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स्त्री को जन्नत का अनुभव: 3 गुप्त सूत्र का असली सच | Hidden Osho Teachings #OshoHindi

By Femina Mind

Summary

## Key takeaways - **प्रेम विजय नहीं, चेतना की यात्रा है**: एक सम्राट ने तलवार से राज्य जीते, पर अपनी स्त्री के कक्ष में भिखारी की तरह खड़ा रहा। प्रेम कोई हमला नहीं है—शरीर को जंजीरों में बांध सकते हो, पर आत्मा को कभी नहीं जीत सकते। [00:41], [02:14] - **खजाने पर बैठकर पल भर का सुख मांगना**: एक भिखारी पूरी उम्र लोहे के बक्से पर बैठकर भीख मांगता रहा, मरने पर खोला तो हीरों से भरा था। हर पुरुष स्त्री के निकट अनंत ऊर्जा के खजाने पर बैठा है, पर घर्षण के कुछ सिक्कों से संतुष्ट हो जाता है। [07:15], [09:00] - **तीन गुप्त सूत्र: उपस्थिति, शून्यता, समर्पण**: साधारण मिलन को समाधि में बदलने वाले तीन रहस्य हैं—पूर्ण उपस्थिति (मन का वहीं ठहरना), शून्यता (विचारों का पूर्ण लोप), और समर्पण (अहंकार का विसर्जन)। इनके बिना जन्नत का दरवाजा कभी नहीं खुलता। [14:44], [18:36] - **असली संगीत सुरों के बीच के सन्नाटे में है**: एक उस्ताद संगीतकार ने फकीर के सामने अपनी सबसे मधुर धुन बजाई, फकीर ने कहा—असली संगीत उन दो ध्वनियों के बीच के खालीपन में है। स्त्री-पुरुष के मिलन में भी जन्नत क्रियाओं में नहीं, दो शरीरों के बीच के ठहराव में है। [20:44], [22:01] - **स्त्री दर्पण में अपना दिव्य रूप ढूंढती है**: जब पुरुष पूर्ण शून्यता को उतार लेता है, तो वह बिना खरोच का दर्पण बन जाता है। साधारण पुरुष की आंखों में वासना और भूख दिखती है, पर शून्य पुरुष के दर्पण में स्त्री अपना सबसे सुंदर और पवित्र रूप देखती है—और वहीं लौटती है। [27:49], [29:03] - **शरीर नाव है, मंजिल नहीं**: शरीर केवल एक माध्यम है—नाव, जिसका काम तुम्हें नदी के पार ले जाना है। जो नाव को ही अपनी मंजिल समझकर उसमें बैठा रहता है, वह ऊर्जा की नदी को कभी पार नहीं कर पाता और दिव्यता तक नहीं पहुंचता। [11:44], [12:16]

Topics Covered

  • प्रेम कोई हमला नहीं, आत्मा तलवार से नहीं जीती
  • खजाने पर बैठा पुरुष पल भर की भीख मांगता है
  • शून्यता: विचारों की दीवार गिराओ, दर्पण बनो
  • संगीत सुरों में नहीं, उनके बीच के सन्नाटे में
  • शून्य पुरुष बने दर्पण, स्त्री अपना दिव्य रूप देखे

Full Transcript

स्त्री को जन्नत का अनुभव देने वाला पुरुष दुनिया का सबसे शक्तिशाली पुरुष है। वह शक्ति कहां से आती है? यह कोई साधारण बात

नहीं है। यह जीवन की सबसे बड़ी कीमिया है। और आज यह राज पूरी तरह से खुलेगा। तुमने अब तक जो भी जाना है, जो भी सुना है, वह

सब बहुत उथला है, बहुत सतही है। तुम शरीर के तल पर जीते रहे हो और शरीर के तल पर जन्नत के दरवाजे कभी नहीं खुलते। दरवाजे

कहीं और हैं और तुम चाबी कहीं और लगा रहे हो। इसे समझने के लिए मेरे मित्र मेरे साथ एक बहुत पुरानी और गहरी बात में उतरो। बात

एक ऐसे सम्राट की है जिसने अपनी तलवार के जोर पर पूरी दुनिया जीत ली थी। उसके पास अपार धन था। विशाल सेना थी और उसके खजाने

हीरे जवाहरात से भरे पड़े थे। एक दिन वह अपनी विजय के बाद अपनी सबसे प्रिय स्त्री के कक्ष में गया। उसे लगा कि जैसे उसने

राज्यों को जीता है, वैसे ही वह इस स्त्री को भी जीत लेगा। वह उसके पास गया। उसने उसे अपने आलिंगन में जकड़ लिया। उसने अपने

पूरे बल अपने पूरे अधिकार का प्रयोग किया। लेकिन उस रात उस सम्राट ने एक बहुत अजीब और गहरी बात महसूस की। उसने देखा कि

स्त्री का शरीर तो उसके पास था। वह उसके नियंत्रण में था। लेकिन वह स्त्री वहां नहीं थी। उसकी आंखें खाली थी। उसकी ऊर्जा

कहीं और थी। उसका शरीर तो बिस्तर पर था। लेकिन उसकी आत्मा मीलों दूर थी। वह सम्राट जिसने बड़े-बड़े राजाओं को घुटनों पर ला

दिया था। उस रात अपनी ही स्त्री के बिस्तर पर एक भिखारी की तरह खड़ा रह गया। उसके हाथ खाली थे। वह सब कुछ पाकर भी कुछ नहीं

पा सका था। वह दरवाजे पर खड़ा रहा और दरवाजा कभी खुला ही नहीं। क्यों नहीं खुला वह दरवाजा? क्योंकि वह सम्राट सोचता था कि

वह दरवाजा? क्योंकि वह सम्राट सोचता था कि प्रेम कोई हमला है। वह सोचता था कि जैसे राज्यों पर कब्जा किया जाता है। वैसे ही

स्त्री की देह पर कब्जा करके वह उसे पा लेगा। लेकिन तुम किसी की ऊर्जा पर कब्जा नहीं कर सकते। तुम शरीर को जंजीरों में

बांध सकते हो। लेकिन तुम आत्मा को किसी तलवार से नहीं जीत सकते। और यही अधिकांश पुरुषों की सबसे बड़ी त्रासदी है। वे

सम्राट की तरह आते हैं। वे शरीर पर हमला करते हैं। वे देह को पाना चाहते हैं।

लेकिन वे उस सूक्ष्म ऊर्जा को उस स्पंदन को कभी नहीं छू पाते जो स्त्री के भीतर गहराई में छिपा है। जन्नत के दरवाजे कोई

ईंट और पत्थर के दरवाजे नहीं है। यह कोई ऐसी जगह नहीं है जहां तुम चलकर जा सको। यह चेतना की एक अवस्था है। जब दो लोग मिलते

हैं तो आमतौर पर केवल उनके शरीर मिलते हैं। यह मांस का मांस से घर्षण है और घर्षण में केवल कुछ पल की ऊर्जा पैदा होती

है और फिर सब राख हो जाता है। तुम थक कर गिर जाते हो। तुम्हारे भीतर एक खालीपन एक उदासी छा जाती है। तुमने भी यह महसूस किया

होगा। मिलन के बाद जो उदासी आती है, वह इस बात का प्रमाण है कि तुम जन्नत के दरवाजे तक गए ही नहीं। तुम बस बाहर की सीढ़ियों

पर ही लड़खड़ा कर गिर गए। असली अर्थ क्या है इसका? जब पुरुष अपनी पूर्ण चेतना के

है इसका? जब पुरुष अपनी पूर्ण चेतना के साथ, अपनी पूरी जागरूकता के साथ स्त्री के पास जाता है तो वह एक पशु की तरह नहीं जाता। वह एक मंदिर में प्रवेश करने वाले

पुजारी की तरह जाता है। स्त्री का शरीर कोई भोग की वस्तु नहीं है। वह एक द्वार है। प्रकृति ने स्त्री को बहुत रहस्यमई

बनाया है। वह ग्रहण करने वाली है। वह एक गहरी खाई की तरह है। एक अथा सागर की तरह है। तुम अगर एक छोटी सी बाल्टी लेकर सागर

के पास जाओगे तो तुम सागर को कैसे जान पाओगे? पुरुष अपनी छोटी सी वासना लेकर

पाओगे? पुरुष अपनी छोटी सी वासना लेकर जाता है और वह सागर के किनारे से ही लौट आता है। उसे पता ही नहीं चलता कि भीतर

कितनी गहराइयां थी जब शरीर मिलते हैं और उन शरीरों के साथ जब तुम्हारी सांसे एक लय में आ जाती हैं। जब तुम्हारा नाड़ी तंत्र

तुम्हारे भीतर की ऊर्जा की तरंगे एक दूसरे से पूरी तरह जुड़ जाती हैं तब वो दरवाजा खुलता है। यह एक ऐसा क्षण होता है [गला साफ़ करने की आवाज़] जहां समय रुक

जाता है। जहां कोई विचार नहीं बचता जहां ना तुम रहते हो ना वह रहती है। केवल एक शून्य बचता है और उसी शून्य को जन्नत कहा

गया है। तुमने शायद एक बहुत प्राचीन और गहरे ग्रंथ का नाम सुना हो। यह दुनिया की सबसे रहस्यमय किताबों में से एक है। इसका

नाम है विज्ञान भैरव तंत्र। यह कोई साधारण किताब नहीं है जिसे तुम पढ़कर एक किनारे रख दो। यह शिव और पार्वती के बीच का संवाद है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] यह उस

ऊर्जा का विज्ञान है जो जीवन को चला रही है। इस ग्रंथ में कोई सिद्धांत नहीं दिए गए हैं। इसमें केवल प्रयोग दिए गए हैं।

शिव अपनी प्रियतमा को ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्य बता रहे हैं। लेकिन वे उसे किसी ब्लैक बोर्ड पर लिखकर नहीं बता रहे

हैं। वे उसे प्रेम के अनुभव के माध्यम से बता रहे हैं। विज्ञान भैरव तंत्र कहता है कि जब दो प्रेमी एक गहरे आलिंगन में होते

हैं, तो उन्हें शरीर को भूल जाना चाहिए। उन्हें उस खालीपन पर ध्यान देना चाहिए जो उनकी सांसों के बीच है। जरा सोचो। जब तुम

श्वास भीतर लेते हो और जब तुम श्वास बाहर छोड़ते हो तो उन दोनों के बीच एक बहुत छोटा सा ठहराव होता है। एक बहुत बारीक सा

खालीपन होता है। विज्ञान भैरव तंत्र कहता है कि जब प्रेम की चरम अवस्था आती है, जब ऊर्जा अपने शिखर पर होती है, तब मन पूरी

तरह से रुक जाता है। विचार शांत हो जाते हैं। उस क्षण में अगर तुम उस खालीपन में प्रवेश कर जाओ तो मिलन एक गहरी समाधि बन

जाता है। तुम देह से शुरू करते हो लेकिन तुम देह पर खत्म नहीं होते। तुम परमात्मा तक पहुंच जाते हो। यह किताब कहती है कि

जन्नत का अनुभव कोई ऐसा अनुभव नहीं है जो मरने के बाद मिलेगा। जन्नत इसी क्षण में है। इसी शरीर में है। अगर तुम उस ऊर्जा को

ऊपर की ओर उठने दो। लेकिन दिक्कत यह है कि इंसान बहुत जल्दी में है। पुरुष बहुत हड़बड़ी में है। वह एक दौड़ में है। वह बस

शुरू करना चाहता है और खत्म करना चाहता है। उसे मंजिल पर पहुंचने की इतनी जल्दी है कि वह रास्ते के सारे फूलों को कुचलता हुआ निकल जाता है। और जब वह मंजिल पर

पहुंचता है तो पाता है कि वहां कुछ भी नहीं है। केवल एक खालीपन है। मुझे एक और कहानी याद आ रही है। एक भिखारी था। वह

पूरी उम्र एक लोहे के पुराने बक्से पर बैठकर भीख मांगता रहा। वह सुबह से शाम तक लोगों के सामने हाथ फैलाता। कुछ सिक्के

उसे मिल जाते और वह उसी से अपना पेट भर लेता। रात को वह उसी बक्से पर सो जाता। उसकी पूरी जिंदगी उसी जगह उसी सड़क के

किनारे उसी बक्से पर बीत गई। एक दिन वह बहुत बूढ़ा हो गया। मौत के करीब था। एक

अजनबी वहां से गुजरा। उसने भिखारी से पूछा, "तुम पूरी जिंदगी यहां इस बक्से पर बैठे रहे? क्या तुमने कभी खोल कर देखा है

बैठे रहे? क्या तुमने कभी खोल कर देखा है कि इस बक्से के भीतर क्या है?" भिखारी

हंसा और बोला, पागल हो गए हो? यह कबाड़ का बक्सा है। इसमें कुछ नहीं है। मैं तो बस इस पर बैठता हूं। अजनबी ने कहा मरने से

पहले एक बार इसे खोल कर तो देख लो। भिखारी ने अपने कांपते हाथों से बक्से का ढक्कन

खोला और उसकी आंखें फटी की फटी रह गई। वह बक्सा अनमोल हीरों और जवाहरात से भरा पड़ा था। वह भिखारी जिसे वह लोहे का साधारण

बक्सा समझ रहा था। वह दरअसल एक बहुत बड़ा खजाना था। वह पूरी उम्र खजाने के ऊपर बैठकर भीख मांगता रहा। यही तुम्हारी भी

स्थिति है। यही उस हर पुरुष की स्थिति है जो स्त्री के पास जाता है। वह एक अनंत ऊर्जा के खजाने पर बैठा है। लेकिन वह भीख

मांग रहा है कुछ पलों के सुख की। वह शरीर के घर्षण से कुछ सिक्के इकट्ठे कर रहा है। जबकि उसके ठीक नीचे हीरों का खजाना दबा पड़ा है। वह दरवाजे के बिल्कुल सामने खड़ा

है। लेकिन वह अंदर नहीं जा पाता क्योंकि वह चाबी बाहर खोज रहा है। जन्नत का वह अनुभव, वह गहराई, वह समाधि, वह कोई

चमत्कार नहीं है जो आसमान से गिरेगा। यह तुम्हारे भीतर सोई हुई ऊर्जा का जागरण है। जब पुरुष यह समझ लेता है कि स्त्री कोई मशीन नहीं है जिसके बटन दबाकर वह सुख पा

लेगा। जब वह समझता है कि स्त्री एक वाद्ययंत्र है। एक बहुत नाजुक वाद्यंत्र जिसके तारों को अगर सही ढंग से छेड़ा जाए

तो उसमें से ब्रह्मांड का सबसे मधुर संगीत पैदा हो सकता है। लेकिन उस संगीत को पैदा करने के लिए पुरुष को खुद एक संगीतकार

बनना पड़ता है। उसे खुद शांत होना पड़ता है। उसे अपनी सारी आक्रामकता, अपनी सारी लड़ाई, अपनी सारी दुनियादारी को

दरवाजे के बाहर छोड़ना पड़ता है। अधिकांश पुरुष जब अपनी स्त्री के पास जाते हैं तो वे अपने साथ पूरी दुनिया को ले जाते हैं।

वे अपने साथ अपना दफ्तर, अपनी चिंताएं, अपना अहंकार, अपनी दौलत, अपना पद सब कुछ बिस्तर पर ले आते हैं। और इतने भारी बोझ

के साथ तुम जन्नत के दरवाजे के भीतर कैसे प्रवेश कर सकते हो? वह दरवाजा बहुत संकरा है। वहां से केवल वही गुजर सकता है जो

पूरी तरह से खाली हो गया हो। जो एक पंख की तरह हल्का हो गया हो। जब तक तुम्हारे सिर पर तुम्हारे विचारों का, तुम्हारी पहचान

का बड़ा सा पहाड़ रखा है, तुम उस सूक्ष्म द्वार से नहीं गुजर सकते। तुम बाहर ही खड़े रहोगे। तुम बक्से पर बैठकर भीख ही

मांगते रहोगे। स्त्री की ऊर्जा बहुत ग्रहणशील होती है। वह सब कुछ सोख लेती है। अगर तुम क्रोध, निराशा और खालीपन के साथ

उसके पास जाओगे तो वह भी वही महसूस करेगी। लेकिन अगर तुम एक गहरे सन्नाटे, एक गहरे मौन और एक प्रार्थना के भाव के साथ जाओगे

तो तुम देखोगे कि उसका शरीर एक मंदिर में बदल गया है। विज्ञान भैरव तंत्र में यही समझाया गया है कि यह कोई भोग का कृत नहीं

है। यह एक योग का कृत है। यह खुद को मिटाने का तरीका है। जब तक मैं मौजूद है

तब तक कोई समाधि नहीं हो सकती। जहां मैं है वहां वासना है। जहां मैं नहीं है वहां जन्नत है। तुम्हें अपने उस मैं को पिघलने

देना होगा। तुम्हें उस दौड़ को छोड़ना होगा। तुम्हें उस पल में पूरी तरह से डूब जाना होगा। शरीर तो केवल एक माध्यम है। एक

नाव है। नाव का काम केवल तुम्हें नदी के उस पार ले जाना है। तुम नाव को ही अपनी मंजिल समझकर उसी में बैठे मत रहो। नदी को

पार करना है। और वह नदी ऊर्जा की नदी है। जब तुम इस बात को गहराई से समझोगे। जब तुम इस सत्य को अपने भीतर उतरने दोगे तब तुम

पाओगे कि जीवन का हर क्षण मिलन का हर पल केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं रह गया है बल्कि वह अस्तित्व के साथ एक गहरा संबंध

बन गया है। यही वह जगह है जहां साधारण असाधारण में बदल जाता है। यही वह बिंदु है जहां मनुष्य अपनी पशुता से ऊपर उठकर

दिव्यता को छू लेता है। यह एक कला है। यह एक बहुत बड़ा विज्ञान है। इसे उथले मन से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए तुम्हें अपने

भीतर की गहराइयों में उतरना ही होगा। तुम्हें [नाक से की जाने वाली आवाज़] अपनी उस अंधियारी गुफा में रोशनी ले जानी होगी जहां तुमने अपनी चेतना को छिपा कर रखा है।

और जब वह रोशनी फैलेगी तब तुम देखोगे कि कोई भी दरवाजा बंद नहीं था। तुम ही अपनी आंखें बंद करके खड़े थे। मेरी इन बातों को केवल शब्दों की तरफ मत सुनना। शब्दों में

कुछ नहीं रखा है। [गला साफ़ करने की आवाज़] शब्द तो केवल इशारे हैं। जैसे कोई उंगली से चांद की तरफ इशारा कर रहा हो। तुम उंगली को मत पकड़

लेना। तुम चांद को देखना। मेरी ये बातें उसी चांद की तरफ इशारा है। उस खालीपन की तरफ, उस सन्नाटे की तरफ। जहां दो लोग

मिलते तो हैं, लेकिन फिर दो नहीं रहते। वे एक विराट शून्य में विलीन हो जाते। यही वह रहस्य है। यही वह चाबी है जो उस बक्से को

खोलती है। और जो पुरुष इस चाबी को पा लेता है। वह दुनिया का सबसे शक्तिशाली पुरुष बन जाता है। क्योंकि उसने उस चीज को जीत लिया

है जिसे तलवारों से नहीं जीता जा सकता। उसने प्रेम को जीत लिया है। उसने चेतना को जीत लिया है। और जो चेतना को जीत लेता है,

उसके लिए इस ब्रह्मांड में कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। वह जहां खड़ा होता है, जन्नत के दरवाजे वहीं खुल जाते हैं। हम

उसी अविरल धारा में आगे बह रहे हैं, जहां हमने उस खजाने की बात की थी, जिस पर बैठकर इंसान पूरी उम्र भीख मांगता रहता है। हमने

उस खालीपन की बात की थी जो दो सांसों के बीच होता है। अब हम और भी गहरी खाई में उतरेंगे। अब हम उन तीन गुप्त तत्वों की

बात करेंगे जो किसी भी साधारण अनुभव को, किसी भी साधारण मिलन को एक असाधारण समाधि में बदल देते हैं। यह कोई किताबी बातें

नहीं है। यह जीवन की कीमिया के सबसे गहरे सूत्र हैं। अगर तुमने इन तीन तत्वों को समझ लिया और समझकर अपने भीतर उतार लिया तो

तुम पाओगे कि तुम्हारे जीवन में कुछ भी साधारण नहीं रह गया है। सब कुछ पवित्र हो गया है। पहला गुप्त तत्व है पूर्ण उपस्थिति।

इसका क्या अर्थ है? तुम कहोगे कि जब मैं अपनी स्त्री के पास होता हूं तो मैं वहीं तो होता हूं। मेरा शरीर वहीं तो होता है।

लेकिन नहीं। मेरे मित्र तुम्हारा शरीर वहां होता है। तुम वहां नहीं होते। तुम्हारी चेतना कहीं और भटक रही होती है।

तुम या तो अतीत की स्मृतियों में खोए होते हो या भविष्य की कल्पनाओं में उड़ रहे होते हो। तुम दफ्तर के किसी झगड़े के बारे

में सोच रहे होते हो या कल चुकाए जाने वाले किसी बिल की चिंता में डूबे होते हो। तुम्हारा शरीर बिस्तर पर है। लेकिन

तुम्हारा मन किसी बाजार में, किसी सड़क पर या किसी दुकान में भटक रहा है। और जहां मन होता है, ऊर्जा वहीं बहती है। स्त्री बहुत

संवेदनशील होती है। वह तुम्हारी इस अनुपस्थिति को तुरंत पकड़ लेती है। उसे एहसास हो जाता है कि तुम वहां नहीं हो।

तुम्हारा ढांचा वहां है। तुम्हारा मांस वहां है। लेकिन तुम नदारद हो। पूर्ण उपस्थिति का अर्थ है कि इस पल में इस एक

क्षण में पूरी दुनिया मिट जाए। ना कोई अतीत बचे ना कोई भविष्य, ना कोई कल था, ना

कोई कल होगा। बस यही एक पल है। और यही पल शाश्वत है। जब तुम इस तरह से अपनी स्त्री के पास जाते हो। जब तुम अपनी पूरी ऊर्जा

को समेटकर उस एक क्षण में ले आते हो तब तुम्हारी उपस्थिति ही एक जादू बन जाती है। तब तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती।

तुम्हारी सिर्फ वह मौजूदगी, तुम्हारा वह ठहराव ही उस स्त्री के भीतर एक बहुत गहरी हलचल पैदा कर देता है। उपस्थिति का मतलब

है पूरी तरह से जागृत होना। एक दिए की तरह जलना। जब तुम पूरी तरह से मौजूद होते हो तो तुम्हारी ऊर्जा एक बहुत उच्च तरंग पर

कंपन करने लगती है और वह तरंग सीधा उस स्त्री के हृदय तक पहुंचती है। दूसरा गुप्त तत्व है शून्यता। शून्यता का अर्थ है विचारों का गिर जाना।

मनुष्य का मन हर समय बड़बड़ाता रहता है। वह कभी शांत नहीं होता। तुम्हारे भीतर लगातार एक कोलाहल चल रहा है। तुम बाहर से

भले ही चुप रहो लेकिन भीतर एक बहुत बड़ी भीड़ खड़ी है जो लगातार शोर मचा रही है। तुम प्रेम के क्षणों में भी सोच रहे हो। तुम सोच रहे हो कि तुम कैसा प्रदर्शन कर

रहे हो। तुम सोच रहे हो कि स्त्री को कैसा लग रहा होगा। तुम सुख की गणना कर रहे हो। तुम परिणाम के बारे में मैं सोच रहे हो।

और जहां विचार है वहां सत्य नहीं हो सकता। जहां विचार है वहां जन्नत का दरवाजा कभी नहीं खुल सकता। विचार एक दीवार की तरह है

जो तुम्हें अस्तित्व से अलग कर देती है। शून्यता का अर्थ है उस दीवार का गिर जाना। जब तुम अपनी स्त्री की आंखों में देखो तो

तुम्हारे भीतर कोई विचार नहीं होना चाहिए। कोई शब्द नहीं। बस एक सन्नाटा, एक गहरा मौन। जब तुम शून्य होते हो तो तुम एक

दर्पण बन जाते हो। शून्य व्यक्ति के भीतर पूरी दुनिया समा सकती है क्योंकि उसके भीतर कोई कचरा नहीं है, कोई बाधा नहीं है।

जब दो लोग बिना किसी विचार के एक दूसरे के करीब आते हैं तो उनके नदारद होने का उनके मिटने का क्षण आ जाता है। वे शरीर के तल

पर मिलते हैं। लेकिन चेतना के तल पर वे एक असीम आकाश में विलीन हो जाते हैं। तीसरा

गुप्त तत्व है समर्पण। मनुष्य का सबसे बड़ा रोग उसका अहंकार है। उसका मैं यह हूं। मैं वो हूं। मैं इतना शक्तिशाली हूं।

मैं पुरुष हूं। मैं जीतने वाला हूं। यह मैं ही सबसे बड़ी बीमारी है। प्रेम कोई युद्ध नहीं है जिसे तुम्हें जीतना है।

प्रेम एक ऐसी हार है जो दुनिया की सबसे बड़ी जीत से भी ज्यादा मीठी है। समर्पण का अर्थ है अपने अहंकार को पूरी तरह से

विसर्जित कर देना। यह मान लेना कि तुम कुछ भी नहीं हो। जब तुम किसी नदी में उतरते हो तो तुम नदी से लड़ते नहीं हो। तुम खुद को

नदी के बहाव पर छोड़ देते हो। ठीक उसी तरह जब तुम उस ऊर्जा के प्रवाह में उतरते हो तो तुम्हें अपनी सारी अकड़ छोड़ देनी होती है। इस बात को गहराई से समझने के लिए मैं

तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं। इसे बहुत ध्यान से सुनना। एक बहुत महान संगीतकार था। उसकी उंगलियों में ऐसा जादू था कि जब

वह अपने वाद्ययंत्र के तारों को छेड़ता तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। दूर-दूर से लोग उसका संगीत सुनने आते थे। एक दिन वह

एक गांव से गुजर रहा था। उसने सुना कि वहां पहाड़ी के ऊपर एक फकीर रहता है जो बहुत ज्ञानी है। संगीतकार को लगा कि उसे

उस फकीर को अपना संगीत सुनाना चाहिए। वह अपने वाद्ययंत्र को लेकर उस पहाड़ी पर चढ़ा। फकीर अपनी झोपड़ी के बाहर आंखें बंद

किए बैठा था। संगीतकार ने अपना वाद्ययंत्र निकाला और दुनिया की सबसे मधुर धुन बजानी शुरू कर दी। उसने अपनी पूरी कला, अपना

पूरा कौशल उसमें झोंक दिया। वह तारों पर अपनी उंगलियां दौड़ा रहा था। उसे उम्मीद थी कि फकीर उसकी तारीफ करेगा। काफी देर

बाद जब संगीत खत्म हुआ तो फकीर ने धीरे से अपनी आंखें खोली। उसके चेहरे पर एक बहुत शांत मुस्कान थी। संगीतकार ने गर्व से

पूछा, "कैसा [गला साफ़ करने की आवाज़] लगा मेरा संगीत?" मैंने इन तारों में अपनी जान

मेरा संगीत?" मैंने इन तारों में अपनी जान डाल दी है। फकीर हंसा और बोला, पागल, तुम संगीत को तारों में खोज रहे हो। तुम

ध्वनियों में संगीत खोज रहे हो। लेकिन असली संगीत तो वहां था ही नहीं। संगीतकार हैरान रह गया। उसने कहा, क्या मतलब? अगर

संगीत तारों और ध्वनियों में नहीं है तो कहां है? फकीर ने कहा असली संगीत उन दो

कहां है? फकीर ने कहा असली संगीत उन दो ध्वनियों के बीच के खालीपन में था। असली संगीत उस सन्नाटे में था जो एक सुर के खत्म होने और दूसरे सुर के शुरू होने के

बीच आता है। तुम शोर पैदा कर रहे थे और मैं उस शोर के पीछे छिपे सन्नाटे को सुन रहा था। जब तक तुम खालीपन को नहीं समझोगे।

तुम कभी असली संगीतकार नहीं बन सकते। यही बात स्त्री और पुरुष के मिलन पर भी लागू होती है। पुरुष वाद्यंत्र के तारों पर

उंगलियां दौड़ा रहा है। वह कृत्यों में क्रियाओं में हलचल में जन्नत खोज रहा है। लेकिन जन्नत वहां नहीं है। जन्नत उस

सन्नाटे में है। उस ठहराव में है जो दो शरीरों के बीच पैदा होता है। स्त्री को वह अंतिम अनुभव तुम्हारे किसी शारीरिक कृत से

नहीं मिलता बल्कि तुम्हारी उस ठहरी हुई उपस्थिति से मिलता है। जब तुम फकीर की तरह उस सन्नाटे को सुन पाते हो। जब तुम उस

खालीपन में उतर पाते हो तब जाकर वह संगीत पैदा होता है जिसे हम समाधि कहते हैं। अब हम एक बहुत गहरा और रहस्यमई प्रयोग

करेंगे। मैं चाहता हूं कि तुम जो भी कर रहे हो उसे एक पल के लिए रोक दो। अपनी आंखें बंद कर लो। बिल्कुल शांत हो जाओ।

अपने शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ दो। अब अपना पूरा ध्यान अपनी सांसों पर ले जाओ। सांस भीतर जा रही है। सांस बाहर आ रही है।

तुम्हें सांस को रोकना नहीं है। ना ही उसकी गति बदलनी है। तुम्हें केवल उसका साक्षी बनना है। अब बहुत ध्यान से देखो।

जब सांस भीतर जाती है और जिस बिंदु से वह वापस बाहर मुड़ती है वहां एक बहुत छोटा सा ठहराव है। एक क्षण का खालीपन।

उसी तरह जब सांस पूरी तरह बाहर निकल जाती है और भीतर मुड़ने से पहले वहां भी एक क्षण का खालीपन है। उस खालीपन पर अपना

ध्यान केंद्रित करो। अब महसूस करो कि तुम्हारी नाभि से एक ऊर्जा धीरे-धीरे ऊपर जब सांस भीतर जाती है और जिस बिंदु से वह

वापस बाहर मुड़ती है वहां एक बहुत छोटा सा ठहराव है एक क्षण का खालीपन। उसी तरह जब सांस पूरी तरह बाहर निकल जाती

है और भीतर मुड़ने से पहले वहां भी एक क्षण का खालीपन है। उस खालीपन पर अपना ध्यान केंद्रित करो। अब महसूस करो कि

तुम्हारी नाभि से एक ऊर्जा धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठ रही है। वह नाभि से उठकर तुम्हारे हृदय की ओर आ रही है।

तुम्हारे भीतर कोई विचार नहीं है। सब कुछ शून्य हो गया है। एक गहरा सन्नाटा तुम्हारे भीतर छा गया है। तुम केवल एक ऊर्जा हो। कोई शरीर नहीं। इस शून्यता में

कुछ पल ठहरो। अब धीरे-धीरे अपनी आंखें खोलो। तुमने अभी जो अनुभव किया वह कोई

चमत्कार नहीं था। तुमने जो यह शांति महसूस की यह कोई नई बात नहीं थी। यह केवल एक स्मरण था। यह तुम्हारे भीतर हमेशा से

मौजूद था। तुमने बस आज इसकी तरफ आंखें खोली हैं। इस ज्ञान को, इस शून्यता को केवल बंद कमरे तक सीमित नहीं रखना है। इसे

तुम्हें अपने दैनिक जीवन में उतारना होगा। तुम्हें इस उपस्थिति को अपने जीवन के हर साधारण पल में जीना होगा। मैं तुम्हें तीन ऐसी स्थितियां बताता हूं जहां तुम्हें

इसका प्रयोग करना है। पहली स्थिति श्रवण यानी सुनना। जब तुम्हारी स्त्री तुमसे बात कर रही हो। चाहे वह घर की कोई साधारण सी बात ही क्यों ना हो तब तुम क्या करते हो?

तुम बस यह सोचते रहते हो कि तुम्हें क्या जवाब देना है? तुम उसकी बात खत्म होने का इंतजार करते हो ताकि तुम अपनी बात कह सको।

कल से यह करना छोड़ दो। जब वह बोले तो पूरी तरह से शून्य होकर उसे सुनो। तुम्हारे भीतर कोई विचार नहीं होना चाहिए।

कोई प्रतिक्रिया तैयार नहीं होनी चाहिए। बस उसे एक खाली आकाश की तरह सुनो। उसे महसूस करने दो कि तुम्हारी पूरी चेतना उसे

सुन रही है। तुम हैरान रह जाओगे कि केवल इस तरह सुनने मात्र से ही तुम्हारे बीच की ऊर्जा कैसे बदल जाती है। उसे लगेगा जैसे वह किसी गहरे कुएं में अपनी बात कह रही है

और वह कुआं उसे पूरी तरह से स्वीकार कर रहा है। दूसरी स्थिति स्पर्श का रहस्य। तुम चीजों को कैसे छूते हो? यह बहुत

महत्वपूर्ण है। तुम [गला साफ़ करने की आवाज़] सुबह चाय का प्याला पकड़ते हो। तुम दरवाजे का हैंडल पकड़ते हो। बहुत ही यंत्रवत तरीके से बिना

किसी होश के तुम्हारी आदत पड़ गई है। इस आदत को तोड़ना होगा जब तुम चाय का प्याला पकड़ो तो ऐसे पकड़ो जैसे वह दुनिया की

सबसे कीमती चीज हो। पूरी चेतना उस प्याले पर ले आओ। उसकी गर्माहट को महसूस करो। जब तुम इस तरह होश पूर्वक साधारण चीजों को

छूना सीख जाओगे तब जब तुम अपनी स्त्री का हाथ पकड़ोगे तो वह केवल दो चमड़ियों का मिलना नहीं होगा। तुम्हारी उंगलियों से

तुम्हारी पूरी आत्मा बहकर उसके शरीर में प्रवेश कर जाएगी। उसे वह स्पर्श ऐसा लगेगा जैसे किसी ने उसके शरीर को नहीं सीधे उसकी

आत्मा को छू लिया हो। तीसरी स्थिति बिना विचारों के देखना। हम हमेशा निर्णय के साथ देखते हैं। यह अच्छा है, यह बुरा है, यह

सुंदर है, यह कुरूप है। तुम्हारी आंखें हमेशा विचारों से भरी होती हैं। दिन में कम से कम एक बार अपनी स्त्री की आंखों में

देखो। लेकिन बिना किसी विचार के उसे कोई नाम मत दो। उसके बारे में कोई राय मत बनाओ। बस उसकी आंखों की गहराइयों में ऐसे

उतरो जैसे तुम किसी अंधेरी रहस्यमई गुफा में उतर रहे हो। पलकें मत झपकाओ। बस साक्षी बन जाओ। देखने वाला पीछे छूट जाए

और केवल दर्शन रह जाए। जब तुम इस तरह देखोगे तो तुम्हारी वह नजर उसके भीतर के सारे जालों को काट देगी। वह तुम्हारे

सामने पूरी तरह से नग्न और पवित्र महसूस करेगी। जब कोई पुरुष अपनी जिंदगी में इस पूर्ण उपस्थिति, इस शून्यता और इस समर्पण

को उतार लेता है तो वह कोई साधारण इंसान नहीं रह जाता। वह एक चलता फिरता मंदिर बन जाता है और यही वह कारण है कि जो पुरुष इस

गहराई को जान लेता है स्त्री उसके पास बार लौटने को क्यों मजबूर होती है। यह कोई आकर्षण नहीं है। यह कोई शारीरिक भूख नहीं

है जो उसे वापस खींचती है। स्त्री उसके पास इसलिए लौटती है क्योंकि वह पुरुष अब कोई व्यक्ति नहीं रहा। वह पुरुष अब एक

दर्पण बन चुका है। एक बिल्कुल साफ निर्मल और बिना किसी खरोच का दर्पण साधारण पुरुषों के पास जब स्त्री जाती है तो उसे

उनकी आंखों में वासना, मांग और एक भूखा भेड़िया दिखाई देता है। वह डरी रहती है। वह खुद को बचा कर रखती है। लेकिन जब वह इस

शून्यता से भरे पुरुष के पास आती है तो उसे उस दर्पण में कोई मांग नहीं दिखाई देती। उसे उस दर्पण में अपना ही चेहरा

दिखाई देता है। अपना सबसे सुंदर, सबसे पवित्र और सबसे दिव्य रूप हर इंसान अपने उस परम सुंदर रूप को देखने के लिए प्यासा

है। जब स्त्री उस पुरुष की गहराई में उतरती है तो वह पुरुष में नहीं उतर रही होती। वह अपनी ही आत्मा की गहराइयों में उतर रही होती है। वह जन्नत का दरवाजा जो

अब तक बंद था, वह खुल जाता है क्योंकि उस पुरुष ने उस दरवाजे के सामने से अपना अहंकार हटा लिया है। उस पुरुष ने वह जगह

खाली कर दी है ताकि परमात्मा वहां उतर सके। मेरे मित्र, यही वह गुप्त शिक्षा है जो किसी साधारण किताब में नहीं मिलती। यह

जीवन की खुली किताब का सबसे गहरा अध्याय है। इसे तुम्हें पढ़ना नहीं है। इसे तुम्हें जीना है। तुम्हें वह दर्पण बनना

है। तुम्हें वह शून्य बनना है। और जब तुम वह शून्य बन जाओगे तब तुम्हें कुछ भी पाने की दौड़ में नहीं भागना पड़ेगा। तुम जहां

खड़े होगे, जन्नत स्वयं तुम्हारे कदमों में आकर बिछ जाएगी। यही तुम्हारा सत्य है। इसे पहचानो। इसे स्मरण करो और इसमें पूरी तरह से डूब जाओ।

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