03. Shri Geeta Gyan Yagya - Haridwar - Swami Shravananand Saraswati - 14 to 20 August 2026
By Swami Shravananand Saraswati
Summary
Topics Covered
- Like a Lotus: Live in Water, Carry None
- Renunciation Lives Inside, Not on Your Skin
- What Looks Like Compassion May Be Pure Delusion
- Struggling in Mire Sinks You; Surrender Floats
- Surrender Means Embracing Your Guru's Hardest Ask
Full Transcript
ो देवा जितनो नाम पुत माता पिता
विश्व देवा अदिति पंच जना श पृथ्वी शरा
श शपया शवे देवा श ब्रह शांति
सर्व शतो यत सम ततो अभय कुर स
कुर प्रजा भय पशुभ्य सु जन्म गवाया
तूने दुनिया के प्यार से प्रीत ना लगाई रे
कृष्ण मुरारी से प्रीत ना लगाई रे
कृष्ण मुरार से जन्म गवाया तूने
दुनिया के प्यार से जन्म गवाया तूने दुनिया के प्यार
से प्रीत ना लगाई रे
कृष्ण मुरार से जन्म गवाया तूने
दुनिया के प्यार से जन्म गवाया तूने
दुनिया के प्यार प्यार से ਜ सुंदर सी काया तेरी मेरी जिसने बनाई
है उसी हरि की तूने याद भुलाई
है सुंदर शिकाया तेरी जिसने
बनाई है उसी हरि की तूने तूने याद भुलाई
है जीवन गवाया तूने यूं ही बेकार रे
जन्म गवाया तूने दुनिया के प्यार में जन्म गवाया
तूने दुनिया के प्यार में तुम्ही आया है अकेला
जग में जाएगा अकेला दो दिन की दुनिया प्यारी
दो दिन का मेला आया है अकेला जग में जाएगा अकेला
दो दिन की दुनियादारी दो दिन का मेला साथ ना देगा तेरा
कोई रिश्तेदार रे जन्म गवाया तूने
दुनिया के प्यार में जन्म गवाया तूने
दुनिया के प्यार में प्रीत ना लगाई रे
कृष्ण कृष्ण मुरार से जन्म गवाया तूने
दुनिया के प्यार में जन्म गवाया तूने
दुनिया के प्यार में जन्म गवाया तूने दुनिया के प्यार
में बोलो श्री अलवेली सरकार की जय श्री
वृंदावन बिहारी लाल की जय जय जय श्री राधे जय जय श्री राधे जय जय श्री राधे
आप सभी भगवत प्रेमी भक्त जनों के श्री चरणों में हमारा निवेदन आप सभी भक्त जन वैष्णव जन
साधक जन रसिक जन अपने मोबाइल फोन साइलेंट मोड पर लगाएं। आपस में किसी प्रकार की कोई भी आप चर्चा ना करें। बड़े प्रेम से भाव
से श्रद्धा से मन लगाकर के भक्त और भगवान की आपस की जगत कल्याण करने की जो चर्चा है
श्रीमद् भगवत गीता के माध्यम से परम पूज्य परम श्रद्धे महाराज श्री की सुमधुर अमृतमय भाव भरी दिव्य वाणी में श्रवण करें और
अपने जीवन को धन्य करें। राधे राधे जय श्री राधे। हरि ओम पूर्णा
नंद दया दृषा दस दया प्रसादो दया
ब्रह्म ज्ञान बिनो दया जन मनोनीय के दया विश्व
प्रेम विकास सहा समुदया त्रोक्य
संप दया पूर्णंदया मनी मनसे कांच
कणा यच्छतो वृंदावनेश्वर मुकुंद मनोवे बंसी
विभूषित करा भुजप नेत्र विश्व केव
ब्रजोत्सव भक्ति वस्य देव पांडव पते
मम दे दास्यम ओम ओम नमः श्री परम हंसा
स्वादित चरण कमल चिन मकरंदाय भक्तजन मानस निवासाय श्री रामचंद्राय
वागीशाय यस नारायण नारायण श्रीमन नारायण
नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण लक्ष्मी नारायण
नारायण नारायण લક્ષ્મી नारायण नारायण नारायण
लक्ष्मी नारायण नारायण नारायण लक्ष्मी नारायण नारायण
नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण सदगुरु नारायण
नारायण नारायण सदगुरु नारायण नारायण नारायण
सदगुरु नारायण नारायण नारायण सदगुरु नारायण नारायण
नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण
नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण राम नारायण नारायण
नारायण राम नारायण नारायण नारायण राम नारायण
नारायण नारायण राम नारायण नारायण नारायण
कृष्ण नारायण नारायण नारायण कृष्ण नारायण नारायण
नारायण कृष्ण नारायण नारायण नारायण नारायण કૃષ્ણ નારાયણ
नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण भजमन नारायण नारायण
नारायण भजमन नारायण नारायण नारायण भजमन नारायण
नारायण नारायण भजमन नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण श्रीमन श्रीमન नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण
नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण
श्रीमन नारायण नारायण नारायण श्रीमन नारायण नारायण नारायण
बोलो भक्त व्सल भगवान भगवान की सदगुरुदेव भगवान
श्री वृंदावन बिहारी लाल की जय जय जय श्री राधे बस पांच मिनट पांच मिनट
अरे भाई गड़बड़ मत करो प्यारे पैसा कम दे रहे हो तो हमको बताओ काम आ रहा है
वही रहता है बस ऐसे ही आ रहा है इसमें से आ रहा है महाराज जी इसमें से आ रहा है एक स्पीकर में से आओ हम सब मिलकर के
भाव पूर्ण हृदय से मधुराद मधुर मनमोहन का चिंतन करते हुए उनकी लीलाओं का चिंतन करते हुए उनकी
क्रियाओं का चिंतन करते हुए हम सब मधुराष्टक का प्रथम पाठ करें। जिन लोगों के पास स्तुति पत्रिका होगी
उसमें अंकित है ना भी हो तो अंतिम चरण को हम लोग बार-बार गुनगुनाते हैं मधुराति पते रखिलम मधुरम आप इसे गुनगुनाइए
आपका अंतःकरण मधुरता से भरेगा रस से परिपूर्ण होगा इसलिए हम सब मिलकर के प्रथम मधुराष्टक का पाठ करें उसके बाद भगवती
गीता के शरण में जाकर के गीता का रस पान करें। अमृत पान करें। पहले हम सब मिलकर के मधुराष्टक का पाठ करें।
मधुरम मधुरम वदनम मधुरम नयनम
मधुरम हसितम मधुरम हृदयम मधुरम गमनम
मधुरम मधुराधिपति रखिलम मधुरम मधुराधिपते रखिलम
మधरम मधुरम मधुरम वदनम मधुरम नयनम
मधुरम हसितम मधुरम हृदयम मधुरम गमनम
मधुरम मधुराधिपते रखिलम मधुरम मधुराधिपते रखिलम
मधुरम मधुराधिपते रखिलम मधुरम वलितम मधुरम
चलितम मधुर मधुरम भ्रमित मधुरम मधुराधिपते रखिलम
मधुरम मधुराधिपते रखिलं मधुरम जय हो तुम्ही
वेणु मधुर रेणु मधुर पाणिर मधुर पादो
मधुर वेणु मधुर रेणु मधुर पाणिर मधुर
पादो मधुरम नृत्यम मधुरम सक्षम मधुरम
मधुराधिपते रखिलम मधुरम मधुराधिपते रखिलम मधुरम
मधुराधिपते रखिलम मधुरम गीतम मधुरम
गीतम मधुरम भक्तम मधुरम सुम मधुरम
गीतम मधुरम पीतम मधुरम मुक्तम मधुरम
सुतम मधुरम रूपम मधुरम तिलकम मधुरम मधुराधिपते
रखिलं मधुरम मधुराधिपते रखिलं मधुरम जय हो
करणम मधुरम तरम मधुरम हरणम मधुरम सुवर्णम
मधुरम करणम मधुरम तरम मधुरम हरणम मधुरम
स्मरणम मधुरम वितंम मधुरम शितंम मधुरम
मधुराधिपते रखिलं मधुरम मधुराधिपते रखिलं मधुरम
मधुराधिपते रखिलं मधुरम गुंजा मधुरा माला मधुरा
यमुना मधुरा नीची मधुरा गुंजा मधुरा माधुरा
यमुना मधुरा विधि मधुरा सलंम मधुरम कमलम
मधुरम मधुराधिपते रखिलम मधुरम मधुराधिपते रखिलम
मधुरम मधुराधिपते रखिलं मधुरम ओम गोपी
मधुरा लीला मधुरा युक्तम मधुरम भक्तम
मधुरम गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तम मधुरम
भक्तम मधुरम दृष्टम मधुरम सृष्टम मधुरम
मधुराधिपते मधुरम मधुराधिपते रखिलं मधुरम मधुराधिपिलं
मधुरम गोपा मधुरा गाओ मधुरा मधुरा
सृष्टि मधुरा गोपा मधुरा गाऊं मधुरा
कृष्ण मधुरा सृष्टि मधुरा ललितम मधुरम हरितम
मधुरम मधुराधिपते रखिलम मधुरम मधुराधिपते मधुरम
मधुराधिपति रखिलं मधुरम मधुरम मधुरम वनं मधुरम
नयनं मधुरम हसितम मधुरम हृदयम मधुरमनम
मधुरम मधुरा रखिलम मधुरम मधुराधिपते रखिलम
मधुरम मधुराधिपते रखिलम मधुरम मधुराधिपते
रखिलम मधुरम जीवन धन जीवन सर्वस्व आराध्य श्री सदगुरुदेव भगवान के
युगल पावन पवित्र चरणारविंद में साष्टांग वंदन अनंत श्री समलंकृत पूज्य
दंडी स्वामी जी महाराज अनंत श्री समलंकृत पूज्य बाबा जी आदरणीय मां जी
विद्वत वृंद भगवान से भगवान के नाम से
भगवान के ज्ञान से भगवान के भक्तों से अनुराग रखने वाले भक्त वृंद एवं मातृ
शक्ति आप सब के रूप में अपने आराध्य की ही अनेकानेक आकृतियों का दर्शन करता हुआ
आप सबको उन्हीं के अनेकानेक रूपों में निहारता हुआ मैं बारंबार वंदन करता हूं। यह समस्त संसार
परमात्मा की ही रचना है। इन्होंने माया के द्वारा
सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के द्वारा इस सृष्टि का सृजन किया है। सृष्टि के प्रारंभ से ही दो प्रकार की वृत्तियां आसुरी वृत्ति
दव वृत्ति इन दोनों का युद्ध चलता रहता है। चलता रहेगा।
हमारा शरीर भी कुरुक्षेत्र ही है, धर्म क्षेत्र ही है। हमने तो कई बार अनुभव किया है कि अंदर भी
युद्ध चलता है, विचारों में भी युद्ध चलता है। और कई बार व्यक्ति आज की भाषा में कहें तो कंफ्यूज हो जाता
है कि धर्म क्या है? अधर्म क्या है? कर्तव्य
क्या है? अकर्तव्य क्या है?
क्या हमें करना चाहिए? क्या हमें नहीं करना चाहिए?
बहुत सारी विडंबनाएं, बहुत सारे प्रश्न उसके मनमानस में खड़े हो जाते हैं। इन संपूर्ण प्रश्नों का समाधान करने के
लिए ऋषियों ने इन ग्रंथों का सृजन किया है।
रामचरित्रमानस श्रीमद भगवत गीता पुराण
और लगभग सभी ग्रंथों में प्रश्न उत्तर की परंपरा है।
कोई न कोई प्रश्न पूछता है और उसका उत्तर गुरुजन प्रदान करते हैं। इसलिए संत लोग गुनगुनाते हैं। राम कथा
सुंदर करतारी संशय विहग उड़ावन हारी। भगवान की कथा
एक ताली है। जैसे वृक्षों पर पक्षी बैठे हो और ताली की धुन से उड़ जाते हैं।
वैसे हमारे मन मस्तिष्क में यदि संशय के कोई पक्षी बैठे हो तो निश्चित रूप से उड़ जाते हैं।
हमारी अनुभूति तो ऐसी है। आपके चित्त में किसी भी प्रकार का प्रश्न क्यों ना हो आप पूछो भी नहीं।
और आप सत्संग में बैठो तो निश्चित रूप से उसका समाधान आपको मिल जाएगा। व्यासपीठ
आपके प्रश्नों को सुन भी लेती है और उन प्रश्नों का समाधान भी कर देती है। आइए हम सब मिलकर के
कुरुक्षेत्र के रणांगन में चले जहां हमारे नंद नंदन यशोदा नंदन ब्रजन वंदन
सारथी बनकर के बैठे हैं। हमारे संतों ने मंगलाचरण में एक बात कही है। प्रपन्न पारजाताय
तोत्र वेत पाणय यह श्रीमान जी कौन है?
इनके चरणों में यदि कोई प्रपन्न हो जाए तो यह पारिजात कल्प वृक्ष का काम करते हैं।
आपके चित्त में कोई भी कामना हो उस कामना को पूरा करने में समर्थ है। इस समय तो
घोड़ों की बागडोर लेकर के बैठे हैं। इतना ही नहीं ज्ञान मुद्रा को धारण किए हुए हैं।
ये श्री कृष्ण का ध्यान है। ज्ञान मुद्रा को धारण करने वाले श्री कृष्ण अर्जुन को गीतामृत पिलाने के लिए उन्मुख
हैं। प्रातः काल की पावन पवित्र बेला हम में सब श्रवण कर रहे थे। संजय धृतराष्ट्र जी को यह कथा सुना रहे
हैं। यह चिंतन सुना रहे हैं कि श्री कृष्ण को अर्जुन ने कहा सेनर भयो मध्य रथम स्थापत
हे अचुत हमारे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में खड़ा करो। निश्चित रूप से
कोई सामान्य सारथी होता तो मना कर देता। किंतु कृष्ण सारथी हैं। तुरंत आज्ञा पालन करके
रणांगन में मध्य में कहां पर खड़ा करते हैं?
जहां समीर से भीष्म पितामह के दर्शन हो रहे हैं। गुरु द्रोणाचार्य के दर्शन हो रहे हैं।
इन महा पुरुषों का दर्शन हो रहा है। बड़े-बड़े रिश्तेदारों का दर्शन हो रहा है। अर्जुन ने परता दृष्टि घुमाई।
और जितने युद्ध में खड़े हुए लोग थे मुखिया के रूप में सब उनके अपने थे। कोई पराया नहीं था।
स्वाभाविक है विचार आया कि अगर इनके साथ हम युद्ध करते हैं और युद्ध में जीत भी जाते हैं तो सब मरे
हुए लोगों के बाद क्या राजा बनकर के राजा बनने का सुख मिलेगा?
विचार करने लगे, धर्म का चिंतन करने लगे। और श्री कृष्ण से अपने हृदय के संपूर्ण भावों को व्यक्त किया।
मैं कई बार निवेदन करता हूं कभी भी डॉक्टर से रोग नहीं छुपाने चाहिए
और गुरु से दोष नहीं छुपाने चाहिए। अगर आप डॉक्टर से रोग छुपाओगे तो इलाज कैसे करेगा?
और गुरु से यदि दोष छुपाओगे तो इसका इलाज कैसे होगा?
और हम आपको गारंटी देते हैं कि जो सच्चा डॉक्टर होगा तुम्हारा रोग चाहे कितना खतरनाक क्यों ना
हो कभी तुमसे घृणा नहीं करेगा। क्योंकि रोग के हेतु अलग-अलग होते हैं
और डॉक्टर लोग समझते हैं कि रोग का हेतु कोई एक नहीं है। मैं कई बार लोगों को निवेदन करता हूं बोर में
एक 45 वर्ष के युवक को एड्स की बीमारी हो गई। मैं वहां कथा करने गया था। मेरा परिचय था उस बालक से।
मैं मिलने गया। अस्पताल में था। अब तो शरीर नहीं रहा।
रो रहा था। मैं उससे मिलने गया तो उसने कहा कि गुरु जी बड़ी विडंबना है। हमने कहा क्या
विडंबना है?
बोले ना तो मेरे माता-पिता हम पर विश्वास करते हैं ना मेरी पत्नी विश्वास करती है। मेरी एक 20 साल की बेटी है वह भी हम पर
विश्वास नहीं करती। सबको लगता है कि हमने दुष्टचरित्रता कहीं की है। क्योंकि इस रोग का कारण मुख्य कारण तो वही
है। किंतु गुरु जी मेरे चरण पकड़ कर बैठा था। मैं सच कहता हूं मैंने कोई दुशत्रा नहीं
की है। तो हमने कहा मुझे विश्वास है। मैं आपसे मिलने इसलिए आया हूं। तो रो पड़ा। बोले कि डॉक्टर और आपके अतिरिक्त आज तक किसी ने हम पर विश्वास
नहीं किया। हमने कहा डॉक्टर को भी पता है इस रोग के बहुत सारे अन्य कारण भी हैं।
केवल एक मुख्य कारण ही नहीं है। बाद में शरीर पूरा हो गया। मैं कई बार चिंतन करता हूं। हमारे जीवन
में जो दोष आते हैं वो दोष केवल इस जन्म के कारण नहीं आते हैं। कई बार जन्म जन्म के संस्कार पीछे से आते
हैं। अभी मैं मार्कंडेय पुराण की कथा कह रहा था। उसमें एक विद्वान ब्राह्मण और उसके पिता
की वार्ता है। बहुत अद्भुत वार्ता है। पिता उस अपने बालक को समझा रहा था कुछ। कि बेटा गुरु चरणों में जाकर वेदा अध्ययन
करो फिर ब्याह करो पितृ ऋण ऋषि ऋण से उण होकर के फिर आध्यात्म की यात्रा में प्रयुक्त हो जाओ
उस बालक ने कहा कि हमको 10,000 जन्मों से ज्यादा अपने जन्म की स्मृति है। 10,000 जन्मों से ज्यादा
और हमने किस किस दिन में क्या-क्या किया उसे हमें स्मरण है। कितनी बार मैं बहुत बड़ा विद्वान भी बना।
विद्यार्थियों को पढ़ाता भी था वेद। किंतु तब भी मैं दुख से नहीं छूट पाया। तो मैं निवेदन इतना ही कर रहा था कि जन्म
जन्म के संस्कार होते और कब वह संस्कार प्रकट हो जाए कुछ पता नहीं है। जो कृषक होंगे वह जानते हैं
खेत में जो खरपतवार का बीज पड़ता है वो बोया नहीं जाता है। अपने आप पड़ता है। और
जैसे पानी मिलता है तो अपने आप अंकुरित हो जाता है। ऐसे काम के क्रोध के लोभ के मोह
के संस्कार हमारे आपके जीवन में जन्म जन्म के पड़े हैं। जहां अनुकूलता का पानी पड़ेगा वहां ये सारे के सारे दोष खड़े हो जाते
हैं। आप कभी विचार करना कभी चिंतन करना। ऐसे ऐसे ऋषियों की कथा है।
आपने सही कई बार सुना होगा जिनके नाम से इस देश का नाम भारत है। जिनका नाम भरत था। ऋषभदेव के पुत्र थे।
बहुत बड़ा भरा पूरा परिवार था। सही समय पर घर द्वार छोड़कर के वन की ओर गमन कर गए थे। नाती थे, पोते थे,
सब थे। किंतु एक हिरण के बालक से राग हो गया और उनको हिरण बनना पड़ा।
हमारे आराध्य गुरुदेव कहते थे सावधान साधु ये दिल की गुंदरी कब कहां और किससे सिल जाएगी कुछ पता नहीं है।
इसलिए कौन सा दोष कब कहां प्रकट हो जाएगा। मैं तो बचपन से संतों की शरण में हूं। जो संत कवि कहते थे हमारे मित्र थे। कई
हमारे गुरुजन थे। कहते थे कि मैं कभी आश्रम नहीं बनाऊंगा। कभी पैसा नहीं छूंगा
और आश्रम भी बना लिए और चंदा भी मांगना प्रारंभ कर दिया। तो कब कौन सा दोष कहां प्रारंभ हो जाएगा
उसका पता नहीं है। तो जो गुरुजनों के भाग्यशाली तो नारायण वो हैं जिनको गुरुजन प्राप्त है।
मैं अर्जुन को भी प्रणाम करता हूं। आप कहोगे क्यों प्रणाम करते हो? तो
क्षत्रिय है। मैं उसके भाग्य को प्रणाम करता हूं। आप जरा विचार करो कितने लोगों के जीवन में मोह आता है। किंतु मोह निवृत्त करने के
लिए क्या गुरुजन उपलब्ध होते हैं?
दुर्लभो मानुषो देहो देह नाम क्षण भंगुर
तत्राप दुर्लभम मनने बैकुंठ प्रिय दर्शनम मनुष्य शरीर दुर्लभ है किंतु बंधुओं ध्यान रखना यह दुर्बल भी है।
दुर्बल यह है कि पता नहीं कब कहां कैसे इसका शरीर का प्राण अंत हो जाए। इस शरीर का मरना आश्चर्य नहीं जीना आश्चर्य है।
ध्यान रखिएगा उसमें भी दुर्लभ है कि सद्गुरु की प्राप्ति हो जाए।
अर्जुन का भाग्य है कि सारथी के रूप में उसको जगत गुरु प्राप्त है। सारथी के रूप में
उसने जैसे ही परिता दृष्टि डाली गुरु द्रोणाचार्य का दर्शन किया। भीष्म पितामह का दर्शन किया।
सारे परिवारी जनों का दर्शन किया। उसने सबके नाम गिनाए हैं। कौन-कौन खड़ा है?
युद्ध के परिणाम पर भी विचार किया। ध्यान रखिएगा जो परिणाम पर विचार करके कार्य करता है वह बुद्धिमान कहलाता है।
कि यदि युद्ध होता है और हम लोग जीत भी जाते हैं समाज के लिए।
अधिकतर स्त्रियां विधवा हो जाएंगी। माताएं पुत्र विहीन हो जाएंगी और समाज में फिर अत्याचार दुराचार का संचार हो जाएगा।
जिससे संताने उत्पन्नोंगी तो वर्ण संकरोंगी और संताने यदि वर्ण संकर होंगी तो निश्चित रूप से पितृ लोग नर्क में चले
जाएंगे और कब तक नर्क में रहेंगे कुछ पता भी नहीं है। तो पितरों पर दृष्टि डालकर, समाज पर
दृष्टि डालकर सबका चिंतन करते करते अर्जुन की बुद्धि ने काम करना बंद कर
दिया। विज ससम चापम शोक संविग्न मानस
उसके मानस को शोक ने पकड़ लिया। यह खतरनाक है। जी। मैं आजकल कई बार कहता हूं।
हम लोग चंद्रमा पर चले गए। हम लोगों ने बहुत कुछ आविष्कार कर लिया है। बहुत कुछ कलाएं सीख ली है। किंतु जीवन
जीने की कला भूल गए। आज जीवन की सामग्रियां बहुत है।
किंतु जीवन जीने की कला नहीं है। जीवन जीने की कला क्या है?
अगर आप सुखी रहना चाहते हो, आनंद में रहना चाहते हो तो इन तीन से दूरी बनाकर रखो।
शोक से, भय से और मोह से। यह शोक भूत का होता है और तुम्हारे जीवन को मरगट
बना देगा। शोक में दो ही बातें होंगी। भूत में दो बातें होती है कि तो आपके प्रिय आपको छोड़कर चले गए
होंगे तो यदि आप अपने प्रियजनों का बहुत स्मरण करोगे तो भूत आपके मनमानस पर बैठ जाएगा। हम कई बार देखते हैं, लोगों से बातचीत करते हैं
तो आश्चर्य लगता है। लगभग लोगों को भूत ने पकड़ रखा है। हम वृंदावन में भी देखते हैं जैसे कोई बड़े बूढ़े मिलते हैं। कहते हैं आज से 25
साल पहले वृंदावन ऐसा था। आज हम लोग घुस नहीं पाते। अब ये भूत की चर्चा करके मिलेगा क्या?
अगर आप 25 साल 50 साल पहले हरिद्वार का चिंतन करने लगोगे। कहोगे पहले ऐसा था लोग ऐसे थे अब ऐसे हो गए इसका बार-बार चिंतन करने से कुछ मिलने वाला है
और यदि आप चिंतन करने लगो कि भविष्य में ऐसा होगा अभी हमको किसी ने बताया किसी महापुरुष ने
कह दिया 2032 में सृष्टि का लय हो जाएगा पूरे विश्व में केवल 60 करोड़ लोग बचेंगे भविष्यवाणी है अमुक अमुक ग्रंथ में लिखा
है एक सज्जन हमारे पास आए। कई लोग आए। एक सज्जन हमारे पास आए। बोले कि ऐसे मैंने सुना है 32 में ऐसासा होने वाला है। होगा
कि नहीं होगा? हमसे पूछने लगे। तो हमने कहा भाई संत ने कहा है तो होगा। किंतु आप एक बात बताओ आपका विश्वास है होगा? तो
हंसने लगे। बोले थोड़ा थोड़ा है। तो हमने कहा एक काम करो तुम्हारे पास पैसा कितना है?
तो बोले महाराज कम से कम 100 करोड़ तो होगा। हमने कहा बात बन गई। हम दोनों हरिद्वार चलते हैं
और 32 में अभी कितने साल हैं?
तो कहा 32 तक ये 100 करोड़ रुपया खर्चा करना है अपने को। खूब संतों का भंडारा करेंगे, खूब सत्संग करेंगे, सब कुछ करेंगे।
और 32 में तो वैसे ही सब नाश होने वाला है। तो हंस के बोले यदि नहीं हुआ तो
हमने कहा यदि नहीं होगा तो जैसा मैं हूं वैसा तू हो जाएगा। बात बराबर है। काहे को टेंशन लेना है? जी
ध्यान रखना भविष्य का बहुत ज्यादा विचार मत करो। वर्तमान में रहो।
भविष्य जब भी आएगा तो वर्तमान बनकर आएगा। और वर्तमान में भी किसी से मोह मत करो।
रहने जीने की कला है। जैसे कमल जल में रहता है।
कमल का जीवन जल है। ध्यान रखना कमल जल में रहता है। किंतु याद रखना
कमल में जल नहीं रहता है। कमल जल में रहता है किंतु कमल में जल नहीं रहता है। यह शरीर भले संसार में
रहे किंतु हमारे मन में संसार ना रहे। यह जीवन जीने की कला है। अगर यह कला आप लोगों के जीवन में आ गई तो
जहां रहोगे आनंद में रहोगे। क्योंकि आप सब आनंद स्वरूप ही हो। कोई दुख स्वरूप है ही नहीं।
क्योंकि हम सब ईश्वर के अंश हैं। और ईश्वर के अंश होने के कारण जो अंशी की विशेषताएं होती है वह अंश में होती हैं।
आप अपने को पहचानो। हमारे जीवन में दुख तभी आता है जब हम किसी के राग में फंस जाते हैं। किसी की मोहब्बत
में फंस जाते हैं। अर्जुन के जीवन में यह मोहब्बत में फंस गए अर्जुन। इनको लगने लगा कि हमारे गुरु जी हैं। ये
हमारे पितामह जी हैं। ये हमारे भ्राता जी हैं। ये हमारे मामा जी हैं। आदि आदि सब के संबंध एक निवेदन मैं करना
चाहता हूं। मेरे को बहुत साल तक बड़ी तकलीफ हुई। तकलीफ क्या थी?
तकलीफ यह थी यही ऋषिकेश में रहता था। अवस्था बहुत छोटी थी। एक महात्मा थे। वह गौेश्वर संप्रदाय के
महात्मा थे। उनका एक छोटा सा पुत्र था पांच वर्ष का। पांच वर्ष में उन्होंने गीता उनको पढ़ा दी
थी। तो साथ में मैं भी वो पांच वर्ष का होगा। मैं 12 वर्ष का होगा। तो गीता में कई जगह माया शब्द का प्रयोग है। उपनिषदों में भी माया शब्द का प्रयोग
है। तो बार-बार पूछता था प्रभु जी यह माया क्या है? वो पूछता था प्रभु जी यह माया
क्या है? वो पूछता था प्रभु जी यह माया क्या है? तो जैसे वो पूछता था प्रभु जी
क्या है? तो जैसे वो पूछता था प्रभु जी माया क्या है? तो नाराज होकर के कहते थे मां तेरी माया तेरी मां है।
क्योंकि शायद भर में मां से फंस गए थे वो विदेश गए थे कहीं तो मां से फंस गए तो वो हो गया। तो मां को कहते थे कि तेरी मां माया है।
तो जब से मैंने यह सुना छोटी सी उम्र थी तो हमारे चित्त में संस्कार पड़ गया। संस्कार यह पड़ गया कि स्त्री माया है।
अब मैं ना स्त्रियों को कभी देखता था ना स्त्रियों से बात करता था और हृदय में स्त्रियों के प्रति घृणा का भाव भर गया।
कि यह बहुत खतरनाक है। लगता था यही नर्क का दरवाजा है। क्योंकि द्वारस मेकम नरकस नारी
आदि आदि वाक्य पढ़ता था। कई वर्ष तक मैं इस घृणा की आग में जला हूं। यहां तक कि हमारे गुरु जी के पास भी कोई स्त्री आ जाती थी तो मैं उसको डांट कर
भगाता था कि भागो यहां से। क्योंकि वह नंगे रहते थे महाराज जी तो मैं भगाता रहता था वो तो भगवान की कृपा हुई कि हमें
वृंदावन मिल गया और हमारे महाराज श्री की शरण मिल गई जब वृंदावन आया और महाराज श्री
की शरण मिली शास्त्र जब अध्ययन किए उस समय लगा कि स्त्री माया नहीं है। माया क्या
है? मैं अरु मोर तोर त माया इसी का नाम
है? मैं अरु मोर तोर त माया इसी का नाम माया है। यह शरीर मैं हूं और संसार मेरा है। इसका
नाम माया है। हम घर द्वार छोड़ के चाहे लाल कपड़ा पहन ले चाहे भूति रमा लें चाहे नंगे रहे
यदि शरीर के प्रति हमारी अहंता है और जगत के प्रति हमारी ममता है तो हम माया के शिकार हैं।
माया ने हमको पकड़ रखा है। स्त्री नहीं बांधती है। स्त्री के प्रति जो ममत्व है वह बांधता है। स्त्री तो महाराज स्त्री समझता संपूर्ण
स्त्रियां भगवती स्वरूपा अगर हमको लगता है हमारे आराध्य ना मिले होते गुरुदेव ना मिले होते तो मैं कहीं घृणा की आग में जल रहा होता द्वेष की आग
में जल रहा होता और ध्यान रखना घृणा का नाम वैराग्य नहीं होता है द्वेष का नाम भी वैराग्य नहीं होता है रागत द्वेष की
शिथिलता का नाम वैराग्य होता है कोई कपड़ा ना पहनने से वैराग्यशाली नहीं होता है। अब अन्यथा मत मानिएगा
क्या पशु कोई कपड़ा पहनते हैं?
तो क्या पशु वैराग्यशाली हो गए?
और पैसा ना रखने से कोई वैराग्यशाली नहीं होता है। आप हमको बताइए कि हाथी का किसी बैंक में खाता है।
शेर का कहीं खाता है, गायों का खाता है। कौन सा पशु पैसा रखता है पास में?
तो क्या सारे विरक्त हो गए? क्या सारे
वैराग्यशाली हो गए?
ना तो कपड़ा का त्यागना वैराग्य है। ध्यान रखिए ना संग्रह करने का नाम वैराग्य है या संग्रह छोड़ने का नाम वैराग्य है। वैराग्य
का सच्चा स्वरूप है इसको अपना ना मानना। आपने यदि इसको अपना माना उसी दिन आप फंस गए। एक बहुत बड़ा दिव्य ग्रंथ है। शायद आपको
कभी सुनने का अवसर मिला हो। उसका नाम महमायण भी है और योग वाशिष्ट भी है। मैं तो भगवत कृपा से उसका भी चिंतन करता
हूं। योग वाशिष्ट में एक बड़ी रसीली कथा है। योग वाशिष्टकार ने वर्णन किया कि एक राजा थे। उनकी रानी का नाम चुड़ाला था।
बड़ी योगिनी थी। बड़ी सिद्ध थी। आत्मज्ञानी थी। तो राजा को हरदम वैराग्य की चर्चा सुनाती थी।
एक दिन राजा ने क्या किया? वैराग्य की
चर्चा सुन सुन के उन्होंने मुकुट उतारा। सारे कपड़े उतार दिए और कॉपीिन पहनकर जंगल में चले गए।
जंगल में जाकर उन्होंने झोपड़ी बना ली। झोपड़ी में रहते थे। कॉपीिन पहनते थे। किंतु वह चुड़ाला बड़ी योगिनी थी, सिद्ध थी।
उसको लगा कि ऐसे कॉपीन पहन के जंगल में रहने से मुक्ति मिलने वाली नहीं है। तो उसने बेस बदल के राजा के पास जाना
प्रारंभ कर दिया। राजा से सत्संग करती थी वो देवी चुड़ाला। एक दिन राजा को कहा कि तुमने क्या त्यागा?
अच्छे-अच्छे कपड़ों की जो इच्छा तुम्हारे चित्त में थी वह मानते थे यह कपड़े हमारे हैं। वो छोड़कर तुमने कॉपीन को अपना मान लिया।
एक बहुत बड़े महल को पहला अपना मानते थे कि महल हमारा है। अब महल को ना मानकर एक झोपड़ी को अपना मानते हो। तो यदि झोपड़ी को अपना मानते हो, कौपीन को
अपना मानते हो, तो अभी तुम्हारा वैराग्य हुआ कहां?
उन्होंने तुरंत क्या किया? भावावेश में
आकर झोपड़ी में आग लगा दी। कॉपी उतार कर भी फेंक दी। चुड़ाला बहुत हंसी और चुड़ाला ने हंस के कहा कि अभी भी आप
इसको अपना मानते हो। यदि आपने अपना ना माना होता तो आग लगाने का प्रयास काहे को करते?
अरे भाई दूसरे की वस्तु में क्या आग लगानी है? मैं एक बार अपने गुरु जी के साथ में
है? मैं एक बार अपने गुरु जी के साथ में बंबई में था। तो मुंबई में छोटा सा स्थान है तो हम दो
ही थे गुरु चेला तीसरा कोई नहीं गर्मी का समय था मैं वहां स्नान करके कमरे में बैठ आया था और कबूतर कुछ आ जाते थे तो उनको
नमकीन खिला रहा था और गुनगुना रहा था मस्त राम मस्ती में आग लगे बस्ती में मस्त राम मस्ती में आग लगे बस्ती में करीबन 20 साल
पहले की घटना है तो गुरु जी कब पीछे से पैर दबाकर आए। हमको पता ही नहीं चला। आकर पीछे खड़े होकर बोले बस्ती तेरे बाप की है।
क्यों लगे बस्ती में आग?
बस्ती तेरे बाप की है। मैं तो मौन हो गया। गुरु जी पीछे खड़े थे। तो हमने कहा ऐसा सुना है लोग बोलते हैं। तो उन्होंने कहा कि अगर बोलने का मन हो तो
ऐसा बोला करो मस्त राम मस्ती में आग लगे हमरी गिरस्ती में। बस्ती में काहे को आग लगाता है? तो मैंने कहा आग मस्त राम मस्ती
लगाता है? तो मैंने कहा आग मस्त राम मस्ती में आग लगे हमारी गृहस्ती में बोले तू तो यह भी बोलने का अधिकारी नहीं है। हमने कहा
क्यों? बोले तुम्हारी गृहस्ती है कहां?
क्यों? बोले तुम्हारी गृहस्ती है कहां?
तुम्हारे पास जो है वो सब गुरुजनों का है। तुम्हारे आराध्य का है। उसको तुम्हारे आग लगाने का अधिकार नहीं है। संपत्ति सब
रघुपति कह आही। जब संपत्ति सब रघुनाथ की है, हमारा है ही नहीं कुछ तो हमें आग लगाने का अधिकार कहां से है? हमको उस दिन
बात गई कि यह जो ममता है ना आप यह मत समझिएगा कि कपड़े उतारने से ममता मिट जाती है या देश परिवर्तित करने से ममता मिट
जाती है। यह भष परिवर्तित करने से ममता मिट जाती है। हमने देखा जितना जितना प्रेम संसारी लोग अपने बच्चों से करते हैं। कई बार उससे ज्यादा प्रेम महात्मा लोग अपने
चेलों से करने लगते हैं। अरे पले हुए आश्रम में पक्षियों से करने लगते हैं। पशुओं से करने लगते हैं।
तो कहीं भी यदि राग होगा तो विषाद होगा ही होगा। राग का परिणाम विषाद है। तो ये विषाद योग
की चर्चा हमने की है। जैसे महाराज इसने धनुष रखा और शोक संविग्न मानस शोक से उसका मानस भर
गया। जैसे शोक से मानस भरा और बैठ गया। टीकाकारों ने एक बात बड़ी बढ़िया कही।
उसके बैठने पर धृतराष्ट्र बड़ा प्रसन्न हुआ। धृतराष्ट्र सोचने लगा कि अब युद्ध तो होगा
नहीं तो हमारे बच्चों का राज्य उसके पास ही बना रहेगा। तो तुरंत जिज्ञासा से फिर क्या हुआ? तो यहां प्रश्न नहीं है।
क्या हुआ? तो यहां प्रश्न नहीं है। टीकाकारों से मसूदन सरस्वती महाभाग ने वो
प्रश्न उठाया है क्योंकि यहां भी तुरंत आप जरा ध्यान देंगे। यह जो प्रथम अध्याय का
लास्टवा श्लोक है 47 नंबर का उसके पहले भी संजय वाच है। यह संजय ने सुनाया है धृतराष्ट्र जी को और द्वितीय अध्याय
प्रारंभ होता है तो पुनः संजय वाच फिर संजय बोल पड़े अभिप्राय क्या है इसके पीछे कि इसके बीच में कुछ वार्ता है जो उसमें लिखी नहीं गई है।
यह जिज्ञासा निश्चित रूप से धृतराष्ट्र की थी और जैसे महाराज बैठे संजय कह रहे हैं तम तथा कृपया विष्टम
अश्रु पूर्ण कुले क्षणम विदम वाक्यम वाच मधुसूदन
तम तथा कृपया विष्ट आपको क्या कहें महापुरुषों का जीवन बड़ा रसीला होता है।
उनकी भाषा भी बड़ी रसीली होती है। वैसे तो अर्जुन के चित्त में
जो आविष्ट हुआ है वो कृपा नहीं है। ध्यान रखिएगा।
किंतु कहते तम तथा कृपया विष्ट इनके हृदय में कृपा का आवेश हो गया। आविष्ट हो गई कृपा।
कृपा कब होती है? कृपा करने का अधिकार किसको है? ध्यान रखना कृपा तो ठाकुर जी का
किसको है? ध्यान रखना कृपा तो ठाकुर जी का स्वभाव है। यह मोह आविष्ट हुआ था। कृपा आविष्ट
नहीं है। इसके हृदय में मोह आ गया है। मोह ऐसा मोह आ गया है कि महाराज तीनों में
इसकी वाणी में भी इसके हृदय में भी और इसकी क्रिया में भी तीनों में मोह समा गया
हृदय में भी ध्यान रखिएगा वाणी में भी और शरीर में इंद्रियों में शरीर में सब में विषदंत
वाक्यम मुवाच मधुसूदन श्री मधुसूदन जी ने जब देखा बड़ा बढ़िया शब्द का प्रयोग है।
मैंने प्रातः काल की बेला में एक संकेत किया था आप सबको मधुसूदन नाम मधुकटप के उद्धार के कारण है।
और यह मधुकैट का प्राकट्य कान से होता है। मधु माने राग
और कैटव माने द्वेष। राग और द्वेष ही यह मधु और कैटव हैं।
जरा ध्यान रखना जिससे राग हो जाता है वो मीठा मीठा लगता
है कि नहीं? मधु मधु लगता है। अगर कभी किसी से राग हुआ हो तो जानोगे। महाराज कैसा कैसा मधु लगता है? मुझे तो बड़ा आश्चर्य लगता है।
एक जगह हम सुन रहे थे एक बच्चा एक बच्ची को कह रहा था तुझ में रब दिखता है। यारा मैं क्या कहूं? इतना मधुर लगता है।
किंतु यह रब सदा दिखता है। ये जितने बोलते थे रब दिखता है। फिर कुछ दिन के बाद पूछो कहते शैतान दिखता
है। यह मामला सब गड़बड़ मामला है। ये जो राग है ना राग ये मधु है और कटव भी
द्वेष है। और दोनों का अधिकतर जन्म होता है कान से। ध्यान रखना।
कान से जन्म कैसे?
आप किसी के बारे में जब ज्यादा सुनोगे ना उसके गुण सुनोगे तो राग होगा और यदि उस पता चलेगा कि आपकी निंदा करता
है तो द्वेष हो जाएगा। तो ये दोनों कान से ही घुसते हैं। राग द्वेष
और श्री कृष्ण कौन है? मधुसूदन है। और इस समय अर्जुन को कौन सा रोग हुआ है? मोह का।
जो मधु है जी तो निश्चित रूप से मोह के रोग के सबसे बढ़िया डॉक्टर हैं। ये आजकल
तो हर रोग के अलग-अलग डॉक्टर होते हैं। जी कान का अलग डॉक्टर, नाक का अलग डॉक्टर, दांत का अलग डॉक्टर, आंत का अलग डॉक्टर।
तो ऐसे कोई काम का डॉक्टर है, कोई क्रोध का डॉक्टर है, कोई लोभ का डॉक्टर है, कोई मोह का डॉक्टर है? और हमारे लाला वैसे तो
सभी के डॉक्टर हैं किंतु मोह के बहुत अच्छे स्पेशल डॉक्टर हैं। ऑपरेशन करने वाले मोह और अभिमान का ऑपरेशन इतना बढ़िया
करते हैं श्री कृष्ण कि आपको क्या कहें और अर्जुन को इस समय हुआ है मोह। राग रंजित हो गया है।
अपने धर्म का निर्णय नहीं ले पा रहा है। तो महाराज जैसे भगवान ने मधुसूदन ने यह देखा
कि इस समय यह कृपया विष्ट है और पूर्णा महाराज पूर्णा कुले क्षणम आंखों में इतने आंसू आ गए हैं उसको कि
सामने कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है। हमने कई बार अनुभव किया है। जब आंसू आने लगते हैं तो सामने दिखना बंद हो जाता है। हम तो कई बार ग्रंथों की कथा करते रहते
हैं। भावावेशित हो जाता है तो फिर भागवत के श्लोक नहीं दिखते हैं। कुछ दिखता नहीं हमको। तो इसकी आंखों में भी आंसू भरे हुए हैं।
अश्र पूर्ण आंखें हैं। और महाराज कई लोगों का तो यह मानना है कि रथ के पिछले हिस्से में जाकर बैठ गया।
कई लोगों का मानना है हमारे महाराज तो यही कहते हैं कि सनुख कृष्ण कृष्ण थे। तो जिस चाहे वो लोहे का समझिए या लकड़ी का जो
हिस्सा होता है जो रथ के साथ जुड़ा रहता है जिसके घोड़े जुड़े रहते हैं उस पर बैठ गया धनुष बाण छोड़ दिया था पीठ दुश्मन की
तरफ थी मुख भगवान की तरफ था और जैसे भगवान ने देखा तो यहां श्री कृष्ण वाच नहीं है श्री
भगवान वाच भगवान बोल पड़े अभी कृष्ण नहीं बोले ना सारथी बोला
भगवान बोले और आप लोग जानते हो भगवान किसे कहते हैं जैसे धनवान शब्द है
यशवान शब्द है विद्वान शब्द है वैसे भगवान शब्द है विष्णु पुराण में भगवान शब्द की वित्पत्ति
दोनों प्रकार की एक ही जगह है। टीकाकारों ने श्री मसूद सरस्वती महाभाग ने भगवत पाद
शंकराचार्य भगवान ने इन महापुरुषों ने उसका उदाहरण दिया है। ऐश्वर्यस्य समग्रस्य
धर्मस्य यशसिया ज्ञान वैराग्य योव
ये छह हो गए ऐश्वर्यस अच्छा समग्र का अन्वय सबके साथ करना संपूर्ण ऐश्वर्य
ऐश्वर्यस समग्रस धर्मस्य संपूर्ण धर्म संपूर्ण यश संपूर्ण कीर्ति,
संपूर्ण श्री संपूर्ण ज्ञान, संपूर्ण वैराग्य। अब जो जरा विचार करो जो वैराग्य का मालिक
है वो ऐसे रोने वालों के साथ पिघलने वाला है। यह तो कभी नहीं पिघले जी, कभी नहीं। आपको
क्या कहें? भले हिंदी के कवियों ने वर्णन
क्या कहें? भले हिंदी के कवियों ने वर्णन किया है कि श्री कृष्ण कभी मथुरा में आकर रोए हैं और कहते हैं
ब्रज बिसरत ना है। मुझे ब्रज बिसरता नहीं है किंतु श्रीमान जी मायापति हैं और वैराग्य के स्वामी हैं। वृंदावन छोड़कर के
आए तो वृंदावन में इतना प्रेम करने वाली गोपियां थी। उसके बाद भी वृंदावन की ओर मुख करके दोबारा देखा नहीं।
भागवत में नहीं वर्णन है कि भगवान वृंदावन आए हो। उद्धव को भेजा है। मथुरा छोड़कर गए तो फिर
मथुरा की ओर मुड़कर के नहीं देखा। इसी का नाम वैराग्य जहां है पूरे हैं।
तो अब जरा ऐसे जो भगवान ज्ञान वैराग्य से जिनका जीवन परिपूर्ण है अथवा उत्पत्तिम च विनाशम च
भूत नाम अगति गतिम वेद विद्या अविद्या च स भगवानता
जो उत्पत्ति जानता है विनाश जाता है भूतों की गति अगति जानता है। भूत नाम अगति गति वेद विद्याम
विद्या जानता है और अविद्या जानता है। तो जो इन छह चीजों को जानता है उसका नाम भगवान है। तो भगवान कभी किसी से अच्छा
ध्यान रखना ईमानदारी से कभी विचार करना। वैसे तो हम लोग थोड़ा पक्षपाती हैं। पक्षपाती इसलिए बोल रहा हूं।
भगवान ही तीन रूपों में काम करते हैं। ब्रह्मा बन के सृष्टि करते हैं। विष्णु बनकर और रुद्र बनकर के।
अच्छा आपको सृष्टि की दो लीलाएं तो भाती है सबको। सृजन लीला
संहार लीला किसी को भाती है। भगवान धन खूब दे दे तो बहुत धन्यवाद है। कहेंगे भगवान की बड़ी कृपा है। दूसरी बड़ी
करुणा की मालामाल कर दिया और यदि लेना प्रारंभ कर दे तो कृपा लगेगी। आप जरा विचार करो।
फिर कहोगे तुझसे बड़ी कृपा की। थोड़ा बोझा हल्का कर दिया। यह भगवान की लीला किसी को भाती नहीं है।
जी। हम कई बार मुस्कुराते रहते हैं। कहते हैं कि भगवान तीनों काम करते हैं। किंतु हमको दो ही लीला भाती है।
वैसे तो भागवत में कि श्लोक हम सुनाते नहीं है। क्योंकि सुनाना प्रारंभ कर देंगे तो हमारी कथाएं बंद हो जाएंगी।
क्यों? अब यहां तो मैं सुना देता हूं।
क्यों? अब यहां तो मैं सुना देता हूं। हमारे पूज्य बाबा हैं महाराज जी हैं। यस्याम अनुग्रहणामि
हरिस त धनम सनय भगवान कहते हैं जिस पर मैं अनुग्रह करता हूं उसका धीरे-धीरे
सब धन ले लेता हूं। हमारे महाराज श्री के एक बहुत प्रेमी थे भक्त कोकिल। उनके परिकर के लोग यहां बैठे हैं।
उनकी गद्दी पर बाबा घई राम जी बैठे। बहुत अच्छे संत थे। दादा घराम जी। मैंने तो दर्शन नहीं किए। उनके उन्होंने कई बहुत
अद्भुत अद्भुत ग्रंथ लिखे। एक उनका ग्रंथ है राधा का न्याय। उस पर अभी बंगाल में उड़ीसा में बड़े-बड़े
अभिनय होते हैं। भगवत प्राप्त महापुरुष थे। राधा ग राम जी। एक दिन हमारे महाराज जी के पास आए
और महाराज जी के पास आकर के बोले महाराज जी हमको ठाकुर ने पहचान लिया है। हमारी उनसे हमारे पहचान हमारे नाम को भी
पहचानते हैं। जहां जहां मैं व्यापार करता हूं मेरा नाम डाला जाता है। वहां वहां चौपट हो जाता है मामला। अब उन्होंने हमको पहचान लिया है तो हमको
फिर वृंदावन ही रहना है। तो भगवान की संहार लीला किसी को जल्दी भाती नहीं है। किंतु ध्यान रखना भगवान है
वही जिसमें ऐश्वर्य भी है जिसमें धर्म भी है जिसमें यश भी है, श्री भी है, ज्ञान भी
है, वैराग्य भी है। ऐसे वैराग्यवान भगवान बोल पड़े। कुतस्तवा कश्मलदम
बस्म समस्थितम अनार्य जुष्टम अस्वर्गम अकीर्तम कर्म अर्जुन
भगवान ने कहा हे अर्जुन अर्जुन शब्द का अर्थ सीधे अर्थ में भी है। अर्जुन माने होता है सीधा
और अर्जुन शब्द का अर्थ है जो गुणों का अर्जन करे। गुणग्राही व्यक्ति
जो गुणग्राही होता है उसका नाम अर्जुन है और जो सीधा भी है वह भी अर्जुन है। ध्यान रखना
जो सीधा होता है भगवान को बहुत भाता है। क्योंकि उसमें कोई कपट नहीं, कोई छल नहीं, कोई छिद्र नहीं। सीधा साधा व्यवहार
ध्यान रखिएगा सीधे व्यक्ति को तो महाराज बात बनानी भी नहीं आती है। उसको बात बनानी नहीं आती। हम कई बार लिखते हैं सीधे लोग बात बनाते तो पकड़ में आ
जाता। हमने कहा तुमसे नहीं बनेगी बात। ये काम दूसरों को सौंप दो। यह तुम्हारा काम नहीं है। बहुत सीधे साधे अर्जुन को भगवान ने बड़े प्रेम से कहा
कुत कमलम एक बात बताओ तुम तो श्रेष्ठ पुरुष हो
किंतु तुम्हारे ये कसमल कहां से आ गया?
वैसे तो कसमल जो होता है ना कसमल कीचड़ होता है और इसी को दलदल बोलते हैं।
आप लोग शायद कभी सुने हो यह समुद्र में भी बहुत जगह है। नदियों में भी होता है कीचड़।
और कीचड़ में एक बार यदि कोई फंस जाए। अच्छा जितना प्रयास किया जाता है निकलने
का उतना और अंदर जाता है। दलदली उससे निकलने का एक ही मात्र साधन है। शरणागति
लेट जाओ सीधे उसके ऊपर। तो मुझे बहुत तैरने का शौक था। अब तो नहीं है। अब तो
छोड़ दिया। बचपन में बहुत तैरते थे। तो कई बार ऋषिकेश में राम झूला जहां बना है वहां में गंगा पार करता था।
बचपना था तो एक महापुरुष ने हमको देखा तो बड़े प्रेम से कहा बेटा
रोकूंगा तो मानोगे तो नहीं किंतु नदी के कुछ विशेषताएं बताता हूं कि कभी भंवर में फंस जाओ तो कैसे निकलना है कभी प्रवाह में
बह जाओ तो कैसे निकलना है और कहीं ऐसा हो कि जहां थक कर के तुम किनारे लगो वहां यदि
दलदल हो और तुम पैर जमाओगे तो जैसे दूसरा उठाओगे तो और घुस जाओगे। तो कैसे निकलना है वह हम तुम्हें बताते हैं। वो महात्मा
ने बताया तो जब यह कीचड़ से निकलने की बात बताई तो उसमें यही कहा कि कीचड़ में पैर नहीं रखना है। लेटना है और लेट कर के
धीरे-धीरे खिसकना है और खिसक करके तट पर पहुंच जाओ क्योंकि कसमल का स्वभाव है कीचड़ का। तुम जैसे प्रयास करोगे और अंदर
जाओगे। पैर उसमें और अंदर तो पूरा हाथी डूब जाता है। जी कई बार हाथी यदि कशमल में कीचड़ में फंस जाता है तो निकल नहीं पाता
है। अथवा ये जो तुम मोह के दलदल में फंसे हो। यह तुम्हारे गुरु हैं। यह तुम्हारी माता है। यह तुम्हारे पिता हैं। यह तुम्हारे
बंधु हैं। यह तुम्हारे सखा हैं। यह मामा है। यह अमुक हैं। ये अमुक हैं। ये सब का सब खेल दलदल का ही है।
आप जितना इनको अच्छा एक बात आपसे पूछ रहा हूं। यह जितने संबंध हैं
यह मान्यता के हैं कि नहीं?
मान्यता के अतिरिक्त कुछ नहीं। यह हमारी माताएं कहेंग आपको क्या पता नंबर दो वहां के बैठे ऊपर मकान ठंड का समय
था मैं घूम रहा था तो बगल की गली में एक माता जी बैठी थी एक चारपाई पर सामने उसकी
बेटी बाल खोल कर बैठी थी और महाराज वो निकालती थी जुए और ऐसे करके मारती थी
और कहा कि 100 मार दिए तो हमारे चित्र सुनाई पड़ा तो मैं हंसा हमने कहा कमाल की बात है इसकी खोपड़ी में
पैदा हुए इसका खून पी के बड़े हुए और मार कर खुश हो रही की मार दिया है। क्यों?
उसको उसने अपना माना नहीं था। अगर खून से ही पैदा होने वाली संतान होती तो फिर महाराज ये जुए अपनी संतान है कि
नहीं है? अपनी संतान है।
नहीं है? अपनी संतान है। अपने ही खून में पैदा हुए हैं। अपनी खोपड़ी में पैदा हुए हैं। जी।
किंतु उनको मारकर प्रसन्नता मिलती है। क्यों? क्योंकि उनके साथ ममता नहीं है।
क्यों? क्योंकि उनके साथ ममता नहीं है। तो यह एक प्रकार का जो संसार के संबंधों
में फंस जाना है। एक प्रकार का मोह है। यह कसमल है। कसमल है। और इस समय अरे भाई
रणांगन में जहां सेनाएं खड़ी हैं। उस समय यह दिल दलदल तुम्हारे दिमाग में आ गया।
देखो भाई किसी भी दृष्टि से ना मोक्ष की दृष्टि से ना स्वर्ग की दृष्टि से और ना
संसार की दृष्टि से ये तीनों दृष्टि से गलत है। मोक्ष की दृष्टि से ये अनार्य जुष्टम
ये आर्य का काम नहीं है। ये आर्य पुरुष का काम नहीं है। अनार्य दुष्ट है ये और अस्वर्गम
इस मोह से तुम्हें स्वर्ग मिलने वाला नहीं है तो कोई कह दे कि हमको स्वर्ग भी नहीं चाहिए मोक्ष भी नहीं चाहिए तो बोले संसार
में कीर्ति तो चाहिए क्योंकि महाराज ध्यान रख उत्तम जो उत्तम लोग होते हैं अधम लोग तो केवल धन चाहते
हैं किंतु उत्तम लोग कीर्ति चाहते महाराज उनको लगता है कि कीर्ति क्योंकि कीर्ति यस सजीवति
जिसकी कीर्ति है वही जीवित रहता है। तो कहा कि ना तो कीर्ति की दृष्टि से इस क्रिया से तुमको संसार में कोई यश मिलने
वाला नहीं है। भगवान ने धीरे से यही कहा होगा मित्र कान में कहा होगा मित्र यह जो
नपुंसकता दिखा रहे हो यहां बैठकर के लोग यही कहेंगे कि अर्जुन एक वर्ष के लिए नहीं हुआ था।
सदा सर्वदा के लिए हो गया। यह डरपोक है। डरपोक कोई यह नहीं कहेगा कि तुम्हारे हृदय में कृपा आ गई थी। इसलिए तुमने युद्ध नहीं
किया। बाद में यह सब कौरवों लोग यही कहेंगे भगोड़ा जब देखा लोगों को बड़े-बड़े वीरों को तो डर गया।
और डर करके महाराज उसने शस्त्र छोड़ दिया तो यह क्षत्रिय का धर्म नहीं है इसलिए
तीनों दृष्टि से उचित नहीं है। क्लव्यम मासगम पार्थ देखो ध्यान रखना पहले अर्जुन संबोधन दिया
था। अब पार्थ संबोधन दे रहे हैं। पार्थ संबोधन का अभिप्राय यह
प्रथा के पुत्र हैं। कुंती के पुत्र हैं। और इन्होंने मां कुंती के वाक्य का स्मरण भी कराया
कि छत्राणियां जिस काल के लिए संतान उत्पन्न करती हैं वो काल उपस्थित हो गया है।
तो कम से कम तू अपनी मां के दूध को तो मत लजा। क्षत्रिय कुंती का लाल है।
इस प्रकार से राग रंजित मत हो। मानो अर्जुन ने कहा महाराज अब तो यह रोग बहुत बड़ा हो गया है। वो कौन
कहता है बड़ा हो गया? क्षद्रम
हृदय दर्बल्यम ये बहुत क्षुद्र है। हृदय की दुर्बलता तेरी। यह बहुत बड़ी नहीं है। शद्र है।
छोटी सी दुर्बलता है। इसको छोड़ उष् खड़ा हो जा। और परम तप
तू तो परम तपस्वी है। सचमुच में अर्जुन बहुत बड़ा तपस्वी है। अर्जुन की कथा यदि आप लोग पढ़ोगे तो
आश्चर्यचकित हो जाओगे। बड़े-बड़े महात्मा जहां फिसल गए। पुराण पढ़ोगे तो पता चलेगा।
उर्वशी ने बड़े-बड़े महात्माओं को बस में कर लिया। और बड़े-बड़े राजाओं के उर में बस गई।
आप कभी पुरवा का चरित्र सुनोगे तो पता चलेगा। पुरवा कोई सामान्य राजा नहीं थे।
किंतु जब यह उर्वशी छोड़कर चली गई तो महाराज पागल हो गए वो। और पागलों के समान घूमते थे। बाद में
कुरुक्षेत्र में उर्वशी मिली तो उसने फिर उपदेश दिया पुरवा को ऐसी सुंदर उर्वशी
और अर्जुन सा शरीर स्वर्ग गए थे और अर्जुन के सामने उर्वशी भेज दी गई।
श्रृंगार करके आई। हावभाव भाव कटाक्ष से उनको आकर्षित करने लगी तो क्या तप है जी
यह तप केवल पंचाग्नि तापना नहीं है ध्यान रखिएगा क्रोध के आवेग को सहना भी तप
है। काम के आवेग को भी सहना तप है। लोभ के आवेग को भी सहना तप है।
काम, क्रोध, लोभ के आवेग को सह लेना। अर्जुन ने हाथ जोड़ करके कहा कि तुम हमारी मां हो।
उर्वशी ने फटकार लगाई। बोले, यहां ये सब संबंध नहीं चलते हैं। ये तुम्हारे मृत्यु लोक में चलते होंगे।
मैं किसी की मां नहीं हूं। मैं तो सबकी भोगिया हूं। और तुम्हारे पास में आई हुई हूं। स्वीकारो मुझे।
किंतु धन्य है अर्जुन। अर्जुन ने कहा कि अपराध मैं नहीं कर सकता हूं। तो कहा मैं श्राप दे दूंगा।
उन्होंने श्राप स्वीकारा किंतु उर्वशी के भोग को नहीं स्वीकारा। उसने एक वर्ष
नपुंसक रहने का श्राप दिया। उसने उसको सह लिया। और तप करके भगवान शंकर को रिझा करके
पाशतास्त्र भी प्राप्त किया अर्जुन ने तो परम तप हो तुम मैं आपको क्या कहूं
हमारे गुरुदेव एक बार साधन काल में किसी महापुरुष के चरणों में अनुष्ठान कर रहे थे अपने कल्याण भगवत प्राप्ति के लिए
उनको भगवत प्राप्ति हुई भी तो अनुष्ठान के बड़े विधियां थी। इतने बार स्नान करना है। ऐसे अनन्यास, करन्यास सारी
विधियां थी। तो एक दिन महाराज जी ने गुरु जिन महापुरुष की सेवा में तब बैठे थे उनको पत्र लिखा कि
यह साधन हमसे नहीं होता है। जैसे कहा यह साधन नहीं होता हमसे तो महाराज तुरंत उनको यही लिखकर के भेजा
क्षद्रम हृदय दबल्यम तष्ट परम तप ये लिखकर भेजा तो बोले ब्राह्मण हो विद्वान हो
यदि तुमसे नहीं जवान हो, ब्राह्मण हो, विद्वान हो, जवान हो, यदि तुमसे साधन नहीं होगा तो किससे होगा?
मैं आप लोगों को कैसे कहूं?
आज के समय में सबसे बड़ा ग्रास साधन का हो रहा है। बातें करना सुनना अच्छा लगता है।
किंतु साधन करना अच्छा नहीं लगता है। किंतु ध्यान रखना जब तक साधन नहीं होगा तब तक साध्य तक कैसे
जाओगे?
आप हरिद्वार की महिमा सुनते रहो। करते रहो किंतु किसी साधन को नहीं अपनाओगे तो हरिद्वार आ पाओगे। नहीं आ पाओगे।
आप भगवान की चर्चा करते रहो, सुनते रहो। किंतु किसी साधन को नहीं अपनाओगे तो भगवान तक पहुंच पाओगे। नहीं पहुंच पाओगे।
और यह साधन किसी पशु के लिए नहीं है। मनुष्य के लिए है। हम सब मनुष्य हैं।
इसलिए उतष् जागृत पर निग उठो जागो यह परंतप शब्द का प्रयोग किया है तक्तो तष् परम तप
कथम भीष्म संखे द्रोणम च मधुसूदन
हे मधुसूदन आप मुझे एक बात बताइए आप कहते हो उठो जागो परम तप हो
यह जो पूजा के योग्य महापुरुष हैं पूजा रहा इसमें दो संबोधन ठाकुर के हैं। मधुसूदन
और अरसूदन दोनों हैं। एक श्लोक में दो दो संबोधन हे मधुसूदन
तुम तो मधु नाम के दैत्य को मारे थे और आप कह रहे हो कि गुरु जी को मारो
तो मधु नामक दैत्य को मारना तो उचित है किंतु क्या गुरुजनों को मारना उचित है?
मैं आपसे प्रश्न कर रहा हूं। कथम भीष्म महम शंखे द्रोणम च मधुसूदनम
ये सामने जो खड़े हैं यह भीष्म हमारे पितामह हैं। इनकी गोद में मैं खेला हूं।
और सच कहें भीष्म पितामह अर्जुन को बहुत मानते थे। बहुत प्यार करते थे।
मैं तो कई बार भागवत में देखता हूं मरण काल में भीष्म पितामह ने बार-बार यही कहा है
कि हे अर्जुन के सखा हे पार्थ सखे रति ममास्तु जैसी आपकी रति पार्थ से है पार्थ की रति आपसे है
वैसे जैसे हमारी आपसे रति हो जाए। संबंध भीष्म पितामह अर्जुन का जोड़ते हैं।
तो ऐसे भीष्म पितामह और श्री द्रोणाचार्य जी महाराज द्रोण ये सामने खड़े हुए हैं।
क्या इन पर बाण चलाए जा सकते हैं? इसी
शब्द का प्रयोग है। क्या मैं इनसे युद्ध कर सकूंगा? प्रतिश्यामि
कर सकूंगा? प्रतिश्यामि यह तो पूजा के योग्य हैं और एक धर्म की दृष्टि से आपको मैं निवेदन
करना चाह रहा हूं। महाभारत का ही अवलंबन लेकर के भीष्म पितामह ने
युधिष्ठिर जी महाराज को शांति पर्व में एक बात बहुत अद्भुत कही
वह समझने लायक हम सबके काम की भी है और अर्जुन निश्चित रूप से उस विधा से उस धर्म से परिचित है।
बात क्या कही प्रातः काल भी हमने संकेत किया था। हमारे जीवन में जो उपकार करें
उपकार के बदले उपकार तो करना चाहिए किंतु अपकार कभी नहीं करना चाहिए। संसार में सबसे बड़ा पाप है वो।
कृतज्ञ होना चाहिए किंतु कृतज नहीं होना चाहिए। कृतज्ञ होना चाहिए। किंतु
कृत नहीं होना चाहिए। हमारे जीवन में कोई भी छोटा सा उपकार करें
उस उपकार का बदला उपकार से निकालना चाहिए। हमने शायद फिल्म में ही देखा था।
एक हाथी को कांटा लग गया। जंगल में तो एक व्यक्ति दिखा तो हाथी का कांटा निकाल दिया।
संयोग से उस हाथी को पकड़ा गया और आज दरबार में उसको रखा गया तो जिसको मृत्युदंड देना होता था उस हाथी के पैर के
नीचे कुचलवाया जाता था तो जिसने कांटा निकाला था उससे कोई अपराध हुआ और हाथी के पास उसको डाला गया कि इसको
कुचल दो किंतु उस हाथी ने देखा इसने एक बार हमारा कांटा निकाला था
तो सूर से उठाकर उसको अपने पीठ में बैठाल दिया। मारा नहीं।
यह तो पशुओं की मानवता है। जी। हमारे साथ कोई सात कदम भी चले उसका भी उपकार
मानना चाहिए। अपकार नहीं करना चाहिए। भीष्म पितामह ने उसमें दृष्टांत सुनाया।
दृष्टांत एक है कि ब्राह्मण का बालक एक पैसा कमाने के लिए किसी शहर में गया
किंतु किसी वैश्या से उसका संपर्क हो गया। ब्राह्मणत्व गवा दिया। उसी वैश्या के साथ रहने लगा। कई वर्षों के
बाद क्योंकि सदाचार समाप्त हो गया। आहार खराब हो गया। विचार खराब हो गए। सब कुछ केवल नाम का ब्राह्मण रहा नहीं तो
पतित हो गया। कई वर्षों के बाद उस शहर में उसके एक
मित्र से मुलाकात हो गई। जो गांव का था। उसने कहा कि तू तो पैसा कमाने आया था। तेरे माता-पिता बड़े वृद्ध है। वो रोते
रहते हैं तेरे लिए। और तू यहां मौज मस्ती कर रहा है। उस बालक को लगा कि बिना पैसे के घर कैसे
जाए? पैसा कुछ था नहीं।
जाए? पैसा कुछ था नहीं। तो सोचा यह शहर छोड़कर किसी दूसरे शहर में चला जाऊं। पहले पैसा कमाऊं फिर माता-पिता के पास
जाऊं। तो महाराज वो चलते चलते चलते चलते जंगल में किसी राज्य में जा रहा था तो एक वृक्ष के नीचे बैठा।
भूखा बहुत था। ठंडीठंडी हवा चल रही थी। ठंड भी लग रही थी।
उसमें एक बगुला बैठा था वृक्ष में। उस बगुले ने देखा कि कोई अतिथि नीचे बैठा है और ठंड के मारे कांप भी रहा है, भूखा भी
है। तो बगुला उड़ के गया और कुछ लकड़ियां उठाकर लाया। कहीं से आग
लाया उसको जलाया। जिससे उसकी ठंड मिटी। पास में ही नदी थी। वहां से पकड़ कर मछली
लाया और मछली लाकर के डाल दिया। अग्नि में पका के उसको खिलाया। अतिथि है।
और खिलाने के बाद उससे पूछा कि मित्र तुम सच सच बताओ किसी परिस्थिति के मारे हो। यहां कैसे पहुंचे?
उसने कहा कि हमारे माता-पिता बहुत गरीब हैं और हम धन कमाने के लिए आए थे। अभी वृद्ध भी हो गए किंतु धन नहीं कमा सका।
अभी मैं धन कमाने जा रहा हूं। तो बगुले ने कहा एक काम करो। जिस राज्य में जा रहे हो उस राज्य का राजा हमारा मित्र है।
तो तुम उनके पास जाकर हमारा परिचय देना। तो तुमको प्रचुर धन मिलेगा। और उस धन से तुम्हारे माता-पिता का भी भरण
पोषण हो जाएगा। तुम्हारा भी हो जाएगा। तो महाराज उनके कहने पर राजा के पास गया। संयोग से वो राजा बहुत बड़ा ब्रह्म भोज
करा रहा था ब्राह्मणों का। उनको भी बैठाल दिया पंक्ति में। खूब धन दिया।
किंतु उसके जो भोजन करने का ढंग था, देखने का ढंग था, राजा को संशय हुआ कि हमारा जो बगुला मित्र
है, कहीं गलत फंस गया है। यह आदमी ठीक नहीं है। उसको धन देकर विदा तो किया किंतु महाराज उसके पीछे कुछ दिन के बाद
सैनिक भेजे कि हमारा मित्र ठीक है कि नहीं? तो घटना यह घटी जब वहां पहुंचा धन
नहीं? तो घटना यह घटी जब वहां पहुंचा धन लेकर के तो मध्य का स्थान था फिर रुका फिर भोजन की व्यवस्था नहीं थी अब जब भोजन की
व्यवस्था नहीं थी तो फिर वैसे किया बगले ने लकड़ी लाया आग लाया मछली लाया
किंतु एक टाइम के ही भोजन के लिए मछली थी उसने पा लिया पाने के बाद उसने सोचा कि रास्ते में क्या खाऊंगा
रास्ता बड़ा लंबा है। तो सोचा इस बगुले का ही मांस पका लेता हूं। महाराज उस बगुले को पास में बैठा था। पकड़
कर पंख नोच कर फेंक दिए और अग्नि में पका कर उसका मांस लेकर चल पड़ा। जब राजा के सेवक आए पंख देखा तो समझ गए कि
वो मार डाला गया। उसको रास्ते में हत्यारे को पकड़ा। सैनिक पकड़ कर राजा के पास ले गए। बोले
इसको खा जाओ, कच्चा खा जाओ। सेवकों ने कहा ऐसे पापी का हम मांस नहीं
खाते हैं। ध्यान रखिए क्योंकि यह सबसे बड़ा अपराधी है। यह कृतज्न है।
जिसने धन दिलाया, जिसने जीवन दिया, उसी को मार दिया। इससे बड़ा संसार में कोई अपराध
होता नहीं। और भगवान श्री कृष्ण स्वयं कहते हैं गोपियों से कि हम तुम्हारे ऋण से कभी उण
नहीं भो पाएंगे। या मां भजन दुर्जर गह श्रंखला तुमने हमारी सेवा
घर की जंजीरों को काट कर की है। इसलिए तुम्हारे ऋण से हम कभी पूर्ण नहीं हो पाएंगे।
तो मानो जो अर्जुन कह रहा है यहां पर वो बात यथार्थ में कह रहा है कि जो हमारे गुरुजन है
जिनकी हमें पूजा करनी चाहिए। क्योंकि गुरु द्रोणाचार्य जी महाराज ने हमको गोद में खिलाया। हमें पढ़ाया।
आपको क्या कहे जो ज्ञान आचार्य चरण द्रोणाचार्य जी ने अश्वत्थामा को नहीं दिया। वो अर्जुन को दिया।
अर्जुन ब्रह्मास्त्र का प्रयोग भी जानता था। उपसंहार भी जानता था। अश्वत्थामा केवल प्रयोग जानता था किंतु उपसंहार
नहीं जानता था। तो जो इतने प्रेम करने वाले गुरुजन हैं उनको हम कैसे मार दे?
उन पर हम कैसे शस्त्र उठाएं?
ये हमको उचित नहीं लगता है। और सरकार एक निवेदन और भी करूं। गुरु हवा महानुभाव
श्रे भोक्त भक्ष लोके क्या इन गुरुजनों की हत्या करके इन महानुभावों को मार करके
हमें श्रेय मिलेगा क्या हमारा कल्याण होगा क्या आप कहते हो कि शस्त्र उठाओ ऐसे राग मत करो तो क्या हमारा
इसमें कल्याण होने वाला है अथवा भोग ही भोगने को क्या मिलेंगे
हतार्थ काम गुरु गुरु नव भजी भोगान रुधर प्रधान यदि हम उन गुरुजनों को मार करके
राजा भी बनेंगे तो गुरुजनों के रुधिर से सिंचित भोगों को ही भोगेंगे।
अभिप्राय इन गुरुजनों की हत्या उचित नहीं है। किसी भी दृष्टि से हमको
उचित ये हत्या लगती नहीं है। मैं इस क्रिया में प्रयुक्त होने वाला नहीं हूं। सरकार मुझे बार-बार आप कहते हो शस्त्र
उठाओ शस्त्र उठाओ। यह मेरे से होने वाला नहीं है। न चतद विद कतरनो गरियो
यदवा जय यदि वाहनो जय अभी तो यही निश्चित नहीं है कि जीतेगा कौन
यदि उदाहरण के लिए हम शस्त्र उठा भी ले आप जरा करो और युद्ध भी करें तो यदवाज यदि वाज यदि मैं जंगा या वो
जीतेंगे और याने महत्वाजी विषमस इनको मार करके मैं जीने की इच्छा क्या करूं और यह जो
धृतराष्ट्र के पुत्र हैं जो सामने खड़े हुए हैं धतराष्ट्र प्रमुखे अथवा इनके पीछे जो लोग खड़े हुए हैं गुरुजनों के पीछे
इनको मार के जीवित रहना भी मैं उचित नहीं समझता। निश्चित रूप से मैं
धर्म समूढ़ हो गया हूं। मेरा चित्त कंफ्यूज हो गया है कि मैं क्या करूं।
पीछे तो श्लोकों में उन्होंने यह भी कहा कि हमको स्वर्ग भी नहीं चाहिए। हमको मोक्ष भी नहीं चाहिए। हमको जगत में
ख्याति भी नहीं चाहिए। जब तक शरीर रहेगा तो जंगल में रहकर भिक्षा मांगूंगा
और भिक्षा के अन्न से ही जीवन व्यतीत करूंगा। यही मुझे उचित लग रहा है। किंतु हे कृष्ण
मैं इस कायरता के दोष से अपहरित हो गया हूं। कार्पण्य दोष है। इसका नाम कायरता का
दोष समझ लिए। इसमें मैं विमूढ़ हो रहा हूं और मैं निश्चित नहीं कर पा रहा हूं कि मैं करूं तो क्या करूं।
एक निवेदन करें जब कहीं रास्ता ना सूझे।
कोई बात समझ में ना आए तो एक ही साधन है भगवान की शरणागति।
उनके चरणों में निवेदन करो। आज इन्होंने बड़े प्रेम से कहा कि यहा
श निश्चितम रूही तन्मय जिसमें मेरा श्रेय हो जिसमें मेरा कल्याण हो
आप मेरे लिए वही कहिए। मानो भगवान ने कहा होगा कि हम क्यों कहे?
हम तो तुम्हारे सारथी हैं। तुम ही कहो कि मैं क्या करूं?
मैं रथ चलाऊं कि मैं बैठा रहूं। यह भी श्रीमान जी कम नखरेबाज नहीं है। कोई महाराज ये त्रिभंग ललित है ना सामने
वाला यदि सीधे-सीधे बोलता तो आप टेढ़े बोलते हैं। और जब टेढ़ा बोलता है सामने वाला तो सीधे बोलते हैं। तो बोले मैं
क्यों कहूं तो मैं क्यों उपदेश दूं? तब
इन्होंने कहा कि शिष्यस्ते हम सामाम तम प्रपन्नम
हम तुम्हारे शिष्य हैं। एक निवेदन है भगवान के साथ इनके कई संबंध थे। बुआ के बेटे हैं।
भाई हैं। और श्याम सुंदर स्वयं इनको मित्र कहते हैं, सखा कहते हैं।
और श्याम सुंदर अर्जुन के बुद्धिदायक भी है।
आप लोग जानते हो बुद्धिदायक कौन होता है?
शालको बुद्धिदायक। कलयुग में आजकल सलाह देने वाले बुद्धि देने वाले
शाला ही होते हैं। एक सज्जन हमारे पास आए बोले महाराज मैं क्या करूं? कहा बताओ क्या बात है? बोले
क्या करूं? कहा बताओ क्या बात है? बोले
हमारी पत्नी बहुत उपदेश देती है मुझे। आजकल जितनी पत्नियां उपदेश देती उतना गुरु भी नहीं देते।
आप देख लो महाराज जहां मौका मिले एक मौका तो अपना गुरु बनने का छोड़ती नहीं है। तो हमने कहा बहुत बढ़िया बात है तेरे को फिर तो कहीं जाने की जरूरत नहीं। सरस्वती
के दिन बसंत पंचमी की इनहीं की पूजा किया करो। तो आजकल सबसे बढ़िया बुद्धि देने वाले बुद्धि दायक
शालको बुद्धि दायक तो हमारे श्री कृष्ण साला साहब भी हैं जी।
तो इतने संबंध होने के बाद भी एक नया संबंध बनाने की क्या जरूरत पड़ी?
आवश्यकता क्या है?
और ध्यान रखना कई लोग प्रश्न करते हैं क्या मैं अपने पिता को गुरु बना सकता हूं?
बिल्कुल बना सकते हो। मां तो अपनी प्रथम गुरु होती ही है। मां प्रथम गुरु है।
मां की कृपा से ही तो अक्षर बोध हो। मां की कृपा से पिता का बोध हो। तो संबंध में कई बार हमारे पास लोग आते
हैं महाराज वो हमारे भ्राता साधु बन गए हैं तो मैं उनका चेला बन सकता हूं। हमने कहा बिल्कुल बन सकते
हो। यदि तुमको उन पर गुरु भाव बने तो केवल कान ठुकाने से काम बनने वाला नहीं
गुरु भाव उत्पन्न होना चाहिए। फिर वो पुराना संबंध जीने की जरूरत नहीं है कि हमारे छोटे भाई हैं कि हमारे बड़े भाई है कि हमारे ताऊ हैं।
हमारे पास तो कई बार आते हैं लोग। तो हम कहते किसी अन्य महात्मा से कथा कराओ। क्यों? तुमको हमारे प्रति श्रद्धा ही नहीं
क्यों? तुमको हमारे प्रति श्रद्धा ही नहीं बनेगी। तुमको लगेगा कि हमारा भतीजा है। किसी को लगेगा कि हमारे महाराज अमुक हैं।
और यदि तुम्हारा भाव नहीं बनेगा तो तुम्हारा काम होने वाला नहीं है। क्योंकि भाव की बहुत महिमा है।
तो क्या अर्जुन ने कृष्ण से कान फुकवाया?
कान नहीं फकवाया। शिष्य जानते हो किसे कहते हैं? शिष्य
शिष्य उसका नाम है जिस पर शासन किया जा सके। शासन योग्यम
आजकल तो बहुत कठिन है। जी। अगर गुरुजन शिष्यों पर अनुशासन करने लगे तो यह फिर चेला तो कब लापता हो जाएंगे कुछ पता ही
नहीं है। आजकल शासन करने वाला लोगों को पसंद नहीं है। प्रशंसा
करने वाला पसंद है। और जब तक आप अनुशासन में नहीं रहोगे तब तक आपका कल्याण होने वाला नहीं है। इसलिए
तुलसीदास जी महाराज ने तो एक बड़ी अद्भुत बात कही। सचिव
वैद्य गुरु तीन जो प्रिय बोले भय आस राज धर्म तन तीन कर होए वेग ही नाश
वो गुरुजनों से आशा रखो कि हमारी प्रशंसा करेंगे तो अपना नाश ही करवा लोगे
गुरुजन तो वही होते हैं जो अनुशासन करें क्यों अगर तुमसे से धन की कामना होगी गुरु की तो गुरु नहीं होगा भिखारी होगा ध्यान
रखिएगा और भिखारी है जैसे भिखारी कहता आप तो बड़े दाता हो आप बड़े उदार हो वही बात स्तुति
हो गई गुरुजन तो नारायण आपको क्या कहे भगवत कृपा से हम गुरुजनों की सेवा में रहे हैं। हमने उनका अनुभव किया है। गुरुजन तो
लात भी मारते हैं, हाथ भी मारते हैं। अभी हम कई बार चिंतन करते तो हृदय भर आता है। ऐसे करुणा जिन महापुरुष के पास बचपन में
मैं रहा वो वेदांत का उपदेश करते थे। भक्ति की चर्चा तो लगभग करते नहीं थे। उपनिषद चर्चा
होती थी। गीता में भी वेदांत की चर्चा 15वा अध्याय ज्यादा सुनाते को गीता का और दूसरा अध्याय भी सांख्य योग का लगभग उनको
सब गीता के श्लोक कंठ थे और कोई दृष्टांत नहीं देते थे तो गंगा किनारे रेत में
बैठकर प्रवचन करते थे वो एक पुराना बागंबर था तो अपने राम बिछा देते थे मस्तक रख देते थे महाराज 108 साल वर्ष तक जिए
और महाराज जी मंगलाचरण करके शंकरम शंकराचार्यम केशव बायम जैसे महाराज जी मंगलाचरण करते थे मैं गंगा
किनारे खेलने चला जाता था क्योंकि अपने राम को प्रवचन वचन कुछ समझ में आता नहीं था वो क्या बोल रहे हैं ब्रह्म क्या माया
क्या और उपाधि क्या वेदांत की शब्दावली पसंद पता नहीं थी और जैसे महाराज जी का प्रवचन पूरा होता था तो कहते थे धर्म की
जय हो अधर्म का नाश हो तो हमको आवाज आती थी दौड़ के आ जाता था बैठ जाता था जो वहां दक्षिणा चढ़ती थी फल चढ़ते थे भगत लोग
चढ़ा जाते थे वो उठाकर कुटिया में ले जाते थे किंतु वह संत उन्होंने एक दिन हमसे पूछा क्यों रे
सत्संग में कहां रहता है झूठ बोला कि यही तो रहता हूं रहता नहीं था
महाराज जी ने कहा झूठ बोलता है यहां नहीं रहता है पीछे बैठता हूं। उन्होंने कहा महाराज एक दिन वो देखते रहते थे कि ये बैठ
नहीं रहा है। कुछ दिन के बाद वो सब लोग चले गए गंगा किनारे से तो कई बार पैर फैला देते थे तो मैं पैर दबाता
था। मेरे से पूछे आज कहां था?
मैंने कहा यहीं था। झूठ बोला। जैसे कहा यहीं था। उन्होंने ऐसी
लात मारी हमको कि मैं उछल कर रेत में गिरा और डांट लगाई महाराज श्री ने फटकारा मुझे
मैं रो पड़ा उन्होंने कहा कि संत सेवा का प्रतिफल है सत्संग करना। तो हमने हाथ जोड़कर कहा मुझे समझ में नहीं
आता है। उन्होंने कहा भले समझ में ना आए किंतु सुना कर औषधि का स्वाद नहीं मिलता तब भी औषधि खाई
जाती है। तो यह भवर रोग की औषधि है जो तुम्हें हम सुना रहे हैं। उनके डर की वजह से मैं बैठता था।
अब आपको क्या कहें?
उस सत्संग ने जीवन बदल दिया। आज यहां बैठे हैं तो उनकी कृपा से बैठे हैं।
आज जो ब्रह्म विद्या का चिंतन होता है बोधोपरांत वृत्त जो बनी उनकी कृपा से बनी।
मैं कई बार लोगों को कहता हूं मैं किसी पद पर बैठा हूं। यह हमारी साधुता नहीं है।
मैं जहां बैठा हूं वैसे ही मैं निकल सकता हूं। और पीछे मुड़ के भी याद नहीं करूंगा।
कभी नहीं करता। कथाएं बड़ी-बड़ी होती हैं। एक एक लाख डेढ़ डेढ़ लाख जनता आती है।
किंतु जैसे वहां से निकलता हूं ना किसी की याद करता हूं ना किसी का स्मरण करता हूं। यह जीने की कला इन गुरुजनों ने
हमें सिखाई है। तो हम तो कई बार कहते हैं अभी हम उन्हें क्या दे सकते हैं? अगर अपने खाल
को निकलवा के इन गुरुजनों के चरणों की जूतियां भी बनवा दूं तब भी मैं उनके ऋण से कभी उण नहीं हो सकता।
जो दिया है उन्होंने आज कई बार हृदय गदगद हो जाता है उनकी कृपा पर, उनकी करुणा पर कि ऐसे कोई अकारण करुणा करता है। मैं
सत्संग ना सुनता तो उनका क्या बिगड़ जाता?
किंतु हमारा तो जीवन बिगड़ जाता। तो गुरु वही है जो शिष्य पर अनुशासन करें।
तो उन्होंने कहा आप मेरे ऊपर अनुशासन कर सकते हो। और एक बात और भी कहे
शिष्यम साध माम तम प्रपन्नम
ये प्रपन्न शब्द पर ध्यान देने लायक है। ये प्रपत्ति शब्द हमारे रामानुज परंपरा में चलता है।
शरणागति और उससे अंतरंग है प्रपत्ति। प्रपत्ति का अभिप्राय
प्रपत्ति उसे कहते हैं। ये जो पैर का तलवा होता है ना इसको संस्कृत में प्रणिपद बोलते हैं।
प्रणिपद उसके नीचे आ जाना। उसका नाम
प्रपत्ति है। यह प्रपन्न जो शब्द का प्रयोग किया ना यह प्रणिपद के नीचे आ जाना
अर्थात चाहो तो जीवन दे दो, चाहो तो मुक्ति दे दो, मार दो। ऐसी शरणागति महाराज हमारा काम क्यों नहीं बन पाता है?
क्योंकि हम बातें शरणागति की करते हैं किंतु सच्ची शरणागति होती नहीं। हम कई बार सबको आपको भी याद होगा यह श्लोक
बचपन में लगभग याद करा दिया जाता है और गीता प्रश के संपूर्ण ग्रंथों में छोटा सा भी ग्रंथ होता है तो यह श्लोक जरूर छापते
हैं प्रारंभ में आप सबको याद है त्वमेव माता च पिता त्वमेव तमेव बंधुस सखा तमेव तमेव
विद्या द्रविड़ त्वमेव तमेव सर्वम मम देव देव तो क्या बोलते समय
यह हृदय में भाव रहता है कि भगवान ही हमारी मां है भगवान ही हमारे पिता हैं। नहीं रहता है।
आप हमारे सर्वस्व हो। ये ठाकुर को बोलते तो हैं। आप मेरे बंधु हो।
आप मेरे द्रविण हो। द्रविण माने धन। तो क्या सचमुच में भगवान हमको धन लगते हैं?
आप लोगों को लगते होंगे हमको तो नहीं लगते। इतने वर्ष हो गए। मैं एक दिन तो बहुत व्यतीत हुआ। फिर ठाकुर
जी ने यही लीला भी की। बाल कृष्ण साथ में रखते थे सेवा में। तो जब वृंदावन से निकलता था तो ठाकुर में
जिसमें बाल कृष्ण है वो कहीं भी थैला छोड़ देते थे हमारे सेवक के पास भी अपने फर्स्ट एसी में है और सेवक थर्ड एसी में उसके उनके साथ
थैला है ठाकुर जी वहां है अपने साथ नहीं और महाराज जब कथा करके आए
और दक्षिणा पास में हो तो थैला बाथरूम जाते समय भी नहीं छोड़ते। बाथरूम भी जाते हैं तो थैला ले जाते। कोई
ले ना जाए। रात्रि में भी जिस अटैची में माल रखा होता है। नींद खुलती है तो देखते हैं कि नहीं।
द्रविण के प्रति जितना प्रेम है उतना ठाकुर जी के प्रति है।
केवल कहते हैं कि तुम हमारे द्रविण हो। वो अंदर बैठा हुआ जानता है कि सब ये जीव वाला मामला है।
अंदर तक इसके कुछ नहीं है। बोलता है तुम्हें वो माता च पिता तुम
बंधु सखा तुमव तमेव विद्या द्रविणम तमेव केवल बोलता है जी
वाचिक नहीं हृदय से भी होना चाहिए शरणागति केवल ऊपर से नहीं कि ठाकुर तुम हमारे हो
हम तुम्हारे हैं। ये बोलने से काम नहीं बनेगा। हृदय में लगे कि हम ठाकुर के शिष्य हैं। गुरुजनों के
शिष्य हैं और उनके चरणों के नीचे आ गए हैं। महाराज जैसे चाहे वैसे हमको रखें।
आ नहीं प्रपश्याम। आप जरा ध्यान दीजिएगा। मुझे
स्वर्ग का राज्य भी नहीं चाहिए और भूमि का राज्य भी नहीं चाहिए। यह राज्यम सुराणा पिचाधिपत्यम
भूमि का राज्य भी नहीं देवताओं का राज्य भी नहीं मुझे स्वामित्व भी नहीं निभाना है।
ठाकुर मैं केवल आपकी शरण में हूं। शरणागति की और कहा मेरी इंद्रियों को
यह जो इंद्रियां सूख रही हैं आप कृपा करके इस शोक को दूर कीजिए
क्योंकि मेरे जीवन में शोक है और हम शरणागति इसलिए आपकी स्वीकार रहे हैं कि आप हमारे शोक को
दूर कीजिए। एव मुक्तवा ऋषिकेशम गु केेश परम तप
एवं उ्वा इस प्रकार से बोल के ऋषिकेश के चरणों में यह श्री ठाकुर
ऋषिकेश है इंद्रियों पर अनुशासन करने वाले यह परम
महाराज घोड़ा केस घुघराले केस वाले अथवा निद्रा पर विजय प्राप्त करने वाले परम तपस्वी
नयो सेति गोविंद मुक्तवा तब मैं युद्ध नहीं करूंगा देखो नयो सेति गोविंद
मैं यह हमारा डबल बात हो गई। एक तरफ कहते हैं कि हम आपकी शरण में हैं
और एक तरफ कहते हैं कि नयो सेति गोविंद मैं युद्ध नहीं करूंगा। यह डबल बात है। मुझे मार्कंडेय पुराण में एक बात बहुत
अच्छी लगी। हरिश्चंद्र काशी में अपनी पत्नी और बेटे को बेच दिया।
किंतु उसके बाद भी दक्षिणा पूरी नहीं हो पाई विश्वामित्र की। तो एक चांडाल उनको खरीदने आया।
बड़ा कारुणिक प्रसंग है और चांडाल का महाराज विकृत स्वरूप मुंडों की माला पड़ी है। शरीर से दुर्गंध
आ रही है। कुत्ते साथ में लिए हुए हैं। विकराल स्वरूप है। और कहा इसको मैं खरीदूंगा।
तो हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र को हाथ जोड़कर के कहा कि शास्त्र में ऐसे निकृष्ट पुरुष की सेवा करना निषिद्ध है।
मुझे इसको मत बेचो। मैं आपका दास हूं। मेरे ऊपर कृपा करो।
तो जैसे उन्होंने कहा मैं तुम्हारा दास हूं। मेरे ऊपर कृपा करो। तो उन्होंने कहा यदि तुम मेरे दास हो
मेरी शरण में आ गए हो तो मैं आज्ञा देता हूं कि तुम इस चांडाल की सेवा करो। एक बार भी हरिश्चंद्र ने फिर मना नहीं
किया। ध्यान रखिए। अब कभी विचार करना शरणागति किसे कहते हैं?
हम लोग कहते हैं कि हम तुम्हारी शरण में हैं। किंतु क्या सचमुच में शरणागति है?
आप कभी विचार करना केवल मैं दृष्टि दे रहा हूं। श्री हनुमंत लाल जी महाराज सूर्य देवता के पास
वेदाध्यन के लिए गए। सूर्य देवता ने कहा मेरे पास अवकाश नहीं है। मैं तो चलता रहता हूं।
हनुमान जी महाराज ने कहा मैं चलते चलते ही पढ़ लूंगा। तो उल्टा होकर के पढ़े।
शास्त्र का नियम है कि गुरु से पूछा जाए कि आपको क्या दक्षिणा में दे हम?
आपने अध्ययन पूरा करा दिया। सूर्य देवता ने श्री हनुमान जी महाराज को कहा इस गुरु दक्षिणा के रूप में
तुम सुग्रीव की सेवा करो। कहां श्री हनुमान जी महाराज ज्ञान नाम अग्रगण्यम
और साक्षात भगवान शिव ध्यान रखिएगा हरते भ हनुमान और कहां सुग्रीव जैसे कामी व्यक्ति लोभी
व्यक्ति की सेवा में लगा दिया गया सुग्रीव महाराज जी लोभी भी है कामी भी है
और मित्रता को निभाने वाला भी नहीं है। किंतु वारे हनुमान जी एक बार भी नहीं कहा कि हमको किसी अन्य की
सेवा में लगा दो। ऐसे व्यक्ति की सेवा में मत लगाओ। और गजब तो तब हुआ। मैं कई बार रामायण का
पाठ करता हूं तो हृदय भर आता है। अंगद ने भले ही कहा राम जी को राम राज्य की स्थापना के बाद कि मुझे मत भेजो।
नीच टहल घर की सब करी हूं। किंतु हनुमान जी ने एक वाक्य नहीं बोला। और सबके साथ हनुमान जी को भी विदा कर दिया गया।
सुग्रीव के साथ हनुमान जी भी विदा हो गए। क्योंकि सुग्रीव के सेवक हैं। और विदा होने के बाद जब अवध की सीमा के
बाहर निकले तो सुग्रीव को प्रणाम किया और कहा कि यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं कुछ दिन रघुनाथ की सेवा करके आऊं।
जब सुग्रीव ने उनको आज्ञा दी तब राम जी की सेवा में हनुमान जी गए। ऐसे नहीं गए।
क्योंकि गुरु जी ने कहा था कि सुग्रीव की सेवा करनी है तो सुग्रीव जहां भेज दें ऐसी सेवा ऐसा समर्पण
हम लोगों को लगता तो है कि हम बहुत शरणागत हैं। बहुत समर्पित हैं। हम लोग जानते हैं नारायण
अगर चेला की मन की ना हो तो गुरुजनों के पास एक भी चेला टिकेगा नहीं। अगर उनके विपरीत बोलने लगे
तो यह सब चेलाओं की हमको पो कोल पट्टी पता है। अब 46 साल से संतों की कोपिन धो रहा हूं।
उनका उच्चिष्ट खा रहा हूं। उनकी सेवा में हूं। अभी भी उनकी सेवा में हूं क्योंकि हम लोग गुरुजनों के गुलाम नहीं
हैं। हम अपने मन के गुलाम है। जिस दिन आप गुरुजनों के गुलाम हो जाओगे उस दिन ईश्वर तुम्हारा गुलाम हो जाएगा।
जिस दिन हम ईश्वरों के गुरुजनों के गुलाम हुए ईश्वर तुम्हारा गुलाम होगा। किंतु हम तो अपने मन के गुलाम है जी। मन के गुलाम
यहां पर जैसे इन्होंने महाराज कहा नयो गोविंद
गोविंदम उ्वा तम भव यह कह के अर्जुन मौन हो गए तमवाच
ऋषिकेश प्रसन्न भारत हे भारत
मुस्कुरा पड़े श्री कृष्ण। यह दोनों सेनाओं के मध्य की घटना है। सेन भयो मध्य बीदंत मिदम बचा।
इन दोनों सेनाओं के मध्य में भगवान मुस्कुराते हुए। यही से हमारे भगवत पाद शंकराचार्य भगवान
ने महाराज भाष्य लिखना प्रारंभ किया है। इसमें बहुत शास्त्रार्थ भी है और आचार्यों
ने इस पर बहुत चिंतन किया है और भगवान ने यह देखकर के महाराज बोलना प्रारंभ किया है वैसे अब यहां से गीता प्रारंभ है।
किंतु गीता को क्योंकि गीता तो वही है जो गोविंद गीत गाएं। तो यहां से गोविंद बोलना प्रारंभ किए हैं। पहले तो भगवान बोले हैं
जी। हमारा गोविंद तो यहां से बोलना प्रारंभ किया है। किंतु इसके पहले के श्लोकों को अध्यायों को प्रथम अध्याय को भी गीता क्यों माना
गया?
जैसे श्रीमद् भागवत महापुराण में 12 स्कंध हैं। तो प्रथम स्कंध के तो लास्ट में सुखदेव जी महाराज आए और द्वितीय स्कंध से
बोलना प्रारंभ किया है। यदि सुखदेव जी महाराज की वाणी ही भागवत है तो फिर तो प्रथम स्कंद भागवत में नहीं आएगा।
और यदि भगवान श्री कृष्ण की वाणी ही श्रीमद् भगवत गीता है तो प्रथम अध्याय तो नहीं जुड़ना चाहिए किंतु गीता में प्रथम
अध्याय भी गिना जाता है। क्यों गिना जाता है? क्योंकि यह गीता की भूमिका है।
है? क्योंकि यह गीता की भूमिका है। यहीं से गीता का प्रवचन प्रारंभ होगा।
क्योंकि गीता की भूमिका प्रारंभ हो गई है। असो न सोचस्वम
प्रज्ञा वाद भास से गता सुगता सो नान सोचती पंडिता पंडित लोग क्या सोचते हैं? भगवान को यह
पंडित शब्द बहुत प्रिय है। इस विषय में श्री ठाकुर जी ने जो बोलना प्रारंभ किया इसकी चर्चा हम कल प्रातः काल से करेंगे। अब क्या करें?
समय अपने ढंग से भाग रहा है। अभी हमारे राधिका शरण आज संयोग से हरियाली तीज है और
हमारे यहां ब्रज में स्थिति की बड़ी महिमा है। हमारे ठाकुर तो वहां नृत्य गोपाल भगवान
आज से नएनए भष धारण करते हैं। आज तो श्री ठाकुर किशोरी जी के पास चूड़ियां बेचने जाते हैं। चूड़ियां लेकर के महाराज जाते
हैं। कल दूसरा रूप बनाएंगे गोपी बन बन के। तो यह झूलन का महोत्सव है। आइए हम सब मिलकर के राधिका शरण जी के साथ में ये
झूलन महोत्सव का आनंद लेते हैं। आप लोग थोड़ी देर के लिए जैसे प्रातः काल आपने देखा होगा कि आप सबको थोड़ी देर में राधिका शरण जी ने राष्ट्र प्रेम में भिगो
दिया था। ऐसे आपको अभी ब्रज प्रेम में भिगोने वाले हैं। भगवान की कृपा है इन पर किशोरी जी की। आप सब ब्रिज में पहुंचे
श्री धाम वृंदावन की ओर यात्रा करें और वहां ये जो महोत्सव झूलन महोत्सव मनाया जाता है हरियाली तीज मनाई जाती है आप सब
ब्रजवासी बनकर उसका आनंद ले करीब 101 मिनट तो हम आपका लेंगे ही इससे तो कम नहीं उसके बाद निरार्जन होगा निरार्जन के बाद कल से
हम गीता के रसधारा में बहेंगे दो टीिकाओं का विशेष करके मधुसूदन सरस्वती महाभाग और भगवत पद शंकराचार्य भगवान का
अवलंबन लेकर और भी अन्य संतों की भी वाणी का अवलंबन लूंगा। किंतु मुख्य रूप से इन्हीं महापुरुषों का अवलंबन होगा और हमारे पूज्य श्री उड़िया बाबा जी महाराज
का भी जो वक्तव्य है गुरुदेव भगवान के गुरुदेव उनका भी और हमारे महाराज श्री की भी जो वाणी बिल्कुल शंकराचार्य भगवान के भाष्य को ही प्रकाशित करने वाली है। उस पर
भी हम चिंतन करते हुए महापुरुषों का प्रसाद ही विषाद मिटाने के लिए आपके सन्मुख हम बांटेंगे। सचमुच में जैसे यहां
प्रसाद बटवाता को बनवाता कोई है और बांटता कोई है। ऐसे ही ध्यान रखना यह प्रसाद तैयार तो हमारे गुरुजनों ने किया है।
किंतु मेरा तो काम केवल बांटने का है। मैं उनका दिया हुआ प्रसाद बांटता रहता हूं। आपको यह प्रसाद स्वीकार करके विषाद को
मिटाना हो तो आराम से विषाद को मिटाइए। बहुत रसीला ज्ञान है। गीता सचमुच में बहुत रसीला ग्रंथ है और यह जीवन संगीत है हमारे
कृष्ण का। इसकी चर्चा हम क्रमश करेंगे। अभी हम सब राधिका शरण के साथ वृंदावन ब्रज की ओर गमन करें और ब्रज रस में डूब करके
अपने को आनंदित करें। विहारत बाग झूलन केजी गावत
गीत मधुर सुर दो बीच बीच मुरली
धुन बाजे बिहत बाग झूलन के काज भुमक चलन
बोलन अवलोकन तुमक चलन बोलन
अवलोकन कोटि मदन छवि निरखत लाजे
विहरत बाग झूलन के काजे नारायण
उलसत सुख विलसत नारायण उलसत सुख विलसत लता भवन
तरे आए बिराजे लता भवन तरे
आए बिराज विहरत बाग झूलन के काजे
एक ब्रिज का बड़ा ही प्राचीन भाव है। अब थोड़ा प्रचलित हो गया हैं। पहले कम जानते थे उसे लोग हिंडोला कुंजवन डारियो झूलन आई राधिका
प्यारी। तो आप सब उसमें मीठी मीठी ताली भी बजा सकते हैं और गा भी सकते हैं। कुछ क्लासिकल गाएंगे तो फिर सुनने के लिए होता है बाकी
जुड़ नहीं पाएंगे साथ में। तो आइए प्रेम से आनंद लेते हैं। झूलन आई राधिका
प्यारी जो झूलन आई राधिका प्यारी जो झूलन आई राधिका
प्यारी जो झूलन आई राधिका प्यारी जोोला
कुंज बन डारो रे हिडोला कुंज बन ड्यो रे हिंडोला
कुंज बन डायो रे हिंडोला कुंज बन डो री झूलन आई राधिका
प्यारी झूलन आई राधिका प्यारी
झूलन आई राधिका प्यारी जो झूलन आई राधिका प्यारी
काहे के खंब लगवाए जी काहे के खंबे लगवाए
जी काहे के खंबे लगवाए जी काहे के हमारे
काहे की दाई डोरिया प्यारी जी काहे की दाई डोरिया प्यारी जी
काहे की डरी डोरिया प्यारी जी काहे की डरी डोरिया प्यारी जी
ओ डोला कुंज बनो रेला कुंज बनारो
रे झूलन आई राधिका प्यारी जी झूलन आई राधिका प्यारी
झूलन आई राधिका प्यारी झूलन आई राध प्यारी
कर्म के खंब लगवाए जी करम के खंबे लगवाए
जी कदम के खंब लगवाए जी कदम के अंबे लगवाए
रेशम की बारी प्यारी रेशम की डोरिया
प्यारी जी रेशम की डोरिया प्यारी जी रेशम की डरी डोरिया
प्यारी जी डोला कुंज बन डायो रे हिंड डोला
कुंज बन डायो रे झूलन आई राधिका प्यारी जो झूलन आई राधिका
प्यारी झूलन आई राधिका प्यारी झूलन आई राधिका
प्यारी झूल रही झूल रही भा की दुलारी झूल रही झूल रही
की दुलारी झूल रही झूल रही धान की दुलारी
झूल रही झूल रही बाल की दुलारी झूल रही झूल रही भानु की दुलारी
झूल रही झूल रही भानु की दुलारी झूल रही झूल रही भानु की दुलारी
झूल झूल रही झूल रही झूल रही राधिका प्यारी जी झूल रही राधिका
प्यारी जी झूल रही राधिका प्यारी जी झूल रही राधिका
प्यारी जी झुलाहे रही आप बन बलवारी झुलाए रहे बलवारी
झुलाए रहे आप बनवारी जी झुलाए रहे आप बनवारी हिंडोला
कुंज बनो रे हिंडोला कुंज बन डायो रे हिडोला
कुंज बनारो रे हिंडोला कुंज बनारो रीन आई राधिका
प्यारी झूलन आई राधिका प्यारी झूलन आई राधिका
प्यारी झूलन आई राधिका प्यारी
धीरे झोला देव बनवारी जी धीरे झोटा देव बनवारी
जी धीरे झटा देव बनवारी जी झटा देव बनवारी
जी हमें तो डर लगो भारी जी हमें तो डर लगे रहो
भारी जी हमें तो डर लगो भारी हिंडोला
कुंज बन जाो रे हिंडोला कुंज बन जाो रे झूलन आई राधिका
प्यारी झूलन आई राधिका प्यारी झूलन आई आई राधिका
प्यारी जी आई राधिका
प्यारी जी करो मती राधिका प्यारी जी करो मती राधिका
प्यारी जी करो मती राधिका प्यारी जी करो मती राधिका
प्यारी जी हमें तो तुम प्राण सी प्यारी जी
हमें तो तुम प्राण से प्यारी जी हमें तो तुम प्राणों से प्यारी जी हमें तो तुम
प्राण से प्यारी हिंडोला कुंज बन जा रे हिंडोला कुंज बन
रे हिडोला कुंज बनो रे हिंडोला कुंज बनारो
री झूलन आई राधिका प्यारी झूलन आई राधिका प्यारी
झूलन आई राधिका प्यारी झूलन आई
प्यारी ओ झूलन आई राजा प्यारी झूलन आई राधिका प्यारी
एक मल्हार है ब्रिज की आपने शायद पहली बार ही सुनेंगे आप ये प्रचलित नहीं है हमारा जो चतुर्वेदी समाज
है उनमें गाई जाती है बड़ी प्यारी सी मलार है वो भी साथ साथ में सुना देते चांद छिपो चांद छिपोकारी
बदरिया में हम गावे मार चांद छिपोकारी बदरिया में हम गावे मार
चांद छिपकारी बदरिया में हम गा मल्हार
चांद की पुकारीरिया में हम गाल कोयल तारी
तू कह है डारी नारी कोयल डारी तू है नारी नारी कोयल तारी
है डारी नारी कोयल का नारी है डारी डारी चांदनी सी
चांदनी सी बैठी पटरिया में हम गावे मल्हार
चांदनी सी बैठी पटरिया में हम गावे मला चांदी
पटरिया में हम गावे मार सबारी बदैया हम गावे
रिमझिम रिमझिम मेघा बरसे रिमझिम रिमझिम
मेघा बरसे रिमझिम रिमझिम मेहा बरसे रिमझिम रिमझिम
मेहा बरसे रिमझिम रिमझिम झिम लेहा बरसे रिमझिम रिमझिम
लेहा बरसे दामनी चमके बिजुरी गरजे दामनी चमके
बिजुरी चमके दामनी चमके बिजुरी गरजे दामिनी चमके
बिजुरी गरजे चांदनी सी चांदनी सी बैठी अटरिया में हम गावे मला
चांदनी तारीरिया में हम गावे मला चांद चोकारी
बरिया में हम गावे मला जय जय और बड़ी प्यारी सी बात कहिए
गोरे गोरे मुखड़े पे लट घुघरारी गोरे गोरे मुखड़े पे लट घुंगे
गोरे गोरे मुखड़े पे लट घुघरारी गोरे गोरे मुखड़े पे लत गुली
गोरी तेरे मुखड़ा ने मोहनी सी डारी गोरी तेरे मुखड़ा ने मोहनी सी डारी कोयल तारी
तू है डारी डारी कोयल तारी है डारी डारी चांदनी सी
चांदनी सी बैठीरिया में जावे चांद से बैठीरिया
सेवे मला चांदीरिया में हम गाइया में हम गाला जय
की जय हरि बोल आप सभी तालियों की सेवा झूला झूलो ही राधा रानी
मेरा श्याम श्याम आया रे झूला झूलो राधा रानी झूला रे मेरा श्याम आया रे झूला झूलो
राधा रानी झूला रे मेरा श्याम आया रे झूलो रे राधा रानी झूला रे मेरा श्याम आया
रे श्याम आया श्याम आया श्याम आया रे श्याम आया श्याम आया श्याम आया रे श्याम
आया आया श्याम आया श्याम आया रे श्याम आया श्याम आया श्याम आया रे झूला झूलो रे राधा
रानी मेरा श्याम आया रे झूलो रे राधा रानी मेरा श्याम आया रे
झूलो रे राधा रानी मेरा श्याम आया रे झूलो रे राधा रानी रे तेरा
सावन की बरसे है रिमझुम पदरिया सावन की बरसे है रिमझिम बदरिया सावन की बरसे है
रिमझुम बदरिया सावन की बरसे है रिमझिम बदरिया रिमझिम बदरिया रिमझिम बदरिया रिमझिम
बदरिया रिमझिम बदरिया तेरी चुनरिया भी तेरी चुनरिया भी राधे मेरा श्याम आया रे
तेरी चुनरिया भी बोली राधा मेरा श्याम आया रे श्याम आया श्याम आया श्याम आया रे
श्याम आया श्याम आया श्याम आया आया रे श्याम आया श्याम आया श्याम आया रे श्याम
आया श्याम आया श्याम आया रे झूला झूलो रे राधा रानी झूला रे मेरा श्याम आया रे झूला
झूलो रे राधा रानी झूला ले मेरा श्याम आया रे जय जय जय हो।
रेशम की डोरी चांदी का झूला रेशम की डोरी चांदी का झूला रेशम की डोरी चांदी का झूला
रेशम की डोरी चांदी का झूला झूला पे तुझको बिठाने
झूला पे तुझको बिठाने राधे तेरा श्याम आया रे झूला पे तुझको बिठाने राधे तेरा श्याम
आया रे श्याम आया श्याम आया श्याम आया रे श्याम आया श्याम आया श्याम आया रे झूला
झूलो रे राधा रानी श्याम आया रे झूला झूलो रे राधा बाबा के हाथों में साजे मुरलिया कान्हा के
हाथों में साजे मुरलिया बाबा के हाथों में साजे मुरलिया कान्हा के हाथों में साजे
मुरलिया मुरली की कहान सुना दे मुरली की कहान सुना राधे श्याम आया रे
श्याम आया रे श्याम आया श्याम आया श्याम आया रे मेरे श्याम आया श्याम आया श्याम
आया रे झूला झूलो री राधा रानी मेरा श्याम आया रे झूला झूलो रे राधा रानी जय हो मेरा
श्याम आया रे झूला झूलो रे राधा रानी रे मेरा श्याम बोलो श्री झूलन महोत्सव की जय बांके बिहारी लाल
की जय जय जय श्री राधे अब आप सब खड़े रहे अभी खड़े खड़े ही आरती हो जाएगी अच्छा पहले सूचना सुन लो
जय जय राम जय जय राम जय जय राम सियाराम मैं सब जग जानी कर प्रणाम जोर जुग पानी केवल एक दो मिनट है ज्यादा नहीं आप लेंगे देखो जो कभी भी औपचारिकता बोलने की आदत नहीं जो हृदय में भाव होता है उसी का
उद्गार किया जाता है महाराज जी के इस भाव से हम बहुत ज्यादा प्रभावित हैं कि परसों जैसे महर मजा जी महाराज जी से मिले और रूटी ने पूछा महाराज जी कोई भी अव्यवस्था
कोई निर्देश जैसी कोई बोले हम और आप एक हैं। कमाल कर दिया महाराज जी ने। मैंने इतने सत्संग जुड़े किसी संत ने ये नही कहा कि हम और आप एक हैं आप भी बाहर से आए हैं।
हम भी बाहर से आए हैं। मिलजुलकर जो है हमारा इकट्ठा कार्यक्रम है और ये सहयोग कर लेंगे। जब भी महाराज जी से कोई बात पूछते नहीं वाली जी बिल्कुल ठीक है। जिधर से महाराज जी आते हैं उधर भोजन बनता है।
बर्तन झूठे साफ होते हैं। हमारी मजबूरी है। लेकिन महाराज जी पूछते हैं महाराज जी बड़े विलक्षण जो है संत है। ये सरल हृदय ना मन कुठलाई। किसी भी संत से आपने मंच पर
यह नहीं सुना होगा कि जिसने अपने बारे में यह कहा हो कि मैंने पिक्चरें देखी हैं। महाराज जी अपनी खुद की जो बातें हैं कितने सरल हृदय से बताते हैं ऐसे सत्संग का जो
है असर होता है। उसके बाद आदि गुरु शंकराचार्य कहते हैं भगवत गीता किंचित गीता गंगाजल कणिका का पीता। वो गीता आधा श्लोक और गंगा जल का जो एक बूंद भी आपको
जो है उधार कर देता है। लेकिन अब ये प्रश्न हमारा ये उठता है कि हमने तो बहुत बार अपने गुरुदेव गीता मनीष से गंगा जी सुनी है और गंगा जी में स्नान नहीं किया। लेकिन जिस श्रद्धा आदर और भाव के साथ हमें
गंगा में स्नान करना चाहिए या गीता सुननी चाहिए। उस आदर भाव से हम नहीं सुनते। हमारे पास पांच दिन है तो आपसे हाथ जोड़कर विनम्र प्रार्थना है गंगा नदी नहीं है
पिकनिक सपोर्ट नहीं है कपड़े धोने के लिए नहीं है आम वहां ले जाकर ठंडे करके खाने के लिए नहीं है जैसे हम करते हैं देख के गंगा हमारी मां है गंगा स्वामी रामदास जी
महाराज तो इतने भी भोर हो जाते थे गंगा नाम से मां मां मां मां हम मां की गोद में जा रहे हैं दंडवत प्रणाम करें वस्त्र ना धोए शरीर का मैल ना तारे सीधी डुबकी लगाए
और पूरे भाव से करें और महाराज जी का गीता प्रवचन तो आप देख ही रहे हैं। पहले दिन महाराज ने कहा था हम अपने ऊपर अपनी कृपा जब तक नहीं करेंगे तब तक गुरु संत ग्रंथ भगवान कोई नहीं करेगा। तो ये जो आपको धारा
मिल रही है पूर्ण गंगा जी की महाराज की बहुत बहुत बहुत बड़ी कृपा और दूसरी बात जो छोटी सी बात जो बहुत बड़ा संकोच होता है हमारे को कहने में व्यवस्था संबंधी मेरे ख्याल ये बात कहनी नहीं चाहिए। आप इतने
अनुशासित सत्संगी हैं। जहां की उपजाऊ भूमि है। पाप करोगे कई गुना बढ़ेगा। पुण्य करोगे कई गुना बढ़ेगा। अरे अव्यवस्था बुलानी या कोई बर्तन इधर लेना प्लीज इनके लिए जो है ध्यान ना करें। दूसरी छोटी
प्रार्थना खत्म कि अपने चिंतन को जो है इधर उधर ना जाने दे। मेरा अपना अनुभव है। हमने कई बार अपने चिंतन को बिगाड़ा किसी के साथ उलझ गए। कमरा ठीक नहीं है। बिस्तरा
ठीक नहीं है। मेरे को नीचे सोना पड़ रहा है। सारा गीता सत्संग चौपट हो जाएगा। एक अक्षर आपके समझ में नहीं आएगा। मैं दावा करता हूं। अगर ये ध्यान रहे भोजन ठीक नहीं। मेरे को नीचे सुहा दिया। मेरे को
उसके इन सब बातों को भूलकर केवल महाराज जी का चिंतन जो है सुनो है तो बात थोड़ी और हैराने की लेकिन हमारे मुख्य जो रसिक प्रेमी भी हैं आप कहोगे व्यस्त नहीं सवा
से लगभग सवा5 बजे तक हमारे पास अच्छे-अच्छे रसिक है ये तो आप गंभीर प्रवचन सुन रहे हो बहुत अच्छे रसिक हैं हमारी बेटी गीता जी बैठी है कल ज्योति जी आएंगे ये हमारे गौंडा जी के हैं और कल जो
है आज भी जो है हमारे जो है राजू बहन जी के लड़के आएंगे राजू तो आप उनका सवा5 से लगभग सवा5 9:30 पूरा उसमें हम आनंद जो लेंगे आप सभी साधन में अब हम रोज रोज नहीं
बोलेंगे लास्ट में बोलेंगे आपसे फिर प्रार्थना और विश्वास है कि इस बार जो है ये ना कुआई की व्यवस्था बनाएंगे दूसरी सबसे बड़ी बात ये जो कार्यक्रम सारे होते हैं इसमें किसी ना किसी के बहुत बड़े संत
का जो है प्रेरणा सद्भावना और सहयोग होता हमारे बाबा जी का जो है हर कार्यक्रम में इनका सबसे पहले आशीर्वाद लिया जाता है तो इसीलिए सफल होते हैं अब मिलकर आरती सभी से
मिलकर आरती व्यवस्था प्राण व्यवस्था के लिए या कोई भगवान ना करे वैसे तो कोई होगा नहीं बीमार कोई बीमारियों के दिन मस्ती है फिर भी अगर किसी को अचानक
शारीरिक अस्वस्थता है तो हमारे डॉक्टर सम्राट है ये ये खूब सेवा जो है करते हैं इनसे आप संपर्क कर सकते हैं पहले महाराज जी निकलेंगे उसके बाद आप भोजन की लाइन में
जो है लगना ताकि किसी प्रकार की व्यवस्था ना हो बर्तन के लिए देखो मेरे को तो बड़ी शर्म आती है बात कहते अरे इतने अच्छे साथ बर्तन वहां ना ले जाए आप य खाए इतने
स्वस्थ तो आप हैं जब आप दूसरे शहरों से जाकर सत्संग में आ गए तो क्या आप कमरे में भोजन खाना पसंद करोगे क्या? तो भोजन यही खाए और डॉक्टर साहब सम्राट डॉक्टर है इनकी सेवा जो है कमरा नंबर 203 में है ये किसी
भी ले सकते हैं। महाराज जी के चरणों में दंडवत प्रणाम इनकी सरलता के लिए जो है दंडवत प्रणाम जय जय राम जय जय राम जय
सभी मिलकर के भाव पूर्ण हृदय से आरती करेंगे। ओम ज्वलमने नम
नम सर्वोपचार्थ गक्ष पुष्पण समर्पयाम ओम प्रजन सर्व
आत्मस प्रजास पशुनियस अग्नि प्रजा बहुम करो भयो
प्मा सुरत तो जय भगवत गीते प्रभु जय भगवत गीते
हरि कमल बिहारी प्रभु ही कमल बिहारी सुंदर सुनीते
ओम जय भगवत गीते परम सुपरम प्रकाशनी शक्ति हरा प्रभु पास
तत्व ज्ञान विकासनी तत्व ज्ञान विकासनी ओम जय भगवत गीते
निश्चल भक्ति विनायिनी निर्मल मलहारी मैया निर्मल मनारी शरण
प्रयनी शरण प्रदायनी सब विधि सुखारी ओम जय भगवत की जय
राग द्वेष बिहारी का क्रोध सदा प्रभु का क्रोध सदा
भव हार तारणी भव भय तारणी परमानंद
प्रदा ओम जय भगवत गीते आसुर भाव विनाशनी
नासिनी रजनी प्रभु नाशिम रजनी स देवी सदनी
हरि रसिका सजनी ओम जय भगवत
क्षमता त्याग सिखावन हरि मुख की वाणी प्रभु हरि मुख की वाणी
सकल शास्त्र की स्वामिनी सकल शास्त्र की स्वामिनी सुतियों की
ओम जय भगवत गीते दया सुधा सावनी
मा कृपा की जय प्रभु मा कृपा की जय
हरि पद प्रेम प्रेम दान कर हरि पद प्रेम दान कर अपनों करिय ओम जय भगवत गीते
जय भगवत गीते प्रभु जय भगवत गीते हरि कमल बिहारी हरि
कमल बिहारणी सुंदर सुनीते ओम जय भगवत गीते
ओम जय भगवत गीते ओम जय भगवत गीते ओम देव शांति
शांति पृथ्वी शरा शोदया शांति वनस्पत देवा श ब्रह्म शांति सर्व शांति शांति देव
शांति साध जले शीतली देवांदनम आरोग प्रक्षाभज
हरि ओम जगम देवाण प्रथ महत्र पूर्ववे साध्या
संवा ओम एकदय विद्महे वक्रतुंडाय
धीमहि तन्नो दते प्रचोदयात ओम नारायणय विद्महे हे
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