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KRISHNA SUDAMA MILAN — From Nothing to Everything in One Night | EPIC SHORT FILM

By Sarvatra Hindutva

Summary

Topics Covered

  • मित्र को बचाने श्राप अपने ऊपर ले लिया
  • त्रिलोकीनाथ ने अपने हाथों से पैर धोए
  • बिना माँगे ही मिल गया सब कुछ
  • सच्चा प्यार हिसाब नहीं रखता

Full Transcript

जरा सोचिए एक ऐसा राजा जिसके पास सोने के महल हो जिसके सामने बड़े-बड़े राजा भी छोटे लगे जिसकी एक मुस्कान [संगीत] के लिए

लोग तरसते हो वो राजा अपनी कुर्सी छोड़कर बिना मुकुट के बिना जूते पहने नंगे पैर दौड़ पड़े और यह दौड़ किसी सेना के लिए

नहीं किसी बड़े मेहमान के लिए नहीं बल्कि एक ऐसे ऐसे आम इंसान के लिए जिसके कपड़े फटे हो, जिसके पैरों में कांटे चुभे हो और

जिसके पास बस मुट्ठी भर सूखा चूड़ा हो। [संगीत] यह कोई कहानीकार की कल्पना नहीं है। यह सच्ची कहानी है उस दोस्ती की जिसे सुनकर

आज भी इतने [संगीत] साल बाद भी हर इंसान का दिल भर आता है। यह कहानी है द्वारका के राजा श्री कृष्ण और एक गरीब ब्राह्मण

सुदामा की। पर इसे पूरा समझने के लिए हमें बहुत पीछे चलना होगा। उस समय में जब ना कोई राजा था, ना कोई गरीब, ना कोई [संगीत]

द्वारका, ना कोई झोपड़ी। बस दो बच्चे थे और एक गुरुकुल था जहां इस अमर दोस्ती की नींव पड़ी थी। उज्जैन के पास घने जंगलों

के बीच ऋषि सादीपनी का आश्रम था। यहां ना कोई राजकुमार था, ना कोई आम बच्चा। सब एक साथ बैठते, एक साथ सोते, एक [संगीत] ही

गुरु से पढ़ते। यहीं पढ़ने आए थे यदुवंशी कृष्ण और बलराम और साथ ही एक बहुत गरीब लेकिन [संगीत] तेज

दिमाग वाला ब्राह्मण का बेटा सुदामा। कृष्ण स्वभाव से बहुत चंचल थे। सुबह गुरु माता के लिए लकड़ियां इकट्ठा

करना, शाम को गायों को चराना और बीच-बीच में वही [संगीत] पुरानी आदतें जो वे वृंदावन से साथ लाए थे। पड़ोस के घरों से माखन चुराना।

[हंसी] [संगीत] [संगीत] मटकी फोड़ना, आम के पेड़ों पर चढ़ जाना। गुरुजन कभी गुस्सा होते पर ज्यादातर बार

उनकी मासूम मुस्कान देखकर खुद भी मुस्कुरा देते। सुदामा का स्वभाव बिल्कुल अलग था। शांत, गंभीर, पढ़ाई में मन लगाने वाला। पर जब भी

कृष्ण कोई शरारत करते, सुदामा उन्हें रोकने नहीं जाते थे। वे चुपचाप पास खड़े रहते और जब सजा मिलने की बारी आती, तो

दोनों साथ खड़े होकर उसे स्वीकार करते। एक ही थाली में खाना, एक ही जगह सोना, एक ही गुरु से सीखना दोनों के बीच कोई फर्क नहीं

रह गया था। एक दिन गुरु माता ने कृष्ण और सुदामा को जंगल से सूखी लकड़ियां लाने भेजा। लकड़ियां बिनते-बीनते दोनों घने जंगल में

काफी दूर निकल गए। [संगीत] अचानक आसमान में काले बादल छा गए। भयंकर आंधी चलने लगी और देखते ही देखते मूसलाधार

बारिश शुरू हो गई। चारों तरफ गुप अंधेरा छा गया। रास्ता भटक चुके दोनों मित्रों को बार और जंगली जानवरों से बचने के लिए एक

बड़े से पेड़ की डाल पर चढ़कर रात गुजारनी पड़ी। रात भर चलने वाली उस ठंडी हवा और बारिश में दोनों बुरी तरह भीग कर कांप रहे थे। [संगीत]

गुरु माता ने उन्हें रास्ते के लिए एक पोटली में कुछ भुने हुए चने दिए थे। भूख लगने पर दोनों बांट कर खा लेना।

लेकिन उन चनों के पीछे एक ऐसा गहरा रहस्य था [संगीत] जिसे आज भी बहुत कम लोग जानते हैं। दरअसल वे चने आश्रम के नहीं थे। कुछ

चोरों ने एक अत्यंत गरीब और बेसहारा बुढ़िया की झोपड़ी से चनों की वो पोटली चुरा ली थी। अपना आखिरी निवाला छिन जाने पर उस रोती बिलखती बुढ़िया ने श्राप दिया

था। जिसने भी मेरा यह भोजन चुराया है, जो कोई भी इन चनों को खाएगा, वो जीवन भर घोर दरिद्रता भोगेगा। जब चोरों ने देखा कि

पोटली में कोई कीमती धन नहीं केवल भुने हुए चने हैं, तो वे झल्लाहट में उस पोटली को महर्षि सांदीपनी के आश्रम में फेंक कर भाग गए। गुरु माता ने अनजाने में वही

श्रापित [संगीत] चों की पोटली सुदामा को दे दी थी। सुदामा जन्म से ही ब्रह्म ज्ञानी थे। [संगीत] उन्हें उन जनों पर लगे उस भयंकर श्राप का आभास हो गया था।

पेड़ पर बैठे-बैठे जब कृष्ण ने ठंड से ठिठुरते हुए पूछा, सखा सुदामा मुझे बड़ी जोरों की भूख लगी है। क्या गुरु माता ने कुछ खाने को दिया

था?

यह सुनकर [संगीत] सुदामा का हृदय कांप उठा। उनके मन में एक ही विचार आया। अगर मैंने यह चने अपने सखा को खिलाए तो त्रिलोकीनाथ को दरिद्रता का श्राप लग

जाएगा। मैं अपने प्रिय मित्र को गरीबी के इस दलदल में कैसे धकेल सकता हूं?

सुदामा अंधेरे में चुपचाप चने चबाने लगे। जब कृष्ण ने चने चबाने की आवाज सुनकर पूछा कि मित्र यह कट कट की आवाज कैसी आ रही है? तो

सुदामा ने वार टालते हुए कहा कुछ नहीं [संगीत] बस ठंड के कारण मेरे दांत किटकिटा रहे हैं मित्र

उस रात सुदामा ने अपने सखा को श्राप से बचाने के लिए वे सारे श्रापित चने अकेले ही खा लिए। उन्होंने अपने परम मित्र के सुरक्षित भविष्य के लिए जीवन भर की भयंकर

गरीबी अपने नाम कर ली। यह केवल चने खाने की घटना नहीं थी बल्कि मित्रता के इतिहास का सबसे बड़ा त्याग था। समय रेत की तरह

मुट्ठी से फिसलता गया। सांदीपनी आश्रम की शिक्षा पूरी हुई [संगीत] और विदाई की उस बेला ने दो अभिन्न मित्रों को बिल्कुल अलग

रास्तों पर लाकर खड़ा कर दिया। एक तरफ सुदामा थे और दूसरी तरफ थे श्री कृष्ण जो नियति के चक्र को घुमाते हुए

अंततः समुद्र के सीने पर बसी स्वर्ण नगरी द्वारका के अधिपति बने। [संगीत] अब वे वृंदावन वाले केवल कान्हा नहीं रहे।

वे बन चुके थे द्वारकाधीश। जिनके ऐश्वर्य, [संगीत] ठाटबाट और पराक्रम की गूंज दूर-दूर के साम्राज्यों तक पहुंचने लगी [संगीत] थी।

और सुदामा सुदामा अपने छोटे से गांव लौट आए। वहां इंतजार में थी एक टूटी फूटी झोपड़ी, एक भली पत्नी सुशीला और कुछ छोटे-छोटे

बच्चे जिनकी आंखें हर शाम अपनी मां से खाना मांगती थी। सुदामा का यह नियम था कि वे सिर्फ एक ही

घर पर भिक्षा मांगेंगे। जो मिल जाए उसी में संतोष। ना मिले तो भी कोई शिकायत नहीं। [संगीत] वे शास्त्रों के बहुत बड़े जानकार थे। पर दुनिया की नजर में बिल्कुल

गरीब। फिर भी एक बात थी जो सुदामा को सबसे अलग बनाती थी। जब भी कहीं से कृष्ण का नाम सुनाई पड़ता सुदामा के होठों पर अपने आप

एक मुस्कान आ जाती। कंस मारा गया। सुदामा मुस्कुराए। कृष्ण द्वारका के राजा बने। सुदामा मुस्कुराए। महाभारत की लड़ाई में

जब कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया तो दूर बैठे सुदामा की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। वे अपने दोस्त की हर खुशी को अपनी

खुशी मानते थे और मन ही मन कहते कान्हा तुम कितने आगे निकल गए पर मेरे दिल में तुम आज भी वही चंचल बच्चे हो जो रात

भर मुझे अपने सीने से लगाए बैठा रहा था फिर आई वो रात जिसने सुदामा की जिंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल दी उस दिन घर में

चूल्हा नहीं जला था दिन भर भिक्षा में कुछ नहीं मिला था बच्चे भूखे भूखे पेट ही सो गए। सुशीला जिन्होंने सालों से कभी एक

शब्द शिकायत का नहीं बोला था। उस रात अंदर ही अंदर टूट गई। [रोने की आवाज़] [संगीत]

स्वामी आपके बचपन के दोस्त द्वारका के राजा हैं और आपके [संगीत] अपने बच्चे भूखे सो रहे हैं।

क्या यह सही है कि आप अपनी मर्यादा के पीछे अपने बच्चों की भूख को भूल जाएं?

सुदामा ने कोई जवाब नहीं दिया। वे सामने रखी भगवान विष्णु की छोटी मूर्ति को टकटकी लगाकर देखते हैं। उनके मन में बार-बार एक

ही ख्याल आता था। इंसान को किस्मत से ज्यादा कभी नहीं मिलता। तो फिर किसी से कुछ मांगना ही क्यों? पर उस रात सोए हुए बच्चों के मासूम भूख से कुमलाए चेहरे

देखकर सुदामा के अंदर [संगीत] कुछ टूट गया। एक पिता टूट गया। एक पति टूट गया और आखिरकार उन्होंने फैसला किया वे द्वारका

जाएंगे अपने बचपन के दोस्त कृष्ण से मिलने। पर तुरंत एक सवाल उठा कृष्ण के लिए तोहफा क्या ले जाएं? सुदामा ने सुशीला से कहा

मैंने सोचा था माखन ले चलूं। कृष्ण को बचपन में माखन बहुत पसंद था। पर

बात वहीं रुक गई। घर में माखन कहां था?

सुशीला कुछ देर चुप रही। फिर चुपचाप उठी, पड़ोसी के दरवाजे तक गई और [संगीत] झिझकते हुए मुट्ठी भर चिवड़ा

मांग लाईं। उसमें से आधा बच्चों के लिए रख दिया और बाकी आधा एक पुराने लाल कपड़े की पोटली [संगीत] में बांधकर सुदामा के हाथों में रख दिया।

यही है हमारा तोहफा स्वामी। इसे अपने दोस्त को जरूर देना। चाहे यह कितना भी छोटा क्यों ना लगे इसमें मेरे हाथों का

प्यार है। सुदामा ने वो छोटी सी पोटली अपने हाथों में पकड़ी। मन ही मन सोचा कहां द्वारका का इतना बड़ा ठाट बाट [संगीत]

और कहां यह सूखा चिवड़ा शायद दरवाजे पर खड़ा पहरेदार भी इसे लेने लायक ना समझे। पर उस पोटली में पत्नी का बिना कहा प्यार था। इसलिए [संगीत] सुदामा ने उसे अपनी

झोली में बड़े प्यार से रख लिया। [संगीत] सुबह हुई और सुदामा चल पड़े। नंगे पैर, फटे कपड़े,

कंधे पर एक मैली झोली और दिल में सालों पुरानी मीठी यादें। 22 दिनों की यह यात्रा आसान नहीं थी। तपती

[संगीत] रेत पर जलती दोपहरी में भूखे प्यासे सुदामा लगातार चलते रहे। पैरों में कांटे चुबते तलवों से खून

निकलता पर सुदामा रुके नहीं। हर कदम के साथ मन में बस एक ही आवाज गूंजती रहती। कृष्ण से मिलना है। कृष्ण से मिलना है।

रास्ते में कई बार पैर लड़खड़ाए। कई बार लगा कि अब शरीर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाएगा। पर जब भी सुदामा थक कर बैठने लगते

उन्हें याद आ जाते गुरुकुल के वे दिन। वो बारिश की रात जब कृष्ण उनके सीने से लगकर सोए थे। वो पल जब उन्होंने चुपचाप वे

श्रापित चने अकेले खा लिए थे और यह याद उन्हें फिर से खड़ा कर देती। 22 दिनों के बाद आखिरकार सुदामा द्वारका

[संगीत] के बड़े दरवाजे पर आ पहुंचे। जिस नगरी के बारे में उन्होंने सिर्फ सुना था, वो आज उनकी आंखों के सामने [संगीत] थी।

सोने के बड़े-बड़े भवन, रत्नों से सजी ऊंची [संगीत] दीवारें, रेशमी कपड़ों में सजे लोग और दूर क्षितिज

पर दिखता कृष्ण का शानदार राजमहल। सुदामा के [संगीत] पैर वहीं रुक गए। मन में एक तूफान उठा। यहां मुझे कौन [संगीत] पहचानेगा?

मैं किस मुंह से कहूं कि मैं खुद राजा का बचपन का दोस्त हूं। वे महल की तरफ नहीं बढ़े। उनके पैर अपने आप समुद्र तट की तरफ

मुड़ गए। सुदामा वहीं तट पर बैठ गए। रात बहुत [संगीत] अंधेरी थी। लहरें ऊंची उठकर किनारे से टकरा रही थी और मन में ढेरों सवाल उठ रहे थे।

क्या कान्हा इतने सालों बाद इस गरीब हालत में मुझे पहचान भी पाएंगे? कहीं उनके

[संगीत] पहरेदार मुझे भिखारी समझ कर वापस ना भेज दें। पर एक बात पक्की थी। गुरुकुल में जो प्यार

पैदा हुआ था वो कभी नहीं मरा। सुदामा के दिल में कृष्ण आज भी वही थे। वही चंचल बच्चे जो भूख लगने पर जंगल से तोड़े फल

बांटकर खाता था। जो आधी रात को उठकर दोस्त के लिए पानी ले आता था। [संगीत] सुदामा पूरी रात उसी तट पर बैठे रहे। लहरें आती

रही, लौटती रही और सुबह होते-होते उन्होंने मन में पक्का इरादा किया।

एक बार कोशिश तो करूंगा ही चाहे नतीजा कुछ भी हो। राजमहल के बड़े दरवाजे पर एक लंबी लाइन लगी थी। अमीर व्यापारी, दूर देशों से आए

दूत, कवच पहने सेनापति [संगीत] और सबसे आखिर में एक बहुत मैले कपड़े पहने थका हारा ब्राह्मण। घंटों बीत गए। दोपहर

का सूरज सिर पर आ गया। जब आखिरकार सुदामा की बारी आई, पहरेदार ने उन्हें ऊपर से [संगीत] नीचे तक शक भरी नजर से देखा।

किससे मिलना है तुम्हें?

कान्हा से श्री कृष्ण से। वे वे मेरे बचपन के दोस्त हैं। क्या श्री कृष्ण [हंसी]

सुदामा की आंखों में आंसू आ गए पर उन्होंने अपने चेहरे पर मुस्कान बनाए रखी। [संगीत] वही धैर्य जो उन्होंने हमेशा रखा था। अच्छा

ठीक है। तुम्हारा संदेश अंदर भिजवा देता हूं। देखते हैं महाराज क्या कहते हैं। जाओ महाराज तक यह संदेश पहुंचाओ। [संगीत]

उस समय कृष्ण राजसभा में सोने के सिंहासन पर बैठे थे। मंत्रियों के साथ राजकाज में व्यस्त। [संगीत]

महाराज दरवाजे पर एक आदमी खड़ा है। उसके कपड़े बहुत मैले हैं। पैर नंगे हैं। शरीर कमजोर है। वह कहता है उसका नाम सुदामा है और वह खुद को आपका बचपन का दोस्त बताता है।

[गहरी सांस लेने की आवाज़][अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] यह नाम सुनते ही कृष्ण की आंखों में एक ऐसी अनोखी चमक आ गई जो उस सभा में पहले कभी किसी ने नहीं देखी थी। वे एक पल के

लिए हैरान रह गए। फिर अगले ही पल सिंहासन से उठ खड़े हुए। ना मुकुट संभाला, [चीखने की आवाज़]

ना जूते पहने, वे दौड़ पड़े जैसे सालों का इंतजार अब और सहा ना जाए। [चीखने की आवाज़]

पूरी राजसभा यह नजारा देखकर हैरान रह गई। सब ने कृष्ण को कई रूपों में देखा था। एक बेजोड़ योद्धा के रूप में, एक होशियार

राजनेता के रूप में, एक शानदार राजा के रूप में। पर इस तरह एक बहुत मामूली गरीब दिखने वाले आदमी के लिए नंगे पैर दौड़ते

हुए उन्होंने कृष्ण को कभी नहीं देखा था। [संगीत] [गाना गाने की आवाज़] [संगीत] सुदामा सालों बाद मिले दो दोस्त उस गले मिलने में

देर तक खड़े रहे और उन पलों में सालों की दूरी, सारा भेदभाव, सारा अमीरी गरीबी, सब कुछ एक पल में मिट गया।

कृष्ण सुदामा का हाथ पकड़े, उन्हें अपने निजी कमरे में ले गए। महारानी रुक्मणी पहले से ही वहां उपस्थित

थी। उन्हें इस खास दोस्ती के [संगीत] बारे में पहले से पता था और वे स्वागत की तैयारियों में जुट गई। [संगीत]

एक नौकर सोने की थाली और पानी लेकर आया सुदामा के पैर धोने के लिए। पर कृष्ण ने हाथ उठाकर नौकर को रोक दिया और खुद भूमि पर बैठ गए। तीनों लोकों के मालिक

द्वारकाधीश कृष्ण ने अपने ही हाथों से [संगीत] अपने दोस्त के पैर धोने शुरू किए। [चीखने की आवाज़] जब कृष्ण ने उन पैरों को पास से देखा, 22 दिनों की नंगे पैर यात्रा

से छिले हुए, जगह-जगह कांटों से बंधे हुए, सूखे खून के निशानों [संगीत] से भरे। [चीखने की आवाज़] उनकी आंखें भर आई।

उन्होंने वो पानी अपने माथे पर लगाया जैसे वो कोई आम पानी ना होकर सच में किसी तीर्थ का पानी हो।

क्या यू मैं ही हूं धन्यवाद कान्हा मुझे इतने सुंदर वस्त्र देने के लिए। [संगीत]

शाम होते-होते दोनों दोस्त साथ बैठे। गुरुकुल की पुरानी बातें की। कभी जोर से हंसे, कभी पुरानी यादों में आंसू बहाए।

कृष्ण बार-बार प्यार से पूछते रहे। दोस्त, घर पर सब ठीक तो है? भाभी ठीक है? बच्चों

को कोई तकलीफ तो नहीं?

सुदामा हर बार मुस्कुरा कर बाट टाल जाते। वे मांगने ही तो आए थे पर आखिरी पल तक मांग नहीं पाए क्योंकि वे इस पवित्र दोस्ती [संगीत] में स्वार्थ की एक बूंद भी

नहीं मिलाना चाहते थे। उनका मन बार-बार यही कहता रहा जो प्यार आज मिला है वही मेरे लिए सबसे बड़ा खजाना है। तभी कृष्ण

की नजर सुदामा की झोली में बंधी एक छोटी मैली सी लाल पोटली पर पड़ी। मुस्कुराते हुए [संगीत] बच्चों जैसी शरारत के साथ कृष्ण ने पूछा, दोस्त, यह क्या है? भाभी

ने मेरे लिए कुछ भेजा है क्या?

सुदामा घबरा गए। पोटली को छुपाने की कोशिश की। उन्हें झिझक थी कि इतना छोटा तोहफा द्वारकाधीश के सामने कैसे रखें? पर कृष्ण

कहां मानने वाले थे? उन्होंने जिद करके वो पोटली छीन ली। खोली और अंदर सूखा चिवड़ा देखते ही उनकी आंखों [संगीत] से आंसू बह निकले। उन्होंने

एक मुट्ठी उठाकर खाई। हम बड़े स्वाद से दूसरी मुट्ठी उठाई और जब तीसरी मुट्ठी की तरफ हाथ बढ़ाया तब

रुक्मणी ने आगे बढ़कर धीरे से कृष्ण का हाथ पकड़ लिया और प्यार से कहा प्रभु थोड़ा हमारे और [संगीत] दुनिया के लिए भी बचा रहने दीजिए। कृष्ण मुस्कुराए और बाकी बची पोटली

रुक्मणी को सौंप दी। रुक्मणी ने राहत की सांस ली जैसे उन्होंने तीनों लोकों की पूरी दौलत उस पल लूटने से बचा ली हो। वो चेवड़ा असल में एक पत्नी का बिना कहा

[संगीत] प्यार था जिसे झिझकते हुए पड़ोसी से मांग कर लाया गया था। उसमें ना कोई खास खुशबू थी [संगीत] ना कोई मिठास। पर उसमें बिना किसी स्वार्थ का भाव और पूरा समर्पण

था और भगवान को इसके अलावा और कुछ नहीं चाहिए था। [संगीत] देखते ही देखते 15 दिन बीत गए।

कृष्ण रोज सुदामा को रोकते रहे और सुदामा अपने दोस्त की बात टाल नहीं पाए। रुकते रहे। पर एक दिन उन्हें वापस जाना ही था।

घर पर इंतजार करता परिवार था। विदाई के उस पल में कुछ भी खास नहीं हुआ। ना कृष्ण ने साफ-साफ कुछ दिया ना सुदामा ने कुछ मांगा। [संगीत]

[संगीत] सुदामा [संगीत] वैसे ही चल पड़े जैसे आए थे। वही फटे कपड़े, वही नंगे पैर, वही मैली [संगीत] झोली। पर इस बार उनका दिल

भरा हुआ था। कृष्ण के अपार प्यार से, गुरुकुल की यादों से, उस गले मिलने की गर्माहट से। रास्ते में चलते-चलते वे बार-बार सोचते रहे। [संगीत] मैंने कुछ

नहीं मांगा। फिर भी जैसे सब कुछ मिल गया। कृष्ण की वो मुस्कान वही तो मेरी सच्ची दौलत है। जब सुदामा अपने गांव की जानी

पहचानी गली में पहुंचे तो वे हैरान होकर रुक गए। वहां अब वो टूटी फूटी झोपड़ी नहीं थी।

उसकी जगह एक शानदार सोने जैसी चमकती छत वाला घर खड़ा था। सुंदर बगीचा, [संगीत] बहता हुआ तालाब

और अच्छे कपड़े पहने हंसते खेलते बच्चे। [हंसी] [रोने की आवाज़] सुशीला दौड़ती हुई बाहर आई।

उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे। उन्होंने कांपती आवाज में कहा। स्वामी द्वारका से कुछ लोग आए थे। सिर्फ 15 दिनों में यह सब कुछ [संगीत] बन गया।

पर आपने तो कभी कुछ मांगा ही नहीं था। सुदामा की आंखों में आंसू आ गए। पर होठों पर वही पुरानी शांत मुस्कान थी। [संगीत] उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे बस आसमान की

तरफ देखते रहे और मन ही मन बोले कान्हा तुमने मुझे बिना मांगे ही सब कुछ दे [संगीत] दिया। बिल्कुल वैसे ही जैसे गुरुकुल में मैंने तुम्हें बिना बताए वो

सब बचाया था। यह अमर कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्ची दोस्ती ना पैसा देखती है ना पद ना हालात।

वो सिर्फ दिल देखती है। सुदामा ने [संगीत] जिंदगी भर कभी कुछ नहीं मांगा। गुरुकुल में अपने दोस्त को बचाने के लिए श्राप तक खुद ओढ़ लिया और द्वारका जाकर भी अपनी

गरीबी स्पष्ट नहीं की। और कृष्ण ने कभी अपने दोस्त को कुछ देने में देर नहीं की। क्योंकि सच्चा प्यार हिसाब नहीं रखता। वो सिर्फ याद रखता है। यही वो रिश्ता है जो

आज हजारों साल बाद भी जब हम सुनते हैं तो हमारे दिल को गहराई तक छू जाता है। अगर यह कहानी आपके दिल को छू गई हो तो इसे आगे

जरूर बढ़ाइए ताकि यह अमर दोस्ती हर घर तक पहुंचे और हर कोई एक सच्चे सुदामा और एक सच्चे कृष्ण को पहचान सके।

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