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Ep:19 Three Life-Saving Emergency Tips That Reduce Panic & Anxiety ft Dr. Ravi Ranjan

By BigOHealth

Summary

## Key takeaways - **आईसीयू में भर्ती का निर्णय भावनाओं पर आधारित न हो**: शिफ्टिंग में 90% मौतें इसलिए होती हैं क्योंकि यह एक भावनात्मक निर्णय होता है, जिससे आप अपने प्रियजनों के जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं। इसलिए, निर्णय लेते समय भावनाओं पर हावी न हों। [00:14], [30:14] - **डॉक्टर का चुनाव: कनेक्शन महत्वपूर्ण है**: भले ही डॉक्टर बहुत बड़े नाम वाले न हों, लेकिन यदि वे आपसे जुड़े हुए हैं और आपकी परवाह करते हैं, तो वे आपको संकट से निकालने के लिए 500% प्रयास करेंगे। डॉक्टर के साथ आपका जुड़ाव आधी लड़ाई जीत लेता है। [01:48], [02:13] - **आईसीयू एक सपोर्ट सिस्टम है, मौत का फरमान नहीं**: आईसीयू एक सपोर्ट सिस्टम है, जो फेफड़ों, मस्तिष्क या रक्तचाप के लिए हो सकता है। यह शरीर पर आए खतरे को टालने का प्रयास करता है। आज के दौर में अच्छे आईसीयू सेटअप और टीम वर्क से बचने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। [04:27], [04:40] - **वेंटिलेटर का उद्देश्य: फेफड़ों या मस्तिष्क को सहारा**: वेंटिलेटर फेफड़ों को ऑक्सीजन नहीं कर पाने की स्थिति में सहारा देता है, या मस्तिष्क की चोट के मामले में, मस्तिष्क के परफ्यूजन प्रेशर को कम करने के लिए साँस को नियंत्रित करता है। यह हमेशा फेफड़ों के सपोर्ट के लिए नहीं होता। [07:18], [07:47] - **पैरालिसिस का कारण: वेंटिलेटर ट्यूब को सुरक्षित रखना**: वेंटिलेटर पर मरीज को पैरालाइज किया जाता है ताकि वेंटिलेटर ट्यूब गलती से निकल न जाए। यह मरीज में जान न होने का संकेत नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने का तरीका है कि मरीज को लगातार ऑक्सीजन मिलती रहे। [09:19], [10:15] - **आईसीयू में संक्रमण का खतरा: सीमित विज़िटर**: आईसीयू में संक्रमण का खतरा होता है, इसलिए मिलने आने वालों की संख्या सीमित रखें। केवल एक या दो जिम्मेदार व्यक्ति ही अंदर जाएं ताकि क्रॉस-इंफेक्शन का खतरा कम हो और स्टाफ का समय बर्बाद न हो। [19:15], [19:34]

Topics Covered

  • आईसीयू का डर: हकीकत और गलतफहमियां
  • डॉक्टर का चुनाव: कनेक्शन ही सबसे महत्वपूर्ण है
  • वेंटिलेटर: जीवन रक्षक या मौत का जाल?
  • आईसीयू में संक्रमण का खतरा: क्या वास्तव में है?
  • मरीजों की शिफ्टिंग: भावनात्मक निर्णय मौत का कारण बनते हैं

Full Transcript

शिफ्टिंग में 90% डेथ्स इसलिए होता है कि वो इमोशनल डिसीजन होता है और इमोशंस बेस्ड डिसीजन है। तो यू आर प्लेइंग विथ द लाइफ ऑफ योर ओन क्लोज वन्स। तो आईसीयू में होता क्या है सर?

आईसीयू शब्द का जैसे ही इस्तेमाल होता है दो-तीन चीज जेहन में आने लगता है। एक तो अनावश्यक खौफ। तो अगर आप एक विजुअल वे में आप एक्सप्लेन कर पाए कि आईसीयू के अंदर से दिखता कैसा

है? तो ये वेंटिलेटर एक्सजेक्टली क्या

है? तो ये वेंटिलेटर एक्सजेक्टली क्या होता है? जब लंग्स आपका ऑक्सिजनेट नहीं कर

होता है? जब लंग्स आपका ऑक्सिजनेट नहीं कर पा रहा है तो वहां पे हम लोग वेंटिलेटर से उसके लंग्स को सपोर्ट करते हैं। तो बेसिकली आईसीयू और एसडीयू में क्या फर्क होता है? मुझे क्या चीजें अपने

क्रिटिकल केयर वाले डॉक्टर से डिस्कस करनी चाहिए जनरली?

हम लोग ये देखते हैं कि जिस खतरे को लेके आया वहां से उसका ग्राफ नीचे जा रहा है या ऊपर जा रहा है?

नमस्कार मेरा नाम गौरव है। मैं शुभम हूं। हम लोग बिगो हेल्थ के फाउंडर्स हैं। तो सर बिगो हेल्थ एक मोबाइल एप्लीकेशन है जो कि Google Play Store पे अवेलेबल है। तो सर बेसिकली क्या होता है कि जो भी हमारी देश की जनता है जब उनको

कोई भी क्रिटिकल एलिमेंट होता है लाइक कैंसर, न्यूरो और कार्डियक सर्जरी की नीड होती है तो अपने आप को लॉस्ट महसूस करते हैं। दे ऑलवेज फाइंड अ पाथ कि जिनको राइट ट्रीटमेंट मिल पाए। इन द नीड दे आस्क देयर

फ्रेंड्स एंड फैमिली जो कि कुछ टाइम सही होते हैं, कुछ टाइम नहीं सही होते हैं। इन द नीड दे आल्सो कम टू द कॉर्पोरेट हॉस्पिटल या बड़े हॉस्पिटल में आ गए। बट सर बड़े कि मैं इस हॉस्पिटल में आ तो गया।

कहां कौन से डॉक्टर को दिखाऊं? तो हम

पेशेंट को अपने प्लेटफार्म के थ्रू थ्रू आउट देयर मेडिकल जर्नी हेल्प करते हैं कि सो दैट वो अपनी मेडिकल जर्नी में एक इनफॉर्म्ड डिसीजन बना सके। तो आज के पडकास्ट में हमारे साथ हैं डॉक्टर रवि

रंजन जो कि सीनियर क्रिटिकल केयर कंसलटेंट हैं। अ मैं डॉ. रंजन क्रिटिकल केयर कंसलटेंट हूं। और यहां मैं आपको बताना

चाहूंगा कि आई हैव बिकम अ डॉक्टर बिकॉज़ ऑफ डॉक्टर्स। मैंने अपनी जिंदगी के 14 साल बिस्तर में गुजारे हैं बिकॉज़ ऑफ ब्रोंकियल

अस्थमा। और मुझे अपने उस बचपन में कभी ऐसा कोई डॉक्टर नहीं मिला जिसके साथ मैं कनेक्ट फील कर पाऊं। और मेरे छोटे-छोटे सवालों का जवाब मिल पाया। नतीजा आई वास

सिलेक्टेड फॉर इंडियन स्कूल ऑफ़ माइंस बीटेक पेट्रोलियम कोर्स एंड आईआईटी कानपुर। उन सबको छोड़ते हुए मैंने फैसला किया कि मैं डॉक्टर बनूंगा। और मैं जिस

चीज पर फोकस करता हूं वो है कनेक्ट पे बॉस। अगर इफ यू आर कनेक्टेड विद योर पेशेंट हाफ ऑफ द जर्नी ऑफ द पेशेंट इज डन

और सिर्फ 50% है जिसको आप उसके विल पावर को एनहांस करते हुए आप उसको बीमारी से बाहर निकाल सकते हो। तो मेरा है कि चूज़

योर डॉक्टर। हो सकता है वो बहुत बड़ा डॉक्टर नहीं हो। लेकिन अगर इफ दैट डॉक्टर इज कनेक्टेड विद यू ही विल गिव ह 500% टू

टेक यू आउट फ्रॉम द क्राइसिस ऑफ द लाइफ। कई बार हम लोग बहुत बड़े-बड़े नाम के पीछे दौड़ जाते हैं। आई ऑलवेज से इवन इफ ही इज़ एन एमबीबीएस डॉक्टर बट इफ ही इज़ इन वॉल्ड

इन यू इफ ही इज़ इंटरेस्टेड इन योर लाइफ, इफ ही वांट्स टू ब्रिंग हैप्पीनेस टू योर लाइफ, गो फॉर हिम। ही विल हिमसेल्फ चूज़

व्हिच आर द अदर डॉक्टर्स टू बी इनवॉल्वड फॉर यू। लेकिन वो डॉक्टर बेशकीमती है जो आपकी जिंदगी में शरीक होना चाहता है। तो सर हमारा पहला सवाल यह है आईसीयू में

होता क्या है सर?

देखिए आईसीयू को लेके हर घर में एक डर बना हुआ है। जैसे ही हम लोग डिस्कस करते हैं कि डॉक्टर ने सजेस्ट किया है कि आईसीयू

में एडमिट करिए तो दो-तीन सवाल खड़े हो जाते हैं। एक तो है कि कहीं डॉक्टर ऐसा तो नहीं कि जानबूझ के आईसीयू में डाल रहे हो। आईसीयू

शब्द का जैसे ही इस्तेमाल होता है दो-तीन चीज जेहन में आने लगता है। एक तो अनावश्यक खौफ कि लगता है अब मेरा मरीज जाने वाला

है। बचने की बात कोई नहीं करता है। लगता है कि आईसीयू में चला गया मतलब कि अंत आ गया इस पेशेंट का और एक ग्लूमी एटमॉस्फेयर

क्रिएट हो जाता है। दूसरा जो है वो है कि कहीं एक्सेस बिलिंग के चक्कर में जो आजकल हो रहा है कि लोगों का ट्रस्ट खत्म हो रहा

है डॉक्टर्स पे तो ये दोनों बिल्कुल गलत है। एज अ डॉक्टर जिसने भी 18 साल 20 साल की पढ़ाई की है और जिसने अपना संपूर्ण

जीवन बहुत सारा जो नॉर्मल एक्टिविटीज अह बाकी लोग कर पाते हैं और एज अ डॉक्टर हम लोग नहीं कर पाते हैं। वी नेवर ट्राई टू

पुश एनी पर्सन विदाउट रीज़ंस इनू द आईसीयू। आईसीयू में क्या होता है? आईसीयू में एक सपोर्ट सिस्टम है और वह सपोर्ट फेफड़े के

लिए हो सकता है। वो फेफड़ वो सपोर्ट आपके ब्रेन के लिए हो सकता है। वो सपोर्ट आपके बीपी के लिए हो सकता है। हम लोग सपोर्ट

सिस्टम क्रिएट करते हैं और उस पीरियड में कोशिश ये रहता है कि जो खतरा आया हुआ है बॉडी पे डिफरेंट फॉर्म्स में उस खतरे को

टाला जाए। आज से 15 20 साल पहले हो सकता है कि बचने की संभावना बहुत कम रहती होगी। लेकिन आज के दौर में अगर एक अच्छा आईसीयू

सेटअप है एंड इट्स अ टीम वर्क तो बचने की संभावना बहुत ज्यादा रहती है। तो इसलिए आईसीयू को लेके कभी खौफ में मत जाइए। हां,

वहां डिसीजन मेकिंग में वक्त मत वेस्ट करिए। इफ अ सीनियर डॉक्टर हैज़ एडवाइज्ड यू कि द पेशेंट मस्ट बी इन द आईसीयू, पेशेंट

मस्ट बी इन द आईसीयू इमीडिएटली। वहां पे उन लोगों से डिस्कशंस में अक्सर टाइम वेस्ट करते हैं जो नॉन मेडिकल बैकग्राउंड से हैं और

वहां से ही रियल खतरा शुरू हो जाता है मरीजों का। इसमें हम लोग बोलते हैं कि आईसीयू के बाहर लोगों ने काफी जो गोल्डन आवर्स है उसको आपस में डिस्कशनंस में ही

गुजार दिया। अगर उनके परिवार में डॉक्टर हैं या मेडिकल बैकग्राउंड से हैं वो लोग डिस्कशन में शरीक होना चाहे तो वी ऑलवेज वांट टू इनवॉल्व देम। लेकिन पहले जो

इमीडिएट करना है उसको करने दीजिए ताकि मरीज की जान एक की जो सुरक्षा है उसको हम लोग सुनिश्चित कर लें और बाद में बैठ के डिस्कस कर लें।

सर जनरली एक लेम मैन को हॉस्पिटल के साथ जो इंटरेक्शन है उनका जनरल वार्ड नॉर्मल वार्ड से होता है। तो अगर आप एक विजुअल वे में आप एक्सप्लेन

कर पाए कि आईसीयू के अंदर से दिखता कैसा है? कैसा दिखता है आईसीयू? आईसीयू में जो

है? कैसा दिखता है आईसीयू? आईसीयू में जो हर बेड के साथ में सपोर्ट सिस्टम होता है। वेंटिलेटर का सपोर्ट सिस्टम रहता है।

सिरिंज पंप्स का रहता है। आपका और भी तरह का जो बैकअप्स की जरूरत पड़ती है। उसको हम लोग वहां पे रखते हैं। और

यहां नर्सिंग रेशियो जो है वो वन टू वन रहता है। वार्ड्स में एक नर्स चारप मरीज को भी देख सकती है। लेकिन आईसीयू में वी

ऑलवेज अह अह इंश्योर कि 1:1 का रेशियो रहे ताकि पेशेंट हर वक्त आपकी निगरानी में डायरेक्ट रहे और इट्स अ वेरी डेडिकेटेड जॉब।

तो सर आपने बात करी वेंटिलेटर की तो अभी देखेंगे कि जब भी हमारे दिमाग में वेंटिलेटर शब्द हम सुनते हैं तो लगता है कि कुछ मशीन होगा। पता नहीं क्या होगा। तो ये वेंटिलेटर एग्जैक्टली क्या होता है?

देखिए वेंटिलेटर इट्स अ वेरी गुड क्वेश्चन। पहले वेंटिलेटर को समझिए कि इसमें हम लोग क्या करते हैं। इसमें हम लोग

आपके लंग्स को सपोर्ट करते हैं। जब लंग्स आपका ऑक्सीजनेट नहीं कर पा रहा है और खुद से सांस नहीं ले पा रहा है मरीज तो वहां

पे हम लोग वेंटिलेटर से उसके लंग्स को सपोर्ट करते हैं। दूसरा कुछ लोगों को लगता है कि हेड इंजरी हुआ और मेरा मरीज तो ठीक

से सांस ले रहा था और फिर उस पेशेंट को वेंटिलेटर पे क्यों डाल दिया गया। वहां पे इंपॉर्टेंट है कि यहां वेंटिलेटर आपके

लंग्स के सपोर्ट के लिए नहीं लगा है। यहां पे आपके ब्रेन के अंदर जब चोट लगता है तो ब्रेन को फैलने के लिए जगह नहीं है। चारों

तरफ से एक हार्ड कवर कवर से ढका हुआ है। स्कल है चारों तरफ। तो वो अगर फैला ज्यादा तो अपने ही प्रेशर से द ब्रेन विल बी डेड।

तो यहां पे हम लोग इलेक्टिव वेंटिलेशन पे जाते हैं और उसका पर्पस रहता है टू कंट्रोल द ब्रेथ जिसमें कार्बन डाइऑक्साइड को वाश आउट करके हम लोग ब्रेन के परफ्यूजन

प्रेशर को कम करते हैं। तो अगर मरीज को हम लोग अच्छे से जो नॉर्मली मैं तो करता ही हूं कि अगर अच्छे से जानकारी दिया जाए कि आपके पेशेंट में लंग्स के सपोर्ट के लिए

नहीं लगाया हुआ है वेंटिलेटर। ब्रेन के परफ्यूजन को कम करने के लिए लगाया गया है। तो फिर दिक्कत नहीं होती। कंफ्यूजन होता है जहां मिसकम्युनिकेशन है कि पेशेंट के

रिलेटिव्स जिनको वेंटिलेटर का आईडिया नहीं है वह देख रहे हैं कि मेरे मरीज तो सांस ठीक से ले रहा था लेकिन डॉक्टर ने उनको वेंटिलेटर पे डाल दिया लेकिन अगर उन्हीं मरीजों को यह बताया जाए कि यह वेंटिलेटर

लंग्स के लिए नहीं डाला गया। ये डाला गया है ब्रेन के लिए। ब्रेन को सुरक्षित करने के लिए। एक यहां मैं जोड़ना चाहूंगा। वेंटिलेटर को

लेके अक्सर कंट्रोवर्सी होता है कि मरीज में तो जान बचा नहीं है। डॉक्टर ने ऐसे ही डाल रखा है। ये कंफ्यूजन क्यों होता है?

जैसे ही आप पेशेंट को वेंटिलेटर पर डालते हो तो वेंटिलेटर में हम लोग एक ट्यूब को सांस के रास्ते से कनेक्ट करते हैं तो पेशेंट का अगर मूवमेंट हुआ तो वो ट्यूब

डिस्कनेक्ट हो जाएगा या वो ट्यूब बाहर निकल सकता है और पेशेंट ऑलरेडी क्रिटिकल है। अगर 510 मिनट और ऑक्सीजन ठीक से नहीं मिला पेशेंट विल डाई तो वहां पे टू

इंश्योर नॉर्मल ब्रीथिंग वी पैरालाइज द पेशेंट्स। इसके बारे में 80 टू 90% लोगों को जानकारी नहीं रहती है। जैसे ही आप पैरालिटिक ड्रग्स देते हो ताकि उस पीरियड

में मरीज का साहस अच्छे से चलता रहा। मरीज अपना उंगली तक खिला नहीं सकता है। मरीज करवट नहीं ले सकता है। मरीज अपने पैर मोड़ नहीं सकता है। बिकॉज़ ऑफ द ड्रग्स व्हिच वी

यूज़ इनसाइड द आईसीयू। वहां पे मैंने कई बार गौर किया कि शाम के वक्त में जब विजिटिंग आवर्स रहता है जो रिश्तेदार आते हैं वो दे ट्राई टू लिफ्ट द हैंड छोड़ते

हैं देखिए कि ये तो धड़ाम से गिर गया उनको लगता है मरीज तो मरा हुआ है। मैं वहां पर जो ध्यान रखता हूं वो पेशेंट्स को एक्सप्लेन करता हूं कि इट इज नॉट दैट कि

आपका पेशेंट में कोई जान नहीं बाकी है। वी हैव पैरालाइज्ड इट और उसका रीज़ंस यह है कि ताकि वेंटिलेटर से डिस्कनेक्ट नहीं हो। जैसे ही लगेगा कि एक मरीज सुधार की तरफ है

तो वी विल डू रिवर्सल। बट एज एन अटेंडेंट और एज अ पेशेंट्स फैमिली मेंबर क्या मैं जान सकता हूं अगर मान लो कोई कुछ हॉस्पिटल या कोई डॉक्टर ये

प्रैक्टिस करने की कोशिश करते भी हैं तो क्या मैं कोई पैरामीटर देख के जान सकता हूं कि नहीं द पेशेंट इज़ स्टिल हियर। हां मॉनिटर इज़ देयर इन फ्रंट ऑफ यू।

यू कैन सी द बीपी यू कैन यू आर एबल टू सी द हार्ट रेट। यू आर एबल टू सी द डिफरेंट ग्राफ्स कि ऑक्सीजन कितना चल रहा है?

कार्बन डाइऑक्साइड कितना चल रहा है। एवरीथिंग इज़ देयर। सो ए पेशेंट इज़ नो मोर। तो यह सब तो दिखेगा नहीं उसके। नहीं नहीं सबसे इंपॉर्टेंट है ये समझिए

कि चाहे हॉस्पिटल हो चाहे घर हो चाहे कहीं और जगह हो जिसका भी डेथ हो गया वो जो शरीर सड़ने की प्रक्रिया है वो चारप घंटे के

बाद शुरू हो जाती है और एक ऐसे देश में जहां पे हम लोग बहुत रिलीजियस हैं और चाहे वो आपका वार्ड बॉय हो उसको भी अगर लगेगा

कि यह मरीज मरा हुआ है और डॉक्टर ने वेंटिलेटर पर डाल रखा है और उससे दुर्ग गंध आ रही है वो तुरंत हंगामा कर देगा। तो

यह तो असंभव है कि कोई मरीज मर जाए और उस मरीज मरे हुए मरीज को दो दिन तीन दिन तक कोई डॉक्टर वेंटिलेटर पर रख ले और उससे बदबू नहीं आए।

जो ऑटोलिसिस है जो शरीर का जो हां वो तो तीन-चार घंटे के बाद शुरू हो जाता है।

तो डेड बॉडी एक बार डेथ होने के बाद आपको सपोर्ट सिस्टम गायब हो जाएगा। आपका ना वर्ल्ड बॉय वहां नजर आएगा ना कि डॉक्टर ने तो ऐसे ही रखा हुआ है। तो यह कभी भी इस

तरह से हो ही नहीं सकता है कि आपका मरीज मरा हुआ है और उसको किसी ने वेंटिलेटर पे डाल रखा है। हां मरीज सीरियस हो सकता है। हो सकता है कि पल्स डाउन जा रहा है, बीपी डाउन जा रहा है। अभी और सपोर्ट की जरूरत

है। वहां पे क्योंकि मूवमेंट नहीं हो रहा। मूवमेंट को हम लोगों ने रोक रखा है। तो वहां पे कुछ लोग जो Google यूनिवर्सिटी से

हैं या WhatsApp यूनिवर्सिटी से हैं वो अपना जजमेंट करके आते हैं कि मैंने देख लिया है पेशेंट मरा हुआ है और बाय चांस

अगर इस तरह का सीरियस मरीज की मौत हो जाए तब यही लोग हंगामा खड़ा कर देते हैं कि मैंने तो दो दिन पहले ही देख लिया था मरीज में जान बाकी नहीं है। जबकि उस समय पूरा

टीम लगा रहता है कि इस सीरियस स्टेज को किस तरह से हम लोग बाहर निकालने का प्रयास करें। कोई भी डॉक्टर भगवान नहीं है। 100%

आप सबको नहीं बचा के चल सकते हो। लेकिन इतना मुझे पता है पिछले 28 साल में मैंने हर जगह चाहे हिंदुस्तान हो या बाहर हो जो भी आदमी सीनियर डॉक्टर के पोजीशन पे काम

कर रहा है। हर आदमी चाहता है उसका मरीज बच के जाए। लेकिन देयर आर सर्टेन थिंग्स जो ना आपके कंट्रोल में रहता है ना किसी और के कंट्रोल में रहता है। तो सर जब आई

वेंटिलेटर पे पेशेंट होता है तो एक पैरामीटर डॉक्टर बोलते हैं अभी 80% सपोर्ट पे है 60% सपोर्ट पे है तो एक्चुअली होता क्या है आप कार चलाते हैं उसमें फोर्थ गियर थर्ड

गियर सेकंड गियर फर्स्ट गियर इस तरह से होता है तो वैसे ही वेंटिलेटर में डिफरेंट मोड्स होते हैं उसमें हम लोग जैसे अह वॉल्यूम कंट्रोल मोड होता है। प्रेशर

कंट्रोल मोड होता है। फिर उसमें ऑक्सीजन मिक्सिंग का रहता है कि कब आप 80% ऑक्सीजन दोगे, कब 90% दोगे, 100% आप बहुत लंबे समय

तक नहीं दे सकते हो। सिक्स आवर्स के बाद 100% ऑक्सीजन अगर किसी ने जारी कर रखा है तो वह अपने आप में पेशेंट के बॉडी को

डैमेज करने लगेगा। तो अगर 100% देने की भी जरूरत पड़ी तो इमीडिएटली वी ट्राई कि दो-ती घंटे के अंदर ही अंदर उसके ऑक्सीजन सपोर्ट को थोड़ा सा कम करें। फिर

उसमें हम लोग टाइडल वॉल्यूम देखते हैं। फिर यह देखते हैं कि उसमें वेंटिलेटर जो है उससे कितना रेस्पिरेशन देने की जरूरत

पड़ रही है और मरीज का स्पॉनटेनियस रेस्पिरेशन कितना है। तो इस तरह से डिफरेंट मोड्स है जहां पे पेशेंट्स ने अपना शुरू किया। तो धीरे-धीरे वेंटिलेटर

का सपोर्ट हम लोग कम करते जाते हैं और पेशेंट अपने स्पॉनटेनियस रेस्पिरेशन पे आते जाता है और एक टाइम है जब लगता है कि नाउ पेशेंट्स

स्पॉनटेनियस रेस्पिरेशन इज इनफ तो हम लोग वेंटिलेटर से विन ऑफ करते हैं। यह एक टफ चैलेंजिंग जॉब है। और मुझे लगता है कि 90%

डॉक्टर्स जो आईसीयू में काम करते हैं उसमें से अधिकांश का या तो नाश्ता छूटता है या लंच छूटता है या डिनर छूटता है जो

आम आदमी तक कभी इट्स अ वेरी टफ जॉब टू सेव समवनस लाइफ। सर अगर मान लो हमारा कोई पेशेंट जो कि

आईसीयू में है या वो वेंटिलेटर पे है तो एज एन अटेंडेंट मैं स्ट्रेस में तो हूं बिकॉज़ आपने जैसा बताया कि आईसीयू शब्द

सुनते ही परेशानी में आ जाते हैं। तो फॉर माइंड पीस ऑफ माइंड मुझे क्या चीजें अपने क्रिटिकल केयर वाले डॉक्टर से डिस्कस करनी चाहिए जनरली

देखिए सबसे पहला सवाल जो आईसीयू के अंदर कई बार पूछा जाता है कि मरीज खतरे से बाहर है क्या

तो यहां एक बहुत कॉमन सा चीज है कि मरीज आईसीयू के अंदर तो तभी है ना जब खतरा है तो खतरे से बाहर अगर आप हां बोलते हो तो फिर आपने आईसीयू के अंदर क्यों रखा हुआ है

और हर आदमी आदमी सुनना चाहता है कि मेरा मरीज खतरे से बाहर है। मैं वहां पर जो बताने का प्रयास करता हूं खतरा है तभी

मरीज आईसीयू के अंदर आया है। हम लोग यह देखते हैं कि जिस खतरे को लेके आया वहां से उसका ग्राफ नीचे जा रहा है या ऊपर जा रहा है। तो वी ऑलवेज टॉक अबाउट द ग्राफ कि

इस कंडीशन में जहां पर आप मरीज को लेके आए थे। नाउ ग्राफ इज गोइंग टुवर्ड्स लाइफ और टुवर्ड्स डाउन द हिल। तो दैट इजेंट

और सेकंड यह है एक चीज मैं हमेशा से फोकस करना चाहता हूं कि व्हनेवर यू चूज़ अ डॉक्टर उसके पहले आप डिस्कशन कर लो आपस में कि

मुझे फोर्टिस में जाना है, ऑटमिस्ट में जाना है, किसी के पर्सनल आईसीयू में जाना है। उसके बाद में सरेंडर करिए। सरेंडर नहीं करिएगा। आप खुद भी स्ट्रेस

में रहिएगा, डॉक्टर को भी नहीं करने दीजिएगा। क्योंकि इट्स अ वेरी टफ जॉब टू सेव समवनस लाइफ और वहां पर बार-बार डॉक्टर

को लगेगा कि मेरे ऊपर ट्रस्ट नहीं किया जा रहा है। बार-बार एक ही सवाल को दोहरा दोहराया जा रहा है। तो उसके टाइम को आप

छोड़ो। वो मरीज में उसको यूटिलाइज होने दीजिए। गीता में एक श्लोक है कर्मण्य वादी कारस्ते मा फलेशु कदाच चना मा कर्म फल

हेतुर भूमा ते संगो अस्तु कर्मणी आपकी जिम्मेदारी जैसे ही आपने उस डॉक्टर को चुना आपका कर्म वहां पूरा हो गया अब उसके बाद क्या रिजल्ट मिलेगा लेट हिम डिसाइड

लेट हिम डू हिज बेस्ट वो उसको आप करने ही नहीं दे रहे हो हर 15 मिनट के बाद कभी रिश्तेदार दिल्ली से आ रहा है हर आधे घंटे में कोई रिश्तेदार बोर से आ रहा है अब

उसका 80% % टाइम तो आप कंज्यूम करना चाह रहे हो तो लेट हिम फोकस फॉर द पेशेंट और वंस यू हैव चोजन द राइट प्लेस राइट

डॉक्टर डू नॉट गेट वरीड ही इज़ ट्राइंग टू गिव ह बेस्ट उसको अगर लंच के लिए भूख भी लगा होगा ही विल रेदर फोकस फॉर योर पेशेंट

फर्स्ट देन ही विल गो फॉर द लंच ये एक प्रोटोकॉल है और मुझे लगता है कि कई लोग हंसते-हंसते अपना नाश्ता खाना भूल के मरीज को बचाने में लगे रहते हैं क्योंकि उन्हें

पता है कि जितने रिश्तेदार को खुशी होगी उससे ज्यादा खुशी बॉस उस डॉक्टर को होता है जो बचाता है। 28 साल की जिंदगी में जो

मैं आईसीयू में मैंने गुजारा है। मुझे नहीं याद है कि आज तक मैंने कभी मैरिज एनिवर्सरी मनाया हो या मुझे नहीं याद है कि मैंने आई हैव अ सिंगल डॉटर कि उसके

बर्थडे को सेलिब्रेशन में मैंने कभी पार्टिसिपेट किया हो। मुझे नहीं याद है कि मैं ऐसा नहीं हो कि अनाथ पैदा हुआ हो। बहुत सारे रिश्तेदार हैं।

मुझे आज तक याद नहीं है कि मैं किसी की शादी में शरीक हो पाया हूं। तो इट्स अ वेरी डिमांडिंग जॉब और पेशेंट्स बचते तभी है जब योर फर्स्ट प्रायोरिटी इन लाइफ इज

योर पेशेंट। तो सर आईसीयू में एक इनफेक्शन का बहुत खतरा होता है। आप जब हर रिश्तेदार मिलना चाहता है। 15 हैं 15 के 15 मिलने चाहते हैं।

तो इस पे सर आप क्या कहेंगे? आईसीयू में

जब आपका मरीज भर्ती है या किसी के परिवार का भर्ती है तो उनको यह चीज समझना जरूरी है कि आईसीयू के अंदर जो लोग रोक रहे हैं

वो आपके दुश्मन नहीं है। दे आर द स्ट्रांगेस्ट वेलविशर्स और वो चाहते हैं कि आपका मरीज हर हालत में बच के वापस घर

जाए। और यहां पे उनको चाहिए कोऑपरेशन आपसे। 15 के 15 आदमी अंदर बाहर करेंगे तो रेट ऑफ इनफेक्शन क्रॉस इनफेक्शंस विल बिकम

वेरी हाई। तो उसमें मैं हमेशा सजेस्ट करता हूं कि जो लोग भी मिलना चाह रहे हैं उसमें से एक दो आदमी जो है वो जो रिस्पांसिबल है उस पेशेंट के लिए या परिवार के लिए वो आपस

में डिसाइड कर लें। ओनली दोज़ टू पर्सन शुड गो इनसाइड और टेल द अदर पीपल कि दिस इज द स्टेट। हर आदमी अलग से मिलना चाहेगा। इट

बिकम्स अ सोर्स ऑफ इनफेक्शन नंबर वन और दूसरा इट बिकम्स इट इट्स टाइम वेस्टिंग फॉर द स्टाफ

जो आपके मरीज को बचाने में लगा लगे हुए हैं। सर वेंटिलेटर पे आपने बताया कि आप एक ट्यूब डालते हो तो ट्यूब भी तो एक एक्सटर्नल सॉर्ट ऑफ एन ऑब्जेक्ट है। तो

उसमें भी तो कुछ इनफेक्शन के चांसेस हो सकते हैं। ये पूरा प्रोटोकॉल मेंटेन होता है। यू कैन

नॉट यूज़ द ट्यूब विथ अ बेयर हैंड। आप जो ट्यूब है दैट इज टोटली स्टेराइल। इनफैक्ट बॉडी में कोई भी बाहर का चीज

डालते हैं तो स्टेरिलिटी जो है दैट इज टेकन केयर ऑफ एंड एक स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल बनाया हुआ रहता है। नॉर्मली आप हाथ धोने

के लिए गए एक बार वाश करके आ जाते हैं हम लोग। लेकिन आईसीयू के अंदर आप एंट्री के साथ ही जो हैंड वाश का तरीका है उसमें कम

से कम 5 से 7 मिनट लगता है और उसके बाद फिर आप ग्लव्स पहनते हो। ग्लव्स के बाद आप जो इंस्ट्रूमेंट हैंडल कर रहे

हो उस वो ऑलरेडी स्टेराइल वो किया हुआ है। उसके बाद फिर आप पेशेंट्स को जाते हो। वहां पर भी यूज दोज़ क्लोथ्स

वि आर ऑलरेडी टोटली क्लीन एंड बट सर एक चीज जो है कि हम लोग सुनते हैं इस चीज को आई एम नॉट श्योर अबाउट द डेटा

बट वेंटिलेटर पे बहुत सारे पेशेंट सेप्सिस में चले जाते हैं बिकॉज़ ऑफ़ द इनफेक्शन। इज इट ट्रू ऑ नो?

सेप्सिप्सिस की वजह से वेंटिलेटर। ओके। सो बट अगर काफी दिनों पर से हैं वो वेंटिलेटर पे। एंड सम एक्सटर्नल ऑब्जेक्ट इज़ इनसाइड द बॉडी। सो इट्स इसका कोई प्रॉब्लम नहीं है।

जो हम लोग इंस्ट्रूमेंट्स यूज़ करते हैं दे आर नॉट रिस्पांसिबल फॉर सेप्सिस। सेप्सिस जो हुआ जिसकी वजह से लंग्स फेलर में गया

उसकी वजह से पेशेंट्स वेंटिलेटर पे आ रहा है और यहां पे जो भी चीज हम लोग यूज़ कर रहे हैं या ट्यूब डाल रहे हैं तो देयर इज़ अ फिक्स टाइम जिसके बाद आपको ट्यूब को

चेंज करना है और वो भी डिसाइड करना है कि आफ्टर 7 10 डेज आप उसके लिए अलग से रूट क्रिएट करो नेक में ताकि द इंस्टेड ऑफ

ट्यूब यो ट्रैकस्टोमी करके आप डायरेक्ट वेंटिलेटर से कनेक्ट करिए। वो तो एक फिक्स्ड प्रोटोकॉल रहता है। ओके?

इट इज टोटली सेफ। यहां पे जो कई लोगों को डर लगता है कि अभी तक तो ट्यूब पड़ा हुआ था। अब डॉक्टर आके बोल रहे हैं गले में छेद करेंगे। तो जैसे

ही गले में छेद करने की बात होती है तो लोगों के मन में दह दहशत आने लगता है कि अब क्या होगा? इट्स अ वेरी सेफ

प्रोसीड्यूर। और ट्रैकिस्टोमी में जहां पर डायरेक्ट ट्रेकिया में हम लोग होल करके बनाते हैं। जिस जैसे ही रिक्वायरमेंट खत्म हुआ यू डू नॉट हैव टू रिपेयर इट आल्सो।

जस्ट यहां पर एक हल्का सा बैंडेज भी लगा दिए। थ्री फोर डेज में द हीलिंग बिकम्स कंप्लीट। तो सर एक आईसीयू में एक वर्ड होता है एचडीयू। तो बेसिकली आईसीयू और एचडीयू में क्या

फर्क होता है? दोनों सीरियस पेशेंट्स के लिए हैं। उसमें एक पेशेंट्स का कैटेगरी है। जहां पर बहुत ज्यादा सपोर्ट सिस्टम की जरूरत नहीं है। लेकिन वार्ड से ज्यादा

जरूरत है। वो एसडी में रहते हैं। जहां पर लगता है कि सपोर्ट सिस्टम में और एडवांस सपोर्ट सिस्टम की जरूरत है। वहां

आईसीयू में रखते हैं। एक सर नॉर्मली एक बात होती है कि पेशेंट्स कॉमनली ये बात करते हैं कि मेरे पेशेंट को आईसीयू में रखने की जरूरत तो नहीं थी बट इट्स काइंड ऑफ़ अ फोर्स्ड आईसीयू एडमिशन।

सो उस पे क्या ओपिनियन है आपका?

देखिए मैं तो एक जो सबसे इंपॉर्टेंट है वो है व्हेन यू चूज़ द डॉक्टर ट्रस्ट हिम। और वो

जो डिसीजन ले रहा है ही हैज़ नॉट डन ह मेडिकल डिग्री इन वन ईयर और सो 17 18 साल उसने पढ़ाई की उसके बाद सीनियर रेजिडेंसी

3 साल तीन साल रजिस्ट्रार तीन साल जूनियर कंसलटेंट 24 साल के बाद ही इज इन अ पोजीशन टू टेक इंडिपेंडेंट डिसीजंस तो उस डिसीजन

की कदर करना चाहिए और इसके अलावा बहुत सारा जो सीरियस इलनेस है उस पे एक नजर डालते के साथ मरीज के जो

इंटेलिजेंट रिलेटिव्स हैं दे कैन मेक आउट कि यह बाहर ठीक नहीं हो सकता। अब हल्का सा एक एग्जांपल लीजिए सांस फूलना। हर तीसरे

चौथे घर में कोई ना कोई मरीज मिल जाएगा जिसका सांस फूल रहा है। उसमें जो व्हाट आई डू ऑन नॉर्मल फोन कॉल्स कि मैं बोलता हूं

मरीज को कि एक सांस में काउंट करो गिनती। अगर वह आराम से 2025 काउंट कर पा रहा है। 1 2 3 4 5 6 और 25 तक क्रॉस कर जा रहा है। दैट मींस कि पेशेंट इज नॉट इवन फॉर द

हॉस्पिटल। वो आराम से घर में रह सकता है। अगर रात हो रही है। ही कैन टेक व्हाटएवर ब्रोंकोडाइलेटरल सिरप इज देयर पफ जो यूज़ करते हैं। वो एक दो पफ लेगा। ही कैन कम इन

द मॉर्निंग ओपीडी। काउंट जो है 15 से कम हो रहा है। 1 2 3 4 5 और जैसे ही 15 के पहले ही ब्रेक कर रहा है। दैट मींस कि मरीज का जो सीरियसनेस है

इसको घर पे मत छोड़िए। इसको हॉस्पिटल में रहना चाहिए। और पांच तक भी काउंट नहीं कर पा रहा है। तो दैट मींस कि हिज लाइफ इज़ थ्रेटेंड। ही हैज़ टू बी इन द आईसीयू। एनी

टाइम ही कैन गो ऑन द वेंटिलेटर। वैसे ही चेस्ट पेन होता है। चेस्ट पेन में जो सबसे इंपॉर्टेंट है टू डिफरेंशिएट

विदाउट ईसीजी इन द हाउस कि यह कार्डियक चेस्ट पेन है या मस्कुलर है। ओल्ड एज में

आफ्टर 60 और 65 कई बार जो कार्टिलेज है जो आपका रीफ्स आके जो बीच वाली हड्डी से जुड़ते हैं वहां कार्टिलेज रहते हैं। तो

उस कार्टिलेज में इनफ्लेमेशन होता है। आप ट्रैक्टर पे बैठ के ज़्यादा देर घूम गए, ऑटो में जा रहे हो, मोटरसाइकिल पे बैठ के 2-3 घंटा घूम लिए। तो, वह पेन हुआ चेस्ट

में। अब उस समय जो बच्चों की निगाह जाती है कि पापा सीनियर सिटीजन है। चेस्ट पेन हो रहे हैं। जरूर हो सकता है कार्डियक इशू हो। तो उसको

आराम से घर पे डिफरेंशिएट किया जा सकता है। उसको हम लोग बोलते हैं थ्री फिंगर डायग्नोस। जहां भी दर्द हो रहा है, वहां तीन उंगली से दबा के देखिए। दबाते के साथ

लगता है दर्द बढ़ गया। दैट मींस कि इट इज़ नॉट कार्डियक इनरिजन। इट इज़ बिकॉज़ ऑफ़ दैट कार्टिलेज टीजे सिंड्रोम जिसको बोलते हैं

मस्कुलर है पेन। और वहां नॉर्मल जो भी घर में एनालजेसिक है वह आप दे सकते हैं। कार्डियक पेन के लिए जो सबसे इंपॉर्टेंट है वह है ध्यान रखना कि वो आपका जो बीच

वाली हड्डी है इसके पीछे लगे तेज दबाव बन रहा है। भारीपन लग रहा है और एक इंपेंडिंग डेथ लगता है कि अब बचूंगा नहीं। हम

भारी दबाव टाइप से छाती के बीच वाली हड्डी के ऊपर आ रहा है। वो आप इग्नोर नहीं कर सकते। उसमें उसका मतलब है कि दिस इज टोटली

रिलेटेड टू अ कार्डियक। बट सर कार्डियक में तो लोग यह सोचते हैं कि मेरे को लेफ्ट साइड में दर्द होगा या पूरे छाती में दर्द होगा। देखिए कोई भी पेन

जो अंबलिकस नाभि के ऊपर हो रहा है इट कैन बी कार्डियक। इवन आपके दांत में जो दर्द हो रहा है वो भी हो सकता है उसका कार्डियक कनेक्शन हो। तो उसको रूल आउट करने में ही

ये यहां पर डिपेंड करता है कि आपके डॉक्टर का एक्सपीरियंस कितने ज्यादा है या बाजू में रेडिएट कर रहा है तो उसमें आपको कोरिलेट करना पड़ेगा कनेक्ट करना

पड़ेगा उनकी हिस्ट्री को देखना पड़ेगा बीपी रहता है कि नहीं बीपी के लिए कोई टेबलेट चल रहा है कि नहीं एंड देन यू हैव टू एक्सक्लूड कार्डियक फर्स्ट

अभी सर हम लोग ऑफलाइन बात कर रहे थे कि आपने बोला कि मैं अपने पेशेंट्स को जब भी मैं किसी को आईसीयू में डालता हूं तो मैं अपने पेशेंट को काइंड ऑफ ट्रेन करता हूं कि वो खुद भी जज कर सकते हैं कि अब मैं आईसीयू के बाहर के

जैसे अभी मैंने बताया ना सांस का सांस में तकलीफ हो रही है 25 तक काउंट कर सकते हैं। इसका मतलब घर में रहिए रात के दो भी बज रहे हैं तो आप अभी जो भी आपके पास है पफ

है, नेबोलाइजेशन है, ब्रों ब्रोंकोडाइलेटेड सिरप है, एक डोज़ और ले लीजिए और सुबह में आ जाइएगा। लेकिन आप काउंट 101 के बीच में कर रहे

हैं। दैट मींस कि डू नॉट स्टे बैक एट होम। आप हॉस्पिटल में रहिए। हो सकता है वार्ड में रखना पड़े। लेकिन विद इन द रीच रहिए और पांच तक काउंट कर पा रहे हैं। यू शुड

बी इन द आईसीयू। अभी सर हम लोग आप बता रहे थे ना कि जब मैं किसी पेशेंट को एडमिट करता हूं तो मैं उसको बताता हूं कि तुम खुद भी जज कर सकते हो कि अब तुम आईसीयू के बाहर है।

आप यह देखिए ना आपके पेशेंट को सपोर्ट सिस्टम की जरूरत पड़ रही है कि नहीं। अगर पेशेंट को बीपी बढ़ाने के लिए अलग से ड्रग की जरूरत पड़ रही है। अपने से वो बीपी

मेंटेन नहीं कर पा रहा है। सैचुरेशन बिना वेंटिलेटर के वो मैनेज नहीं कर पा रहा है। जैसे ही आप ऑक्सीजन कंसंट्रेशन वेंटिलेटर पे कम करते हो उसका सैचुरेशन ड्रॉप करने

लगता है। आप देख रहे हो उसका हार्ट रेट अनस्टेबल चल रहा है। उसके ईसीजी में बार-बार एरिदमिया आ रहा है। दैट मींस कि पेशेंट कैन नॉट बी शिफ्टेड आउटसाइड द

आईसीयू। हां पेशेंट आपका आराम से पड़ा हुआ है। बिस्तर में बैठ के चाय पी रहा है। कंफर्टेबल है। डेफिनेटली वो पेशेंट आपके आईसीयू के लिए नहीं। तो सर कभी-कभी सिचुएशन आती है कि कोई पेशेंट एक हॉस्पिटल

में एडमिट है। काफी दिनों से आईसीयू में है। बट वहां से वो सेटिस्फाइड नहीं है। उसको लगता है कि नहीं मेरे को यहां पे मिसलीड या मिसगाइड किया जा रहा है। और उसने सेकंड ओपिनियन लिया और वो किसी दूसरे

हॉस्पिटल में शिफ्ट होना चाहता है। तो सर क्या चीजें को उनको ध्यान रखना चाहिए वाइल शिफ्ट?

शिफ्टिंग में जो सबसे इंपॉर्टेंट है वो है कि यह शिफ्टिंग आपकी मर्जी से हो रहा है या डॉक्टर की मर्जी से हो रहा है। और हो सकता है आप जिस सेंटर से शिफ्ट करना चाह

रहे हो वहां के डॉक्टरों पे ऑलरेडी आपका ट्रस्ट कम हो गया है। तो आप जहां शिफ्ट करना चाहते हो वहां के डॉक्टर से प्रॉपर असेसमेंट कराइए। अगर इफ द आंसर इज नो नेवर

गो फॉर शिफ्टिंग बॉस। शिफ्टिंग में 90% डेथ्स इसलिए होता है कि वह इमोशनल डिसीजन होता है और इमोशंस बेस्ड

डिसीजन है तो यू आर प्लेइंग वि द लाइफ ऑफ योर ओन क्लोज वंस इट हैज़ टू बी प्रॉपर्ली असे एक एग्जांपल बतलाऊंगा एक पेशेंट था

उसका फ्रॉम अह तीन बार कार्डियक अरेस्ट हुआ रोड ट्रैफिक एक्सीडेंट में पेशेंट वीआईपी था और आई वाज़ गेटिंग कॉल्स फ्रॉम द चीफ मिनिस्टर कि

डॉक्टर साहब इसको गुड़गांव शिफ्ट करना है। मैंने बोला सर यह 10 मीटर नहीं चल पाएगा। दो कार्डियक अरेस्ट का एपिसोड हो चुका है। देन ही स्टार्टेड सेइंग शाउटिंग कि शिफ्ट

टू गुड़गांव इमीडिएटली। आई सेड आई कैन नॉट डू इफ यू वांट टू टेक द पेशेंट ऑन योर ओन यू कैन यू आर फ्री टू बट विथ माय सिग्नेचर आई

विल ऑलवेज राइट कि पेशेंट इज़ अनफिट फॉर एनी ट्रांसफर। ही सेड कि अगर यहां पर डेथ होता है तो विल यू टेक द रेसिबिलिटी? आई

सेड कि सर ही इज़ ऑलमोस्ट नियर द डेथ। उसी को टालने का प्रयास कर रहे हैं। अगर आपने डिसीजन ले लिया कि शिफ्ट होना है तो वो आईसीयू से बाहर निकलते निकलते ही इस गोइंग

टू डाई। एंड आई डिड नॉट शिफ्ट अगेंस्ट द डिसीजन ऑफ द चीफ मिनिस्टर एंड पेशेंट सर्वाइव।

तो कई बार ह्यूज प्रेशर रहता है। उसमें डू नॉट गो टेक योर वाइस डिसीजन एंड रिलेटिव्स दे एग्रीड विथ माय डिसीजंस

एंड दैट वाज़ द सपोर्ट दैट आई डिड नॉट ट्रांसफर द पेशेंट एंड पेशेंट सर्वाइव। सो थैंक यू सर। दोस्तों, हम आशा करते हैं कि जो भी हमने डिस्कशन करी आज के पडकास्ट

में, यह हमारी देश की जनता को अवेयर करेगी और वह अपनी मेडिकल जर्नी में एक इमावर्ड महसूस करेंगे और एक इनफॉर्म्ड डिसीजन बना सकेंगे।

मैं फिर से एक बार गौरव और शुभम का हार्दिक धन्यवाद करना चाहूंगा और जिस तरह से यह लोग कर रहे हैं। मैं पिछले 8-10

सालों से देख रहा हूं। हेल्थ सेक्टर में बहुत कम लोग ऐसे मिले हैं जो अपने जिंदगी को एक मिशन में कन्वर्ट कर देते हैं फॉर द

बेटरमेंट ऑफ द सोसाइटी और जिस तरह से आप लोग कर रहे हैं पिछड़े इलाकों में जा रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं उनको एडवांस्ड

हेल्थ केयर फैसिलिटीज प्रोवाइड करने का और जिस तरह से डॉक्टरों को आप जोड़ते हैं और उनकी सर्विज को गांवों तक पहुंचाते हैं अह

मेरी वाइफ़ डॉ. स्वरूपा मित्रा तो ऑलरेडी आपकी फैन है और शी इज़ अ लीडिंग ऑनकोलॉजिस्ट। मैंने अक्सर बहुत बार चर्चा

में उसका नाम सुना तो मुझे लगता था दो लोग हैं कुछ कर रहे होंगे। लेकिन आज आपसे फेस

टू फेस मिलने के बाद लगा कि यू आर 100% और 500% यू आर बोर्न टू ब्रिंग चेंज इन द सोसाइटी। इस मिशन को मत छोड़िएगा। एंड एनी

टाइप ऑफ सपोर्ट हम लोग हमेशा आपके साथ खड़े हैं। एंड लेट्स ब्रिंग अ पॉजिटिव चेंज इन द सोसाइटी टुगेदर।

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