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विज्ञान भी हैरान! क्या धरती और ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्य हिंदू शास्त्रों में पहले से लिखे थे?

By Naval Digital

Summary

Topics Covered

  • नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ में छिपा बिग बैंग
  • ककुदमी की कथा में आइंस्टीन का टाइम डायलेशन
  • दशावतार में डार्विन से पहले विकासवाद की झलक
  • ब्रह्मास्त्र का वर्णन परमाणु बम जैसा विनाशकारी
  • विज्ञान और शास्त्र संवाद हैं, प्रतिस्पर्धा नहीं

Full Transcript

कल्पना कीजिए एक ऐसा ग्रंथ जो हजारों वर्ष पुराना है जिसे लिखने वाले ऋषियों के पास ना दूरबीन थी ना प्रयोगशाला ना कोई आधुनिक

यंत्र और फिर भी उन पन्नों में लिखी कुछ बातें आज के विज्ञान की खोजों से इतनी मिलती जुलती हैं कि पढ़ने वाला चौंक जाता

है। क्या यह केवल संयोग है या हमारे पूर्वजों के पास कोई ऐसा ज्ञान था जिसे हम आज सदियों बाद फिर से खोज रहे हैं?

ब्रह्मांड की उत्पत्ति कैसे हुई? समय

कितना विशाल है? क्या दूसरी दुनिया भी हैं? परमाणु क्या है? प्रकाश की गति कितनी

हैं? परमाणु क्या है? प्रकाश की गति कितनी है? क्या समय अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग

है? क्या समय अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग गति से बहता है? यह वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर आधुनिक विज्ञान ने पिछले कुछ 100 वर्षों में खोजा। पर आश्चर्य की बात यह है

इन्हीं में से कई प्रश्नों के संकेत हजारों वर्ष पूर्व ऋग्वेद, उपनिषदों, पुराणों और अन्य प्राचीन ग्रंथों में मिलते हैं। आज की इस यात्रा में हम उन्हीं

रहस्यमई समानताओं की पड़ताल करेंगे। हम देखेंगे वे कौन सी घटनाएं और सच्चाइयां हैं जिन्हें विज्ञान ने आज प्रमाणित किया। पर जिनके संकेत हमारे शास्त्रों में पहले

से मौजूद थे। पर एक बात शुरू में ही स्पष्ट कर दें। यह वीडियो किसी को यह साबित करने के लिए नहीं है कि विज्ञान बड़ा है या शास्त्र। यह वीडियो जिज्ञासा

के लिए है। उस अद्भुत संवाद के लिए जो प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच हो सकता है। कुछ समानताएं गहरी हैं। कुछ

पर बहस है और हम दोनों को ईमानदारी से देखेंगे। तो चलिए हमारे साथ इस रहस्यमई यात्रा पर। पहला रहस्य सबसे बड़ा रहस्य।

यह ब्रह्मांड शुरू कैसे हुआ? आधुनिक

विज्ञान कहता है लगभग 13 अरब वर्ष पूर्व एक अत्यंत सूक्ष्म अत्यंत घने बिंदु से एक महा विस्फोट हुआ जिसे बिड बैंग कहते हैं

और उसी एक बिंदु से संपूर्ण ब्रह्मांड फैलता चला गया। अब सुनिए हजारों वर्ष पूर्व ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में क्या

लिखा है। ऋषि कहते हैं सृष्टि से पहले ना सत्य था ना असत ना मृत्यु थी ना अमरता। केवल एक अनंत अंधकार था और उस शून्य में

एक तत एकम वो एक अपनी ही ऊष्मा से स्पंदित हो रहा था और फिर एक इच्छा जागी एक कंपन

हुआ और सृष्टि आरंभ हुई एक शून्य एक बिंदु और उससे संपूर्ण ब्रह्मांड का फैलना क्या यह विचार आधुनिक बिग बैंग सिद्धांत से मेल

नहीं खाता और पुराणों में तो और भी स्पष्ट प्रतीक है हिरण्य गर्भ यानी स्वर्णिम ब्रह्मांडीय अंडा कहा गया है सृष्टि के

आरंभ में एक स्वर्णिम अंडा प्रकट हुआ जो अनंत जल में तैरता रहा और फिर फूट कर उससे संपूर्ण ब्रह्मांड बना। एक बिंदु से

विस्तार का यह विचार सदियों पुराना है। पर सबसे अद्भुत बात यह है हमारे शास्त्र ब्रह्मांड को एक बार बनने और खत्म होने वाली चीज नहीं मानते। वे कहते हैं सृष्टि

का यह चक्र अनंत है। एक ब्रह्मांड बनता है। फैलता है और फिर विलीन हो जाता है और फिर एक नया जन्म लेता है। आधुनिक भौतिकी

में भी कुछ वैज्ञानिक चक्रीय ब्रह्मांड यानी बार-बार जन्म और विलय वाले ब्रह्मांड के सिद्धांत पर विचार कर रहे हैं। अब यह कहना कि ऋषियों को बिग बैंग का पूरा गणित

पता था। यह अतिशयोक्ति होगी। पर यह मानना कि उन्होंने सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर जो गहन दार्शनिक अंतर्दृष्टि दी वो आज के वैज्ञानिक विचारों से आश्चर्यजनक रूप से

मिलती है यह पूरी तरह उचित है। पर यह तो केवल शुरुआत है। अगला रहस्य समय से जुड़ा है और वहां की समानता और भी चौंकाने वाली

है। आधुनिक विज्ञान कहता है हमारा ब्रह्मांड लगभग 13.5 अरब वर्ष पुराना है। पृथ्वी लगभग अरब वर्ष पुरानी है। यह

संख्याएं इतनी विशाल हैं कि मानव मन इन्हें सहज कल्पना भी नहीं कर सकता। पर दिलचस्प बात यह है दुनिया की अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं ने समय को कुछ हजार

वर्षों में ही सीमित माना। पर हिंदू शास्त्र हजारों वर्ष पूर्व ही समय को अरबों वर्षों में गिनते थे। हमारे

शास्त्रों के अनुसार चार युग मिलकर एक महायुग बनाते हैं जो लगभग 43 लाख 2000 वर्ष का होता है। ऐसे 1000 महायुग मिलकर

बनते हैं ब्रह्मा का एक दिन जिसे कल्प कहते हैं और एक कल्प का मान है 4 अरब 32 करोड़ वर्ष। अब यह संख्या ध्यान से सुनिए।

4 अरब 32 करोड़ वर्ष। और आधुनिक विज्ञान के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4 1/2 अरब वर्ष है। यह समानता किसी को भी सोचने पर

मजबूर कर देती है। जब बाकी दुनिया समय को छोटे पैमाने पर सोच रही थी, तब हमारे ऋषि अरबों वर्षों के चक्रों की बात कर रहे थे।

उन्होंने समय को रेखीय नहीं बल्कि चक्रीय माना जो जन्म लेता है, बढ़ता है और फिर लौट आता है। यह समझ कहां से आई? क्या यह

केवल गहन चिंतन का परिणाम था या इसके पीछे कोई और अंतर्दृष्टि थी? यह प्रश्न आज भी खुला है। पर समय से जुड़ा एक और रहस्य है

जो और भी अविश्वसनीय है। क्या समय अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग गति से बहता है? 20वीं

सदी में महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने दुनिया को एक चौंकाने वाला सत्य बताया। समय हर जगह एक जैसा नहीं बहता। यह सापेक्ष

है। जितनी अधिक गति या जितना अधिक गुरुत्वाकर्षण समय उतना ही धीमा बहता है। इसे टाइम

डायलेशन कहते हैं। यानी अंतरिक्ष में किसी तेज यात्रा पर गया व्यक्ति जब पृथ्वी पर लौटेगा तो पाएगा कि यहां उससे कहीं अधिक

समय बीत चुका है। यह विचार 20वीं सदी में क्रांतिकारी था। पर हमारे पुराणों में हजारों वर्ष पूर्व एक कथा है जो ठीक इसी

विचार की ओर इशारा करती है। यह कथा है राजा ककुदमी और उनकी पुत्री रेवती की। कथा के अनुसार राजा ककुदमी अपनी पुत्री के लिए

योग्य वर चुनने स्वयं ब्रह्मलोक यानी ब्रह्मा के लोक गए। वहां वे कुछ क्षण ब्रह्मा की सभा में संगीत सुनने रुके और फिर ब्रह्मा से अपनी पुत्री के विवाह के

बारे में पूछा। तब ब्रह्मा मुस्कुराए और बोले हे राजन तुम जिन वरों के नाम सोच कर आए थे वे तो कब के समाप्त हो चुके। यहां

तुम्हें जो कुछ क्षण लगे उतने में पृथ्वी पर कई युग बीत चुके हैं। तुम्हारा राज्य तुम्हारे संबंधी सब लुप्त हो चुके हैं।

जरा सोचिए। ब्रह्मलोक में बिताए कुछ क्षण और पृथ्वी पर बीत गए कई युग। यह ठीक वही टाइम डाइलेशन का विचार है जो आइंस्टीन ने

हजारों वर्ष बाद प्रस्तुत किया कि अलग-अलग स्थानों पर समय की गति अलग-अलग होती है। अब यह जरूरी नहीं कि ऋषियों को सापेक्षता

का पूरा गणितीय सिद्धांत पता रहा हो पर यह विचार कि समय हर जगह एक जैसा नहीं बहता उनकी कथाओं में स्पष्ट रूप से मौजूद है और

यह समानता वाकई गहरी है। समय के बाद अब बात करते हैं उस चीज की जो हमारे और संपूर्ण ब्रह्मांड के मूल में है। परमाणु

आधुनिक भौतिकी में पिछले कुछ दशकों से एक चौंकाने वाला विचार चर्चा में है। मल्टीवरिवर्स यानी बहु ब्रह्मांड। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारा ब्रह्मांड

अकेला नहीं है। हो सकता है इसके जैसे अनगिनत ब्रह्मांड हो। हर एक अपने अलग नियमों के साथ। यह विचार आज भी विज्ञान में विवादित और अप्रमाणित है। पर आश्चर्य

की बात यह है यह विचार हमारे पुराणों में हजारों वर्ष पूर्व से मौजूद है। हमारे शास्त्र कहते हैं यह ब्रह्मांड जिसमें हम रहते हैं अकेला नहीं है। ऐसे अनंत

ब्रह्मांड है और हर ब्रह्मांड का अपना ब्रह्मा, अपना विष्णु, अपना शिव है। श्रीमद् भागवत में एक अद्भुत कथा है जिसमें भगवान ब्रह्मा को स्वयं यह एहसास

होता है कि उनके जैसे अनगिनत ब्रह्मा है और हर एक अपने-अपने ब्रह्मांड की रचना कर रहा है। एक अन्य प्रसिद्ध प्रसंग में भगवान कृष्ण के मुख में माता यशोदा को

संपूर्ण ब्रह्मांड, असंख्य लोक, तारे और सृष्टियां एक साथ दिखाई देती हैं। यह प्रतीक अनंतता के उस विचार की ओर इशारा करता है जो मानव कल्पना से परे हैं। जरा

सोचिए। जब आधुनिक विज्ञान अभी हाल में बहु ब्रह्मांड के विचार तक पहुंचा है तब हमारे ऋषि हजारों वर्ष पूर्व अनंत ब्रह्मांडों की बात कर रहे थे। यह समानता वाकई

विचारणीय है। अब एक और अद्भुत समान था। आधुनिक विज्ञान का एक बड़ा सिद्धांत है विकासवाद यानी एवोल्यूशन। यह कहता है कि जीवन सरल जलीय रूपों से शुरू हुआ और

धीरे-धीरे जटिल स्थलीय रूपों तक विकसित हुआ। अंततः मनुष्य तक। अब भगवान विष्णु के दशावतार के क्रम को देखिए। पहला अवतार

मत्स्य यानी मछली। पूरी तरह जलीय जीव। दूसरा कुर्म यानी कछुआ। जल और थल दोनों में रहने वाला उभयचर। तीसरा वराह यानी

सूअर। पूरी तरह स्थलीय जीव। चौथा नरसिंह। आधा पशु आधा मानव। पशु से मानव की ओर संक्रमण। पांचवा वामन, एक छोटे कद का

मानव। और फिर परशुराम, राम, कृष्ण, पूर्ण विकसित मानव। जरा इस क्रम को देखिए। जल से थल तक, पशु से मानव तक। क्या यह क्रम

डार्विन के विकासवाद से आश्चर्यजनक रूप से मेल नहीं खाता? अब यह कहना कि दशावतार डार्विन के विकासवाद का सटीक वैज्ञानिक विवरण है। यह अतिशयोक्ति होगी। क्योंकि

इनका उद्देश्य धर्म की रक्षा है। जीव विज्ञान पढ़ाना नहीं। पर यह क्रम जल से मानव तक की यह यात्रा इतनी व्यवस्थित है कि यह एक गहरी अंतर्दृष्टि को दर्शाती है।

हमारे पूर्वजों ने किसी ना किसी रूप में जीवन के क्रमिक विकास की उस भावना को समझा था। आधुनिक विज्ञान की एक बुनियादी खोज है

परमाणु। यह सिद्धांत कि हर पदार्थ अत्यंत सूक्ष्म कणों से बना है जिन्हें आगे नहीं तोड़ा जा सकता। यह विचार आधुनिक रूप में

जॉन डॉल्टन जैसे वैज्ञानिकों ने कुछ 100 वर्ष पूर्व दिया। पर क्या आप जानते हैं इससे हजारों वर्ष पूर्व एक भारतीय ऋषि ने

ठीक यही विचार प्रस्तुत किया था। उनका नाम था महर्षि कणाद। महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन की स्थापना की और उन्होंने एक

क्रांतिकारी विचार दिया कि हर पदार्थ को तोड़ते अंत में एक ऐसा सूक्ष्मतम कण बचता है जिसे आगे नहीं तोड़ा जा सकता। उन्होंने

इसे नाम दिया अणु और परमाणु। कणाद ने कहा कि यह परमाणु अत्यंत सूक्ष्म है, अविनाशी हैं और शाश्वत है। और जब दो परमाणु मिलते

हैं तो एक द्विअक बनता है और तीन द्विअक मिलकर बड़े कण बनाते हैं और इसी तरह संपूर्ण भौतिक संसार का निर्माण होता है।

जरा सोचिए बिना किसी सूक्ष्मदर्शी के बिना किसी प्रयोगशाला केवल तर्क और गहन चिंतन से कणाद ने वो विचार दिया जो आज आधुनिक

रसायन विज्ञान और भौतिकी की नीव है। यही कारण है कि कई विद्वान उन्हें परमाणु सिद्धांत का जनक कहते हैं। यह हमें एक

गहरा सत्य दिखाता है। प्राचीन भारत में केवल आध्यात्मिक चिंतन ही नहीं बल्कि गहन वैज्ञानिक और दार्शनिक चिंतन भी होता था।

हमारे ऋषि केवल पुजारी नहीं थे। वे विचारक थे, खोजी थे, वैज्ञानिक थे। पर अगला रहस्य आकाश से जुड़ा है और इसे लेकर आज भी सबसे

बड़ी बहस होती है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में बार-बार आकाश में उड़ने वाले यंत्रों का वर्णन आता है जिन्हें विमान कहा गया

है। सबसे प्रसिद्ध है पुष्पक विमान। रामायण में वर्णन है कि रावण के पास पुष्पक विमान था और लंका विजय के बाद भगवान राम इसी विमान से माता सीता और

लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। इस विमान को इच्छा से चलने वाला और आकाश में उड़ने वाला बताया गया है। महाभारत में भी उड़ने

वाले रथों और आकाश में युद्ध का वर्णन है और कुछ ग्रंथों में तो विमानों के प्रकार, उनकी बनावट और उनके संचालन तक का उल्लेख मिलता है। यहां हमें एक बात ईमानदारी से

समझनी होगी। इन वर्णनों को लेकर दो दृष्टिकोण हैं। एक दृष्टिकोण मानता है कि प्राचीन भारत में सचमुच उन्नत तकनीक थी और

यह विमान वास्तविक थे। दूसरा दृष्टिकोण मानता है कि यह काव्यात्मक कल्पना, प्रतीक या दिव्य शक्तियों का वर्णन है। एक ग्रंथ जिसका नाम अक्सर लिया जाता है, वह है

वैमानिक शास्त्र। पर यहां पूरी ईमानदारी जरूरी है। अधिकांश विद्वान मानते हैं कि यह ग्रंथ अपेक्षाकृत आधुनिक काल का है और इसे प्राचीन प्रमाण नहीं माना जा सकता।

इसलिए इसे किसी निर्णायक सबूत के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। पर इससे मूल प्रश्न कम रोचक नहीं होता। सवाल यह है कि हमारे पूर्वजों की कल्पना इतनी विशाल

क्यों थी? उन्होंने आकाश में उड़ने, दूर

क्यों थी? उन्होंने आकाश में उड़ने, दूर देशों तक पहुंचने और अद्भुत यंत्रों के सपने हजारों वर्ष पूर्व क्यों देखे? क्या

यह केवल कल्पना थी या किसी खोई हुई स्मृति की गूंज? इसका उत्तर शायद हम कभी निश्चित

की गूंज? इसका उत्तर शायद हम कभी निश्चित रूप से ना जान पाएं। पर यह प्रश्न अपने आप में अद्भुत है। अब विमानों से भी अधिक

विवादित एक विषय है प्राचीन अस्त्र और इनका वर्णन आधुनिक हथियारों की याद दिलाता है। महाभारत में एक अस्त्र का बार-बार वर्णन आता है ब्रह्मास्त्र।

इसे सबसे शक्तिशाली और सबसे विनाशकारी अस्त्र बताया गया है। अब सुनिए इस अस्त्र का वर्णन कैसे किया गया है। कहा गया है जब

ब्रह्मास्त्र चला तो ऐसा लगा मानो हजारों सूर्य एक साथ चमक उठे हो। एक प्रचंड प्रकाश, एक भयानक ताप और एक विशाल धुएं का

स्तंभ आकाश में उठा। जिस भूमि पर यह गिरा, वहां की धरती वर्षों तक बंजर हो गई। जल विषैला हो गया और जीवित प्राणियों के शरीर

तक गलने लगे। जिन लोगों ने आधुनिक परमाणु बम के प्रभाव के बारे में पढ़ा है उनके लिए यह वर्णन कुछ परिचित सा लग सकता है।

प्रचंड प्रकाश, ताप, धुएं का मशरूम जैसा बादल और दीर्घकालिक विनाश। यही कारण है कि जब आधुनिक युग में परमाणु बम बना तब उसके

निर्माता रॉबर्ट ओपनहमर ने उस विनाश को देखकर भगवत गीता का एक श्लोक याद किया था। पर यहां भी हमें संतुलित रहना होगा। यह

कहना कि प्राचीन भारत में सचमुच परमाणु बम था। इसका कोई पुरातात्विक प्रमाण नहीं है। यह अधिक संभव है कि यह वर्णन युद्ध के

भयानक विनाश को अत्यंत शक्तिशाली और काव्यात्मक भाषा में चित्रित करते हैं। पर फिर वही प्रश्न उठता है इन ऋषियों और

कवियों की कल्पना एक ऐसे महाविनाश तक कैसे पहुंची जो आधुनिक हथियारों से इतनी मिलती जुलती है। यह समानता संयोग है या मानव मन

की उस गहरी समझ का परिणाम जो जानती थी कि शक्ति का दुरुपयोग कैसा विनाश ला सकता है।

शायद इन कथाओं का असली संदेश हथियार नहीं बल्कि चेतावनी है कि अत्यधिक शक्ति अगर विवेक के बिना हो तो संपूर्ण सृष्टि को

नष्ट कर सकती है। अब हम आते हैं एक ऐसे रहस्य पर जो जीवन के निर्माण से जुड़ा है। आधुनिक विज्ञान की एक अद्भुत उपलब्धि है शरीर के बाहर जीवन

का निर्माण जैसे टेस्ट ट्यूब बेबी और क्लोनिंग जिसमें एक ही कोशिका से कई जीव बनाए जा सकते हैं। अब महाभारत की एक कथा

सुनिए। रानी गांधारी के गर्भ से एक मांस का पिंड जन्मा। तब महर्षि वेदव्यास ने उस पिंड को 101 भागों में विभाजित किया और हर

भाग को अलग-अलग घड़ों में विशेष औषधियों और परिस्थितियों में रखा गया और उन्हीं घड़ों से समय आने पर 100 कौरव और एक

पुत्री का जन्म हुआ। जरा सोचिए एक ही स्रोत से कई जीवों का जन्म शरीर के बाहर नियंत्रित परिस्थितियों में क्या यह विचार

आधुनिक क्लोनिंग और परख नली में जीवन निर्माण से मेल नहीं खाता एक और कथा है कर्ण के जन्म की कहा जाता है कि कुंती को एक मंत्र प्राप्त था जिससे वे बिना

पारंपरिक गर्भधारण के संतान प्राप्त कर सकती थी। ऐसी कई कथाएं हमारे शास्त्रों में जीवन के अद्भुत और असामान्य निर्माण

की ओर इशारा करती हैं। अब यहां भी हमें स्पष्ट रहना होगा यह कहना कि प्राचीन भारत में सचमुच क्लोनिंग की तकनीक थी एक बड़ा

दावा है जिसका कोई प्रमाण नहीं। पर यह विचार कि जीवन को असामान्य तरीकों से शरीर के बाहर भी बनाया जा सकता है। यह हमारे

पूर्वजों की कल्पना में मौजूद था और यही कल्पना आज विज्ञान ने वास्तविकता बना दी है। इन कथाओं की खूबसूरती यही है। यह हमें

सोचने पर मजबूर करती हैं कि मानव मन की कल्पना कितनी दूर तक जा सकती है और कैसे कभी-कभी वह कल्पना भविष्य की सच्चाई बन

जाती है। अब हम आते हैं शायद सबसे गहरे रहस्य पर। प्रकाश और गति। आधुनिक विज्ञान ने बताया

प्रकाश की गति इस ब्रह्मांड की सबसे तेज गति है। लगभग 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड। यह मापना आधुनिक यंत्रों के बिना असंभव सा

लगता है। पर एक रोचक बात है। ऋग्वेद के एक श्लोक पर 14वीं सदी के विद्वान सायनाचार्य ने एक टिप्पणी लिखी जिसमें सूर्य के प्रकाश की गति का वर्णन है। कुछ आधुनिक

शोधकर्ताओं ने उस टिप्पणी में दी गई इकाइयों की गणना की तो पाया कि वह संख्या प्रकाश की वास्तविक गति के आश्चर्यजनक रूप से करीब बैठती है। अब इस पर विद्वानों में

मतभेद है। कुछ इसे एक अद्भुत संयोग मानते हैं। कुछ इसे इकाइयों की व्याख्या का परिणाम। इसलिए हम इसे एक निश्चित प्रमाण के रूप में नहीं बल्कि एक रोचक और बहस

योग्य समानता के रूप में देखेंगे। अब बात करते हैं पृथ्वी के आकार की। सदियों तक दुनिया की कई सभ्यताएं मानती थी कि पृथ्वी चपटी है। पर हमारे कई प्राचीन ग्रंथों और

खगोल शास्त्रियों ने पृथ्वी को गोल और अंतरिक्ष में बिना किसी सहारे के टिका हुआ बताया। महान खगोल शास्त्री आर्यभट्ट जो लगभग 1500 वर्ष पूर्व हुए। उन्होंने बताया

कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और यही कारण है कि हमें सूर्य उगता और डूबता दिखाई देता है। उन्होंने ग्रहणों का सही कारण भी बताया कि यह छाया के कारण होते

हैं ना कि किसी राक्षस के कारण। यह समझ उस युग में अत्यंत उन्नत थी। एक और खगोल शास्त्री भास्कराचार्य ने न्यूटन से सैकड़ों वर्ष पूर्व गुरुत्वाकर्षण जैसी

शक्ति का संकेत दिया कि पृथ्वी में एक आकर्षण शक्ति है जो वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है। यह केवल कथाएं नहीं है। यह प्रमाणित गणितीय और खगोलीय ग्रंथ हैं और

यह दिखाते हैं कि प्राचीन भारत में विज्ञान कितना उन्नत था। अब इन सब समानताओं के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न

उठता है इन सब का अर्थ क्या है? तो इन सब समानताओं को देखने के बाद हमारे मन में एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है। क्या हमारे

पूर्वजों के पास सचमुच कोई उन्नत तकनीक थी जो खो गई या यह सब केवल संयोग है? यहां

हमें दो चरम विचारों से बचना होगा। एक चरम यह है कि हर प्राचीन कथा को आधुनिक तकनीक का प्रमाण मान लेना। हर विमान को हवाई

जहाज, हर अस्त्र को परमाणु बम, हर कथा को इतिहास। यह अतिशोक्ति है और इससे हमारे शास्त्रों की असली गहराई कम हो जाती है।

दूसरा चरम यह है कि इन सब समानताओं को केवल संयोग मानकर पूरी तरह खारिज कर देना। यह भी अन्याय है क्योंकि कुछ समानताएं

इतनी गहरी हैं कि उन्हें केवल संयोग कहना कठिन है। सच शायद इन दोनों के बीच है। हमारे ऋषि गहन चिंतक थे। उन्होंने ध्यान,

तर्क और अवलोकन के माध्यम से ब्रह्मांड, समय, जीवन और चेतना के गहरे सत्यों की खोज की। हो सकता है उनके पास आधुनिक यंत्र न

रहे हो पर उनकी अंतर्दृष्टि, उनका दार्शनिक चिंतन इतना गहरा था कि वह कई बुनियादी सत्यों तक पहुंच गया। और यही असल

में सबसे प्रेरणादायक बात है कि सत्य तक पहुंचने के एक से अधिक रास्ते हो सकते हैं। विज्ञान बाहरी दुनिया को नाप कर प्रयोग करके सत्य खोजता है और हमारे

ऋषियों ने भीतर की दुनिया में उतर कर ध्यान और चिंतन से कुछ वैसे ही सत्यों को छुआ। इसलिए यह प्रतियोगिता नहीं है कि विज्ञान बड़ा है या शास्त्र। यह तो एक

संवाद है। एक ही सत्य को दो अलग-अलग दृष्टियों से देखना। और जब हम दोनों को सम्मान देते हैं तब हमारी समझ और गहरी

होती है। तो इस पूरी यात्रा के अंत में एक क्षण रुक कर सोचिए हजारों वर्ष पूर्व कुछ लोग नदियों के किनारे पर्वतों की गुफाओं

में तारों भरे आकाश के नीचे बैठकर इस अस्तित्व के सबसे गहरे प्रश्नों पर विचार कर रहे थे। ब्रह्मांड कैसे बना? समय क्या

है? जीवन क्या है? हम कौन हैं? उनके पास

ना दूरबीन थी ना प्रयोगशाला। पर उनके पास कुछ ऐसा था जो शायद आज हम खोते जा रहे

हैं। एक गहरी जिज्ञासा, एक धैर्य और भीतर झांकने का साहस। और आज हजारों वर्ष बाद जब आधुनिक विज्ञान उन्हीं प्रश्नों के उत्तर

खोज रहा है तब हमें उन प्राचीन शब्दों में एक अद्भुत गूंज सुनाई देती है। मानो समय के पार से हमारे पूर्वज हमसे कह रहे हो।

हमने भी यही प्रश्न पूछे थे। हमने भी इसी सत्य को खोजा था। यह हमें एक गहरा सत्य सिखाता है। ज्ञान किसी एक युग या किसी एक

सभ्यता की बपौती नहीं है। यह एक अनंत यात्रा है जिसमें हर पीढ़ी हर सभ्यता अपना योगदान देती है। हमारे पूर्वजों ने अपनी

अंतर्दृष्टि दी। आधुनिक विज्ञान अपने प्रयोग दे रहा है और यह यात्रा आगे भी चलती रहेगी। इसलिए ना अपने अतीत को

अंधविश्वास कहकर ठुकराइए। ना हर कथा को इतिहास मानकर आंख मूंद लीजिए। बल्कि दोनों को खुले मन से देखिए। जिज्ञासा के साथ,

सम्मान के साथ और विवेक के साथ। क्योंकि सत्य की खोज तभी पूरी होती है जब हम पुराने और नए दोनों से सीखने को तैयार

होते हैं। और शायद सबसे बड़ा सत्य यही है कि यह विशाल ब्रह्मांड और उसमें छिपे अनगिनत रहस्य हमें बार-बार यही याद दिलाते

हैं कि जानने के लिए अभी बहुत कुछ बाकी है और यही जिज्ञासा यही खोज ही हमें मनुष्य

बनाती है। ओम सत्य की खोज अनंत है। हम्म

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