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Huzoor Pak ﷺ Ka Bachpan Kaisa Tha? 😢❤️ Hazrat Halima Saadiaؓ KaHairatAngaizWaqia|PeerAjmal RazaQadri

By Bolti Alamat

Summary

Topics Covered

  • कपड़ा उतरते ही बेहोश: हया की मिसाल
  • पालने वाली मां का हक़ कभी न भूलो
  • बिन देखे ईमान लाने वाली खदीजा
  • दुखों की साथी: खदीजा की असली कदर
  • नेकी छुपाओ, कयामत में काम आएगी

Full Transcript

रसूल-ए-करीम सल्लल्ला सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अरब की कंवारी लड़कियों से ज़्यादा हया वाले थे। कवारी लड़कियों से ज़्यादा हुज़ूर हया फरमाया करते

थे। जब खाना काबा की मक्का शरीफ में तामीर हो रही थी ना अहले अरब उसको तामीर कर रहे थे। तो

नबी पाक सल्ला वसल्लम अपने चाचा हजरत अब्बास के साथ खाना काबा की तारीफ में मशरूफ थे। तो अरब के लोग क्योंकि लंबा कुर्ता पहनते

थे पैरों तक तो नीचे अगर किसी वक्त कोई चीज नहीं भी होती थी तो किसी को वो नजर नहीं आती थी क्योंकि पर्दा रहता था एक लंबा कुर्ता पहना हुआ होता था तो जब बच्चे

सरकार की उम्र मुबारक भी अभी थोड़ी थी तो इस तरह बच्चे जब निकलते तो वो कई दफा अपनी तामत उतार देते नीचे से और कोई मजदूरी करने लगते तो तीन चार तय करके ना तामद की

कंधे पर रख लेते जिस तरह कभी देहातों में लोग कपड़ा सर पर रखते थे के ऊपर अगर कोई वजनी चीज रखेंगे तो वह तकलीफ नहीं देगी।

नबी पाक सल्लल्लाह वसल्लम भी सब लोगों के साथ खाना काबा की तामीर में शामिल थे। तो हजरत अब्बास रदी अल्लाह ताला अनो ने कहा हुजूर से अभी अला ने नबूवत भी नहीं फरमाया

था भतीजे आप भी तामद उतारिए। ये सही मुस्लिम में हदीस मौजूद है। और इसको कंधे पर रख लीजिए। आप ईंटें उठा उठा के ला रहे हैं। तो जरा आपको तकलीफ नहीं होगी। तो

सरकार दो आलम सल्लल्लाह वसल्लम से यह बात कही और फिर जल्दी से हुजूर की तामत को निकाल के ना हालांकि लंबा कुर्ता पहना हुआ है तो वो जैसे ही उनके कंधे पर रखा ईंटें

रखने के लिए तो सरकार तो जमीन पे गिर गए बेहोश हो गए आंखें आसमान की तरफ और फिर हुजूर पुकार रहे हैं आारी आजारी आजारी

मेरा तामत दे दो मेरा तामत दे दो कभी कोई शख्स इस वजह से भी बेहोश हुआ है कि मेरे वजूद से कपड़ा उतर गया है हालांकि सरकार पर वो बेहोशी भी नबी पाक का

वो जो गलबा है ना शर्मो हया का उसकी वजह से हुई वरना तो हुजूर फरमाते हैं कि मेरी आंखें सो जाती है दिल तो मेरा उस आलम में भी जागता रहता है

तो सरकार जमीन पे तशरीफ ले आए आंखें आस मेरा मेरा तामत दे दो मेरा तामत दे दो तो जल्दी से उन्होंने तामत दिया तो हुजूर ने बांध लिया फिर तबियत मुबारक में तसल्ली

हुई यानी हम उस रसूल के गुलाम है कि जिनके तो वजूद से कपड़ा उतर जाए तो हुजूर बर्दाश्त नहीं करते कबूल नहीं फरमाते।

तकलीफ शुरू हो जाती। लेकिन यहां नौजवान है और बड़ा कद काट है और बड़े-बड़े समझदार लोग हैं। गर्मियां आती है तो श कपड़े पहन के घूमते हैं। उनको ख्याल नहीं कि ये वो

वाला लिबास है जो बाहर तो क्या घर में अम्मा के सामने नहीं पहनना चाहिए। बहनों और बेटियों के सामने नहीं पहनना चाहिए। आपकी गुफ्तगू में शर्मो हया हो। आपके लबो

लहजे के अंदर हुसन हो। आपको पता है नबी पाक सल्लल्लाह वसल्लम ने फरमाया मेरी उम्मत में सबसे ज्यादा हया करने वाले उस्माने गनी हैं। उस्माने गनी सबसे ज्यादा हया करने वाले आप

फरमाया करते थे जब से हुजूर का चेहरा देखा है मैंने कभी अपनी शर्मगाह भी नहीं देखी। मैंने आंखों का वजू नहीं तोड़ा और जब से हुजूर के दस्ते मुबारक में मैंने बैत के

लिए सीधा हाथ बढ़ाया तो फिर सीधा हाथ मैंने कभी गंदगी को नहीं लगाया। हयात आप बाथरूम के अंदर भी गुसल फरमाते थे तो कपड़ों समेत करते थे। किसी ने कहा हजरत जी

वाशरूम के अंदर क्यों नहीं कपड़े उतारते?

आप फरमाने लगे बाहर बंदों से हया करता हूं। अंदर जाता हूं तो रब से हया आनी शुरू हो जाती है। वो तो देख रहा है ना। तो मैं जो बात आपकी खिदमत में अर्ज करना चाहता हूं उसको आप

समझिएगा मेरे अजीज कि शर्म वाला मिजाज गुफ्तगू भी शर्म वाली आंखें भी शर्म वाली लिबास भी शर्म वाला दोस्ती यारी भी शर्म

वाली बहुत सारी ऐसी बातें देख ना आप जरा मैंने कहा कि बातों को सुन के गुजर ना जाया करें उसकी गहराई पर गौर करें और नबी रहमत अल सलाम की पहली बात नहीं बीवियों की

आंखों में आंसू पैदा कर दिए अरब के अंदर साल के बाद औरतों का एक मेला लगता था खाना काबा के पास। सिर्फ औरतें इकट्ठी होती थी। मेला लगा हुआ था। एक तरफात जानने वाला

यहूदी आलिम भी आया हुआ था। वो बीवियों के मजमे पे नजर डाल के कहने लगा बीबियों मर्द का काम तो कोई नहीं औरतों के मजमे में बात करना। लेकिन मैं तुम्हें एक पैगाम देने

लगा हूं। अल्लाह के आखिरी रसूल जो मक्के में पैदा होने वाले हैं उनके आने का वक्त करीब आ गया है। वो बीवी बड़ी खुशनसीब होगी जिन्हें उनकी

रफाकत मिलेगी। औरतों ने जब देखा कि मर्द आ गया औरतों के मेले में तो उन्होंने डांटा झिड़का कहा चल उठा अपनी किताबें और निकल जा। हजरत खदीजा कहती है बाकियों ने डांटा।

पर मैंने बात पल्ले से बांध ली। मैंने पल्ले से बांध ली और मैं इंतजार करने लगी। कि अल्लाह करे वो नसीब मेरे ही हो। अल्लाह करे मुकद्दर मेरा ही खुले। आप

फरमाते मैं तस्बीह पढ़ती, दुरुद पढ़ती, मैं उस जमाने में जो अल्लाह का जिक्र जिस तरह होता था वो मैं शुरू करती और जब फारिग होती तो मैं इंतजा करती के अल्लाह मेरे

नसीबें खोल दे। कहती है आहिस्ता-आहिस्ता आहिस्ता-आहिस्ता मैं हुजूर की तारीफ सुनने लगी। आहिस्ता-आहिस्ता तारीफ सुनने लगी नबी

पाक। सादिक हैं, अमीन हैं, सच्चे हैं, दयानतदार हैं। इस बुरे और मैले मुआशरे में भी वो सबसे आला भी हैं और सबसे उजले भी

हैं। वो सबसे पाकीजा है। मैं सुनने लगी तारुफ। आहिस्ता-आहिस्ता मैं उनकी गविदा होने लगी। उधर नबी-ए पाक सल्लल्लाह वसल्लम अपने चाचा जनाबे अबू तालिब के पास रहते

थे। कहत आ गया। हालात बिगड़ गए। हुजूर सैयद आलम सल्लल्लाहु ताला वसल्लम से चाचा कहने लगे बेटे अगर माले तजारत लेके शाम जाओ तो बड़ा नफा कमाओगे हमें जरूरत भी है

[हंसी] और अगर हो सके तो खदीजा का माल लेके जाओ और नबी पाक ने कहा चाचा मैं नहीं कहूंगा किसी से जा के मैं नहीं कहता किसी से जाके

जो मेरे नसीब में होगा मेरा रब खुद अता फरमाएगा मैं नहीं कहूंगा मुस्तफा ने तो नहीं कहा हजरत खदीजा रबी अल्लाह ताला कहती है मैंने खुद अपनी खातमा को भेजा मैंने

कहा जाके पूछो तो सही कि मेरा माल कबूल होता भी है कि नहीं? पूछो नबी पाक सल्ला वसल्लम से पूछा हजरत खदीजा की ख्वाहिश है कि आप माल लेके जाएं। हुजूर ने कबूल कर

लिया जनाबे खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला अन्ह के गुलाम थे मैसरा उनका नाम था। जनाबे खदीजा ने उनको साथ भेजा। फरमाया एक

तीन बातें इरशाद फरमाई। एक तो फरमाया सारा रास्ता गौर से देखना मेरे नबी के साथ क्या मामलात दरपेश होते हैं। अभी ऐलान नबूवत नहीं किया। फरमाया जरा गौर

करना मेरे मुस्तफा का मुतालिया करना और मुझे वापस आके सबक सुनाना वो जो तुमने चेहरा बदुआ की तिलावत की हो जरा मुझे वापस

आके सुनाना जिन ने दिल भर जानी डिटठा हो अिया ही तक लया तू मिले ते साजन मिल हूं ना सा लग पया जरा जा के ना तिलावत करना और

मुझे और दूसरा फरमाया तुम मेरे गुलाम हो तो मुस्तफा के भी गुलाम बनके रहना मैं सुनती हूं कि किरदार के अफकार के नजरियात के अजमत के बुलंद

वो जैसे कहे वैसे करना। और तीसरी हजरत खदीजा ने नसीहत फरमाई। फरमाया मोहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह सल्लल्लाह वसल्लम की राय से इख्तलाफ ना करना। ये चलते हुए मुआयदा

किया। जो वो कह दे सो कर जाना। गुलाम कहते हैं मैं साथ गया। बातें मैंने सुन ली। लेकिन जब सफर शुरू हुआ ना अभी चंद मंजिलें

तय हुई थी। मैंने कहा खदीजा आपने क्या नसीहत करनी थी। इनके साथ जो रहेगा वो इनका गुलाम ही बन जाएगा। इनके साथ जो रहेगा तू अ मेरा महबूब नहीं

डिटठा जिन देख के चंद शर्मावे जे रखे हाथ फुल विच हाथ नाल फुल रल जावे अ रात चंद चढ़

जलवा फरमावे फरमाया जो भी साथ रहता गुलाम हो जाता कहते मैं गया तजारत शुरू हुई कहते नबी पाक सल्लल्लाह वसल्लम जब मंडी में

पहुंचे तो लोग कसमें उठा उठा के माल बेच रहे थे अल्लाह के महबूब जब गए ना तजारत ने तो एक आदमी कहने लगा चलो माज़ अल्लाह बुतों

के नाम थे लातो मनात कहने लगा लात की उजा की मनात की कसम उठाओ तो नबी पाक फरमाने लगे उनकी कसम उठाऊं जिनका मैं नाम लेना भी पसंद नहीं करता अभी अल्लाह ने नबूवत नहीं

किया और फरमाया वैसे भी मैं कसम देके माल नहीं बेचता खरीदना है तो खरीदो नहीं खरीदना तो ना खरीदो कहते हैं लोग कसमें उठा उठा के पीछे जाते थे पर मेरे नबी

जिससे रुख फेरते थे वो नबी पाक के पीछे हो जाता था फरमाते हैं कई कई गुना ज्यादा नफा कमाया। हम रस्ते में थे। हुजूर एक दरख्त

के नीचे आराम करने लगे। एक ईसाई राह गार में बैठा था। निकल के आ गया। मुझसे कहने लगा मुझे वो जानता था। मैं ये किसको साथ लाए? ये कौन है? मैंने कहा अहले कुरैश के

लाए? ये कौन है? मैंने कहा अहले कुरैश के एक मुअज्जज़ आदमी है। कहने लगे यार जिस दरख्त के नीचे ये लेटे हुए हैं। यहां आम आदमी नहीं लेट सकता। यहां वही लेटेगा जो

अल्लाह का सच्चा रसूल होगा। यहां दूसरा कोई लेट ही नहीं सकता। ये रसूल है इनका ख्याल रखना। ख्याल रखना काश मैं उस वक्त तक जिंदा रहूं जब ये नबूवत का

ऐलान करें। महसरा कहते हैं मैं गुलाम हो गया। नबी पाक सल्लल्लाह अलैहि वसल्लम की अदाएं मुझे भाने लगी। जब वापसी पे निकले

तो गर्मी बड़ी शदीद थी। फरमाते जब धूप तेज होती तो बादल का साया आके हुजूर पे साया कर देता। बादल का टुकड़ा नबी पाक पे अल्लाह जाने

कहां बैठ के लोगों ने किताबें पढ़ी है। जो कहते हैं 40 साल के बाद नबी बने थे। पता नहीं कहां बैठ के किताबें पढ़ी है। हमने तो जो सीरत पढ़ी है वो बताती है कि तेरी

हयात पाक का हर लम्हा पैगंबर लगे। हर लम्हा पैगंबर लगे। यहां तो वो लोग जो कई साल पहले 20 और 25 साल पहले हुजूर सैयद

आलम सल्लल्ला वसल्लम की रफाकत में रहे। वो ऐलान कर रहा है। लोग पता नहीं कहां बैठ के किताबें पढ़ते हैं। कहां बैठ के? मेरे नबी

पाक से सहाबा ने पूछा हुजूर आप कब नबी थे?

फरमाया अभी आदम की मिट्टी गूदी जा रही थी। अभी आदम की मिट्टी गूदी जा रही थी। मैं तब भी अल्लाह का रसूल था। मेरे भाई नबी-ए रहमत सैयद आलम सल्लल्लाह वसल्लम के गुलाम

हजरत खदीजा के गुलाम कहते हैं वापस आया। और पहले भी कई दफा हजरत खदीजा का माल गया था। बड़े नफे आए थे। पर जो नफा इस साल आया

वो पहले कभी नहीं आया था। कहते हैं मुझसे हजरत खदीजा की सहेली भी बैठी थी। मैं भी आ गया। और जनाबे खदीजा की सहेली कहने लगी चल माल के बारे में कुछ बता कितना बिका।

मैंने कहा माल छोड़ो मुस्तफा की सुनो। और फिर कहती चलो ठीक है बादल साया करता था। चलो ठीक है। तुमसे राहब ने पूछा था ये सही है। उन्होंने तेरी सारे रस्ते बड़ी

खिदमत की। तेरा बड़ा ख्याल रखा। पर ये भी बता तजारत कैसे हुई? तो मैसरा कहने लगा जिंदगी मैंने भी सारी गुजार दी है पर इस रसूल के साथ चार दिन ही गुजारे हैं। हद हो

गई मुझसे और कुछ ना पूछो और कुछ ना पूछो आ मेरे दिल आमना के लाल की बातें करें और कुछ ना पूछो बस जिक्र उनका छेड़िए हर बात

पर और छेड़ना शैतान का आदत कीजिए। बस मुझे हुजूर के तस्करे बयान करने हैं। जिक्र मुस्तफा करना है। हजरत खदीजातुल कुबरा बड़ी मुतासिर हुई। कहती है मुझे दर्जनों

लोगों ने पैगाम निकाह दिया था पर मैंने सुनी नहीं थी| मैंने नफीसा के हाथ पैगाम भेजा मैंने कहा मेरी उम्र 40 साल है उनकी

25 साल है और मेरा आमाल और तरह का है वो शहंशाह है जा के पूछो तो सही भला मैं कबूल होती हूं पूछो नफीसा कहती है मैं आई तो वो

खातून जिनके लिए लोग बड़े बड़े कुरैश पैगाम देते थे पैगाम लेके आई तो रसूल पाक ने अजीब रंग बयान किया अपनी सीरत का। जब मैं पहुंची मैंने कहा खदीजा

निकाह करना चाहती हैं। नफीसा कहती है मेरा ख्याल था कि कोई और होता तो कुर्सी से उठ खड़ा होगा। फौरन कहेगा अच्छा जल्दी करो बात करो।

जब मैंने आ के कहा ना हुजूर खदीजा निकाह करना चाहती है तो नबी पाक ने मेरी तरफ देखा। फरमाया वो कहती है कि तुम कहती हो?

कहा वो कहती हैं? तो हुजूर ने फरमाया ठहर जाओ मैं अपने चाचा से पूछ के बताऊंगा। सुभान अल्लाह। मैं मशवरा करूंगा, मैं पूछ के बताऊंगा। आज बच्चों को कुछ सबक बड़े याद हैं। कहते हैं

पसंद की शादी करना हजरत साहब नाजायज है। पसंद की शादी करना कोई नाजायज है? ओ मैंने

कहा भाई सिर्फ एक ही जायज चीज रह गई और कोई शय जायज नहीं। ये एक ही जायज चीज है जिसका फतवा सारे नौजवान पूजते फिरते हैं। सारे रंगे बने फिरते हैं। मजनू बने फिरते

हैं। सारे माईवाल हो गए। अल्लाह पाक वो हिदायत की तौफीक अता फरमाए। सारे इस बुरी लत का शिकार हो गए। ओ भाई नबी पाक सिवाय

खुदा के किसी के पाबंद नहीं। लेकिन मेरे मुस्तफा ने अपनी उम्मत को ये दर्स दिया है कि जो बड़ों के शफकत के साए में चलता है

अल्लाह उसकी मदद फरमाया करता है। तुझे क्या पता तेरा अच्छा भला किस बात में? कहा

निकाह करना चाहती हूं। फरमाया चाचा से पूछ के बताऊंगा। [हंसी] खदीजा रदी अल्लाह ताला अन्हाना कहती है उन्होंने पूछा। जनाबे अबू तालिब कहने लगे

ये तो खुशकिस्मती है कि हमें ऐसी बहू मिल जाए जिसके किरदार में अफकार में नजरियात में इतनी नफासत हो मुस्तफा करीम के साथ

निकाह हुआ कुर्बान जाएं हजरत खदीजातुल कुबरा की शादी हुई तो भाई बड़ा मुश्किल होता है बड़ा मुश्किल बड़ा मुश्किल होता है अपने आप को ढालना लेकिन जनाबे खदीजा की

जिंदगी उठा के देखो मैं ये नहीं कह सकता वो करोड़पति थी अरब खरब की मैं बात ही नहीं कर सकता और 20 20 नौकरानियां थी उनके

पास दर्जनों उनके पास गुलाम थे लेकिन जब रसूल अल्लाह के दरवाजे नूर पे आई हैं उन्होंने मेरे नबी के घर में झाड़ू भी दिया है। उन्होंने हुजूर के कपड़े भी धोए

हैं। उन्होंने रसूल अल्लाह के लिए अपने हाथों से खाना बनाया। उन्होंने देखा कि नबी पाक सल्ला वसल्लम को दौलतों से तिजारतों से सरमाए से प्यार नहीं। जितनी

दौलत थी शाम को लाकर कदमों में रख दी। कहा महबूबा जब मैं तेरी हूं तो मेरी हर शय ही आपकी है। चंद दिनों में हुजूर ने सारी चीजें दे दी अल्लाह के रस्ते में। हर चीज

नबी पाक ने दे दी। हजरत खदीजातुल कुबरा का हाल ये था कि एक जोड़ा रह गया। कई जगह से पबंद लगे हुए मैं गुड्डी हाथ डोर सज्जन

दे। ओ ज रखे रहना है वाजिब नहीं जे शरीयत मंदा कसम न कहना बस ठीक है जिस हाल में

महबूब राजी है कहा हर चीज कदमों में रख दी और हुजूर के हर रिश्ते का ख्याल किया नबी पाक की हर ख्वाहिश का औरतें बिलखसूस मेरी

बात पे तवज्जो करें जो अर्ज करने लगा हूं आग लगी हुई है घरों में फसाद है लड़ाई है झगड़ा है दंगा है ये तेरा रिश्तेदार वो मेरा रिश रिश्तेदार जब तेरे आते हैं तो

रोटियां जल्दी पकती हैं। जब मेरे आते हैं तो बीमारियां बड़ी होती हैं। तेरे मेरे का झगड़ा आओ मेरे मुस्तफा करीम सैयद आलम का

भी हाल देखो। हजरत हलीमा सादिया मिलने आई। शादी को कुछ दिन गुजरे तो हलीमा सादिया मिलने आई। हजरत हलीमा सादिया सगी अम्मा

नहीं रजाई अम्मा है। यहां तो सगी अम्मा बर्दाश्त नहीं होती। सगी अम्मा और वो बहू सोचती नहीं बात करते हुए सोचती नहीं वो

सोचती नहीं कि किसके बारे में बात कर रही है उसे पता ही नहीं कि तुझे तो पला पलाया ये मिला है ना कभी इसकी अम्मा से पूछ उसने कितनी तकलीफें बर्दाश्त की है। उससे पूछ

किस दिक्कत में किस आजमाइश में इस बच्चे को परवान चढ़ाया है। तू आज मालिक बनी है तो तू तू रंग ही बदल गई है। और बच्चा भी बीवी के साथ मिलकर के अम्मा की हिम्मत

करता है। सोचता ही नहीं कि बात किसकी हो रही है, इसे ख्याल ही नहीं आता। हजरत हलीमा सादिया रजाई मां है। जब तशरीफ लाई तो मुस्तफा करीम ने फरमाया खदीजा ये मेरी

अम्मा है। जनाबे हलीमा सादिया कहती है मैं घर में रही मेरी खिदमत की। मुझे खाना पका के दिया, बिस्तर बिछा के दिया, कपड़े लेके

दिए और जब मैं जाने लगी तो कहने लगी आप मेरे मुस्तफा की अम्मा है। पहली दफा आई हैं। थोड़ा सा तोहफा ना दे दूं। मैंने कहा जैसे मर्जी हो हजरत हलीमा कहने लगी तो

जनाबे हलीमा सादिया को 40 बकरियां और एक ऊंट तोहफे में अता फरमाया और ये जो बीवी आके माली बनी है ना आज जिस दरख्त की छांव में तू बैठी हुई है ना अगर तू समझे तो असल

एहसान उस मां का है जिसने ये परवान चढ़ा के तुझे दिया है। असल नेकी उस अम्मा की है जिसने तेरे सर पे ये सरताज रखा है और तू उस मां को ही भूल गई है और शिकवा बहू से

नहीं शिकवा उस बेटे से है बेटे से है जो अलेदा भी होने लगा था तो अम्मा से अदा हो गया है जिसने सोचा ही नहीं के मां के हाथ उठ जाए तो अर्श का मालिक कहता है फरिश्तों

से के पीछे हट जाओ मां और बाप औलाद के लिए जो मांगेंगे मैं फौरन अदा करूंगा तुझे पता ही नहीं और उधर रसूल पाक का क्या हाल है कहता है वो तेरे रिश्तेदार हैं तेरे बहन

भाई हैं तू तू जा मैं तुझे दरवाजे पे छोड़ आऊंगा। तू मिल उनसे मैं नहीं मिलता। मैं साहब होता हूं। मेरा उनसे क्या लेना देना?

हजरत खदीजा के भाई नहीं थे। नबी पाक सल्लल्लाह वसल्लम के ससुर हयात नहीं थे दो बेटे थे हजरत खदीजा के। और वो दोनों बेटे

पिछले खावंद से थे। जरा अक्ल की कसौटी पर तोलिएगा कि किस किसी बीवी के बेटे हो और पिछले खावंद से हो। उस आदमी का रवैया किस तरह का होता है? [हंसी]

लेकिन मेरे रसूल पाक का रवैया इस तरह का था। मैं आपको सीरत की किताबों से इमाम हलबी ने कस्तानी ने साहिब फतूल बारी ने

लिखा है। रसूल कायनात सैयद आलम सल्लल्ला वसल्लम सोए होते थे। ओ जागो और सुनो। अल्लाह करे हजरत खदीजा का मेरे नबी से

रिश्ता और मेरे नबी का हजरत खदीजा का रिश्ता हमारी समझ में आ गया तो समझ लो हमारे घर जन्नत बन जाएंगे। रोशनी फैल जाएगी। समझो और सीखो।

हजरत आयशा सिद्दीका फरमाती है नबी पाक सो जाते थे ना दोपहर को तो कहती थी मौला अली से लेकर अबू बकर सिद्दीक तक किसी की ताकत

नहीं होती थी हुजूर को आके बेदार करे। सुबह अदब समझा जाता था। और मैं एक जुमला आगे बढ़ा के कहूंगा। मैं कहूंगा अम्मा जी आप तो मौला अली से लेकर अबू बकर सिद्दीक

तक फरमाती है ना। हमारा तो अकीदा ये है कि मुस्तफा सो जाए तो जिब्रील भी नहीं जगा सकते। वो भी नहीं आ सकते वो भी हाथ बांधे खड़े हैं कि मौला कैसे जगाऊं हजरत जिब्रील भी

नहीं जगा सकते लेकिन हजरत आयशा सिद्दीका फरमाती है मैं थी मदीने में बीत गया हजरत खदीजा के विसाल को मैं मदीने में हुजूर के

घर में थी नबी पाक मेरे घर में मौजूद थे और सैयद आलम सोए हुए थे हजरत ए खदीजा के पिछले खावंद के बेटे जनाबे हाला आ गए और

वो मस्जिद में आ के बोले मस्जिद में तवज्जो जो करना मस्जिद में बोले उन्होंने मस्जिद में आके पूछा कि नबी पाक कहां है? मस्जिद में। तो जनाबे आयशा

कहां है? मस्जिद में। तो जनाबे आयशा सिद्दीका फरमाती है हुजूर सोते हुए बेदार हो गए। हुजूर तामत समेटी फौरन सर के ऊपर कपड़ा रखा। मैंने कहा हुजूर कहां जा रहे हैं?

फरमाती है मैंने एक दफा पूछा तो हुजूर ने तीन दफा फरमाया। फरमाया मेरा हाला आ गया है। मेरा हाला आ गया है। मेरा [हंसी] हाला आ गया है। खदीजा का बेटा आ गया है। मेरे

रसूल पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बीवी के रिश्तों का जो तकद्दुस बयान किया उसको समझिए। फरमाया हाला आया है। बेदार होके

खुद तशरीफ ले गए। ये तो हाला थे ना। बड़े बेटे हजरत खदीजा साहब से उनका नाम हिंद था। और हजरत हिंद से कोई बंदा तारुफ पूछता ना नबी पाक का जो हुलिया मिलता है ना

किताबों में सीरत की किताबों में हुजूर का मुखड़ा कैसा था मुख चंद बदर शाशानी है मत्थे चमक दी लाड नूरानी है काली जुल्फ ते

मस्तानी है मखमूर अखी है मद भर ये जो हुजूर का हुलिया मिलता है ना ये हजरत हिंद का बयान किया हुआ है वो बयान किया करते थे कि नबी पाक की आंखें

कैसी थी हुजूर के जलवे कैसे थे वो बयान हजरत खदीजा के बेटे कोई उनसे पूछता कि बड़े राजी रहते हो हिंद बड़े राजी रहते हो तो हजरत हिंद कैसे राजी कैसे ना रहूं राजी

कैसे ना रहूं मेरे भाई का नाम अली उल मुर्तजा है बहन का नाम फातिमातु जहरा है मां का नाम खदीजातुल कुबरा है और बाप का

नाम मोहम्मद मुस्तफा है मैं राजी कैसे ना रहूं हजरत खदीजातुल कुबरा के रिश्तों के साथ रसूल अल्लाह का प्यार उनके रिश्ते कंजुलमाल में हजरत आयशा सिद्दीका की हदीस

है जनाबे आयशा फरमाती है दोपहर को हुजूर आराम करते तो कोई आया नहीं करता था। एक दिन एक बूढ़ी आ गई दरवाजे पे उसने छड़ी पकड़ी हुई है। कहते हैं वो अंदर आई तो नबी

पाक बड़ी तेजी के साथ उठे। हुजूर सैयद आलम ने करीब बिठाया। देर तक हुजूर बातें करते रहे। देर तक [हंसी] देर तक गुफ्तगू होती रही। फरमाते हुजूर ने

उसे कोई इजाफी वक्त दिया। आम सहाबा इस वक्त आते नहीं थे। हुजूर के आराम का वक्त था। इजाफी वक्त दिया नबी पाक ने और फरमाते हैं जब वो जाने लगी तो नबी पाक ने तोहफे

भी अता फरमाए और फिर एक गुलाम से हजरत बिलाल से या किसी गुलाम से फरमाया कि साथ जाओ और घर छोड़ के आओ नबी पाक सल्ला वसल्लम ने एजाज दिया हजरत आयशा सिद्दीका

फरमाती है देर तक मुलाकात भी तोहफे भी इनफरादी मुलाकात बाद में नबी पाक सल्लल्लाहु वसल्लम लेट गए मेरे दिल के अंदर ख्याल आया कि हुजूर जाएंगे और जब रात

को वापस आएंगे तो फिर मैं पूछूंगी कि हुजूर ये बीवी कौन कौन है? हुजूर अब आराम कर रहे हैं। फरमाती है मेरा ख्याल था कि ये सवाल शाम तक मेरे ज़हन में रहेगा कि ये

कौन है? आपने बड़ा एजाज दिया। दरवाजे तक

कौन है? आपने बड़ा एजाज दिया। दरवाजे तक छोड़ने गए। हजरत आयशा सिद्दीका फरमाती है मैं सोच रही थी आराम कर रहे हैं। और मैंने

जैसे ही निगाह डाली तो हुजूर तो गहरी सोच में गुम हैं। नबी पाक सोचो में गुम है। और आंखें खुली हुई। फरमाती है मैं करीब जाकर

बैठी कदमों पर हाथ रखा। मैंने कहा महबूबा ये बीवी कौन थी? इतनी देर आपने मुलाकात की और वो चली गई है तो अभी ख्यालात हैं, तसवुरात हैं। फरमाती है मैंने पूछा तो

मुस्तफा की आंखों में आंसू आ गए। नबी पाक रो दिए उठ के बैठ गए। मैंने कहा हुजूर क्या हुआ? मैंने तो आपको परेशान कर दिया।

क्या हुआ? मैंने तो आपको परेशान कर दिया। मैं माज़रत चाहती हूं। हुजूर ने फरमाया आयशा ऐसी कोई बात नहीं। इस बीवी के बारे में पूछती हो जिसे मैंने

ज्यादा इज्जत दी है। ज्यादा प्यार किया है। जरा ज्यादा उसके साथ मैंने तवज्जो की है। हां या रसूल अल्लाह मैंने इंफरादी रंग देखा है। रूटीन से बढ़कर आपने मोहब्बत

फरमाई तो मेरे मुस्तफा ने फरमाया ये जो औरत आई थी ना जो मेरे पास बैठी रही है। ये मेरी ज़ौजा जनाबे खदीजा की सहेली है। सुभान अल्लाह। ये हजरत खदीजा की सहेली है।

जनाबे खदीजा की सहेली। फरमाया ये मक्के में खदीजा से मिलने आया करती थी। खदीजा इसे वक्त देती थी। पास बिठाती थी। खाना खिलाती थी। दुख सुख सुनती और थोड़ी गरीब

है। जब ये जाती थी तो खदीजा तोहफे भी देती थी। फरमाया आज जब ये आई है तो खदीजा की यादें ताजा हो गई। देर तक मैंने इससे बात की है, गुफ्तगू की है। जाते दफा तोहफा

दिया है। इसलिए कि हुस् अह ईमान [चीखने की आवाज़] अच्छे तरीके से वादा निभाना ये भी ईमान का हिस्सा है। अच्छे तरीके से अहद निभाना,

ताल्लुकात निभाना ये भी ईमान का ये भी ईमान का हिस्सा है। हजरत खदीजा की सहेलियों से रसूल्लाह सल्लल्लाह वसल्लम का

रिश्ता पहली वही नाज़िल हुई नबी पाक पर। अब हुजूर जब इबदा वही के अयाम आए तो हजरत खदीजा फरमाती है रसूल पाक गिरा में चले

जाते कई के दिन वहां रहते पहली वही आई तो कुरान मजीद की तासीर ये है कि कुरान जब खास फरमाया अगर मैं पहाड़ों पे नाजिल करूं

कुरान को तो वो भी मेरे खौफ से रेजा रेजा हो जाए इतनी तासीर है जब हुजूर के कलबे अथर पर आया तो नबी पाक कांपते हुए घर आए

जमिलूनी जमिनी मुझे चादर उड़ाओ चादर उड़ाओ हजरत खदीजा ने चादर दी बैठ गए कहा खदीजा आज कोई आने वाला आया है एक और रब्ब खलक ये

आयात उसने मुझे दी है और मैं बड़े खौफ के आलम में हूं हजरत खदीजा के लफज़ बड़े हसीन है जनाबे खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला क्या

फरमाती है कहती है या रसूल अल्लाह सल्ला वसल्लम आप गम ना करें रब आपको रुसवा दुआ नहीं करेगा, इज्जतें अता करेगा। और दलील क्या है? हजरत खदीजा फरमाने लगी दलील ये

क्या है? हजरत खदीजा फरमाने लगी दलील ये है कि आप गरीबों की मदद करते हैं। मिसकीनों का ख्याल रखते हैं और महबूबा कमजोरों का बोझ आप उठाते हैं। जिसके अंदर

ये खूबियां होती है अल्लाह उसे इज्जत ही अता फरमाया [हंसी] करता है। हजरत खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला अन्हा सबसे पहले नबी पाक पे ईमान लाए। बड़ा मुश्किल होता

है। हमारे जो फलसफे के लोग हैं वो कहते हैं बहुत बड़ा वली अल्लाह भी हो तो बीवी उसकी मान जाए। यह मुश्किल होता है काम। ये मुश्किल होता है। हजरत खदीजातल कुबरा रदी

अल्लाह ताला सबसे पहले ईमान और किस तरह का ईमान किस तरह का ईमान? इब्ने माजा में रिवायत है। गौर करना। हजरत कासिम नबी पाक सल्ला

वसल्लम के साहबजादे हुजूर की छह औलादें चार बेटियां दो बेटे हजरत खदीजा से हुए चार बेटियां और दो बेटे धोखा देते हैं बाज लोग कहते हैं हजरत खदीजा की एक ही बेटी थी

हजरत कासिम हुजूर के बेटे थे वो विसाल कर गए हजरत खदीजा अभी दूध पिलाती थी कि शहजादे पर्दा कर गए एक दिन घर में बैठी

हुई थी तो कहने लगी या रसूल अल्लाह सल्ला वसल्लम मेरे बेटे कासिम के हिस्से का दूध मेरे वजूद में भर आया है। काश मेरा रब

इतना मौका देता कि मेरा बेटा मुद्दत रजा ही पूरी कर लेता। वो दूध पी लेता। नबी पाक ने फरमाया खदीजा तू गम ना कर। अल्लाह

तबारक व ताला ने तेरे बेटे की मुद्दत रजा जन्नत में पूरी कर दी है। जन्नत में पूरी कर दी है। और नबी पाक ने अपना इख्तियार बयान फरमाया इबने माजा में रसूल पाक ने

फरमाया अगर तू कहे तो मैं यहां बैठे-बैठे तुझे तेरे बेटे की आवाज सुनाऊं?

सुभान अल्लाह। अर्ज करूं रब की बारगाह में मैं अभी-अभी तुझे सुनाऊं तेरे बेटे की बात? अभी वो

जन्नत में बोले। तो नहीं आया आपको इस बात का?

सुभान अल्लाह। मैं अभी अभी अभी सुनाऊं तुझे बात से की रवा अभी सुनाऊं तेरा बेटा बोलेगा जन्नत में आवाज यहां मक्के में आएगी सुनाऊं

बड़े लोग करामत देखना चाहते हैं मोजजा देखना चाहते हैं कहते जी मैं तो कुछ देख के आऊंगा कहा सुनाऊं हजरते खदीजा का ईमान देखें कहने लगी महबूबा मुझे सुनने की क्या

जरूरत है मैं खुदा को भी मानती हूं मोहम्मद मुस्तफा को भी मानती हूं मैं बिन देखे ही मानती हूं बिन देखे ही मानती हूं

मुझे सुनने की जरूरत आपने कह दिया तो सो हो गया। मुझे हाजत हुजूर कह रहे हैं अगर तू कहे तो दुआ करूं इल्तजा करूं। अभी आवाज

अल्लाह सुना दे। अभी सुनाऊं? हजरत खदीजा

कहती है नहीं हुजूर मैं बिन देखे ही मैं हूं। मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो पहले देख के आए, पलट के आए, देख के सौदा करें। मैं तो उन लोगों में से हूं जो बिन

देखे माना करते हैं। यूना बिल गैब की काय रसूल्लाह सल्ला वसल्लम पे ईमान लाए। और फिर नबी पाक सल्ला वसल्लम ने जैसा कहा हजरत खदीजा ने वैसा [हंसी]

किया और हजरत आयशा की रवायत ऐसी भी मिलती है जनाबे आयशा से किसी ने पूछा था किसी ने जन्नत की नेमतें भी खाई है तो हजरत आयशा

कहने लगी हां एक दफा नबी पाक ने जन्नत के अंगूरों का खोसा तोड़ के हजरत खदीजा को खिलाए थे वो अंगूर वहां से तोड़ के जनाबे खदीजा को हुजूर ने

अंगूर खिलाए नबी-ए पाक सल्लल्लाहु ताला अलह वसल्लम पर ईमान लाई। हर मौका पर हर मौका पर हुजूर का साथ दिया। तकलीफें देखी।

आजमाइशें देखी। हजरत खदीजा का जो वक्त हुजूर के साथ गुजरा है ना वो सारा आजमाइशों का वक्त है। 15 साल शादी को हुए तो नबी पाक ने ऐलान नबूवत किया। बाकी के

10 साल 25 साल की रिफाकत रही। सख्त मसला था। कुफार की मुखालफत थी। बहुत ज्यादा माल था। फिर गुरबत आई। पूरा मक्का सलूट करता

था। फिर वो सारा शहर मुखालफत करने लगा। हजरत खदीजातुल कुबरा डट के रसूल्लाह का साथ देती। हर हर मौके पर किसी जगह शिकवा नहीं किया। यहां औरतें बोल पड़ती हैं।

कहती है जब से तेरे घर आई हूं सुख नहीं देखा। जब से यहां आई हूं कुछ नहीं देखा। जब से यहां आई हूं बड़ी आजमाइश में। हजरत खदीजतुल कुबरा माल लेके आई। लेकिन

उन्होंने देखा कि मुस्तफा को गरीबी पसंद है तो गरीब हो गई। जी जान कुछ वसा नहीं जान यार दे शाद हो जा ऐसे दिल दे फसाद

सारे दिल दिलबर दे ते आजाद हो जा रखे आबाद ते रहो वसदा ज करे बर्बाद बर्बाद हो जा कहा या रसूल अल्लाह जिस बात में आप राजी

है मैं भी उसी बात में राजी हूं जनाबे खदीजा रदी अल्लाह ताला मुकम्मल वक्त रसूल अल्लाह का साथ दिया शेब अबी तालिब के तीन

साल कैद में गुजारे भाई जिस औरत ने सारी जिंदगी माल देखा हो आला से आला खाना खाया हो बड़े घर में वक्त गुजारा हो कैदी होके

वक्त गुजारा और आप अगरचे कुरैश में से थी लेकिन जिस शाख से हुजूर थे बनू हाशम उसमें से नहीं थी आप हजरत खदीजा रदी अल्लाह ताला अन्हा ये कह सकती थी कि ये बॉयकॉट जो तीन

साल मक्के वालों ने किया और एक एक छोटी सी वादी में कैद कर दिया है बनू हाशम को तो ये मेरा बॉयकॉट नहीं है। नबी पाक सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम ने इजाजत भी

दी कि अगर तुम चाहो तो अदा रह सकती हो। बॉयकॉट तो मेरा है। लेकिन हजरत खदीजा ने कहा नहीं तेरे कदमों में रहूं। गैर की

ठोकर पे ना डाल। झिड़कियां खाऊं कहां छोड़ के सदका तेरा। और तेरे कदमों में जो है वो गैर का मुंह क्या देखे? कौन नजरों पे चढ़े

देख के तलवा तेरा। कहा हुजूर मैंने नहीं जाना। तीन साल पत्ते खा के वक्त गुजारा। तीन साल पानी पी के वक्त गुजारा। आप

फरमाती है कई रातें ऐसी भी गुजरी जिनमें खदीजा ने खाया ही कुछ नहीं। वक्त गुजार दिया। जिंदगी गुजार दी। तीन साल एक लम्हे

के लिए शिकायत नहीं की। ओ भाई ऐसी वफादार मां का तो रोज जिक्र होना चाहिए। ऐसी आला हजरत फरमाते हैं हक गुजारे रिफाकत पे

लाखों सलाम। हक गुजारे रिफाकत पे। अच्छा मैं दुआ करने लगा हूं कि आप सारे हजरत खदीजा पे सलाम पढ़े। हक़ गुज़ारे रिफाकत पे

लाखों सलाम लाखों सलाम। हजरत खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला अन्हा ने हक़ अदा किया। सैयमां पहली मां काफे अमनो अमा हक़

गुज़ारे रिफाकत पे लाखों सलाम। हज़रत खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला हक़ अदा किया। तीन साल का वक़्त सोशल बॉयकॉट का

वक़्त था। सोशल बॉयकॉट। लेकिन हजरत खदीजातुल कुबरा ने हुजूर के साथ टाइम गुजारा। बॉयकॉट खत्म हुआ। आसानी

का वक्त आया तो खदीजा बीमार हो गई। उम्मुल मोमिनीन सैयदना खदीजा रदी अल्लाह ताला अलील हुई। अलालत शदीद हुई तो नबी पाक आके

सराहाने बैठे। कुर्बान जाऊं। आज लोग इतनी नौकरी नहीं करते जितना एहसान जतलाते हैं। कहते हैं वो फला मौलवी साहब को रोटी मैं दिया करता था। वो फला आदमी के साथ उसको तो

आगे पहुंचाया ही मैंने। क्रेडिट पकड़ पकड़ के लोग अपने खाते में डालने के चक्कर में होते हैं। लोग इस कदर ज्यादा प्यार नहीं करते जितना जतलाते हैं। हजरत खदीजातुल

कुबरा ने सिखाया है। सिखाया है अंदाज उम्मत को कि वफा क्या होती है? हजरत खदीजा

ने सारी जिंदगी नौकरी की। सारी जिंदगी वफा की। वक्त विसाल आया। हुजूर को बुलाया। अल्लाह के महबूब तशरीफ़ फरमा हुए। साहिब

इबनेशाम कहते हैं हजरत खदीजा रो पड़ी। कहने लगी महबूबा मैं नबी की बीवी थी। मैं खिदमत का हक़ नहीं अदा कर सकी। कोई गलती हो गई हो

तो मुझसे दरगुज़र कर दिया जाए। मुझे माफ़ कर दिया जाए।" ये कह के रोने लगी। नबी पाक ने फरमाया, तू गलती की बात करती है। खुश हो जा। मेरे रब ने वादा फरमाया है कि तू

दुनिया में भी मेरी बीवी है तो जन्नत में भी तू ही मेरी बीवी बनेगी। वादा किया है अल्लाह तबारक व ताला मैंने तुझे पसंद किया है। जन्नत में भी तू ही मेरी बीवी है।

मेरे नबी-ए करीम सैयद आलम सल्लल्लाह वसल्लम ने हजरत खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाहहु ताला अन्हा से इस कदर ज्यादा हजरत आयशा फरमाती है अक्सर घर में अक्सर

अक्सर नबी पाक हजरत खदीजा का जिक्र छेड़ देते हैं। यहां तो आदमी बहन का जिक्र नहीं ना कर सकता बीवी के सामने। अम्मा का जिक्र

नहीं कर सकता। मामला खराब हो जाता है। बड़ा मुश्किल हो जाता है। मुश्किल है। हजरत आयशा सिद्दीका बाजा तो सौकन थी ना लेकिन हजरत आयशा बयान करती है। कहती है

नबी पाक सबसे ज्यादा हजरत खदीजा का जिक्र करते थे घर में। अक्सर जिक्र होता [हंसी] खदीजा यूं करती थी। खदीजा ये काम इस तरह करती थी। खदीजा का ये रंग होता था। उसका

ये तरीका होता था। उसका ये तर्ज़ हयात था। वो ऐसे चलती जो ऐसे अक्सर हुजूर बयान करते हजरत आयशा फरमाती है मुझे रश होता रश नाज़

करती मैं क्या मुकद्दर है खदीजा के कहती है एक दिन ना मैंने कहा जरा बात तो करूं कहती है नबी पाक गोश्त लाए मुझे कहा आयशा जरा गोश्त साफ करो पकाओ और जरा शोरबा

ज्यादा करना [हंसी] कहती है मैंने वो गोश्त लिया साफ करने लगी मैंने कहा हुजूर शोरबा क्यों ज्यादा करना है मेहमान आने वाले हैं कुछ लोगों को आना

है तो नबी पाक ने फरमाया नहीं आना तो किसी ने नहीं। मुझे पता चला है मदीने में खदीजा की कुछ सहेलियां आई हैं। मेरा दिल करता है कुछ सालन बतौर तोहफा उनको भी भेज दूं। तो

जरा ज्यादा पकाना खदीजा की सहेलियों को मैंने सालन भेजना है। तोहफा देना है। हजरत आयशा कहती है एक जुमला हल्का सा बेजर सा।

बड़ा धीमा सा बच-बच के बड़ा बड़ा बड़ा अपने आप को मोहताज करके। मैंने कहा या रसूल अल्लाह सल्लल्लाह वसल्लम आप खदीजा का जिक्र बहुत करते हैं। हुजूर वो तो उम्र

में 15 साल बड़ी थी। या रसूल अल्लाह सल्ला वसल्लम अल्लाह ने आपको जवान और खूबसूरत बीवियां दी। आप खदीजा का जिक्र करते हैं।

फरमाती है ये बात कह के मैं खामोश हो गई। मेरा ख्याल था जवाब आएगा। देर हो गई। हुजूर जवाब नहीं देते। कहती है मैंने यूं नजर उठाके देखा तो चेहरा मुबारक सुर्ख हो

गया। और रसूल पाक ने फरमाया आयशा आज बात की है आज के बाद ये बात ना करना। मैंने कहा हुजूर क्या हुआ? फरमाते हैं पहले जलाल

था फिर अचानक वो जलाल आंसुओं में बदला और हुजूर ने रो के फरमाया आयशा तुम सारी बीबियां सुखों के वक्त आई हो। खदीजा तो मेरे दुखों की साथी है।

वो तो मेरी आजमाइशों और तकलीफों की साथी उसने तो मेरे साथ वक्त कठिन बिताया। जब लोग मुझे पत्थर मारते मेरे रास्ते में

कांटे बिछाते मैं परेशान होके लौटता उसके एक हाथ में दूध का प्याला होता एक हाथ में खजूरें होती दूध पिला के खजूर खिला के

बिस्तर बिछा के रोटी देके कहती महबूबा गम ना करना अल्लाह बड़ी इज्जतें अता फरमाएगा अल्लाह बड़ी शान अता फरमाए मेरे रसूल करीम

सैयद आलम सल्लल्लाहु ताला अलैहि वसल्लम और फिर इमाम इबने हजर ने लिखा लिखा है। आप फरमाते हैं बाज लोगों पे हुजूर ने कभी

जलाल भी फरमाया है। कभी-कभी जलाल भी फरमाया और हुजूर का जलाल भी बड़ी रहमत वाला है। नबी पाक ने फरमाया ऐ अल्लाह अगर मैं अपने किसी उम्मती को झिड़क दूं तो उसे

इतना सवाब देना जितना तू फर्ज नमाज का सवाब अता करता है। हुजूर का तो जलाल भी करम वाला है। करम वाला जलाल है रसूल पाक का। अक्सर बाज लोगों पर हुजूर नाराज भी

होते लेकिन इमाम इब्ने हजर फतूल बारी में फरमाते हैं के सहाबा और अहले बैत में से हजरत खदीजातुल कुबरा की वो हस्ती है जिस

पर कभी नबी पाक नाराज नहीं हुए कभी नाराज नहीं हुए ये सबसे बड़ी फज़ीलत है हजरत खदीजा की कभी नाराज नहीं हुए नबी किसी मौके पर भी हजरत खदीजातुल कुबरा रदी

अल्लाह ताला अन से नाराज नहीं हुए बल्कि बुखारी शरीफ में लफ्ज कुछ इस तरह के हैं। मैंने शुरू में कहा कि हजरत खदीजा की 20 कनिजाएं थी, नौकरानियां थी, घर के अंदर

नौकर चाकर थे, रेलपेल थी। कोई काम कभी नहीं किया था। हजरत खदीजातुल कुबरा ने एक दिन खाना पकाया। और खाना पका के अपने हाथों से जब निकली ना और आ रही थी हुजूर

को खाना देने तो बुखारी में मौजूद है। जब हजरत खदीजा आई तो नबी पाक ने फरमाया खदीजा तेरे आने से पहले हजरत जिब्रील आ गए। और वो कह रहे हैं या रसूल अल्लाह खदीजा

बर्तन में खाना लेके आ रही है और जब वो खाना लेके आ जाए तो उसे कह दीजिएगा उसका रब उसे सलाम कहता है। उसका रब उसे अल्लाहू अकबर जिसको अल्लाह

सलाम कहे। बरेलवी फरमाते हैं हक़ गुज़ारे रिफाकत पे लाखों हक़ गुज़ारे रिफाकत पे लाखों सलाम। हक़ गुज़ारे रिफाकत पे लाखों

सलाम। हजरत खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला अनो को रब ताला के सलाम आए मुखना इस उम्मत की मुखना तो मैं आपको पाकिस्तान में

जितने अबूज़ आजम रह चुके हैं मैं सबके नाम नहीं बता सकता आए चले गए छुट्टी फारग हो गए खत्म हो गया काम अब कौन पूछता है भाई [गला साफ़ करने की आवाज़]

जो सबसे बड़ा ओहदा है उस पर लोग जो लोग बरा जमाल रहे आप जाकर उनकी कब्रों को देखें

कब्रें शिकवा करती है कि सालों बीत गए आया कोई नहीं ओया देश कबरा जिन ते फुल पे उधर

तो कोई भी नहीं आदा इधर ही लखा गए तो जब इतने इतने बड़े लोगों के जाने के बाद निजाम जिंदगी नहीं रुका तो मैं और आप हमारे जाने से क्या फर्क पड़ता है तो भाई अगर तो कब्र

हशर बेहतर हो गई तो अगला मामला ठीक है। बुखारी शरीफ में एक हदीस है। नबी करीम अल सलाम की आली मर्तबत बारगाह में एक खातून हाजिर हुई और अर्ज गुजार हुई या रसूल

अल्लाह सल्लल्लाहहु अल का वसल्लमा मुझे मिर्गी का मर्ज है मेरे लिए दुआ कर दे अल्लाह शिफा दे तो बहुत सारे लोग इसी तरह सरकार के हुजूर

आया करते हुजूर दुआ करते अल्लाह शिफा दे देता हजरत मौला अली की आंखों में दर्द था सरकार ने लुआबे दहन लगाया खैबर के मौके पे अल्लाह ने शिफा दे दी हजरत अब्दुल्ला इब्न

अतीक की पिंडली टूट गई। हुजूर ने लुआबे दहन लगाया। अल्लाह ने शिफा दी। लेकिन आज इस खातून ने जब अर्ज किया ना या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहहु अलैह वसल्लमा दुआ कर

दें मेरी मिर्गी दूर हो जाए। तो हुजूर ने एक अनोखी बात इरशाद फरमाई। हुजूर फरमाने लगे अगर तू कहे तो मैं दुआ

कर देता हूं। शिफा हो जाएगी। और अगर कहे और तू करे सब्र तो फिर मैं तेरे लिए जन्नत की दुआ करूंगा।

आपने समझना है बात को। फरमाया अगर सबर करे क्या मतलब कि मिर्गी के साथ ही गुजारा करें। थोड़ी दुनिया में तकलीफ सह ले पर तेरी

आखिरत की बेहतरी की दुआ कर देते तो वो सहाबा थे। एक मिनट नहीं लिया सोचने के लिए। फौरन अर्ज करने लगी हुजूर मैं गोया कर लूंगी गुजारा आप दुआ करें अल्लाह मुझे

जन्नत ही अता करे यहां का गुजारा हो सकता है थोड़ी बहुत तकलीफ थोड़ा बहुत दर्द थोड़ी बहुत आजमाइश लेकिन कब्र हशर का मामला खतरनाक हो तो गुजारा हो सकता

नहीं वहां की मुश्किलात हल होनी चाहिए हुजूर मैं सबर कर लूंगी गुजारा हो जाए नबी पाक अल सलाम ने दुआ कर दी या अल्लाह

इसे जन्नत अता फरमा सहाबा फरमाते हैं वो खातून अर्ज करने लगी या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहहु अलै वसल्लमा जब मुझे मिर्गी होती है तो मेरे जिस्म से कपड़ा हट जाता

है। औरत हूं हयात तो सरकार ने दुआ कर दी जितनी मर्जी भी तकलीफ होती थी कपड़े जिस्म से जुड़े रहते थे। हजरत उस्माने गनी के जमाने तक हयात

रही। कोई मदीना शरीफ से बाहर से आता था तो लोग उसे कहते थे जन्नती अम्मा की जियारत करनी। इस बूढ़ी की जियारत करें। इसे दुनिया में हुजूर ने जन्नत की बारत अता फरमाई।

सुभान अल्लाह। तो आखिरत की बेहतरी का भी तो कुछ ना कुछ इंतजाम होना चाहिए। अच्छा फिर अगर हमारा यह ख्याल हो ना कि मेरे बच्चे पीछे से बड़ा सदका दे

देंगे तो यकीनन जितना मैंने अपने अब्बा जी के लिए दिया मेरे बच्चे भी उतना को दे देंगे। वो मेरे लिए बड़ी दुआएं कराएंगे तो जितनी मैं अपने वालिद साहब के लिए करता

कराता हूं इतने वो भी करा देंगे। जितना मैं साल सवाब करता हूं इतना खूब वह भी करा देंगे। यह तो हमें खुद पर कयास कर लेना

चाहिए। कुछ ना कुछ फिक्र आखिरत का मिजाज होना चाहिए। मैं आपकी खिदमत में अर्ज करूं हमने ना खुद से ही तय कर लिया है कि हम बिल्कुल ठीक हैं। शुक्र है जी अल्लाह दा

कभी किसी ने तकलीफ नहीं देती। शुक्र है जी फलानी था तो मेरा नाम पूछ भाई। ये तो आपने खुद तय कर लिया है। ये तो आप अपने आप से

कह रहे हैं। ये तो फैसले कयामत में होंगे कि जीता कौन और हारा कौन? ये तो कयामत का फैसला है। ये तो आपको कयामत के दिन पता

चले। बाज औकात बाज नेकियां हमने की भी होती हैं। लेकिन वो करके बता देते हैं। करके जतला

देते हैं। वो नेकी नेकी रहती नहीं। वो तो हिसाब यही पर बराबर हो गया। और फिर बाज नेकियां ऐसी है जिनका वह स्टेटस और मयार

नहीं होता कि इन अल्लाह पेश की जा सके। कीमती चीजें होती है ना हमारे पास तो हम किसी को दिखाते नहीं। मतलब

किसी के पास इस वक्त भी जेब में 8 ₹1 लाख हो तो शायद किसी को बताए ना। बल्कि अब तो महफिल में आने से पहले लोग कीमती मोबाइल गाड़ियों में छोड़ के आते हैं। लोग बताते

नहीं घर में कितना कैश पड़ा नहीं बताते क्योंकि कीमती समझते हैं। कितना सोना पड़ा है नहीं बताते क्योंकि कीमती चीज है। तो भाई नेकियां क्यों बताते हो? इन्हें कीमती

नहीं समझते। कीमती चीज तो छुपाई जाती है। अपनी आखिरत के लिए कुछ छुपा के रखना कि मुश्किल वक्त

आया तो मेरे काम आएगा। यह बड़ा जरूरी है कुछ नेकियों का किसी को पता नहीं होना चाहिए। एक 100 घर था मदीना मुनवरा में थोड़ी सी

आबादी होती थी। 100 घर पूरा जिसमें दो वक्त खाना भी जाता था। मौसम के कपड़े भी जाते थे। इमाम अबू नयम ने इसको लिखा

अदवियात के लिए और जररियात के लिए रकम भी जाती थी। लेकिन शाम के बाद कोई चेहरे पर नकाब डाल के आता था

देकर चला जाता था। अगर घर वाले नाम पूछते तो वो गुस्सा करता और सालों

वो बूढ़ा शख्स खाना लेके और अदवियात लेके और लिबास लेके आता रहा। पता नहीं था किसी को कौन है। फिर अचानक वो खाना आना वो

खर्चा आना बंद हुआ। लोग गरीब एक दूसरे से पूछने लगे तेरे घर कब से नहीं आया? तेरे घर कब से नहीं आया?

तो लोगों ने तारीखें मिलाना शुरू की। तो पता चला 18 मुहर्रम के बाद यह सबके घरों में 100 घरों में खाना आना बंद हुआ है। अब

जब तहकीक करने लगे तो पता चला कि 18 मुहर्रम को तो इमाम ज़ैनुल आबदीन का इंतकाल हुआ। इमाम हुसैन के कर्बला में तन्हा बच जाने

वाले शहजादे रात को अपने कंधों पर राशन की बोरियां रख के कंधों पर गोराबा के घरों में पहुंचाते थे और जब

गुसल दिया जा रहा था तो पुश्त पर निशान थे बोझ उठाने के तो लोगों ने आपके बेटे से कहा ये क्या है कहने लगे मेरा बूढ़ा बाप

कंधों पर थैले उठा के गोराबा के घरों में पहुंचाने जाता था तो कहा आप जवान थे तो आप क्यों नहीं जाते थे कहा 100 दफा मिन्नत की

कि मुझे बता दे मैं दे आता हूं तो कहते कहते थे उस गरीब का पर्दा नहीं खोलना और साथ फरमाते थे ये मेरा और मेरे अल्लाह

का राज है ये अखा ज मीटिया ते जमाना मेनु रोवेगा अपना ते अपना बेगाना मेनु रोवेगा ज

ना मैं दस्या मैं खारा नुखाने विच फिर जम जाम टूट जांगे ते मखाना मेनु रोवेगा कई लुक लुक रोगे

ते कई बुकबुक रोगे गलियां दाना ते सायाना मेनु रोवेगा तो कुछ अपने लिए जमा तो किया जाए। कुछ इख्तियार तो किया जाए। हर चीज बता के हर

चीज बता। यहां बहुत सारे काम लोग औलाद को बता के नहीं करते। जाती होते हैं। ये मैंने दोस्तों के लिए रखा है। तो भाई कुछ काम अल्लाह के लिए भी रख लो जो किसी को ना

बताओ। हजरत उमर बिन अब्दुल अजीज बादशाह थे। साथ बस मैं बात को समेटने लगा हूं। बादशाह भी थे और दरवेश भी थे।

तो सुबह जो जो काम करना होता था ना उसकी लिस्ट बना लेते थे। जो लोग समझते हैं ना मुझे शायद सुबह याद ना रहे वह रात को लिख लेते हैं। आजकल लोग मोबाइल में लिख लेते

हैं। तो लिस्ट बना लेते थे कि सुबह मैंने जोहर से पहले माहौलियात वालों को बुलाना है और जोहर के बाद मैंने तालीम के महकमे वालों से मीटिंग करनी है और 4:00 बजे फिर

मुझे दफा वालों से बात करनी है। तो वह लिस्ट रात को बनाते थे और सुबह आते ही अपने वजीर को देते थे कि इस इस टाइम फलाफा

गुजारा को और महकमों को तलब कर लेना। तो वजीर को लिस्ट दी आपने एक दिन निकाल के तो उस पर लिखा था

मैं जो 5000 बार दद पाक पढ़ता हूं तो कल मेरा 500 रह गया था आज 5500 पढ़ना है लिखा था कि आज फला यतीम बच्चियों की बारी है

वहां राशन पहुंचाना है अभी दो-तीन लाइनें वजीर ने पढ़ी थी कि हजरत ने छीन ली फरमाने लगे ओो यह तो मेरी जाती है तेरी दूसरी है

यह गलत चली गई और दो सफे भरे हुए थे। एक दो लाइन पड़ी तो छीन ली। तो वजीर पैरों में बैठ गया। कहने लगा हुजूर मैं भी सारा दिन साथ होता हूं। ये

काम किस टाइम करते हो?

ये गरीबों के घरों में खाना पहुंचाना और यतीमों की मदद करना। तो ये ये किस वक्त होता है? ये दुरूद पाक और ये तिलावतें। तो

होता है? ये दुरूद पाक और ये तिलावतें। तो आप फरमाने लगे वजीर चुप कर जा। कुछ चीजें बंदों ने ना जरा छुपा के रखी

होती है। मुश्किल वक्त आया तो काम आएगी। की अकीदा मरण जीन रख है कहते हैं कोई थोड़ा मर जीन रखा होता है कि कोई मुश्किल वक्त

आई तो फरमाने लगे ये भी मैंने कुछ नेकियां छुपा के रख ली है कयामत आई तो मुश्किल कयामत में आई तो हो सकता है मेरे काम आ जाए मैंने छुपा ली है यह मेरा और मेरे

अल्लाह का राज है यह मैं किसी को बता सकता मेरा रब फरमाता है यमा नश मुकीना इ रहमानी वफता

फरमाया जब मुत्तकी लोगों की कब्रें खुलेंगी ना कयामत में नेक लोगों की तो वह रब की बारगाह में पहुंचाए तो जाएंगे पर

मेहमान बनाकर बिठाए जाएंगे अल्लाह के मेहमान होंगे जो मुत्तकी होंगे थोड़ा सा ना वक्त अपने आप को दें

अल्हम्दुलिल्लाह सियासी समाजी फलाई काम खूब करें पर कुछ चीजें रख लें मुश्किल वक्त के लिए आखिरत के लिए कब्रो हश्र के

लिए कुछ मामलात को समेट लें। बिल्कुल अचानक से वक्त आ जाता है। कुछ समेटने का मौका ही नहीं मिलता। और

पछतावे हैं कि जान ही नहीं छोड़ते। बच्चे कह रहे होते हैं काश मैं वक्त पे हॉस्पिटल ले जाता तो यह हो जाता। काश फला होता। भाई कुछ भी नहीं होना था। वक्त आ गया था। अब

इसी पे अंजाम था। तो मेरे अजीज, मेरे भाई, मेरे बुजुर्ग, मेरे दोस्त कुछ अपनी आखिरत के लिए तैयारी। वो हमारे दानिशवर थे ना

मरहूम वासफ अली वासफ साहब तो उन्होंने एक प्राइवेट स्कूल बनाया था आखिर में। तो वो क्लर्क बिठाया था बच्चे दाखिल करने

के लिए। तो वो बच्चे को दाखिला देना है। तो बच्चा कहता है मैं फीस नहीं दे सकता। तो क्लर्क कहता है अभी फीस के बगैर कैसे दाखिल करें? तो अंदर जाता। तो वासिफ साहब

दाखिल करें? तो अंदर जाता। तो वासिफ साहब से कहता है जी वो मेरे पास तो फीस नहीं है तो बच्चा दाखिल कराना है तो कहते फ्री में दाखिल कर लो। एक बच्चा भी तो दो भी तो 100

भी तो कलहरक आकर कहने लगा हजरत इस तरह कारोबार नहीं चलते तो कहने लगे तुम्हें किसने कहा है कारोबार चला रहा हूं। तो कहा फिर क्या कर रहे हो? कहने लगे

जनाजे के बंदे पक्के कर रहा हूं। कोई उधार के बंदे ना लेने पड़े। कोई रो के आए कि मेरे साथ नेकी की थी। दुआ करानी ना पड़े। दुआ निकल जाए। सुभान अल्लाह

के यार इसने मेरे साथ फला वक्त मैं तो जनाजे के बंदे पक्के कर रहा हूं के उधार के कंधे ना लेने पड़े लोग दौड़ के शामिल होना पसंद करें

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