Glories of Lord Sri Ram | Gauranga Das
By Gauranga Das
Summary
Topics Covered
- विपत्ति में रामानुव्रतता आनंद देती है
- रामकथा श्रवण पांच फल देता है
- लक्ष्मण सेवा रूपी लक्ष्मी के प्रतीक
- भरत संशय भार वहन की क्षमता
- शत्रुघ्न अहंकार दमन से नम्र
Full Transcript
ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय
ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय
ओम अज्ञानस ज्ञानजन शला चक्षुरतम तस्मै श्री गुरुवे नमः नमो विष्णु पादाय कृष्ण प्रष्ठाय भूतले श्रीमते भक्ति वेदांत
स्वामी नितनामिने नमस्ते सरस्वती देवी गौरवाणी प्रचारणी निर्विशेष शून्यवादी पाश्चात्य देश जय श्री कृष्ण चैतन्या
प्रभु नित्यानंद श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासदी गौर भक्त वृंद हरे कृष्णा हरे
कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे हरे कृष्णा
आगामी 6 अप्रैल को राम नवमी का पावन पर्व है। श्री राम लक्ष्मण भरत और
शत्रुघ्न इनके नामों की महिमा क्या है? इसके ऊपर आज संक्षेप में मैं वर्णन करूंगा।
शती मदती एका ध्यान शोक परायण एक दुखता न पश्यती
रामाम रामम अनुव्रताम सीता देवी का रावण ने अपहरण किया और सीता देवी को कई यातनाएं
[संगीत] दी। लंका में 10 वर्ष तक सीता देवी बंदी बनकर
रही। किसी भी पतिव्रता नारी के लिए वह भी जो राजकुमारी रह चुकी
है। इस प्रकार की पीड़ा बहुत कष्टदायक थी। तो सीता मैया के दुखों की श्रंखलाओं का
वर्णन करते हुए वाल्मीकि जी कह रहे हैं शष्यती अर्थात
बहुत शोषण उन्होंने अनुभव किया था। रुदती निरंतर रो रही थी।
एकाम अकेली थी। जब लोग मिलकर दुख और कष्ट अनुभव करते हैं
तो बढ़ जाता है। लेकिन एकाम वो अकेली यातनाएं झेल रही थी। ध्यान शोक
परायणी और निरंतर अपने इस अवस्था के विषय में उनको स्मरण होता था कि मैं रामचंद्र जी से
दूर हूं। ध्यान फिर शोक परायणाम निरंतर इतना शोक की अवस्था थी कि वो शोक के परायण हो गई
[संगीत] थी। दुख संताम न पश्यती दुख का कोई दूर दूर तक अंत नहीं दिख रहा था। अनिश्चितता
थी। जब किसी भी क्षेत्र में अनिश्चितता होती है तो पीड़ा और बढ़ जाती है। और फिर अंतिम पंक्ति में कहा गया है कि
भाई जिस व्यक्ति के जीवन में ऐसे पांच छह भिन्नभिन्न प्रकार की पीड़ाएं होंगी वो
व्यक्ति शोक के सागर में ही डूबता होगा। तो उनकी दुर्दशा का इतना विस्तृत वर्णन पांच छह शब्दों में करने के पश्चात
अंतिम पंक्ति में कहते हैं रामाम कि सीता मैया का आंतरिक उनकी आंतरिक
चेतना और उनका आंतरिक अनुभव क्या था?
रामाम अर्थात वह एक आनंद के सागर में डूबी हुई थी। मग्न थी। बाहरी
परिस्थितियां बड़ी विषम थी। खतरनाक थी। उन पर हावी थी। लेकिन आंतरिक रूप से वह रंच मात्र पीड़ा का अनुभव नहीं कर
रही थी। रामाम श्री रामचंद्र जो कि रमते योगिनो
अनंते सत्यनंद चिदात्मनी इति राम पदेनास परम ब्रह्मा
विधते तो राम शब्द का अर्थ ही है आनंद के सागर
तो ऐसे आनंद के सागर में सीता मैया डूबी हुई थी। क्यों? रामम
अनुव्रताम। क्योंकि उन्होंने प्रभु रामचंद्र जी के शिक्षाओं के आधार पर उनके प्रति जो उन्होंने व्रत लिए थे
उनके आधार पर उनके जीवन के आदर्श और चरित्र के आधार पर अपना जीवन जीने का निश्चय किया था। रामम अनुव्रताम
शी वास डिटरमिन टू फॉलो लॉर्ड राम इन एनी सिचुएशन। संपत्ति या विपत्ति की परिस्थिति
में भी वो रामचंद्र की अनुगामिनी बनना चाहती थी। तो चाहे कितनी भी विपत्तियां क्यों ना
आए उनके हृदय में श्री राम के चरणों के प्रति अटूट सेवा की संपत्ति थी। जो बाकी
बाहरी परिस्थितियों से उनको बचाए हुए थे। तो इसको कहते हैं रामाम रामम
अनुव्रताम। श्री प्रभुपाद कुछ भक्तों के साथ बैठे हुए थे। चर्चा कर रहे थे। 12 महाजन की चर्चा हो रही थी।
स्वयंभू नारदा शंभू कुमार कपिलो मनु प्रह्लादो जनको भीष्मो बल व्यासकी वयं ये
12 महाजन है जिनका अनुगमन हम वैष्णव संप्रदाय में करते हैं तो प्रभुपाद जी ने
कहा दी आर द 12 महाज ये 12 महाजन है तो एक भक्त ने प्रभुपाद को कहा प्रभुपाद यू आर द 13 प्रभुपाद ने कहा यू आर द 14थ
फिर प्रभुपाद ने कहा हम सब का कर्तव्य बनता है कि इन महाजनों के दिए हुए मार्ग और शिक्षाओं के
आधार पर अपने जीवन को सवारे और उसके आधार पर हम
चले रामाम रामम अनुव्रता इसलिए श्री रामचंद्र जी कौन है मर्यादा पुरुषोत्तम पूर्ण
पुरुषोत्तम भगवान ड ऐश्वर्यशाली जो कि स्वयं चरित्र के और चरित्रवान स्वभाव के
मूर्तिमान स्वरूप थे। तो इसलिए रामचंद्र जी का नाम उन व्यक्तित्व में वर्णन आता है जिन्होंने
आदर्श या मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान का एक स्वरूप धारण किया। जब राम कथा हो रही थी। प्रथम बार
राम कथा कब हुई? जब लव और कुश विभिन्न स्थानों में सुनाना आरंभ किया। भरत महाराज के जानकारी में आई कि इस
तरह कुछ दो बालक कथा कर रहे हैं। तब राम रामचंद्र जी अयोध्या में राजा के रूप में थे। तो भरत महाराज ने प्रस्ताव दिया कि
चलिए यह कथा यहां पर भी कर लेते हैं। तो भरत महाराज के प्रस्ताव को सुनकर रामचंद्र जी तैयार हुए और एक बड़ा भव्य आयोजन किया।
जहां पर प्रभु रामचंद्र जी अपने रत्न सिंहासन पर आरूढ़ होकर उस कथा को सुनने के लिए तैयार हो गए। तल्लीन हो गए। जैसे लव
और कुश ने अपने मधुर कंठ से श्री राम कथा का वर्णन आरंभ
किया। रामचंद्र जी देखकर समझ गए। यह दोनों हो सकता है मेरे पुत्र हो। क्योंकि इतना मीठा, इतना सुरीला, इतना
सटीक वर्णन और कौन कर सकता था। लेकिन प्रभु रामचंद्र जी सुनने में तल्लीन थे।
लेकिन रामचंद्र जी गौर से देख रहे थे कि श्रोताग उस कथा को सुनने में इतने मग्न थे कि वह श्री रामचंद्र जी के वहां
व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की बात को भी भूल गए थे कि यहां पर इस कथा के पात्र श्री राम यहां पर बैठे हुए हैं। वो भूल
गए। वह कथा में इतने रम गए कि कथा के अलग-अलग पॉइंट पर वह एक दूसरे के पीठ पर थपथपी मार रहे हैं। कोई एक दूसरे को ताली
बजा रहे हैं। मजे लूट रहे हैं। इसको देखकर रामचंद्र जी को लगा भाई श्रोता ज्यादा मजा ले रहे
हैं। मैं तो अकेला ऊपर बैठा हूं। लेकिन जब तक परस्पर आदान प्रदान नहीं होगा तब तक सुख की वृद्धि नहीं
होती। क्योंकि बांटने पर सुख बढ़ता है। है कि नहीं? इसलिए हम लोग कुंभ मेला में बहुत
कि नहीं? इसलिए हम लोग कुंभ मेला में बहुत बांटे। [प्रशंसा]
तो हमारे प्रद्युम्न प्रिय प्रभु मेन सूत्रधार इसके वही थे। हम लोग तो 5000 पर डे का सोच के आए निकले थे।
आराम से सोए हुए थे। अचानक नींद उड़ा दी उन्होंने। बोले 5000 नहीं 1 लाख होना है। [प्रशंसा]
पहले मुझे लगा मजाक कर रहे हैं तो कंफर्म करने के लिए खुद दिल्ली आया मैं और तब उस दिन से जो शुरू हुआ
सिलसिला उसके ऊपर हम लोग एक बुक भी लिखने वाले ऑथर होंगे शांत गोपीनाथ [प्रशंसा]
दास तो रामचंद्र जी सोच रहे भाई सब बैठकर मजे ले रहे हैं एक दूसरे के साथ। हम ऊपर बैठकर क्यों अकेला
रहे? तो रामचंद्र जी सोचा चलो सब लोग
रहे? तो रामचंद्र जी सोचा चलो सब लोग ध्यान मग्न है। हम धीरे-धीरे नीचे उतरेंगे। तो बहुत धीमे-धीमे कदम रखकर
रामचंद्र जी उस सिंहासन से नीचे उतरे। नीचे उतर कर सिंहासन के सबसे निकट जो व्यक्ति बैठे थे उनके बगल में आकर बैठ गए।
और उस सज्जन को पता नहीं कौन आकर बैठ गए। रामचंद्र जी बैठे हैं और वह सज्जन सुन रहे हैं और अगला ही पॉइंट इतना जोरदार था कि उस सज्जन ने रामचंद्र की पीठ पर मारा जोर
से। फिर कुछ समय के पश्चात सब लोग ऊपर जाकर देखते हैं कि भाई सिंहासन खाली है।
वो कहां चले गए? तब देखा कि राम कथा इतना आकर्षक होता है कि प्रभु रामचंद्र जी को भी आकर्षित कर
[प्रशंसा] ले। इसीलिए श्रीमद् भागवत में कहते हैं
येण भगवान हररीश्वर करो रम्यानी मनो्ञानी प्रभु
इन कथाओं को जब हम श्रवण करते हैं भगवान के अवतार लेने के पीछे मूल कारण यही
है जिससे कि वो कथा का विषय छोड़ जाए करोत रम्यानी श्रवण में आकर्षक
मनोज्ञानी जन प्रभु और अर्थ बड़ा ही सटीक और इसलिए कहते हैं परीक्षित महाराज
यतो अर विष्ण सत चति अचरेण
पुस भक्ति हर त पुरुष च सख्यम तदेवहारम वमन्य
से जो भी भगवान की लीलाओं का श्रवण करेगा
कृष्ण कथा, राम कथा इन सभी अवतारों के लीलाओं का अगर श्रवण करोगे तो इसके पांच परिणाम होते हैं।
यत शतो अपैति अरतिर अरतिर अर्थात जो सुनने
में उदासीनता होती है कि लगता है कि भाई क्या है? यह कथा कब तक चलेगी?
क्या है? यह कथा कब तक चलेगी?
हमारे और प्रसाद के बीच ये बाधा [संगीत] क्यों? तो इस तरह की
क्यों? तो इस तरह की भावनाएं बहुत अधिक सुनने का मूड लोगों को होता नहीं
है। तो इसको कहते हैं अ रति लैक ऑफ टेस्ट या डिस्टेस्ट श्रवण के प्रति उदासीनता
बहुत साल पहले जन्माष्टमी के दिन राधानाथ स्वामी ने चार पांच घंटे का लेक्चर दिया और हम लोग भी जवान थे उस समय बेचैन
थे सोच ही रहे थे कब खत्म होगा कब खत्म होगा लेकिन महाराज जी भी बीच-बीच में पूछते थे
शैल आई कंटिन्यू तो हम लोग सब विवश होके हरि बोल बोल देते थे लेकिन जब पूरा लेक्चर समाप्त हुआ तो आश्रम में आकर चार पांच
ब्रह्मचारी धड़ाम से गिर गए और विदिन 10 सेकंड्स खर्राटे मारने लगे। है कि
नहीं? तो इतनी गहरी नींद में सो गए। मैं
नहीं? तो इतनी गहरी नींद में सो गए। मैं आया आश्रम में आके पांच लोग चार पांच लोगों को देखा खर्राटे मारते हुए। मैं भी प्रेरित हो गया।
[प्रशंसा] क्योंकि संगार संजायते काम संग से इच्छा पैदा होती है तो मुझे भी लगा चलो हम भी थोड़ा विश्राम कर लेते हैं
ऐसा फिर मैं लेटने के लिए गया तभी अचानक महाराज खुद आ गए आश्रम में देखने के लिए कि क्लास के बाद हो क्या रहा है आश्रम में और आकर खड़े हो गए देखे पांचों ऐसे
खर्राटे मार रहे हैं अन्य लोगों की सुगम यात्रा में थे तो उनको देखकर महाराज बोले आज जन्माष्टमी का पावन दिन
है। दिन भर श्रवण कीर्तन सेवा में लगे रहना चाहिए। इतनी जोर-जोर से खराटे मार के सो रहे हैं। शर्म नहीं आ रही। मैंने कहा महाराज
आज फास्टिंग का दिन है। निर्जला है। वह सोच के ही आधा उत्साह उड़ जाता है। बेचारे घबराए हुए
हैं। शाम को भी फेस्टिवल है। ऊर्जा की आवश्यकता है। थोड़ा ऊर्जा बचा रहे हैं। महाराज सर पीट लिए और बोले इतना
मैंने कृष्ण लीला सुनाया और यहां महा विष्णु लीला चल रही [प्रशंसा]
है। तो इसलिए उदासीनता श्रवण के प्रति वो चली जाती है। विष्णा भौतिक इच्छाएं कम होने लगती
है। भी तृष्णा अर्थ है। भौतिक इच्छाएं कम होने लगती है। उस दिन मैंने
बताया कल ही मैं कथा सुना रहा था। एक बहुत बड़े उद्योगपति मित्र मेरे आए और कहने लगे प्रभु मेरे पास
इतना इतना धन है। इतना धन है जैसे सागर में जल। लेकिन सागर का जल नमकीन कभी प्यासी नहीं बुझती।
लेकिन मैं देखता हूं आप हरे कृष्णा करते रहे तो आपके पास कुएं का मीठा जल है भक्ति का। आप कृपा करके अपने कुएं के जल का दो
बूंद दे दीजिए। मैंने कहा कुएं का जल का दो बूंद आप ले लीजिए। आप सागर का दो बूंद मुझे दे दीजिए। बोलने मात्र से वह व्यक्ति अगले छ
महीने के लिए गायब ही हो गया। तो भौतिक जगत में व्यक्ति मृग तृष्णा के पीछे घूम रहे हैं।
भटक रहे हैं। उन्हें ले आना है किसके पास?
कृष्णा के पास। मच्छति मलेच्छ से कोच्छ कर्म गो ब्राह्मण द्रोहे संग अमार संगम कोई भी व्यक्ति
अधोगति को प्राप्त होता है तो केवल अपने जन्म से संग से व्यवसाय से मोर कर्म मोर हाथ गोलाए बांधिया
को ग दिया छे फैलाया रूप और सनातन कहते हैं कि इस भौतिक आकर्षण के जंजाल में
फंसकर हम भौतिक अंदर तृप्ति के दलदल में धसते चले जा रहे हैं। वामन यही चे चांद धर
ते चाहे कोरे त वांछा मोरे उठ अंतरे लेकिन भगवान की कृपा की किरणें एक बौने को भी स्पर्श कर सकती है। जैसे चंद्रमा की
किरणें बौने को स्पर्श कर सकती हैं। इसीलिए जब सत्संग में हम आते हैं तो
तृष्णा से हम कृष्णा की ओर जाने लगते हैं। तो इसलिए यह महत्वपूर्ण दूसरा प्रभाव है श्रवण का।
तीसरा सतम चुद्धति। सत्वगुण की वृद्धि होने लगती है। सतगुण हम प्राप्त करने लगते हैं। और
सतगुण का अर्थ है कि हम कर्तव्य निष्ट होने लगते हैं। कर्तव्य परायण होने लगते हैं। और मन की चंचलता
धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है। कभी-कभी मन हमारा बहुत चंचल रहता है, उतावला रहता है। एक ही कार्य के लिए हम लोग बहुत समय तक सेवा करने के लिए तैयार
नहीं रहते। है ना? मैंने कई बार यह स्टोरी सुनाया कि मेरे एक जब मैं आश्रम ज्वाइन किया मुझे किचन में सेवा के लिए भेजा तो
एक मेरे दूसरे ब्रह्मचारी भी ज्वाइन हुए। उसको भी किचन में भेजा। तो मैंने उसको लगाया चपाती बनाने में। वो बड़ा दुखी हो
गया। वो आकर बोलता है मैं तो अपने गांव का सबसे बड़ा प्रचारक हूं। मैं जब खड़े होकर गांव में लेक्चर देता हूं पूरा गांव खड़ा
हो जाता है। इस में ज्वाइन हुआ प्रचारक बनने चपाती बनाने नहीं। मैंने कहा मुझे क्यों कह रहे हो भाई मैं भी चपाती बना रहा
हूं। हर चार दिन आकर वो कंप्लेंट करता था कि तुम मेरा टैलेंट नहीं पहचान पाए। मैं
प्रचारक और काम दिया चपाती। एक महीने के बाद बोरिया बिस्तर बांध के चला गया। जाते-ते डायलॉग मार के
गया। प्रचार करने आया था चपाती बनाने नहीं। मैं शॉक हो गया। बोले यार केवल चपाती को लेकर इतना बड़ा
मैटर चपाती इतना विस्फोटक हो सकता है कभी समझा ही नहीं मुझे। 10 साल बाद प्रोग्राम में मिला। भागा भागा आया। वो आकर बोलता है मुझे मंदिर छोड़ के जाने के बाद शादी किया।
विवाह के पश्चात पत्नी को बैक पेन हो गया। घर पे रोज चपाती मैं ही बनाता हूं। थोड़ा मैं धीरज करके वहीं रह जाता तो शायद ज्यादा अच्छा
होता। तो इसको कहते हैं रजोगुणी प्रवृत्ति। निरंतर परिवर्तनशील स्वभाव। तो जब श्रवण करते हैं तो सतगुण की
वृद्धि होती है। भक्तिम हर तत पुरुष चौथा भक्ति हमारे हृदय के अंदर प्रकट होने
लगती है। और पांचवा पुरुष च सख्यम भक्तों के प्रति
स्नेह उत्पन्न होने लगता है। प्रेम की भावना जागृत होने लगती है। सुशील सहिष्णु शांत वदान्य
गंभीर मधुर वचन मधुर चेष्टा महा धीर सवार सम्मानकर्ता कोरे
सारहित कौटिल्य मात्सर हिंस रचित सारे देवी गुण प्रकट होने लगते हैं। करुणिका
नाम साधो साधु भूषणम और व्यक्ति इस तरह के गुणों के आभूषणों से अभिभूत होने लगते
हैं। तो यह है राम कथा श्रवण करने का प्रभाव। श्री रामचंद्र जी स्वयं आदर्श
मर्यादा पुरुषोत्तम है। राम शब्द का अर्थ है आनंद के भंडार। राम आदर्श चरित्र के प्रतीक। और केवल श्री रामचंद्र जी की
कथाओं को श्रवण करके उनके गुणों का मनन करके हृदय के अंदर व्यक्ति आनंदित रहता है क्योंकि वह आनंद के सागर के संपर्क में
है। अपने चिंतन और मनन के द्वारा तो चाहे बाहरी परिस्थितियां कितनी भी विषम और
विभत्स क्यों ना हो उस पर वह प्रभाव ना करें। इसीलिए श्री रामचंद्र जी स्वयं
मर्यादा पुरुषोत्तम का रूप अदा किए। वनवास में चल रहे थे। चित्रकूट में कई वर्ष श्री राम, सीता
और लक्ष्मण के साथ रहे। उनके चित्रकूट के प्रवास के अंतिम पड़ाव में एक दिन सीता देवी ने
अनायास श्री रामचंद्र जी को देखकर कह दिया प्रभु मैं देख रही हूं कि कितने वर्षों से
आप अपने हाथ में धनुष और बाण लिए घूम ही रहे हो। धनुष और बाण को चलाते हुए मैंने नहीं देखा।
यह क्या आभूषण है क्या? ऐसे ही ले घूम रहे हो कि इसको चलाने
क्या? ऐसे ही ले घूम रहे हो कि इसको चलाने का भी इरादा है। तो जो भी था सीता का सीता मैया का जो
कमेंट था थोड़ा रामचंद्र जी को चुभ गया। क्षत्रिय हैं। सीता मैया ने ललकार तो दिया लेकिन रामचंद्र जी भी मर्यादा पुरुषोत्तम
है तो दिखाना चाहते थे कि भाई आपके सामाजिक पारिवारिक व्यावसायिक संबंधों में जब कोई शब्दों से आपको ललकारेगा तो हमेशा
उसका तुरंत उत्तर देना आवश्यक नहीं है। टिट फॉर टैट की आवश्यकता नहीं है। धीरज से सुन लो। फिर जब सही अवसर मिले तब उसका
उत्तर अपने कार्यों से ही दे देना। तो रामचंद्र जी प्रतीक्षा कर रहे थे उस दिन का और वह दिन आया जब सुरपणका के नासिका को
काटने के पश्चात सुरपणका भागे-भागे आर्तनाद करते हुए अपने दो भाइयों के पास गई। खर और
दूषण और खर और दूषण 14,000 असुरों को साथ
लेकर आक्रमण किए रामचंद्र जी के ऊपर जनस्थान पर जो कि आज पंचवटी नासिक का
स्थान है गोदावरी के तट पर 14,000 असुरों के साथ खर और दूषण का नेतृत्व करते हुए उन असुरों को देखकर
लक्ष्मण उत्तेजित होकर रामचंद्र को बोलते हैं प्रभु आप सीता मैया के साथ तुरंत गुफा के अंदर जाकर सुरक्षित बैठिए
मैं इनका सामना करूंगा। रामचंद्र जी कहते नहीं लक्ष्मण धनुष बाण तो आज मैं चलाऊंगा।
युद्ध तो मैं करूंगा तुम नहीं। लक्ष्मण समझ नहीं पाए। लक्ष्मण बोले प्रभु हे राम यह जो असुर आ रहे हैं वह आपके
स्टैंडर्ड के नहीं है। आप क्यों अपना व्यर्थ ऊर्जा गवा रहे हो? आप आराम से विश्राम कीजिए। सीता मैया
हो? आप आराम से विश्राम कीजिए। सीता मैया के साथ रहिए। हम देख लेंगे निपट लेंगे। अपने लिए बाएं हाथ का खेल
है। रामचंद्र जी ने कहा नहीं लक्ष्मण धनुष बाण तो आज मैं चलाऊंगा। लक्ष्मण अभी भी समझ नहीं पाए।
लक्ष्मण बोले प्रभु आप इतना हट क्यों कर रहे हो? क्यों कष्ट दे रहे हो? अपने आप को
रहे हो? क्यों कष्ट दे रहे हो? अपने आप को सेवक को सेवा का अवसर तो दीजिए। आप जाइए अंदर। रामचंद्र का लक्ष्मण तुम मेरा घरेलू मामला नहीं समझ
सकते। तो आप कृपा करके जाइए और अंदर सीता देवी का संरक्षण कीजिए। इन 14,000 असुरों के
साथ हम निपटेंगे। तो लक्ष्मण समझ नहीं पाए। बोल क्या रहे थे कि ठीक है आदेश मिल गया तो ले
गए। अब रामचंद्र जी अगले 1 घंटे तक आक्रमण कर रहे थे अपने अस्त्र-शस्त्र से। इतने
बाण चलाए कि 14,000 असुर एक घंटे के अंतर्गत हताहत हो गए और वाल्मीकि रामायण में वर्णन आता है कि
रामचंद्र जी के मस्तक पर पसीने का एक बूंद भी नहीं आया। जय श्री राम। जय श्री राम। जय श्री राम।
जय श्री राम श्री राम जय श्री राम जय जय श्री राम
जय जय श्री राम जय जय श्री राम तो रामचंद्र जी के लिए तो ये मनोरंजन
था 14000 असुर क्या थे भाई अब जैसे ही ये 14000 समाप्त हो
गए सीता सीता देवी बाहर आई और अपने हाथ में वरमाला ले आई और रामचंद्र जी को माला पहनाते हुए कहती है
प्रभु क्या पराक्रम का प्रदर्शन किया आपने। वाह वाह वाह वाह वाह वाह मैं तो शुक्र करती हूं कि आज इस पराक्रम को देखने के लिए मेरे पिताजी जनक
महाराज नहीं रहे। अगर जनक महाराज यहां आकर आपके इस पराक्रम को देखते तो हो सकता है मेरी दो बहनों का विवाह भी आपके साथ कर
डालते। [प्रशंसा] तो रामचंद्र
जी एक आदर्श व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। सो राम रिप्रेजेंट्स इंटीग्रिटी मनस्यकम वचसकम कर्मसकम
महात्म मनस्य वचन्य कर्मसन्य दुरात्म रामचंद्र जी कहते हैं कि आनंद का सूत्र
क्या है? जब आपके
क्या है? जब आपके विचार, आपके शब्द और आपके कर्म तीनों में जब समन्वय
होगा तब ही आप आनंद की अनुभूति कर सकते हो।
जब तक आपके मन के विचारों में, चिंतन में, आपके शब्दों में और आपके कर्मों में भेद रहेगा, भिन्नता
रहेगी तब तक मन में चिंता उमड़ती रहेगी। तो रामचंद्र
जी ऐसे संपूर्ण समन्वय के मूर्तिमान प्रतीक थे। रामचंद्र जी के
अनुज लक्ष्मण दीप्तिम अग्निम अरण्यम वा यदि रामम
प्रवेक्षति प्रवेष्ट तत्रमाम देवी माम पूर्वम अवधारय रामचंद्र जी ने कहा कि वनवास तो हम
जाएंगे लक्ष्मण ने कहा हम भी जाएंगे रामचंद्र का आदेश मुझे मुझे हुआ है। तुम क्यों जा रहे हो? तो लक्ष्मण कहते हैं दीप्ति अग्निम
हो? तो लक्ष्मण कहते हैं दीप्ति अग्निम अरण्यम जलते हुए दावानल के अंदर अगर आप
प्रवेश करोगे यदि रामम प्रवेक्षति अगर किसी भयंकर दावाग्नि के
भीतर रामचंद्र जी चलते हुए दिखेंगे तब मैं प्रवेश तत्र देवी मैं उनके पहले उसमें प्रवेश करूंगा
उनकी सेवा में है। अर्थात मेरा अस्तित्व केवल उनकी सेवा के लिए है। उनके
सुख और आनंद के लिए है। अन्य किसी कारण के लिए नहीं। तो इसलिए लक्ष्मण किसके प्रतीक हैं?
अधिकतर लोग मंदिर आते हैं कुछ मांगते हैं कुछ कामना करते हुए कि भगवान यह दे दीजिए वह दे
दीजिए मेरी यह इच्छा पूर्ण कर दीजिए और लोग जब भगवान से इस तरह प्रार्थना करते
हैं तो कई बार उनको यह विश्वास होता है कि भगवान यह इच्छा पूर्ण कर देंगे और कभी-कभी कर भी देते
लेकिन भगवान के सामने जब हम आते हैं तो इस भावना से नहीं आना चाहिए कि वह हमारा कुछ कर देंगे।
इसलिए भागवत में वर्णन करते हैं तस मेघस परावरेशो व्यासक्तितस गिक्षम निर्वेद मूल द्वज शाप रूपो यत्र
प्रसक्तो भयमाध परीक्षित महाराज कहते हैं कि अचानक मुझे अभिश्राप मिला है। सात दिन सात रात में मेरी मृत्यु होने वाली है। मैं तो
विचार करता हूं कि भगवान श्री कृष्ण की विशेष अनुकंपा है मुझ पर जिससे मुझे अनासक्त कर इस भौतिक जगत के श्रृंखलाओं से
इन बेड़ियों को काटकर मुझे अपने निकट लाकर अपनी बलिष्ठ भुजाओं से आलिंगन करें। यह उनकी कृपा
है और इसलिए परीक्षित महाराज के पास वो दृष्टि थी जिससे वह उस विपत्ति को सबसे बड़ी संपत्ति के रूप में देख पा रहे
थे। जब हमारे जीवन में कोई विपत्ति ग्रस्त अवस्था आती है तब हम उसे क्या संपत्ति के
रूप में देख पाते हैं अथवा नहीं। और इसलिए परीक्षित महाराज उस समय प्रार्थना करते
हैं तमो पंतम प्रतंत विप्रा गंगा देवी द्वजो कुक्षवा दशतम गायत विष्णु
[संगीत] गाथा कहते हैं सामान्य व्यक्ति अपने भौतिक देह और
शरीर के नाश को लेकर चिंता चिंतित रहता है। लेकिन मैं अपने मन के विचलित होने से चिंतित हूं कि मृत्यु
के क्षण मेरा मन इस भौतिक जगत के अन्य किसी वस्तु या विषय पर आविष्ट ना हो
जाए। और ऐसा यदा कदाचित हो गया तो मेरा यही निवेदन है
कि हे प्रभु आप मेरी अन्य इन इच्छाओं की पूरी कीजिए पूर्ण पूर्ति
कीजिए भगवती अनंत रति प्रसंगदाशु महत्सयाम उपयाम सृष्टि मैत्रस्तु सर्वत्र नमो
द्वजभ्य अगर किसी व्यक्ति को पुनः भौतिक जगत जगत में जन्म लेना पड़े। तो परीक्षित महाराज कहते हैं कि
भगवान श्री श्री रुक्मणी द्वारकाधीश जगन्नाथ, बलदेव, सुभद्रा, गौर नेता या किसी भी अर्च विग्रह के सामने जब हम आए तो
यह तीन प्रार्थनाएं हमें करनी चाहिए। प्रथम भगवान के चरणों के प्रति असीमित मात्रा में आकर्षण हो।
भगवती अनंत रति अनंत रति अन्य भौतिक जगत के किसी भी
वस्तु या व्यक्ति के प्रति वो आकर्षण नहीं प्रभुपाद जी जुहक मंदिर के टेरेस के ऊपर बैठे हुए थे और कुछ बड़े-बड़े
उद्योगपति उनके साथ थे तब बृज रतन महता बहुत बड़े उद्योगपति प्रवेश किए प्रणाम किए प्रभुपाद को कहते हैं एक भक्त यह ब्रज मोहता है। बहुत बड़े
बिजनेसमैन है। तो मोहता जी कहते हैं प्रभुपाद को अरे आप मुझे बिजनेसमैन क्यों कह रहे
हो? अमेरिका तो आप गए ₹40 लेकर। अब ₹
हो? अमेरिका तो आप गए ₹40 लेकर। अब ₹ करोड़ की संपत्ति पूरे विश्व भर में आपके इस कौन की है? असली बिजनेसमैन तो आप
हो। तब प्रभुपाद ने तुरंत कहा तो मेरा बिजनेस ज्वाइन हो जाओ आप। वो घबरा गए। वो बोले अभी नहीं
लेकिन हम अवश्य हर प्रकार से सपोर्ट करेंगे। तो श्रीला प्रभुपाद यही चाहते
थे कि चाहे हम जीवन के किसी भी मोड़ पर क्यों ना हो एक कदम कृष्ण की ओर ले।
कोई छोटा कदम ले, कोई बड़ा कदम ले लेकिन कृष्ण की ओर कदम तो
ले भजने मध्य श्रेष्ठ नवविधा भक्ति कृष्ण प्रेम कृष्ण दते धोरे महा शक्ति तार मध्य
सर्वश्रेष्ठ नाम संकीर्तन निर अपराध नाम लोले पाए प्रेम
धन पूर्व सेवा देख तारे कृपा उपजीला अनुसंधान बिना कृपा प्रसाद
कोरीला तो भगवान देख रहे हैं कि यह भक्त कितने तल्लीनता से मेरी भक्ति करना
चाहता है। इनका भाव क्या है? भगवान हर एक क्षण हमारे हृदय के भावों को भांप जाते
हैं। इसलिए प्रथम प्रार्थना होनी चाहिए कि आपके चरणों के प्रति हमारा आकर्षण बढ़े।
अट्रैक्शन। दूसरा यह आकर्षण कैसे बढ़ेगा?
जब हम सत्संग में होंगे। व्हेन वी आर इन द [संगीत] एसोसिएशन। तो इसलिए हमें
निरंतर भगवत भक्तों के संग में रहने की इच्छा करनी। इसलिए श्रीला प्रभुपाद ने किसकी स्थापना की?
अंतरराष्ट्रीय कृष्ण भावना संघ इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा
कॉन्शियसनेस। यह एक ऐसा संघ जहां पर लोग आकर अपने कृष्ण भक्ति की चेतना को बढ़ाएं। और एक व्यक्ति आकर मेरे से बहस कर
रहा था। अरे आप लोग मंदिर चलाते हो सबको मंदिर में भर्ती करने के लिए। आप लोगों का यही लक्ष्य है। सबको भर्ती करोगे। एक कॉलेज का स्टूडेंट तो प्रसाद
लेने से मना कर रहा था। मैंने कहा क्यों नहीं लेगा प्रसाद? बोलता है मुझे डर लगता है मेरा हेयर स्टाइल आपके जैसा हो जाएगा। एक आश्रम में ब्रह्मचारी ज्वाइन
हुआ तो पिताजी आकर मेरे से बहस करने लगे। मेरा लड़का यह उम्र में क्यों जॉइ हुआ है?
वो जब मेरे उम्र का होगा तब जॉइ होना चाहिए ना। मैंने कहा बेटे को जाने दो आप आ [प्रशंसा]
जाओ। इतना घबरा गए बोले घर पे पूछ के बताता हूं। अगले दिन आकर बोले बेटे को ही रहने [संगीत]
दो। तो लोगों को कई बार लगता है मुझे सत्संग वत्संग की कोई आवश्यकता नहीं। हम तो बहुत प्राचीन काल से हमारे परिवार में
पूजा पाठ पंडिताई यह वो शास्त्र सब अरे हम दो चार तो आपको बता देंगे ये क्या सत्संग में हर संडे आओ ये
करो माला करो 16 माला करो इतने सारे नियम बांध के रखे भक्ति ऐसी थोड़ी होती है तो
इसलिए जब तक हम भक्ति के संग में नहीं आएंगे तब तक हमारे विचार बदलेंगे नहीं
सत्संग छाड़ी कोनो असत्य विलास ते कारण ला ये कर्म बंद फास तो जब हम सत्संग में
आएंगे तब हम विषय वस्तुओं के जंजाल से बचेंगे तीसरा जो हमें प्रार्थना करनी चाहिए भगवान
के चरणों में आकर्षण सत्संग और तीसरा जो भी अनुभव मैंने प्राप्त किया है वह जन सामान्य में वितरित करूं। लोगों में
बांटूं। यह है तीसरा कि जो कुछ आपके पास हो दूसरों के साथ बांटिए। तो इसलिए शीला प्रभुपाद जी ने कहा
इफ यू वांट टू प्लीज बी डिस्ट्रीब्यूट माय बुक्स। और आज यहां पर इस द्वारका में बैठकर मैं स्मरण कर रहा हूं। परम पूज्य
गोपाल कृष्ण गोस्वामी महाराज के जीवन भर के शीला प्रभुपाद के चरणों में किताब के प्रकाशन और किताब के वितरण के द्वारा
समर्पण जिसके कारण 55 करोड़ गीता विश्व भर में वितरित हो चुके हैं। शीला प्रभुपाद बुक डिस्ट्रीब्यूशन की जय
इन ग्रंथों के वितरण से, प्रकाशन से, पठन से लोगों के मानसिकता में परिवर्तन आता है।
तो जब तक आप जाकर दोगे नहीं, वितरण नहीं, मिलेंगे नहीं तब तक लोग इसको गंभीरता पूर्वक स्वीकार नहीं करेंगे। तो इसलिए यह तीसरा बहुत
महत्वपूर्ण मुद्दा है। और यह तभी संभव हो पाता है जब हम एक उचित
अनुकूल परिवेश में हो। इसलिए लक्ष्मण यहां रामचंद्र जी को कह रहे हैं हम आपके साथ चलेंगे सेवक
बनकर। क्योंकि आत्मा का असली सुख सेवा में है भोग में नहीं। वाल्मीकि जी कहते हैं लक्ष्मण शब्द का अर्थ क्या
है? व्हाट इज द मीनिंग ऑफ
है? व्हाट इज द मीनिंग ऑफ लक्ष्मण? हम हैं भारत
लक्ष्मण? हम हैं भारत में। रामायण सुना भी है, देखा भी है,
लेकिन अधिकांश लोगों को रामायण के मूल पात्र के नाम का अर्थ भी नहीं पता।
सर्व प्रिय करस रामस शरीर लक्ष्मणो लक्ष्मी संपन्न बहिर प्राण
पर लक्ष्मण शब्द का अर्थ है वह व्यक्तित्व जो प्रभु रामचंद्र जी को देखते थे तो उनको
लगता था कि यह मेरे बाहरी प्राण चल रहे हैं। माय लाइफ एयर आउटसाइड ऑफ मायसेल्फ। बहिर
प्राण सर्व प्रियकर तस रामस शरीर और वो प्रभु रामचंद्र जी को हर प्रकार की प्रिय वस्तु देखकर देखकर
संतुष्ट करना चाहते थे ही वांटेड टू प्लीज लॉर्ड राम इन एव्री पॉसिबल
वे इसलिए उनका नाम क्या पड़ गया लक्ष्मणो लक्ष्मी संपन्नो जो लक्ष्मी संपन्न है वह
लक्ष्मण अब आप पूछोगे कौन से लक्ष्मी से संपन्न भाई सेवा रूपी लक्ष्मी से जो संपन्न थे उनका नाम है
[प्रशंसा] लक्ष्मण द प्रोस्पेरिटी ऑफ ऑफ
सेवा तो सेवा करने का अवसर मिलना सबसे बड़ा सौभाग्य है और यह सबसे बड़ी लक्ष्मी
है भक्त भोगा परित्यक्त दृष्ट दोष नित्यस न ईश्वरस अशुभम दत्त स्वहिस भोग करने की प्रवृत्ति को त्याग कर
जब जीव समझता है कि हां मैं प्रभु के चरणों की सेवा करूं तब वह असली भगवत धाम के ऐश्वर्य का अनुभव
करने लगता है। तो लक्ष्मण शब्द का अर्थ है जो लक्ष्मी संपन्न
हो। तो रामचंद्र का अर्थ क्या है?
रामचंद्र किसके प्रतीक है? इंटीग्रिटी
आदर्श चरित्र लक्ष्मण किसके प्रतीक हैं?
सेवा भाव। भरत शब्द का अर्थ क्या है? भारवाही
इति भरत। जो बहुत भार वहन करते हैं वो है भरत। वन हु हैज़ द कैपेसिटी टू कैरी हैवी लोड।
ही इज भरत। कौन सा भार?
देखिए हमारे जीवन में जितने संबंध बनते हैं उन संबंधों में जब गलतफहमियां होती
हैं जब दो लोगों के बीच में उस संबंध को लेकर
कुछ संशय उत्पन्न होते हैं। एक समय जो स्नेह से लदा लद संबंध था।
अब उस स्नेह के संबंध में जब संशय रूपी विष प्रवेश कर जाता है तब उससे बड़ा भार दूसरा कोई है ही
नहीं। इट इज एन इमोशनल लोड। द सस्पिशन द मिस [संगीत]
अंडरस्टैंडिंग तो प्रभु रामचंद्र जी को वनवास कराया किसने? कैकई
ने। किसकी अनुपस्थिति में? भरत की
अनुपस्थिति में। क्या भरत का उसमें हस्ताक्षेप था? कदापि नहीं।
हस्ताक्षेप था? कदापि नहीं। लेकिन जिन परिस्थितियों में रामचंद्र जी का वनवास हुआ सबको लगा। अयोध्या वासियों को लगा,
वशिष्ठ ऋषि को लगा, कौशल्या को लगा, भरद्वाज ऋषि को लगा, गुहा को लगा, लक्ष्मण को भी लगा। इस षड्यंत्र के मूल
रचयिता भरत ही हैं। रामचंद्र जी को वनवास कराने के बाद राजगद्दी किसको मिल रही है? भरत। यह
षड्यंत्र किसने रचा? दशरथ महाराज के सामने प्रस्ताव किसने रखा? कई कई। कई कई किसकी मां है? तो इसके लिए कोई क्या सीबीआई
है? तो इसके लिए कोई क्या सीबीआई इन्वेस्टिगेशन की जरूरत है क्या? स्पष्ट
है कि भाई भरत ही इसके पीछे हैं। तो भरत
निरंतर ऐसे आरोपों के साए में ही अपनी भक्ति कर रहे थे। ऐसे आरोप युक्त वातावरण में पांच मिनट
बैठना भी कठिन हो जाता है। जब आप ऐसे लोगों से घिरे हो जो आपसे घृणा करते हो, आप पर संशय करते हो, संदेह करते
हो, आपके आशाओं पर प्रश्न चिन्ह उठाते हो। ऐसे लोगों के बीच समय बिताना कठिन
है। जब भरत महाराज अंतिम संस्कार करने गए दशरथ महाराज का उनके हाथ में मशाल देने वाले थे तब अचानक वशिष्ठ ने आकर भरत
महाराज के हाथ को पकड़ लिया। कहा नहीं भरत दशरथ महाराज की अंतिम इच्छा उन्होंने व्यक्त की और मुझसे कहा
वशिष्ठ ऋषि किसी भी अवस्था में मेरा अंतिम संस्कार भरत नहीं करना चाहिए क्योंकि इस
रामचंद्र जी को वनवास भेजने के पीछे सबसे मूल कारण भरत है। मक्कार है वो वो शैतान है। वह भरत
कभी मेरे शव के आसपास भी ना भटके। उसका साया भी मेरे शव को ना पड़े। इस
तरह अपने ही पुत्र भरत की भरसना करते हुए, आलोचना करते हुए, उनको गालियां देते हुए, उन पर पूर्ण संदेह करते हुए दशरथ महाराज
दिवंगत हुए। भरत महाराज ने यह बात सुनी। तो उनके हृदय पर मानो करोड़ों करोड़ों
वज्रपात एक साथ पड़ गया हो। जिस व्यक्ति से वह सबसे अधिक स्नेह और प्रेम करते थे उनके ही पिता
दशरथ उनको इतना गलत मानकर चले गए और भरत महाराज के पास अवसर भी नहीं कि अपना कुछ स्पष्टीकरण दे सके।
अगर व्यक्ति जीवित हो तो कम से कम आप कोई मीटिंग करो या फिर किसी मेडिएशन के माध्यम से कुछ तो प्रयास कर सकते हो कि भाई जो आपने समझा
वो सही नहीं था। वास्तविक परिस्थिति यह थी वो थी। कुछ तो एक आशा बनी रहती है। लेकिन गालियां देकर व्यक्ति दिवंगत हो जाए
तब क्या करूं?
जीवन भर भरत महाराज को उस भार को लेकर चलना था कि मेरे सबसे प्रेमी पिता जिनसे मैं सबसे अधिक प्रेम करता
था वो मुझे आरोपित करते हुए मुझे दोषी ठहराते हुए अपराधी ठहराते हुए दिवंगत हो गए।
सोचो भावनात्मक दृष्टि से कितना बड़ा भार था वह तो कोई गलत समझता है तो बड़ा कष्ट होता है।
प्रभुपाद के एक महिला शिष्य डीटी किचन में कुकिंग कर रही थी। तो प्रभुपाद जी के सर्वेंट आए और बोले उनको अरे मैंने प्रभुपाद को कुछ कचोरी दी। लेकिन प्रभुपाद
ने कहा कचोरी आज मैं नहीं खाऊंगा कल खाऊंगा। तो वह कचोरी मैं यही किचन में रख रहा हूं। कल ले जाऊंगा प्रभुपाद के लिए।
तो माता जी ने कहा भाई यह इस का किचन है। यहां पर आप ऐसे ही प्रसाद रख के चले जाओगे। तो अगले दिन तक वह बचेगा। इसकी कोई
गुंजाइश ही नहीं है। आप क्या बात कर रहे हो? बोले नहीं
नहीं आप यहां पर कुकिंग कर रहे हो। देखो इसको। अरे मत छोड़ो भाई मुझसे नहीं होने वाला नहीं आप ही को देखना है प्रभुपाद का कचोरी
है स्पेशल है रख के वह चले गए अगले दिन आए कचोरी ढूंढने लगे गायब वो माता जी को पूछा अरे मैंने कहा था तुमको उसको देख देखभाल करना कचोरी कहां
गया वो माता जी बोली भाई कल मैंने 10 बार बोला यार मत रखो मत रखो मत रखो फिर भी जबरदस्ती रख के जाओगे तो क्या होगा तो सर्वेंट बेचारे परेशान हो गए अब
मैं प्रभुपाद को क्या उत्तर दूंगा तो माता माता जी भी कुकिंग करने में बिजी थी। बोली प्रभुपाद को कह देना वो कचोरी किचन में
रखी थी। वो बिल्ली आकर खा गई। तो सर्वेंट के पास दूसरा कुछ चारा था नहीं। वो गए ऊपर प्रभुपाद के पास जाकर फिर
लौट के जब आए तो माता जी हंसते हुए पूछी क्यों भाई? क्या कहा प्रभुपाद जी ने? तो
क्यों भाई? क्या कहा प्रभुपाद जी ने? तो
सर्ववंड बोलता है प्रभुपाद ने कहा जिसने भी कहा बिल्ली ने खाया उसी ने खाया है। [प्रशंसा]
अब जब ये माता जी ने यह सुना बड़ा धक्का लगा। अरे मेरे ऊपर गलत
आरोप मैंने खाया। अरे प्रभुपाद मेरे बारे में ऐसा कैसे सोच सकते हैं? ये कैसे कह
हैं? ये कैसे कह दिया? और उनका पूरा दिमाग घूमने लगा। जैसा
दिया? और उनका पूरा दिमाग घूमने लगा। जैसा होता है। जब हमको लगता है किसी ने मेरे बारे
में ऐसा कह दिया तो तुरंत तूफान खड़ा हो जाता है। विवेक शक्ति क्षीण हो जाती है। समाप्त हो जाती है। धुंधला छा जाता है। तो
हर प्रकार के उनके मन में विचार चल रहे थे। फिर अचानक उन्होंने सोचा चलो भाई जो भी उन्होंने मेरे बारे में कहा
होगा वह सेकेंडरी है। अभी प्रभुपाद जी को क्या चाहिए?
कचोरी। मेन पॉइंट वो है। फिर वो गई बगल के किचन से कुछ कचोरी के लिए जो सामग्री थी लाकर गरम गरम बना के खिलाया। भेज दिया सर्वेंट के साथ। सर्वेंट गए लौट के आए।
बोले प्रभुपाद ने पांच कचोरी खाए और कहा यह कल के कचोरे से भी ज्यादा जोरदार [प्रशंसा]
थे। किसी को लंबे समय सेवा करना हो तो दो चार गाली तो सुनना ही पड़ेगा। कम बता रहा हूं मैं। नए लोग बैठे हैं इसलिए डराना नहीं
चाहता। [प्रशंसा] है कि नहीं ब्रह्मचारी मुस्कुरा रहे हैं बहुत सत्य वचन सत्य
वचन तो इसलिए सहनशीलता होनी चाहिए तो भरत महाराज ऐसे सहनशीलता के प्रतीक हैं। भरत महाराज
रिप्रेजेंट्स [संगीत] टॉलरेंस। लक्ष्मण लोकप्रियता के परिवेश में सेवा किए। भरत महाराज
लोक घृणा के परिवेश में सेवा की। सुबह डे:30 बजे उठकर सरयू में स्नान करने भरत महाराज जाते थे। पता है क्यों? क्योंकि
2:30 बजे के बाद अयोध्या के नागरिक आते थे और जब देखते थे भरत है हाथ में पत्थर लेकर मारते थे। बोलते यही है वो जालिम जिसने
रामचंद्र जी को भेजा। यही है वो अपराधी रामचंद्र के शत्रु। तो ऐसे लोगों के ऊपर राज्य करना पड़ रहा था जो उनसे घृणा करते
थे। तो इसलिए सेवा चाहे अनुकूल परिस्थिति हो प्रतिकूल परिस्थिति हो सेवा करते रहना है सहनशीलता
के [प्रशंसा] साथ। लक्ष्मण भरत राम और चौथे हैं
शत्रुघ्न। शत्रुघ्न नित्य शत्रुघ्न नीता प्रीति पुरस्कृत गच्छता मातुल कुलम भरते
तदानगा शत्रुघ्न नित्य शत्रुघ्न नीत प्रीति पुरत सब वाल्मीकि रामायण में दिया गया है शत्रुघ्न शब्द का अर्थ है जिन्होंने
अपने शत्रु का वध किया अब रामायण का रिकॉर्ड में देखोगे तो शत्रुघ्न ने एक ही असुर को मारा लवणासुर अब एक असुर को मारने
के लिए शत्रुघ्न नाम देना थोड़ा ज्यादा नहीं हो जाता। अगर कोई बोले आप तो किताब वितरण के मूर्तिमान स्वरूप हो। कितना किताब बांटा?
एक स्मॉल बुक। तो लगेगा या तो मजाक कर रहे हैं या तो फिर व्यंग कर रहे हैं। तो केवल एक लवणासुर को मारने के लिए
शत्रुघ्न कौन से शत्रु का दमन किया?
किसी की सेवा करने में सबसे बड़ा शत्रु है अहंकार। अह कृषक तस्मात स्वातंत्र्यम
प्रतिषिद्धते न म नमः हम कहते हैं ना विष्णवे नमः नमो
नमः न म अर्थात अहंकार का प्रतीक न अर्थात उसका निषेध
नॉट मी नॉट माइन इसलिए नमः तस्मात नमसा स्वातंत्र्यम प्रति
सिद्धते नमः शब्द इसका है प्रतीक इसलिए जब हम शत्रुघ्न की बात करते हैं तो शत्रुघ्न ने अपने अहंकार का दमन करके अपने आप को
भरत महाराज के चरणों में समर्पित कर दिया था। अयोध्या में जो व्यक्ति सबसे अधिक आरोपी
थे भरत उनकी सेवा में जीवन निकाल दिया। उनके मन में कोई अहंकार नहीं था।
भरत जो आदेश करते वो करने के लिए तत्पर हो जाते। यह तभी संभव है जब व्यक्ति अहंकार
शून्य भाव से सेवा करें। और
इसलिए चैतन्य चरितामृत में यह वर्णन आया है पाया यार आज्ञा धन ब्रजेर वैष्णव गण
तारा मध्य मुख्य हरिदास चैतन्य विलास सिंधु कलोले एक बिंदु
तहां कणा कोहे कृष्ण दास वैष्णव की आज्ञा प्राप्त होना ही सबसे
बड़ा धन है। आज्ञा धन इसलिए शत्रुघ्न नम्रता के प्रतीक
हैं। तो इस तरह रामायण के चार पात्र रामचंद्र आदर्श चरित्र के प्रतीक इंटीग्रिटी लक्ष्मण सेवा भाव के प्रतीक
सर्विस एटीट्यूड भरत महाराज सहिष्णुता के प्रतीक टॉलरेंस और शत्रुघ्न नम्रता के प्रतीक
ह्यूमिलिटी यह चार बातों को लेकर जब हम अपना जीवन भक्ति मेंय करेंगे तो अपने आप भगवत
भक्ति की भावना दिन दुगनी रात चौगुनी बढ़ती चली जाएगी। आगामी राम नवमी के दिन और इस नवरात्रि के
समय श्री वाल्मीकि रामायण और श्री रामचंद्र जी के चरित्र से इन सभी गुणों का मनन करते हुए हम अपने
भक्तिमय जीवन को आभूषित करें। इन शब्दों के साथ इस कौन द्वारका में मैं अपने इस कथा को यहीं विराम देता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्णा
[प्रशंसा]
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