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अमावस की वो अंधेरी रात | Amavas ki raat | Haunted story | Horror Stories |

By Midnight Tales Hindi

Summary

Topics Covered

  • घंटी हर किसी को नहीं बुलाती
  • छाया दिल का सबसे गहरा प्रेम पढ़ लेती है
  • अनसुलझा दुख छाया बन जाता है

Full Transcript

घन-घोर बरसात में सुजीत अपनी पुरानी बैलगाड़ी लेकर मेले से लौट रहा था। आसमान में काले बादलों की मोटी परतें उमट घुमट

कर गरज रही थी। मानो धरती पर टूट पड़ने को तैयार हो। बिजली की चमक जब-जब आसमान को चीरती पूरा जंगल पल भर के लिए सफेद उजाले

में नहा उठता और फिर अगले ही क्षण और भी भयावना अंधकार में डूब जाता। शाम ढल चुकी

थी और अंधेरा अब तेजी से चारों ओर फैल रहा था। तेज हवा पेड़ों को झकझोर रही थी। सूखे पत्तों की सरसराहट किसी अनजानी आहट सी लग

रही थी। हे भोलेनाथ कैसी घनघोर बरसात बरसा दी है। घर पहुंचना भी दुश्वार हो गया है। अरे यह कीचड़ भी ना बस अब हिम्मत रखो रे

बैलों थोड़ा और अभी हमें गांव पहुंचना है। काश मैं मेले में इतनी देर तक नहीं रुकता। अरे चलो रे थोड़ा और जोर लगाओ। यह कीचड़

भी बस नहीं छोड़ता। हे बाप रे यह बिजली तो सिर पर ही गिरी लगती है। मेले की वो भीड़ अब किसी सपने जैसी लग रही है। यहां तो बस

डर ही डर है। यह कैसी रात है? बारिश रुकने

का नाम ही नहीं ले रही। अरे भोलेनाथ कहीं यह वही रास्ता तो नहीं जहां की कहानियां लोग सुनाते हैं। दिल धक-धक कर रहा है

मेरा। काश अब जल्दी कोई आसरा मिल जाए। बारिश अब और भी तेज होती जा रही थी। बूंदे इतनी वेग से गिर रही थी कि चेहरे पर पड़ते

ही हल्की सी चोट का एहसास होता था। आसमान में बिजली बार-बार चमक रही थी और बादलों की गड़गड़ाहट से धरती जैसे कांप उठती थी।

चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। ना कोई इंसान, ना कोई आवाज, बस बारिश की लगातार

ध्वनि और दूर कहीं से आती जंगली जानवरों की डरावनी आवाजें। सुजीत का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने इस रास्ते के बारे

में कई डरावनी कहानियां सुनी थी। तभी अचानक उसे दूर कहीं से मंदिर की घंटी की

आवाज सुनाई दी। अजीब बात यह थी कि वो आवाज बारिश के शोर के बीच भी साफ और गूंजती हुई

सुनाई दे रही थी। सुजीत ने ध्यान से सुना। हां, यह निश्चित ही किसी मंदिर की घंटी थी। अरे यह आवाज

यह तो मंदिर की घंटी जैसी लग रही है। हां बिल्कुल। पर इतनी तेज बारिश में कौन बजा रहा होगा इसे? सुजीत ने बैलों को उस आवास

की दिशा में मोड़ दिया। कुछ दूरी तय करने के बाद उसे घने पेड़ों के बीच एक बहुत ही पुराना शिव मंदिर दिखाई दिया। मंदिर

पत्थरों से बना था और देखने में काफी जजर व प्राचीन लग रहा था। पर अजीब बात यह थी कि उसके भीतर से हल्की सी रोशनी झिलमिला

रही थी। सुजीत ने अपनी बैलगाड़ी मंदिर के पास रोकी और उत्सुकता व डर के मिलेजुले भाव के साथ

जल्दी से मंदिर के अंदर चला गया। मंदिर बाहर से जितना पुराना लग रहा था अंदर उतना ही स्वच्छ और शांत था। शिवलिंग

के सामने अगरबत्तियां जल रही थी और चारों ओर दूध और चंदन की हल्की सी खुशबू फैली हुई थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने अभी-अभी पूजा की हो। मगर वहां कोई दिखाई

नहीं दे रहा था। कोई है यहां? कृपया बाहर आइए। मैं रास्ता भटक गया हूं। बारिश बहुत तेज हो रही है।

रास्ता कीचड़ में डूब गया है। बैल भी थक गए हैं। अगर थोड़ी देर यहीं रुक जाऊं तो कोई आपत्ति तो नहीं? अजीब है। मंदिर में

रोशनी जल रही है। अगरबत्तियां भी सुलझी हैं। फिर कोई दिख क्यों नहीं रहा? कुछ देर

बाद मंदिर के पिछले वाले कमरे से एक वृद्धा साधु प्रकट हुए जिन्होंने गेरुए वस्त्र धारण कर रखे थे। उनकी आंखों में

गहरी शांति थी पर चेहरे पर किसी गहरी चिंता की छाया साफ झलक रही थी। कौन हो तुम बेटा? इस तूफानी रात में यहां

कैसे आ पहुंचे?

महाराज मैं पास के गांव से लौट रहा था। मेला देर तक चला गया इसलिए देर हो गई। रास्ते में इतनी भयंकर बारिश शुरू हो गई

कि कुछ सूझा ही नहीं। तभी मंदिर की घंटी की आवाज सुनी और यहां चला आया। वे कुछ क्षणों तक सुजीत को निहारते रहे।

मौन और स्थिर। फिर धीरे-धीरे शांत स्वर में बोले। इस समय जंगल में रुकना उचित

नहीं है। यह जगह दिन में भले शांत लगे पर रात में इसका रूप बदल जाता है। हर आवाज का

यहां कोई ना कोई अर्थ होता है और हर सन्नाटे में कोई छिपा हुआ स्वर। बेटा अगर

तुमने बाहर की घंटी सुनी है तो जान लो। वो हर किसी को नहीं बुलाती। मगर महाराज आप कह रहे हैं कि वह घंटी हर किसी को नहीं

बुलाती। इसका क्या मतलब है? साधु ने एक गहरी सांस ली। उनकी आंखों की शांति अब गंभीरता में बदल गई। कुछ पल तक वे मौन

रहकर सुजीत को ध्यान से देखते रहे। मानो उसके भीतर कुछ खोज रहे हो। फिर धीरे से बोले, बेटा आज की रात यहीं मंदिर में रुक

जाना। बाहर तूफान अभी थमने वाला नहीं है। मगर मेरी बात ध्यान से सुन। आधी रात के

बाद अगर कोई आवाज सुनाई दे चाहे कोई पुकारे, रोए या तुम्हारा नाम ले। किसी भी

हालत में इस मंदिर की सीमा के बाहर मत जाना। याद रखना हर आवाज इंसान की नहीं

होती। सुजीत को साधु की बात कुछ अजीब जरूर लगी। पर उनके चेहरे पर झलकती गंभीरता देखकर साफ महसूस हो रहा था कि वे मजाक नहीं कर रहे थे।

जी महाराज मैं आपकी बात का ध्यान रखूंगा। चाहे कैसी भी आवाज क्यों ना सुनाई दे मैं मंदिर के बाहर कदम नहीं रखूंगा।

उसने मन ही मन सोचा कि शायद रात में यहां जंगली जानवर आ जाते होंगे। इसलिए साधु महाराज उसे डराकर सावधान करना चाह रहे

हैं। साधु ने उसे पास के एक कोने में बैठने के लिए कहा। फिर वे अंदर चले गए और थोड़ी देर में एक थाली में कुछ ताजे फल

लेकर लौटे। लो बेटा यह कुछ ताजे फल खा लो। रास्ता लंबा था। शरीर को आराम और भोजन

दोनों की जरूरत है। बाहर तूफान है इसलिए आज यहीं ठहर जाओ। भगवान शिव की शरण में

हो। चिंता मत करो। सब ठीक रहेगा। सुजीत ने शांति से फल खाए और पानी पिया।

साधु महाराज ने उसे एक पुरानी चटाई और कंबल दिया ताकि वह आराम कर सके। सुजीत ने श्रद्धा से भगवान शिव को प्रणाम किया और

मंदिर के कोने में जाकर लेट गया। थकान के मारे उसकी आंखें धीरे-धीरे बंद

होने लगी। बाहर रात अब और गहरी हो चली थी। बारिश अब भी जोरों पर थी और हवाएं मंदिर की दीवारों से टकराकर सनसनाती हुई गुजर

रही थी। सुजीत नींद में जाने ही वाला था कि अचानक उसे एक अजीब सी आवाज सुनाई दी। पहले तो वह बहुत धीमी थी पर कुछ ही पलों

में वो आवाज धीरे-धीरे तेज होती चली गई। सुजीत बेटा बाहर आजा। देख मैं यहां हूं। डर मत। मैं तेरी मां हूं। तू इतनी देर से

लौटा नहीं। मैं तुझे ढूंढती-ढूंढती यहां तक आ गई। बेटा बस एक बार बाहर आजा। देख

तेरी मां तुझे बुला रही है। मेरे पास आजा सुजीत। तू मुझे पहचानता है ना? मेरी आवाज

सुन बेटा। मैं तुझसे मिलने आई हूं। सुजीत मेरी बात सुनो बेटा। मैं बड़ी मुसीबत में हूं। कोई मुझे यहां से ले जाओ। वरना मैं

बच नहीं पाऊंगी। तू तो मेरा साहसी बेटा है ना। बस एक बार बाहर आजा। मुझे तेरी जरूरत है। देख मैं यहीं तेरे मंदिर के बाहर खड़ी

हूं। ठंडी बारिश में भीग रही हूं। जल्दी आ बेटा मुझे बचा ले। सुजीत की आंखें अचानक खुल गई। वो चौंक कर

उठ बैठा। उसके चारों ओर सन्नाटा पसरा था। पर वह आवाज अब और स्पष्ट सुनाई दे रही थी।

अजीब बात यह थी कि वह आवाज किसी और की नहीं बल्कि उसकी अपने मां की आवाज जैसी लग

रही थी। यह आवाज मां की लग रही है। लेकिन मां यहां कैसे हो सकती है? नहीं यह सच नहीं हो सकता। वो तो गांव में थी। पर अगर

सच में वह हैं तो मैं कैसे अंदर बैठा रहूं? हे शिव शंकर अब मैं क्या करूं? बाहर

रहूं? हे शिव शंकर अब मैं क्या करूं? बाहर

जाऊं या नहीं? सुजीत का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। मानो उसकी छाती से बाहर निकल आएगा। डर और जिज्ञासा दोनों उसके मन में

एक साथ उमड़ने लगे। सुजीत उठ खड़ा हुआ और धीरे-धीरे मंदिर के दरवाजे की ओर बढ़ने लगा। उसका हाथ दरवाजे की ओर बढ़ रहा था।

जबकि मन भीतर से कह रहा था। शायद बाहर अगर मां है और अगर सच में उन्हें एक मदद चाहिए तो मैं कैसे ना जाऊं। तभी अचानक किसी ने

उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। सुजीत सिहर उठा। पीछे मुड़ा तो देखा साधु महाराज उसके पीछे खड़े थे। उनकी आंखों में गहरी गंभीरता और

एक अनकहा डर झलक रहा था। रुको बेटा। एक कदम भी बाहर मत रखना। मैंने तुम्हें पहले

ही चेतावनी दी थी। जो आवाजें बाहर से आती हैं वे इंसान की नहीं होती। चाहे वह तेरी मां की ही क्यों ना लगे

महाराज पर वह तो सच में मेरी मां की आवाज थी। वही पुकार रही थी मुझे। कह रही थी कि वह मुसीबत में है। अगर सच में वह हैं तो

मैं उन्हें ऐसे कैसे छोड़ दूं। वह तेरी नहीं है। यह छाया तुम्हारे मन को पढ़ लेती है। बेटा यह उसी की आवाज निकालती

है जिसके लिए तेरे दिल में सबसे गहरा प्रेम हो। यह जानती है कि तेरे मन में अपनी मां के लिए कितना स्नेह है। इसलिए

उसी का रूप धारण करके तुझे बुला रही है। कई यात्री इसके इस छल में फंस चुके हैं और फिर कभी लौटे नहीं। सुजीत बेटा तू मुझे

क्यों नहीं सुन रहा?

सिसकियों की आवाज हवा में घुलती है। मैं बहुत दर्द में हूं। तेरी मां हूं मैं। देख मैं यहीं बाहर हूं। बारिश में भीग रही

हूं। रोने की धीमी टूटी हुई आवाज सुनाई देती है। मुझे अकेला मत छोड़ बेटा। बस एक बार बाहर आजा। अगर तू नहीं आया तो मैं बच

नहीं पाऊंगी। साधु महाराज छोड़ दीजिए मुझे। वो मेरी मां है। उनकी आवाज मैं पहचानता हूं। आप समझ

नहीं रहे वो मुसीबत में है। मुझे उनकी मदद करनी ही होगी। कृपया जाने दीजिए। मैं उन्हें ऐसे नहीं छोड़ सकता। वो मुझे पुकार रही है।

याद रखना अगर तू बाहर गया तो तेरा नाम भी उनमें शामिल हो जाएगा। साधु ने झटके से सुजीत को वापस अंदर खींच

लिया और जमीन पर बिठा दिया। फिर वे सीधे शिवलिंग के सामने जाकर पद्मासन में बैठ गए और ऊंचे स्वर में मंत्र जपने लगे।

ओम नमः शिवाय ओम त्रयंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम ओम नमः काल भैरवाय ओम हुजू सह रुद्राय नमः हर हर महादेव रक्षामि

रक्षामि महाकाल देव पंडित तुम कितना भी मंत्र जप कर लो मुझे नहीं रोक पाओगे मैं फिर आऊंगी बार-बार

आऊंगी जबजब कोई इस मंदिर में कदम रखेगा मैं उसे पुकारूंगी तुम मुझे बांध बांध नहीं सकते। मेरी छाया हर दिशा में फैली

है। हर हवा में मेरा नाम गूंजता है। ओम नमः शिवाय। उनके मंत्रों की गूंज पूरे

मंदिर में फैल रही। ओम नमः काल भैरवाय। धीरे-धीरे बाहर की आवाज बढ़ने लगी। हर हर मगर पूरी तरह से थमी नहीं। रक्षामि

रक्षामि। साधु ने मंत्र जाप जारी रखा। उनके माथे पर पसीने की बूंदे चमकने लगी थी और पूरा मंदिर एक अजीब रहस्यमई ऊर्जा से

भर गया। सुजीत डर के मारे कांप रहा था। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। अब डर मत

करना बेटा। वो शक्ति अब लौट गई है। इस मंदिर की रक्षा स्वयं भोलेनाथ करते हैं।

तुम अब निश्चिंत होकर सो जाओ। मैं यहीं बैठा रहूंगा। कुछ देर बाद बाहर की सारी

आवाजें एकदम थम गई। अब बस बारिश की लगातार गिरती बूंदों की आवाज रह गई थी। सुजीत कांपते हुए वापस अपनी चटाई पर लेट गया।

मगर उसकी आंखों में नींद कहां थी? वो पूरी

रात जागता रहा। जब सुबह की पहली किरण मंदिर के अंदर पहुंची तो सुजीत धीरे-धीरे उठा और बाहर निकल आया। बारिश अब थम चुकी

थी। लेकिन मंदिर की चारों ओर जमीन पर अजीब से पैरों के निशान बने हुए थे। जैसे कोई अनजानी चीज रात भर मंदिर के इर्दगिर्द

घूमती रही हो। तभी साधु महाराज अपनी कुटिया से बाहर आए। उन्होंने चारों ओर देखा और गहरी सांस ली। मानो किसी लंबे

संघर्ष के बाद राहत मिली हो। देख रहे हो बेटा? यह निशान। यह उसी छाया के हैं जो पूरी रात मंदिर के चारों ओर

मंडराती रही। वह कोशिश कर रही थी कि तुम्हें बाहर खींच ले जाए। तुम्हारे मन के प्रेम का इस्तेमाल करके तुम्हें अपने जाल

में फंसाए। पर भगवान शिव की कृपा से वह इस मंदिर की सीमा पार नहीं कर सकी। यह रेखाएं उसकी असफलता की निशानी है। वह अब भी

मुक्ति नहीं पा सकी। इसलिए हर तूफानी रात में लौटती है किसी नए मन को बहकाने। महाराज यह छाया आखिर कौन है? क्यों हर रात

यहां आती है? और क्यों मुझे अपनी मां की आवाज में बुला रही थी? इसका क्या रहस्य है? इसकी पिछली कहानी क्या है?

है? इसकी पिछली कहानी क्या है?

बेटा, यह छाया कोई साधारण आत्मा नहीं है। कभी यह भी एक इंसान थी। एक औरत जो अपने पति की मौत के बाद पागलपन की हद तक टूट गई

थी। कहा जाता है कि वह अपने दुख में इतनी डूब गई कि उसे जीते जी शांति नहीं मिली। एक तूफानी रात में उसने इसी जंगल में अपनी

जान दे दी। तभी से उसकी आत्मा इस जगह से बंध गई। वह अब भी अपने अकेलेपन और दर्द से मुक्त नहीं हो पाई है। वह अपने दर्द में

सबको शामिल कर लेना चाहती है। वह जानती है कि इंसान का सबसे बड़ा प्रेम किससे होता है। अपनेपन से, अपनी मां से, अपने बच्चों

से, इसीलिए वह उसी आवाज में पुकारती है ताकि जो सुन ले, वह खुद को रोक ना सके। कई यात्री उसके इस छलावे में फंस चुके हैं और

फिर कभी लौटे नहीं। वही सब उसकी छाया में समा गए। उसी के दुख का हिस्सा बन गए। बेटा अगर मैं तुम्हें रोका ना होता तो सुबह तक

यहां तुम्हारे पैरों के भी निशान नहीं मिलते और तुम्हारे बैल वहीं के वहीं खड़े रह जाते। सुजीत के रोंगटे खड़े हो गए। सुजीत ने कांपते हाथों से साधु के चरण

छुए। साधु महाराज अगर आप मुझे नहीं रोकते तो पता नहीं मेरा क्या होता। साधु महाराज

आपने मेरी जान बचाई है। अगर आप ना होते तो आज मैं जिंदा नहीं होता। मैं आपका आजीवन ऋणी रहूंगा। इसे मैं कभी नहीं भूलूंगा।

बेटा मुझे नहीं भगवान शिव को कहना। उन्हीं की कृपा से तुम आज सुरक्षित हो। याद रखना उस छाया से बचने का एक ही उपाय है।

श्रद्धा और विश्वास यह दोनों कभी मत भूलना। सुजीत ने भगवान शंकर की मूर्ति के पास जाकर श्रद्धा से प्रणाम किया। फिर वह

बाहर आकर अपनी बैलगाड़ी के पास पहुंचा। दोनों बैल सुरक्षित खड़े थे जैसे रात की भयानक घटनाओं से अनजान हो। उसने बैलगाड़ी

तैयार की। साधु महाराज को अंतिम प्रणाम किया और वहां से रवाना हो गया। रास्ते भर उसका मन उसी रात की घटनाओं में उलझा रहा।

वह आवाज कितनी सच्ची कितनी जीवंत लग रही थी। उसे एहसास हो रहा था कि अगर साधु महाराज ना होते तो शायद आज वह जिंदा ना

होता। सुबह की सुनहरी धूप अब पेड़ों की पत्तियों पर चमक रही थी। दोपहर तक सुजीत अपने गांव पहुंच गया। घर पहुंचते ही उसकी

नजर अपनी मां पर पड़ी। वह आंगन में बैठी अपने छोटे बेटे से हंसते हुए बातें कर रही थी। मां को कुछ नहीं हुआ था। वह बिल्कुल सुरक्षित थी।

अरे यह क्या हाल बना रखा है तूने सुजीत?

कांप क्यों रहा है बेटा? कहीं रास्ते में कुछ हुआ क्या? बोल ना पगले तू ठीक तो है ना?

मां मैं बहुत डर गया था। रात भर तुम्हारी आवाज सुनाई देती रही। इतनी सच्ची इतनी करीब जैसे तुम मुझे बुला रही हो। मैंने

सोचा तुम किसी मुसीबत में हो। अगर साधु महाराज मुझे ना रोकते तो शायद मैं आज तुम्हारे सामने ना होता। सुजीत ने अपनी मां को रात की सारी घटना

बताई। उसकी बात सुनकर मां की आंखों में डर और हैरानी दोनों झलकने लगे। धीरे-धीरे यह खबर पूरे गांव में फैल गई।

सबको मालूम हो गया कि उस जंगल में रात के समय कुछ अनहोनी घटती है।

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