Allah Loves You More Than 70 Mothers… So Why Fear Your Destiny? | Islamic Psychology
By Shafi Verse Stories
Summary
Topics Covered
- बंद दरवाज़े के पीछे अल्लाह की हिकमत
- एक ख्वाहिश पूरी न होना बदकिस्मती नहीं
- तवक्कुल: कोशिश करो, फिर अल्लाह को सुपुर्द करो
- শুক্র এক জ़हनी আदত হ্য
- আপনী মর্जী নহীं, খ़ैর মাংगো আল্লাহ সে
Full Transcript
जरा एक लम्हे के लिए खामोश हो जाइए। अपनी आंखें बंद कीजिए। और अपने दिल से एक सवाल पूछिए। क्या आपने कभी रात के अंधेरे में
अकेले बैठकर यह सोचा है? आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है? दूसरों की दुआएं इतनी जल्दी कबूल क्यों हो जाती हैं? दूसरों की
जिंदगी इतनी आसान क्यों लगती है? और मेरी
जिंदगी में ही इतनी मुश्किलात क्यों हैं?
कभी किसी को कामयाब होते देखा और दिल के किसी कोने से आवाज आई। शायद मैं बदकिस्मत हूं। कभी किसी को वह चीज मिल गई जिसके लिए आपने
बरसों दुआ की थी और आपने मुस्कुराकर उसे मुबारकबाद तो दे दी लेकिन अंदर से दिल ने कहा या अल्लाह मेरे लिए कब? कभी रिश्ता
मांगा नहीं मिला। कभी नौकरी मांगी नहीं मिली। कभी कारोबार के लिए दुआ की रास्ता बंद हो गया। कभी किसी अपने को मांगा और वह
आपकी जिंदगी से ही चला गया। और फिर आहिस्ताआहिस्ता इंसान अपने नसीब से शिकायत करने लगता है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूं
[गला साफ़ करने की आवाज़] कि शायद जिस चीज को आप बदनसीबी समझ रहे हैं वो दरअसल अल्लाह की तरफ से आपके लिए लिखी गई किसी ऐसी हिकमत का हिस्सा है जिसे आप आज नहीं
देख पा रहे क्योंकि आप सिर्फ आज देखते हैं। लेकिन अल्लाह कल भी जानता है। आप सिर्फ रास्ता देखते हैं। अल्लाह पूरी
मंजिल जानता है। आप सिर्फ एक दरवाजा बंद होता देखते हैं। अल्लाह जानता है कि इस दरवाजे के पीछे क्या था। और सबसे बढ़कर आप
अपनी जिंदगी को अपनी महदूद समझ से देखते हैं। जबकि अल्लाह सब कुछ जानता है। कुरान करीम में अल्लाह ताला फरमाते हैं मुमकिन
है तुम किसी चीज को ना पसंद करो। हालांकि वो तुम्हारे लिए बेहतर हो और मुमकिन है तुम किसी चीज को पसंद करो। हालांकि वह
तुम्हारे लिए बुरी हो और अल्लाह जानता है। तुम नहीं जानते। सूरत अल बकरा आयत नंबर
216 जरा इस आयत को अपने दिल में उतारिए। अल्लाह जानता है तुम नहीं जानते। शायद आप जिस चीज के ना मिलने पर रो रहे हैं।
अल्लाह जानता है कि अगर वह मिल जाती तो आपका सुकून छीन जाता। शायद जिस इंसान के चले जाने को आप अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी तबाही समझ रहे हैं। अल्लाह जानता था कि
उसके साथ रहकर आप कहां पहुंच जाते। शायद जिस नौकरी का दरवाजा बंद हुआ, वह आपको किसी ऐसी जगह ले जाती जहां आपकी दुनिया तो
बन जाती लेकिन आपका दीन, आपका सुकून या आपका दिल तबाह हो जाता। और शायद जिस दुआ का जवाब अभी तक नजर नहीं आया, वह रद्द
नहीं हुई। सिर्फ आपकी मर्जी के मुताबिक जवाब नहीं आई। यह फर्क समझना बहुत जरूरी है क्योंकि साइकोलॉजी हमें बताती है कि
इंसान का दिमाग अक्सर जो चीज चाहता है उसे ही अपने सुकून की शर्त बना लेता है। वह कहता है अगर यह मिल गया तो मैं खुश हऊंगा।
अगर मेरी शादी उस शख्स से हो गई तो मैं खुश हऊंगा। अगर मुझे यह नौकरी मिल गई तो मैं सुकून में आ जाऊंगा। अगर मेरे पास इतने पैसे आ गए तो मेरी जिंदगी मुकम्मल हो
जाएगी। लेकिन जब वह चीज नहीं मिलती तो दिमाग फौरन नतीजा निकालता है। मैं बदकिस्मत हूं। यही
वह मुकाम है जहां इंसान को रुकना चाहिए। क्योंकि एक ख्वाहिश पूरी ना होना पूरी जिंदगी के बदकिस्मत होने का सबूत नहीं। एक दरवाजा बंद होना यह साबित नहीं करता कि
अल्लाह ने आपके लिए सारे दरवाजे बंद कर दिए हैं। एक इंसान का आपको छोड़ देना। यह साबित नहीं करता कि अल्लाह ने आपको तन्हा छोड़ दिया है। और एक मुश्किल वक्त यह
साबित नहीं करता कि अल्लाह आपसे नाराज है। बल्कि कभी-कभी आजमाइश भी अल्लाह की हिकमत का हिस्सा होती है। कुरान कहता है बेशक
मुश्किल के साथ आसानी है। बेशक मुश्किल के साथ आसानी है। सूरतुल इंशरा आयत नंबर पांच और छ गौर कीजिए। अल्लाह ने यह नहीं कहा कि
जिंदगी में मुश्किल नहीं आएगी बल्कि बताया कि मुश्किल के साथ आसानी भी है। यानी मोमिन की कहानी सिर्फ मुश्किल की कहानी
नहीं होती। इसमें मुश्किल भी होती है, सब्र भी होता है, दुआ भी होती है और फिर अल्लाह की तरफ से आसानी भी आती है। एक
मर्तबा रसूल अल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम के सामने कुछ कैदी लाए गए। उनमें एक औरत अपने बच्चे को तलाश कर रही थी। जब उसे अपना बच्चा मिला तो उसने उसे अपने
सीने से लगा लिया और उसे दूध पिलाने लगी। रसूल अल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने सहाबा इकराम रज़ अल्लाह अन से पूछा क्या तुम समझते हो कि यह औरत अपने बच्चे को आग
में डाल सकती है? सहाबा इकराम रज़ अल्लाह अन ने अर्ज किया नहीं। तब रसूल अल्लाह सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया अल्लाह अपने बंदों पर इस औरत से भी ज्यादा
मेहरबान है जितनी वह अपने बच्चे पर मेहरबान है। यह हदीस सही मुस्लिम हदीस 274 में मरवी है। जरा इस मंजर को अपने दिल में
महसूस कीजिए। एक मां अपने बच्चे को सीने से लगाए हुए हैं। उसे देखकर आपको मां की मोहब्बत समझ आती है। लेकिन रसूल्लाह सल्लल्लाह अलैह वसल्लम हमें बता रहे हैं।
अल्लाह अपने बंदों पर उससे भी ज्यादा रहमत फरमाता है। तो फिर जब आपकी जिंदगी में कोई चीज आपकी मर्जी के मुताबिक नहीं होती।
क्या फौरन यह कहना दुरुस्त है? अल्लाह ने
मेरे लिए बुरा लिख दिया। नहीं। आप अल्लाह की हिकमत को नहीं देख सकते। लेकिन आप अल्लाह की रहमत को जान सकते हैं और यही
यकीन इंसान को अंदर से तोड़ने के बजाय मजबूत बनाता है। जरा हजरत युसुफ अली सलाम की जिंदगी को देखें। एक बच्चा अपने ही
भाइयों की तरफ से कुएं में डाल दिया जाता है। फिर गुलाम बनाकर फरोख्त कर दिया जाता है। फिर एक आजमाइश आती है। फिर कैद एक ऐसी
कैद जिसमें हजरत युसुफ अली सलाम ने साल गुजारे। अगर कोई शख्स सिर्फ एक-एक वाकया अलग देखता
तो शायद कहता यह तो बदनसीबी है। लेकिन अल्लाह पूरी कहानी जानता था। कुआं मिस्र की तरफ जाने वाला रास्ता बन गया। गुलामी
महल [गला साफ़ करने की आवाज़] तक पहुंचने का जरिया बन गई। कैद इख्तदार तक पहुंचने का मरहला बन गई। और आखिरकार वही युसुफ अली
सलाम जिन्हें उनके भाइयों ने खत्म समझ कर छोड़ दिया था। अल्लाह ने उन्हें इज्जत और इख्तियार अता फरमाया। यही वजह है कि हमें अपनी कहानी का एक सफा
पढ़कर पूरी किताब का फैसला नहीं करना चाहिए। आपकी जिंदगी में भी शायद अभी सिर्फ एक सफा चल रहा है। आपको मालूम नहीं अगले
सफे पर क्या लिखा है। लेकिन यहां एक बहुत अहम बात समझना जरूरी है। अल्लाह पर तवकक्कुल का मतलब यह नहीं कि इंसान हाथ पर
हाथ रखकर बैठ जाए। यह कहना अल्लाह बेहतर करेगा और फिर कोशिश ही ना करना यह तवकुल नहीं तवकुल का मतलब है अपनी पूरी कोशिश
करो दुआ करो सही रास्ता इख्तियार करो और फिर नतीजा अल्लाह के सुपुर्द कर दो आप नौकरी के लिए कोशिश करें तालीम के लिए मेहनत करें कारोबार के लिए मंसूबा बनाएं
रिश्तों में हिकमत इख्तियार करें अपनी गलतियों की इस्लाह करें और फिर अगर नतीजा आपकी मर्जी के मुताबिक ना आए तो अपने रब
से जंग ना करें। इससे ताल्लुक मजबूत करें। क्योंकि कभी-कभी इंसान का सबसे बड़ा सुकून उस वक्त शुरू होता है जब वो यह मान लेता
है या अल्लाह [गला साफ़ करने की आवाज़] मैं नहीं जानता तो जानता है। और अगर आज आपको लगता है कि मेरा नसीब बहुत खराब है
तो एक काम कीजिए। अपनी जिंदगी की सिर्फ वो चीजें मत गुनिए जो आपको नहीं मिली। यह भी गुनिए कि अल्लाह ने आपको क्या-क्या दिया
है। सांस, सेहत, ईमान, घर, वालदैन, औलाद, दोस्त, रिज़्क और सबसे बढ़कर अल्लाह
की तरफ वापस आने का मौका। हम अक्सर जो नहीं मिला उस पर इतना रोते हैं कि जो मिला हुआ है उसे देखना ही भूल जाते हैं। साइकोलॉजी में ग्रेटट्यूड यानी
शुक्रगुजारी का ताल्लुक इंसान की तवज्जो के रुख से है। जब इंसान मुसलसल सिर्फ मेहरूमियों पर तवज्जो देता है तो दिमाग हर नई मेहरूमी को ज्यादा नुमाया महसूस करने
लगता है। लेकिन जब इंसान जानबूझकर अपनी नेमतों को भी देखता है तो उसकी सोच का जाविया बदलना शुरू होता है। इसीलिए शुक्र
सिर्फ एक मजहबी लफ्ज नहीं यह एक ऐसी जहनी आदत भी है जो इंसान को मेहरूमी के मुसलसल चक्कर से बाहर निकाल सकती है। और अगर आपने
बहुत गुनाह किए हैं तो भी अपने रब से मायूस मत हो। अगर आपको लगता है कि मैं बहुत दूर निकल गया हूं। तो कुरान आपको
वापस बुलाता है। अल्लाह ताला फरमाते हैं ऐ मेरे वह बंदो जिन्होंने अपनी जानों पर ज्यादती की है। अल्लाह की रहमत से मायूस
ना होना। बेशक अल्लाह तमाम गुनाह बख्श देता है। बेशक वही बहुत बखशने वाला निहायत
रहम वाला है। सूरत जुमर आयत नंबर 53 जरा देखिए अल्लाह ने यह नहीं फरमाया। सिर्फ उन लोगों को वापस आओ जो कभी गलत
नहीं हुए बल्कि जो अपनी जानों पर ज्यादती कर चुके थे उन्हें भी फरमाया मायूस ना होना इसलिए अपने माजी को अपनी किस्मत का फैसला
मत बनाएं। आपने गलतियां की हैं तौबा करें। आपने वक्त जाया किया आज से बचाएं। आप नमाज में कमजोर हो गए। आज से वापस आए। आपने
किसी को तकलीफ दी माफी मांगे। आपने कई बार नाकामी देखी। दोबारा कोशिश करें क्योंकि अल्लाह की रहमत आपके माजी से
बड़ी है। और एक दिन शायद आप पीछे मुड़कर देखें और कहें या अल्लाह अब समझ आया वो दरवाजा क्यों बंद हुआ था? वो शख्स मेरी
जिंदगी से क्यों गया था? वो मौका मुझे क्यों नहीं मिला था? वह दुआ इतनी देर से क्यों कबूल हुई? और शायद आपकी आंखों में
आंसू आ जाए। लेकिन इस बार दुख के नहीं शुक्र के। आप कहें या अल्लाह मैं तो अपनी छोटी सी ख्वाहिश को अपनी पूरी जिंदगी समझ
बैठा था। लेकिन तू मेरी पूरी जिंदगी जानता था। यही हुस्ने ज बिल्ला है। यानी अल्लाह के बारे में अच्छा गुमान रखना। इसका मतलब
यह नहीं कि हर ख्वाहिश जरूर पूरी होगी। बल्कि यह यकीन रखना है कि अल्लाह का फैसला हिकमत से खाली नहीं। और अगर मैं अल्लाह की
इतात में रहूं, इससे दुआ करता रहूं, अपनी कोशिश जारी रखूं तो मुझे अपने रब की रहमत से मायूस नहीं होना। तो आज अगर आपकी
जिंदगी में कुछ ऐसा है जिसके लिए आप बहुत अरसे से दुआ कर रहे हैं और अभी तक नहीं मिला तो एक लम्हे के लिए रुके। अल्लाह से
शिकायत करने के बजाय अल्लाह से बात करें। कहिए या अल्लाह मैं कमजोर हूं। मैं नहीं जानता कि मेरे लिए क्या बेहतर है। मैं जिस
चीज को अपने लिए अच्छा समझ रहा हूं मुमकिन है वह मेरे लिए अच्छी ना हो। अगर वह मेरे हक में बेहतर है तो उसे मेरे लिए आसान फरमा। और अगर वह मेरे हक में बेहतर नहीं
तो मेरे दिल को उससे बेहतर चीज पर राजी फरमा। यह दुआ आपके अंदर एक बहुत बड़ी तब्दीली पैदा कर सकती है। क्योंकि फिर आप अल्लाह से सिर्फ अपनी मर्जी नहीं मांग रहे
होंगे। आप अल्लाह से अपने लिए खैर मांग रहे होंगे और शायद यही असल सुकून है। जब आप कहते हैं या अल्लाह मेरी जिंदगी मेरी
मर्जी के मुताबिक नहीं चल रही तो दिल बेचैन रहता है। लेकिन जब आप कहते हैं या अल्लाह मेरी जिंदगी तेरी हिकमत के मुताबिक
चल रही है और मुझे इस हिकमत पर भरोसा है तो दिल आहिस्ता-आहिस्ता पुरसकून होने लगता है। आपकी मुश्किल फौरन खत्म नहीं होती
लेकिन मुश्किल के अंदर आपका दिल बदलना शुरू हो जाता है और कभी-कभी अल्लाह सबसे पहले हालात नहीं बदलता वह इंसान को बदलता है जो इन हालात से गुजर रहा होता है। आपके
अंदर सब्र पैदा होता है। तवक्कुल पैदा होता है। शुक्र पैदा होता है। अल्लाह की पहचान पैदा होती है। और फिर वही आजमाइश जो
कभी आपको तोड़ रही थी आपकी जिंदगी की सबसे बड़ी तरबियत बन जाती है। इसलिए अपने नसीब को बुरा कहना छोड़ दें। अपनी जिंदगी को
दूसरों की जिंदगी से नापना छोड़ दें। हर ताखीर को रद्द होना समझना छोड़ दें। हर नुकसान को सजा समझना छोड़ दें। और अपनी
महदूद नजर से अल्लाह के फैसलों का फैसला करना छोड़ दें। आप नहीं जानते लेकिन अल्लाह जानता है। आप नहीं देखते लेकिन
अल्लाह देखता है। आप सिर्फ आज जानते हैं लेकिन अल्लाह आपका कल भी जानता है। और सबसे बढ़कर आप खुद से मोहब्बत करना सीख
सकते हैं। लोगों से मोहब्बत करना सीख सकते हैं। लेकिन याद रखिए आपका रम आप पर उस मां से भी ज्यादा मेहरबान है जो अपने बच्चे को
सीने से लगाकर रखती है। तो फिर अपने रब से मायूस क्यों होना? इससे दूर क्यों जाना?
इसके फैसले से नफरत क्यों करना? इसकी रहमत
पर शक क्यों करना? आज से अपनी दुआ बदल दीजिए। सिर्फ यह ना कहें या अल्लाह मुझे वो दे दे जो मैं चाहता हूं। बल्कि कभी यह
भी कहें या अल्लाह मुझे वो दे जो मेरे लिए बेहतर है। और मेरे दिल को तेरे फैसले पर राजी कर दे। क्योंकि कभी-कभी आप जिस चीज
को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी समझ रहे होते हैं, अल्लाह जानता है। वह आपके लिए सबसे बड़ी आजमाइश हो सकती है। और कभी-कभी
जिस चीज को आप अपनी बदकिस्मती समझ रहे होते हैं, अल्लाह जानता है। वो आपको किसी बहुत बड़ी भलाई की तरफ ले जाने वाला
रास्ता हो सकती है। इसलिए अगर आज जिंदगी मुश्किल है, तो मायूस ना हो। अगर दुआ देर से कबूल हो रही है तो दुआ छोड़े नहीं। अगर
रास्ता बंद है तो कोशिश छोड़े नहीं। अगर आप गिर गए हैं तो उठना छोड़े नहीं। और अगर दिल टूट गया है तो अपने रब से ताल्लुक
तोड़ने की गलती मत कीजिए। क्योंकि दुनिया के दरवाजे बंद हो सकते हैं। लेकिन अल्लाह की रहमत का दरवाजा आपके लिए बंद नहीं हुआ।
अल्लाह ताला फरमाते हैं अल्लाह की रहमत से मायूस ना होना। तो आज रात जब आप अकेले हो अपने रब के सामने बैठे। अपनी सारी
शिकायतें, अपने सारे आंसू, अपनी सारी नाकामियां, अपनी सारी ख्वाहिशें उसके सामने रख दें। और फिर खामोश होकर दिल से
कहें या अल्लाह मैं तेरे फैसले को पूरी तरह समझ नहीं सकता। लेकिन मैं तेरे रब होने पर भरोसा करता हूं। मैं नहीं जानता
मेरे लिए क्या बेहतर है। लेकिन तू जानता है मुझे मेरी ख्वाहिश का गुलाम ना बना। मुझे अपने फैसले पर राजी कर दे। और शायद
इसी लम्हे आपकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत सफर शुरू हो जाए। एक ऐसा सफर जिसमें आपको
हर चीज नहीं मिलेगी। लेकिन आपको अपने रब की पहचान मिल जाएगी। और यकीन कीजिए जिस इंसान को अपने रब की मोहब्बत मिल जाए वह
अपनी जिंदगी की हर कमी के बावजूद अंदर से गरीब नहीं रहता। आज से अपने नसीब से शिकायत नहीं करनी। अपने रब की हिकमत पर
भरोसा करना है। दुआ भी करनी है, कोशिश भी करनी है। और फिर अपने मामले को अल्लाह के सुपुर्द करना है। अगर आप भी आज से यह
फैसला कर रहे हैं कि आप अपनी ख्वाहिश से ज्यादा अपने रब के फैसले पर भरोसा करेंगे तो कमेंट में सिर्फ एक जुमला लिखें। मैं
अल्लाह के फैसले पर भरोसा करता हूं। और अगर यह वीडियो आपके दिल तक पहुंची हो तो उसे अपने किसी ऐसे दोस्त या अपने किसी ऐसे प्यारे के साथ जरूर शेयर करें जो उस वक्त
अपनी जिंदगी के किसी मुश्किल मरहले से गुजर रहा है और शायद उसे आज सिर्फ यह याद दिलाने की जरूरत है कि अल्लाह से भुला
नहीं है। और मेरे चैनल को जरूर सब्सक्राइब करें क्योंकि शफीवर्स स्टोरीज पर हम ऐसी ही वीडियोस लाते रहेंगे जहां साइकोलॉजी
इस्लाम और लाइफ लेसंस मिलकर आपको खुद को समझने अपनी सोच को बेहतर बनाने और अपने रब के साथ ताल्लुक मजबूत करने में मदद देते
हैं। क्योंकि कभी-कभी जिंदगी बदलने के लिए सिर्फ एक नई सोच, एक मजबूत यकीन और अपने रब पर भरोसा काफी होता है। अल्लाह हमें
अपने फैसलों पर राजी रहने वाला, आजमाइश में सब्र करने वाला, नेमत में शुक्र करने वाला और हर हाल में अपने रब से जुड़ा रहने
वाला बंदा बनाए। आमीन या रबुल आलमीन।
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