LongCut logo

Kala Tantra | Hindi Horror Story | Scary Pumpkin

By Scary Pumpkin

Summary

Topics Covered

  • ईर्ष्या इंसान से अकल्पनीय कार्य करवा देती है
  • विजय को सब भूल गए, यही दर्द था
  • लालच और काला जादू सिर्फ बर्बादी देते हैं

Full Transcript

गांव के आखिरी छोर पर जहां खेत खत्म होते थे और पुराने पीपल के पेड़ शुरू होते थे। वहां एक टूटा हुआ मंदिर था। उस रात बारिश

होने वाली थी। हवा भारी थी और दूर कहीं कुत्ते लगातार भौंक रहे थे। मंदिर के पीछे एक औरत बैठी थी। उसके सामने एक काला कपड़ा

बिछा हुआ था। उस कपड़े पर कुछ चीजें रखी थी। राख नींबू, लाल धागा, सरसों का तेल और

कुछ बाल। वो औरत धीरे-धीरे मंत्र पढ़ रही थी। उसकी आंखें बंद थी लेकिन चेहरे पर नफरत साफ दिखाई दे रही थी। अचानक उसने वो

बाल उठाए और उन्हें काले धागे में बांधने लगी। जिस सुख ने मुझे जलाया है, अब वही सुख उसे खा जाएगा। उसने वो बंधा हुआ धागा एक छोटी पुड़िया

में रखा। फिर अपने सामने रखे एक तस्वीर पर काला तेल टपकाया और अगले ही पल मंदिर के

अंदर रखे दिए की लौ मशाल की तरह बड़ी होकर जली और अपने आप बच गई। धर्मपाल का परिवार गांव में सम्मानित माना

जाता था। दो बेटे थे अजय और विजय। अजय बचपन से तेज था। वो पढ़ाई करके शहर चला गया और धीरे-धीरे उसने अपना व्यापार खड़ा

कर लिया। कुछ ही सालों [संगीत] में उसके पास बड़ा घर, गाड़ी, नौकर और पैसा सब कुछ

आ गया। लेकिन अजय कभी अपने परिवार को नहीं भूला। हर महीने गांव पैसे भेजता। मां-बाप की दवाई, घर की मरम्मत, खेती का खर्च।

यहां तक कि विजय के बच्चों की फीस भी वही भरता। जब भी गांव आता पूरा घर खुश हो जाता। देखो अजय फिर से बच्चों के लिए कितने

खिलौने लाया है। मीरा भी बहुत अच्छे स्वभाव की थी। वो कभी विजय और कविता को छोटा महसूस [संगीत] नहीं

होने देती। गुड़िया के लिए कपड़े, विजय के लिए घड़ी, कविता के लिए साड़ी, हर बार कुछ ना कुछ लेकर आती है। लेकिन यही चीज कविता

को अंदर ही अंदर जलाने लगी। कविता जब गांव की औरतों को सुनती अजय तो भगवान जैसा बेटा है। पूरा गांव उसी की वजह से चलता है।

तो उसके चेहरे पर नकली मुस्कान आ जाती। लेकिन अंदर कुछ सड़ने लगता। उसे लगता धर्मपाल और सरोज अब विजय से ज्यादा अजय को

मानते हैं। गांव वाले भी अजय के आने पर ही घर आते और सबसे ज्यादा कविता को तब चोट लगी जब एक दिन अजय ने कहा बाबा मैंने शहर

में नया घर लिया है। आप सब मेरे साथ चलो। इतना बड़ा घर है कि सब आराम से रहेंगे। धर्मपाल और सरोज खुशी से तैयार हो गए।

विजय भी खुश था। लेकिन कविता चुप थी। उस रात उसने विजय को रोका। शहर जाकर क्या करेंगे? [संगीत] यहां खेती है, बच्चों का स्कूल है और शहर के खर्चे भी तो महंगे होते हैं।

पर भैया कह रहे हैं सब संभाल लेंगे। आज संभाल लेंगे, कल एहसान भी जताएंगे। विजय चुप हो गया। धीरे-धीरे उसे भी लगा कि

कविता शायद सही कह रही है। कुछ दिनों बाद धर्मपाल और सरोज शहर चले गए। अब रोज गांव में फोन आता और धर्मपाल खुशी-खुशी बताते।

अरे विजय यहां तो हर कमरे में एसी है। आज अजय हमें बड़ी होटल में खाना खिलाने ले गया। मीरा तो रोज नई चीज बनाती है। कल हम मुंबई

घूमने जा रहे हैं। विजय यह बातें आकर कविता को बताया और हर बार उसके चेहरे पर जलन और बढ़ जाती है। अब

उसे मीरा की अच्छाई भी दिखावा लगने लगी थी। वो रात में जाग कर सोचती। अगर मेरे हिस्से में यह सुख नहीं तो उनके हिस्से में भी नहीं रहेगा।

गांव में एक बूढ़ी औरत रहती थी। लोग कहते थे वो तंत्र मंत्र जानती है। कविता कई रात चुपके से उसके पास जाने लगी। धीरे-धीरे

उसने सीखना शुरू किया। बालों से वशीकरण खाने में मिलाने वाली राह, नींबू और धागे की क्रिया और तस्वीर पर किए जाने वाला

तंत्र। पहले उसे डर लगता था लेकिन जलन इंसान से वह सब करवा देती है जो वह कभी सोच भी नहीं सकता। कुछ महीनों [संगीत] बाद

एक दिन कविता अचानक बदली हुई दिखाई दी। उसने विजय से कहा भैया भाभी को गांव बुलवा लो। मां बाबा गए तब से वो यहां आए ही नहीं।

विजय खुश हो गया। उसे लगा आखिरकार कविता का मन बदल गया। लेकिन उसे क्या पता था?

उसकी पत्नी के मन में क्या चल रहा है? अजय

और मीरा गांव आए पूरा घर खुश था। कविता भी नकली मुस्कान के साथ उनकी सेवा कर रही थी।

लेकिन रात होते ही वो बदल जाती। एक रात जब सब सो गए। वो धीरे से अजय के कमरे में गई। उसने सोते हुए अजय के सिर से कुछ बाल

काटे। फिर उसके बटुए में एक छोटी पुड़िया रख दी। अगले दिन उसने अजय के खाने में राख मिलाई और मुस्कुराते हुए खाना परोसा।

भैया आपके लिए खास खीर बनाई है?

अजय मुस्कुरा कर खाने लगा और कविता चुपचाप उसे देखती रही। उसकी आंखों में अब इंसानी भाव नहीं बचे थे। इस बात की घर में किसी

को कोई खबर नहीं थी। [संगीत] कुछ दिन गांव में बिताने के बाद अजय वापस शहर लौट गया। शुरुआत के दो-तीन दिन सब

सामान्य रहा। फिर धीरे-धीरे सब बदलने लगा। पहले छोटे-छोटे झगड़े शुरू हुए। कभी मीरा से बहस तो कभी माता-पिता से अनबन। अजय खुद

समझ नहीं पा रहा था कि उसे इतनी जल्दी गुस्सा क्यों आने लगा है। एक रात मीरा ने उससे कहा, आप बहुत तनाव में रहने लगे हो। थोड़ा आराम कर लो।

अचानक अजय भड़क गया। तुम्हें लगता है मैं मेहनत नहीं कर रहा? सबको बस मेरी गलती दिखती है। मीरा चुप रह गई। धर्मपाल और

सरोज ने पहली बार अजय को इस तरह टूटते देखा था। लेकिन असली डर अभी शुरू हुआ था। कुछ ही हफ्तों में अजय का व्यापार डगमगाने

लगा। जो कस्टमर सालों से उसके साथ थे। अचानक काम रद्द करने लगे। किसी का पेमेंट अटक गया। किसी का माल वापस आ गया। एक बड़ा

कॉन्ट्रैक्ट जो लगभग पक्का हो चुका था। आखिरी समय पर टूट गया। बिजनेस पार्टनर भी अब उस पर शक करने लगे। अब अजय तुम्हारे

फैसले अब पहले जैसे नहीं रहे। तुम हर काम बिगड़ रहे हो। अजय पूरी रात फाइलों के सामने बैठा रहता। लेकिन उसका दिमाग जैसे

काम करना बंद कर चुका था। कई बार उसे लगता जैसे कोई उसके कान में फुसफुसा रहा हो। रात में अचानक उसकी नींद खुल जाती और उसे

लगता कमरे में कोई खड़ा है। उसकी अलमारी के पास कोई काली परछाई खड़ी थी। अजय घबरा कर उठा। लाइट जलाई लेकिन वहां कोई नहीं

था। धीरे-धीरे घर की हालत खराब होने लगी। लोन की किश्तें रुकने लगी। नौकर [संगीत] चले गए। बैंक से फोन आने लगे। एक दिन मीरा

ने डरते हुए पूछा। अगर अगले महीने भी पेमेंट नहीं हुआ तो क्या हमें घर छोड़ना पड़ेगा?

अजय ने कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि [संगीत] उसे खुद भी यही डर सताने लगा था। धर्मपाल और सरोज रोज गांव फोन करके विजय को सारी बातें बताने लगे।

पता नहीं क्या हो गया है अजय को। काम कम होता जा रहा है। घर में हर वक्त तनाव रहता है। अगर ऐसे ही चलता रहा तो शायद घर भी बेचना

पड़े। विजय यह सब सुनकर परेशान हो जाता। लेकिन जब उसने यह बातें कविता को बताई तो उसके चेहरे पर एक [संगीत] अजीब सी शांति आ गई। उसने मन ही मन सोचा

तो आखिर असर शुरू हो गया। उस रात कविता ने विजय से कहा मुझे लगता है भैया पर कोई बुरी नजर है। उन्हें गांव बुलाओ। यहां तांत्रिक इलाज करवाना पड़ेगा।

तुम्हें सच में ऐसा लगता है?

भगवान नाराज हुए होंगे। इतनी जल्दी कोई इंसान ऐसे नहीं टूटता। विजय को उसकी बात सही लगी। उसने अजय को फोन किया।

भैया कुछ दिन गांव आ जाओ। यहां मन भी शांत हो जाएगा। टूटा हुआ अजय तुरंत मान गया। इस

बार कविता पूरी तैयारी में थी। रात को जब सब सो जाते वो चुपके से मंदिर के पीछे जाती। काला कपड़ा बिछाती। अजय की तस्वीर

रखती और उसके ऊपर सरसों का तेल टपकाती। फिर उसके पुराने बाल और बटुए से निकाला गया कागज एक काले धागे में बांधती और

धीरे-धीरे मंत्र पढ़ती। इसका भाग्य ऊंचा है। वो नीचे गिरे। इसका

घर रोशन है। उसका दीप बुझ जाए। हर रात के बाद अजय और कमजोर होने लगा। गांव से शहर लौटते ही वो बुरी तरह बीमार

पड़ गया। उसे तेज बुखार रहने लगा। डॉक्टरों को कुछ समझ नहीं आ रहा था। रिपोर्ट नॉर्मल थी लेकिन अजय की हालत

बिगड़ती जा रही थी। वो रात में अचानक उठकर बैठ जाता और खाली दीवार को घूरने लगता। एक रात मीरा ने उसे नींद में बोलते हुए सुना।

मुझे मत बुलाओ। मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा? मुझे मत बुलाओ। मैंने क्या

तुम्हारा? मुझे मत बुलाओ। मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा? मीरा डर गई। अब सरोज को कुछ अजीब लगने लगा था। उन्होंने गौर

किया। अजय की हालत हर बार गांव से लौटने के बाद ही बिगड़ती है। पहले व्यापार अब तबीयत। एक दिन उन्होंने विजय को फोन किया। सच-सच बता। गांव में तुम लोग क्या कर रहे

हो?

क्या मतलब मां?

पिछली बार गांव आया तो उसका काम बिगड़ा। इस बार आया तो उसकी तबीयत खराब हो गई। विजय खुद डर गया। उसे समझ नहीं आ रहा था।

आखिर क्या हो रहा है? उसने सारी बातें आकर कविता को बताई। कविता का चेहरा एक पल के लिए उतर गया। पहली बार उसे डर महसूस हुआ

क्योंकि अब शक शुरू हो चुका था। सरोज की बातें सुनकर कविता अंदर से हिल गई थी। उसे समझ आ गया था कि अब बात सिर्फ बीमारी और

नुकसान तक नहीं रही। अब शक उस तक पहुंचने लगा है। उसने उसी वक्त सरोज को फोन लगाया। फोन उठते ही उसकी आवाज गुस्से से [संगीत] कांप रही थी।

अगर आपको गांव नहीं आना तो मत आइए। लेकिन मेरे और मेरे पति पर ऐसे इल्जाम मत लगाइए। मैंने किसी का नाम नहीं लिया कविता। पर इशारा तो हमारी तरफ ही था ना। हम क्या

अपने ही परिवार को बर्बाद करेंगे?

सरोज कुछ पल चुप रही। उसके दिमाग में पुरानी बातें घूमने लगी। कविता की मां हंसिका। गांव में लोग उसके बारे में

क्या-क्या बातें करते थे। कहते थे उसे तंत्रमंत्र आता था। उसने अपने ससुराल के लोगों को धीरे-धीरे अपने वश में कर लिया

था। फिर एक-एक करके उनकी जमीन, दुकान और संपत्ति सब उसके नाम हो गई। लेकिन हंसिका

की सबसे खतरनाक बात यह थी कि बाहर के लोगों के सामने वो बहुत अच्छी और सीधी औरत बनकर रहती थी। सरोज भी उसकी मीठी बातों

में आ गई थी और बिना ज्यादा सोचे उसकी बेटी कविता की शादी विजय से करवा दी थी। अब उसे अपनी वही गलती याद आ रही थी। उस

रात सरोज ने फैसला कर लिया। वो अजय को फिर गांव लेकर जाएगी। लेकिन इस बार सीधे मंदिर। उसने धर्मपाल को सारी बात बताई।

मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा। तुम घर पर रहो। मीरा और आर्यन का ध्यान रखना। मैं अजय को लेकर गांव जा रही हूं। धर्मपाल भी अब डर चुका था। उसने बिना सवाल

किए सरोज की [संगीत] बात मान ली। सबसे बड़ी बात सरोज ने विजय और कविता को कुछ नहीं बताया। [संगीत] अगले ही दिन वह अजय

को लेकर गांव निकल गए। गांव से थोड़ी दूर पुराने जंगल के बीच एक प्राचीनस मंदिर था। वहां रहते थे स्वामी महाराज। लोग कहते थे

उन्होंने कई ऐसे लोगों को ठीक किया था जिन पर कुछ किया गया हो। सरोज सीधे अजय को लेकर वहीं पहुंची। मंदिर के अंदर घंटियों

की धीमी आवाज गूंज रही थी। अगरबत्ती की खुशबू हवा में फैली थी। स्वामी महाराज आंखें बंद किए बैठे थे। सरोज ने बैठते ही

पूरी कहानी सुना दी। अजय चुपचाप बैठा रहा। महाराज अगर मेरे बेटे पर किसी ने कुछ किया

है तो उसे देखिए और उसे बचा लीजिए। स्वामी जी कुछ देर शांत बैठे रहे। फिर धीरे से बोले कल सुबह इसे लेकर तुम्हारे गांव के

मंदिर आना। उस रात सरोज पड़ोस के गांव में अपनी एक पुरानी सहेली के घर रुक गई। अजय को अभी भी समझ नहीं आ रहा था। उसे बस इतना

लग रहा था कि उसकी मां बहुत डरी हुई है। वो अपनी मां के खातिर सब मान रहा था।

लेकिन रात में उसे फिर वही सपने आने लगे। एक काली परछाई जो उसके कान में फुसफुसा रही थी। तू

बच नहीं पाएगा। [कराहने की आवाज़] अजय अचानक पसीने से भीगा उठ बैठा। अगली सुबह दोनों मंदिर पहुंचे। अजय मंदिर की

सीढ़ियों तक गया। लेकिन जैसे ही अंदर भगवान की मूर्ति देखी उसके कदम रुक गए।

उसका चेहरा अचानक बदलने लगा। मां मुझे अंदर नहीं जाना। चलो यहां से। सरोज का दिल

धड़क उठा। यह वही अजय था जो रोज पूजा किए बिना घर से नहीं निकलता था। आज वो भगवान से मुंह फेर रहा था। सरोज ने तुरंत स्वामी

जी को आवाज लगाई। महाराज यह मंदिर के अंदर आने से मना कर रहा है। स्वामी जी समझ गए। उन्होंने पास रखी राख

उठाई और अजय के माथे पर लगा दी। अगले ही पल अजय का शरीर जोर से कांप उठा। जैसे उसे बिजली का झटका लगा हो। वो पीछे गिर पड़ा

और जोर-जोर से सांस लेने लगा। मंदिर के अंदर बैठे लोग डर गए। स्वामी जी की आंखें

गंभीर हो गई। इस पर कुछ किया गया है। सरोज की आंखों से आंसू निकल पड़े और जिसने किया

है वो कोई अपना ही है। उसे इसकी तरक्की, इसकी खुशी और इसके परिवार से जलन है। सरोज

का दिमाग सीधे कविता की तरफ गया। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। स्वामी जी ने अगले दिन विशेष पूजा रखी। सुबह से ही

मंदिर में तैयारी शुरू हो गई। हवन कुंड बनाया गया। गंगाजल, कपूर, पीली सरसों और

पवित्र राख रखी गई। अजय को हवन के सामने बैठाया गया। जैसे ही मंत्र शुरू हुए, अजय

बेचैन होने लगा। उसकी सांसे तेज हो गई। अचानक वह जोर से चिल्लाया। बंद करो ये सब। मुझे यहां नहीं बैठना। उसने उठने की कोशिश

की। लेकिन दो लोगों ने उसे पकड़ लिया। कुछ देर बाद वो अचानक हवन कुंड की तरफ झपटा। जैसे आग बुझाना चाहता हो। उसने कई बार हवन

की लकड़ियां उठाकर फेंकने की कोशिश की। उसकी आंखें लाल हो चुकी थी और वह भारी आवाज में गुर्राने लगा था। मंदिर में

मंत्रों की आवाज लगातार गूंज रही थी। हवन की आग अब तेज हो चुकी थी। अजय जमीन पर

बैठा बुरी तरह कांप रहा था। कभी वह चीखता, कभी हंसने लगता और कभी अचानक रोने लगता। मंदिर में बैठे लोग डर चुके थे। स्वामी

महाराज लगातार मंत्र पढ़ रहे थे। उनकी आवाज भारी होती जा रही थी। फिर उन्होंने

हवन से राख उठाई और सीधे अजय के सिर पर डाल दी। अगले ही पल अजय जोर से चीखा।

ऐसा लगा जैसे उसके अंदर से कोई चीज बाहर निकल रही हो। उसका शरीर एकदम अकड़ गया।

आंखें पलट गई और अगले ही पल वह जमीन पर गिर पड़ा। पूरा मंदिर कुछ सेकंड के लिए शांत [संगीत] हो गया। फिर अजय धीरे-धीरे

सामान्य सांस लेने लगा। उसकी आंखों से पानी बहने लगा था। और आंखें सामान्य होने

लगी थी। वो कमजोर आवाज में बोला, मां सरोज रोते हुए उसके पास बैठ गई।

स्वामी महाराज ने गहरी सांस ली। बंधन टूट चुका है। अब यह सुरक्षित है। लेकिन

उन्होंने जाते-जाते एक और बात कही। जिसने यह किया है, उसका अंत अच्छा नहीं होगा। अगले दिन सरोज अजय को लेकर गांव के घर

पहुंचे। घर में कदम रखते ही उसने सीधे कविता को आवाज दी। कविता बाहर आई। लेकिन सरोज की आंखें देखकर ही उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

क्यों किया था तूने यह सब? क्या बिगाड़ा

था अजय ने तेरा?

कविता तुरंत मुकर गई। मैंने कुछ नहीं किया। आप लोग मुझे फंसा रहे हो। लेकिन इस बार विजय भी वहां खड़ा था। उसके

चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा था। वो धीरे-धीरे कविता के पास आया। गुड़िया की कसम खाकर बोल सच क्या है?

यह सुनते ही कविता के आंखों में डर उतर आया। कुछ पल तक वो चुप रही। फिर उसकी आंखों [संगीत] से आंसू निकलने लगे और

आखिरकार वो टूट गई। मैंने किया। मुझे जलन होती थी। सब अजय भैया की तारीफ करते थे। मां बाबा पूरा

गांव भी मैं नहीं सह पाई। आप सब लोग जैसे विजय को भूल ही गए। क्या सिर्फ अजय ही आपका बेटा है और विजय जैसे कोई नहीं।

फिर उसने सब बता दिया। कैसे उसने तंत्र सीखा। कैसे उसने बाल लिए? कैसे खाने में राख मिलाई और कैसे रात भर क्रियाएं की। और

कैसे वो अजय को बर्बाद होते देख खुश होती रही। घर में सन्नाटा फैल गया। विजय की आंखों में आंसू आ गए। उसे यकीन नहीं हो

रहा था कि जिस औरत के साथ उसने पूरी जिंदगी बिताई वो इतनी गिर सकती है। अचानक विजय पागलों की तरह रसोई की तरफ भागा।

उसने दराज से चाकू निकाला और सीधे कविता की तरफ बढ़ा। तूने मेरे भाई की जिंदगी बर्बाद कर दी। मैं तुझे जिंदा नहीं

छोडूंगा। कविता डर कर पीछे हटने लगी। तभी अजय ने दौड़कर विजय को पकड़ लिया। नहीं

विजय बस कर और पाप मत कर। विजय फूट-फूट कर रोने लगा। उस दिन उसका परिवार पूरी तरह

टूट चुका था। उसके बाद विजय ने फैसला कर लिया। वह कविता के साथ नहीं रहेगा। वो गुड़िया को लेकर अजय और सरोज के साथ शहर

चला गया। कविता उस पुराने गांव वाले घर में अकेली रह गई। अब ना कोई उससे बात करता था, ना कोई उसके घर आता था। रात होते ही

उसे वही आवाजें सुनाई देती जो वह क्रियाओं के वक्त सुना करती थी। कभी उसे लगता कोई आंगन में चल रहा है। कभी उसके कमरे में

काले साए घड़े दिखाई देते और कई रात उसे ऐसा लगता जैसे कोई उसके कान में फुसफुसा आ रहा हो।

अब तेरी बारी है। कुछ ही दिनों में गांव वालों ने उसके घर से बदबू आने की शिकायत की। जब दरवाजा

तोड़ा गया तो कविता अंदर मृत्यु मिली। उसके सामने वही काला कपड़ा पड़ा था और उसके ऊपर जला हुआ नींबू। गांव में आज भी

लोग कहते हैं जिस घर में लालच और काला जादू साथ आ जाए वहां इंसान नहीं बचते। सिर्फ बर्बादी बचती

Loading...

Loading video analysis...