नरसिंह अवतार | Narasimha Bhagwan | Bhaktiwood #narasimha #vishnu #holikadahan #bhaktiwood
By BhaktiWood
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Full Transcript
आज से लाखों वर्षों पहले सत्य युग में जब मंदराचल पर्वत की घाटी में लगभग कई 100 वर्षों से निरंतर केवल मात्र एक ही स्वर
गूंज रहा था ओम वेदात्मा विद्महे हिरण्य गर्भ धीमहि तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात ओम
वेदात्मा विद्महे हिरण्य गर्भ धीमहि तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात ओम वेदात्मा विद महे दरअसल कई स वर्षों से ब्रह्मदेव की असीम
कठिन तपस्या करता आ रहा यह महा बलशाली असुर कोई और नहीं बल्कि स्वयं हिरण्य क शिपु
था हिरण्य कशि के इस महा हठी कठिन तपस्या को देख इंद्र देव समेत सभी देवताओं को अपना भविष्य घौर अंधकार में डूबने की अनुभूति होने
लगी जिसके बाद देवताओं से रहा न गया और वे सभी भागे भागे ब्रह्म लोक चले आए पता हि
पिता हिता ब्रह्म लोक आते ही इंद्र देव समेत सभी देवताओं ने ब्रह्मदेव को अपना अभिवादन देते हुए ब्रह्मदेव के सम्मुख अपनी चिंता
व्यक्त करने लगे पितामह इसके पूर्व के अत्यंत विलंब हो जाए आपसे विनम्र प्रार्थना है कि कृपया उस
पहले से ही महा बलशाली हिरण्य कशि को कोई भी साधारण सा वरदान देकर संतुष्ट कर
दे देवराज कदाचित आप भूल रहे हैं कि हिरण्यकशिपु कई स वर्षों से अत्यंत कठोर तपस्या में लीन है यह स्वयं मां प्रकृति
का ही अटूट नियम है कि जैसी तपस्या वैसा ही फल स्वयं ब्रह्मदेव के मुख से कठोर वचन सुनकर इ देव सहित समस्त देवगण व्याकुल हो
उठे और सभी स्वर्ग लोक को प्रस्थान कर गए और यहां पृथ्वी के मंदराचल पर्वत की घाटी में हिरण्यकशिपु ने बिना अपनी परवाह किए
अत्यंत घोर तपस्या में लीन रहा समय यूं ही बीतता चला गया और फिर एक दिन वह समय आ ही गया जब ब्रह्मदेव हिरण्यकशिपु के अति कठोर
तपस्या से प्रसन्न होकर उसके सम्मुख प्रकट हुए और उससे अपना इच्छुक वरदान मांगने को कहने लगे
उठो वत्स अपनी आंखें खोलो हम तुम्हारे इस अति कठिन तपस्या से अति प्रसन्न [संगीत]
है ब्रह्मदेव आपको सत सत प्रणाम पत् हिरण्य कशि पू तुम जिस प्रकार की भी इच्छुक वरदान की कामना रखते हो हमसे मांग
सकते हो ब्रह्मदेव के मुख से यह वाणी सुन हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मदेव से सीधे अमर हो जा ने का वर मांग लिया जिसके प्रत्युत्तर
में ब्रह्मदेव ने इसे प्रकृति के नियम के विरुद्ध बताते हुए किसी और प्रकार का अति कठिन व अति शक्तिशाली वरदान मांगने की सलाह
दी इतना सुनते ही हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मदेव पर कटाक्ष करना शुरू कर दिया अमर होने का अधिकार प्रकृति ने तो केवल
देवताओं को ही दिया है क्यों ब्रह्मदेव हम असुरों को तो कभी भी और कहीं भी मृत्यु का ग्रास बनाया जा सकता
हमें पता था कि आप हमें अमृता का वरदान कभी भी नहीं देने वाले इसलिए हमने पहले से ही इसका विकल्प सोच रखा था जिसे देने के
लिए आप प्रतिबद्ध हैं इतना कहकर हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मदेव से ऐसा वरदान मांग लिया जिसे सुन स्वयं ब्रह्मदेव भी
आश्चर्य चकित हो उठे देवताओं ने तो जैसे अपना इंद्रासन अभी से ही खो दिया हो दरअसल
इस वरदान के दौरान हिरण्य कश को ना तो कोई देवता यक्ष राक्षस मानव या पशु मार सकता इसके अलावा वह ना तो दिन में मरता और ना
ही रात में उसे ना किसी अस्त्र से मारा जा सकता और ना ही किसी शस्त्र से वह ना धरती पर मरता और ही आकाश में और उसकी मृत्यु ना
तो घर के भीतर हो पाती और ना ही घर के बाहर ब्रह्मदेव द्वारा वरदान प्राप्ति के पश्चात हिरण कशि अपने जीवन को लेकर पूरी
तरह से सुनिश्चित हो चुका था अब उसे अपने मृत्यु का भय ना था वह स्वयं को अजय अमर ही समझ बैठा [संगीत]
था वरदान प्राप्ति के पश्चात हिरण्य क शिपु मंदराचल पर्वत की घाटी से निकलकर सीधे अपने विशाल काय राज्य हिरण्य करण वन
पहुंच गया जहां उसका स्वागत बड़े ही हर्षोल्लास से किया [संगीत]
गया अपने सिंहासन में बैठने के पश्चात उसने अपने आसुरी सैनिकों को सबसे पहले तो अपने राज्य व राज्य के आसपास के क्षेत्रों
में हो रहे विष्णु भगवान के पूजा पाठ को तत्काल ही प्रतिबंध करवाने का आदेश दे दिया रसल उस समय काल से भी लगभग लाखों
वर्षों पहले श्री विष्णु के वराह अवतार ने हिरण्यकशिपु के छोटे भ्राता हिरण्याक्ष को पृथ्वी को ब्रह्मांडी महासागर में डुबो देने व समस्त देवताओं को मृत्यु का ग्रास
बना देने के कुप्र यास के कारण वर्ष मृत्यु के घाट उतार दिया था और इसी कारण वर्ष हिरण्यकशिपु श्री विष्णु का परम शत्रु बन चुका
था और यदि कोई इसका विरोध करे तो उससे निसंकोच वहीं मृत्यु के घाट उतार देना हिरण्यकशिपु का आदेश पाते ही उसके आसुरी
सैनिक राज्य राज्य के बाहरी क्षेत्रों में अलग-अलग दिशाओं में फैल करर संपूर्ण विष्णु भक्तों को विष्णु पूजा व भक्ति न करने की चेतावनी देने लगे और जो इसका
विरोध करने का साहस करते उन्हें हिरण्यकशिपु के आसुरी सैनिक मात्र एक झटके में मृत्यु के घाट उतार दिया
करते हिरण्यकशिपु के इस उद्दंडता से राज्य के समस्त विष्णु भक्त आतंकित हो चुके थे और कई तो म के ग्रास भी बन चुके थे समय
बीतने के साथ-साथ हिरण्यकशिपु और भी अधिक निर्दय बनता गया धीरे-धीरे उसके अंदर विस्तार वाद की सोच पनपने लगी जिसके बाद
उसने पूरी पृथ्वी में अपना अधिपत्य स्थापित करने का मन बना लिया और साथ ही बिना विलंब किए उसने योजना बनाना भी आरंभ कर दिया योजना बनते ही हिरण्यकशिपु ने
अपने आसुरी सैनिकों को साथ में लिए सबसे पहले तो अपने पड़ोसी राज्यों के ऊपर प्रचंड रूप से टूट पड़ा हिरण्यकशिपु जैसे
महा बलशाली असुर को देख आसपास के समस्त राजाओं ने आपस में गठबंधन कर लिया समस्त राजा मिलकर युद्ध के मैदान में हिरण्यकशिपु के विरुद्ध युद्ध लड़ने तो
चले आए परंतु वे ज्यादा समय तक युद्ध को संभाल ना सके हिरण्यकशिपु उन सभी राजाओं पर अकेले ही भारी पड़ने लगा हिरण्यकशिपु
और उसके कुछ आसुरी योद्धाओं ने कुछ ही क्षण भर के भीतर समस्त राजाओं समेत उनके समस्त सैनिकों को मृत्यु के घाट उतार दिया
और फिर उनके राज्य पर अपना अधिपत्य जमा लिया अब इसके बाद हिरण्य कशपत वाद को प्रचंड रूप से जोर देते हुए
पृथ्वी के अलग-अलग कोनों में फैलाना शुरू कर दिया उसने अत्यंत ही कम समय काल के भीतर ही पृथ्वी के हर राज्यों महाद्वीपों
व कबीलों पर अपना अधिपत्य जमा लिया उसके नाम मात्र से ही समस्त मनुष्य जाति थरने लगी थी समस्त पृथ्वी पर अपना अधिपत्य स्थापित
करने के पश्चात हिरण्यकशिपु ने अपनी दृष्टि पाताल लोक पर केंद्रित की जहां की तमाम प्रकार के शक्तिशाली राक्षसों व
असुरों का राज्य था हिरण्यकशिपु ने पाताल लोक के समस्त असुरों के ऊपर अधिपत्य स्थापित करने से ठीक पहले एक असुर होने के
नाते उनके पास अपने दूतों को भेजकर स्वयं को उन पाताल लो की असुरों का राजा मनवाने पर दबाव बनाने लगा जिसे अधिकतर पाताल लोकी
असुरों ने हिरण्यकशिपु के प्रबल क्षमता व शक्ति को ध्यान में रखते हुए सहज ही स्वीकार कर लिया और जिन असुरों ने उसके
प्रस्ताव को ठुकराया उन्हें हिरण्यकशिपु ने स्वयं धूल चटा करर अपने अधीन कर लिया समय बीतने के साथ-साथ हिरण्यकशिपु अब
पृथ्वी समेत समस्त पाताल लों का भी स्वामी बन चुका था पर फिर भी उसकी विस्तार वाद की भूख अब तक शांत ना हुई थी अब उसकी दृष्टि
स्वर्ग लोक तक जा पहुंची थी साथ ही उसे अपने भ्राता हिरण्याक्ष के अपूर्ण कार्य को भी पूर्ण करना था जिसके लिए उसने अपने सेनापति व प्रमुख
आसुरी योद्धाओं के साथ एक सर्वोत्तम युद्ध रणनीति बनाई और सही समय देख अपनी आसुरी सेना लिए अपने तीव्र शक्ति का उपयोग करते
हुए उसने राज्य के भीतर ही स्वर्ग लोक जाने का ऊर्जावान प्रवेश द्वार खोल दिया फिर उसी प्रवेश द्वार के माध्यम से
हिरण्यकशिपु अपनी विशाल आसुरी सेना लिए कुछ ही क्षण भर के भीतर ही स्वर्ग लोक में प्रवेश कर गया और जोरों से ठहाके लगाता
हुआ इंद्रासन के सम्मुख आखड़ा हुआ हिरण्यकशिपु को साक्षात अपने सम्मुख खड़े देख इंद्र देव समेत सभी देवता विचलित
हो उठे और क्रोधित होते हुए हिरण्यकशिपु को पृथ्वी वापस चले जाने की चेतावनी देने लगे
परंतु हिरण्यकशिपु देवताओं के सम्मुख खड़ा हुआ मात्र ठहाके ही लगाए जा रहा था और देखते ही देखते उसके अनेकों आसुरी योद्धा
स्वर्ग पर पांव जमा चुके थे यह दृश्य देख इंद्रदेव समझ चुके थे कि अब युद्ध होना तो निश्चित ही संभव है जिसके बाद युद्ध का
बिगुल बजा और समस्त आसुरी और देव सेना आपस में एक दूसरे के ऊपर टूट पड़े और यहां इंद्र देव अग्निदेव एवं सूर्य देव समेत
समस्त देवता मिलकर हिरण्यकशिपु और उसके प्रमुख योद्धाओं को प्रचंड रूप से बराबरी का टक्कर दे रहे थे देवता अपने विस्फोटक
शक्तियों का उपयोग हिरण्यकशिपु समेत उसके समस्त प्रमुख आसुरी योद्धाओं पर खुलकर करने लगे जिसमें कि हिरण्यकशिपु के समस्त
प्रमुख योद्धा एक के बाद एक ढेर होते चले गए और यहां उसकी आसुरी सेना भी देव सेना के सम्मुख शक्तिहीन होती हुई दिख रही थी
यह मरण संहार का दृश्य देख हिरण्यकशिपु के क्रोध का ठिकाना ना रहा जिसके बाद हिरण्यकशिपु ने अपने शारीरिक बल के साथ-साथ अपने प्रचंड शक्तियों का भी सद
उपयोग कर अकेले ही समस्त देवताओं के ऊपर टूट पड़ा उसने अकेले ही अपने लगातार प्रचंड शक्ति प्रहार से इंद्र देव समेत
सभी देवताओं को मार मारते लगभग अचेत ही कर दिया हिरण्य कशि पु का यह भयंकर रूप देख देवता भय से थड़क कांपने लगे और इससे पहले
कि हिरण्यकशिपु सभी देवताओं को बंदी बनाता सभी देव भयभीत होते हुए स्वर्ग से अंतर्धान हो गए इंद्रदेव समेत समस्त
देवताओं को युद्ध हारकर स्वर्ग से अंतर्धान होता देख देव सेना भी छिन्न भिन्न होने लगी जिसमें कई देव सेना तो
आसुरी सेना के हाथ हाथों वीर गति को प्राप्त हो गए और कई तो अपने प्राण बचाकर स्वर्ग से अंतर्धान हो गए जिसके बाद
हिरण्यकशिपु ने बड़े ही हर्षोल्लास के साथ स्वर्ग पर अपनी जीत का परचम लहराया और इंद्रासन पर विराजमान हो गया स्वर्ग लोक को जितने के बाद
हिरण्यकशिपु ने कभी भी मुड़कर पीछे नहीं देखा वह लगातार पूरे ब्रह्मांड में एक के बाद एक लोक व राज्य जता ही गया जिसमें
यमलोक और नाग लोक प्रमुख थे और एक समय ऐसा भी आया जब वैकुंठ लोक ब्रह्म लोक देवी लोक एवं कैलाश को छोड़
हिरण्यकशिपु पूरे ब्रह्मांड यानी कि तीनों लोकों का स्वामी बन चुका था इंद्रदेव समेत समस्त देव हिरण्यकशिपु के भय से पूरे ब्रह्मांड में छिप छिपाए त्रिदेव के शरण
में रहने लगे थे उस समय काल में हिरण्यकशिपु को पूरे ब्रह्मांड में चुनौती देने वाला कोई भी ना था समय यूं ही बीतता गया और फिर एक दिन वह अत्यंत ही दुर्लभ
क्षण आया जब हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु ने एक दिव्य शिशु को जन्म दिया और उस दिव्य शिशु का नाम प्रहलाद रखा
गया प्रहलाद को लेकर हिरण्यकशिपु अत्यंत ही प्रसन्न था वह अपने पुत्र प्रहलाद को भी स्वयं की ही भाति त्रिलोकी असुर राज बनाना चाहता
था फिर कुछ वर्षों में ही कयाधु ने और भी तीन पुत्रों को जन्म दिया जिनका नाम अनु लाद सहला एवं हल्लाद रखा गया और तब तक
हिरण्यकशिपु का ज्येष्ठ पुत्र प्रहलाद किशोरावस्था में पहुंच चुका था प्रहलाद अपने चेतना वस्था से ही भगवान विष्णु से अत्यंत ही प्रभावित होकर उनका परम भक्त बन
चुका था भगवान विष्णु से भक्त प्रहलाद का एक अटूट संबंध बन चुका था जो कि आम संबंधों से परे था भक्त प्रहलाद अपने गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने के साथ
ही साथ दिन रात श्री विष्णु की उपासना भी किया करते समय बीतने के साथ-साथ उनकी शिक्षा पूर्ण हुई जिसके बाद उनके गुरु
प्रहलाद को लिए हिरण्य करण वन राज्य लौटे और हिरण्य कशि के सम्मुख प्रस्तुत हुए उस समय हिरण्य कशि मदिरा पान में डूबा हुआ था
वह अपने पुत्र प्रहलाद को देख अत्यंत प्रसन्न भी हुआ जिसके बाद प्रहलाद ने अपने पिता के चरणों में झुककर प्रणाम किया
अब तक तुमने अपने अध्ययन में निरंतर तत्पर रहकर जो शिक्षा प्राप्त की है उसकी सार भूत व्याख्या हमें सुनाओ जिसके बाद
प्रहलाद अपनी शिक्षा की व्याख्या बताने से पूर्व श्री विष्णु को सादर प्रणाम करने लगा प्रहलाद के मुख से श्री विष्णु का नाम सुनते ही हिरण्यकशिपु के नेत्र क्रोध
पूर्वक लाल हो उठे और वह प्रहलाद के गुरु को भयंकर दृष्टि से क्रोध पूर्वक घूरने लगा रे दुर्बुद्धि ब्राह्मणा अधम ये तूने
मेरी पीठ पीछे मेरे बालक को ऐसी क्या शिक्षा दे दी कि वह मेरे ही सम्मुख मेरे परम शत्रु विष्णु का नाम लिए जा रहा है
दराज कृपया कर आप क्रोधित ना हो दरअसल प्रहलाद मेरी सिखाई हुई बातें नहीं कह रहा यह तो हमें भी नहीं पता कि उसने यह सब सीखा
कहां जिसके बाद हिरण्य कशि ने अपने पुत्र प्रहलाद से उसकी इस शिक्षा प्राप्ति का कारण पूछा जिसके प्रत्युत्तर में भक्त
प्रहलाद ने समस्त जीव के हृदय में बसे श्री विष्णु को जगत का उपदेशक बताया इतना सुनते ही हिरण्य कशि पू ने प्रहलाद को
क्रोध पूर्वक दुत काते हुए उसे अयोग्य बतलाते हुए चेतावनी देकर अपनी शिक्षा पुनः प्राप्त करने के लिए वापस गुरुकुल भेज दिया जिसके बाद प्रहलाद अपने गुरुकुल वापस
आ गया और अपनी शिक्षा पुनः प्राप्त करने लगा और यहां हिरण्यकशिपु का पुरे दृष्टि पर अत्याचार दिन दुगनी और रात चौगुनी के
गति से बढ़ता ही रहा उसने पृथ्वी समेत समस्त ब्रह्मांड में अपने अधिकार क्षेत्रों में अब सभी देवी देवताओं के पूजा पाठ को पूरी तरह से बंद करवाकर स्वयं
मातृ की पूजा करवाने पर जोर देने लगा फिर समय बीतने के साथ-साथ भक्त प्रहलाद ने अपनी शिक्षा पुनः प्राप्त कर ली जिसके बाद
हिरण्यकशिपु का बुलावा आने पर समस्त गुरु मंडल भक्त प्रहलाद को लिए वापस से हिरण्य करण वन पहुंच गए और फिर से हिरण्यकशिपु के
समक्ष प्रस्तुत हुए तो पुत्र आज कोई गाथा सुनाओ जिनसे यह संपूर्ण सृष्टि समस्त प्रधान तत्व और समस्त चराचर जगत उत्पन्न
हुआ है वे समस्त प्रपंच के कारण परम पालनकर्ता भगवान श्री विष्णु हम पर प्रसन्न हो इतना सुनते ही हिरण्यकशिपु फिर
से क्रोध से भर उठा और इस बार उसने अपने आसुरी सैनिकों को प्रहलाद का वध कर देने की आज्ञा दे डाली उसकी आज्ञा पाते ही वहां उपस्थित सहस्त्र असुर अपनी धारदार अस्त्र
शस्त्र लिए भक्त प्रहलाद को मृत्यु के घाट उतार देने को आतुर हो उठे और सभी एकत्र होकर भक्त प्रहलाद के ऊपर टूट पड़े उनके
अनेकों शस्त्र समूहों के प्रहार के बाद भी भक्त प्रहलाद को तनिक भी वेदना ना हुई और वे ज्यों के त्यों नवीन बल संपन्न बैठे रहे
यह देख हिरण्यकशिपु अचंभे में पड़ गया और फिर उसने भक्त प्रहलाद को विष्णु भक्ति छोड़ स्वयं हिरण्य कशि पु की भक्ति करने पर जोर देने लगा जिसके प्रत्युत्तर में
भक्त प्रहलाद ने श्री विष्णु को ही अनंत सनातन बताया यह सुनकर हिरण्य कशपत सातव आसमान पर पहुंच गया जिसके बाद उसने अपने
भयंकर विष वाले सर्प सेना को बुलाया और उन्हें भक्त प्रहलाद को अपने विषगन दंत से काटकर नष्ट कर देने की आज्ञा दे दी जिसके
बाद में सभी विषधर सर्प बनकर भक्त प्रहलाद के ऊपर टूट पड़े और उनके समस्त अंगों में काटने लगे परंतु भक्त प्रहलाद के श्री विष्णु के ध्यान में डूबे होने के कारण
उनके ऊपर समस्त विषैले डंको का भी कोई प्रभाव ना हुआ हालांकि समस्त सर्प सैनिकों के दंत जरूर टूट चुके थे उनकी मणियाकल गी
थी फनों में पेड़ा और हृदय अवश्य कांपने लगा था यह देख हिरण्यकशिपु आश्चर्य चकित होने के साथ-साथ उग्र क्रोधित भी होने लगा
उसके इस अशांत क्रोध को देख सभी गुरु मंडल उसके सम्मुख आए और उन्हें प्रहलाद के सभी दोषों को क्षमा कर उन्हें एक और अवसर देने की प्रार्थना करने लगे उनके इस बारंबार
प्रार्थना को देख हिरण्यकशिपु ने उन्हें अंतिम अवसर दे ही दिया जिसके बाद समस्त गुरु मंडल भक्त प्रहलाद को अपने संघ गुरुकुल ले आए और उन्हे बड़े ही अनुशासित
होकर पढ़ाने लगे परंतु पढ़ाई कर चुकने के पश्चात भक्त प्रहलाद समस्त दानव कुमारों को हर दिन विष्णु भक्ति का उपदेश दिया
करते और जब यह बात गुरु मंडल को पता चली तो उन्होंने किसी आसुरी सैनिक के माध्यम से यह समाचार असुर राज हिरण्यकशिपु तक
पहुंचा दी जिसके बाद हिरण्यकशिपु ने एक प्राणघातक षड्यंत्र रचते हुए गुरुकुल में प्रहलाद के लिए बुलावा भेज दिया असल में
हिरण्यकशिपु ने अपने रसोइयों को आदेश दिया कि वे प्रहलाद के भोजन में हलाहल विष मिला दें और फिर वही विषाक्त भोजन उसके सम्मुख परोसे और जब भक्त प्रहलाद ने उस विषैले
भोजन को श्री विष्णु का स्मरण करते हुए खाना शुरू किया तब सभी रसोइयों ने भक्त प्रहलाद के ऊपर अपना ध्यान केंद्रित कर
लिया भोजन खाकर पचाने के पश्चात भी भक्त प्रहलाद स्वस्थ रहे यह देख सभी रसोइयों को बड़ा आश्चर्य हुआ फिर वे भी अत्यंत ही
भयभीत होकर हिरण्यकशिपु के सम्मुख प्रस्तुत होकर सारी घटना बताने लगे यह सुन हिरण्यकशिपु का क्रोध भक्त प्रहलाद के ऊपर
बढ़ता ही गया जिसके बाद उसने गुरु मंडल के पुरोहितों को कृत्या उत्पन्न कर प्रहलाद को नष्ट करने की आज्ञा दे दी फिर समस्त
पुरोहित गणों ने भक्त प्रहलाद के सम्मुख जाकर उसे शांति पूर्वक श्री विष्णु की भक्ति छोड़ मात्र अपने पिता हिरण्यकशिपु
की ही भक्ति करने का परामर्श देने लगे यह सुन भक्त प्रहलाद ने अपने पिता को पूजनीय माना परंतु उन्हें भगवान मानना अस्वीकृत कर दिया उन्होंने भगवान विष्णु को ही परम
सनातन भगवान बताया य सुन समस्त पुरोहित गणों ने अंतिम चेतावनी देते हुए महा प्रचंड अग्नि शिखा के समान प्रज्वलित शरीर
वाली कृत्या उत्पन्न कर दी उस प्रचंड शक्तिशाली कृतिका ने क्रोध पूर्वक गर्जना करते हुए अपने हाथों में त्रिशूल भक्त प्रहलाद के ऊपर टूट पड़ी फिर जै जसे ही
त्रिशूल भक्त प्रहलाद की छाती से टकराया वह क्षण भर में चकनाचूर हो गया अपने महाशक्तिशाली त्रिशूल को यूं चकनाचूर होते
देख कृतिका ने अपना संयम खो दिया और वह उल्टे समस्त पुरोहितों के ऊपर ही टूट पड़ी और उन्हें तत्काल ही मृत्यु के घाट उतार
स्वयं भी नष्ट हो गई य देख भक्त प्रहलाद के मस्तिष्क को अत्यंत घातक रूप से आघात पहुंचा जिसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु को स्मरण किया और उनसे समस्त मृत्यु के
ग्रास बन चुके पुरोहितों को पुनः जीवन प्रदान करने के लिए प्रार्थना करने लगे फिर भक्त प्रहलाद के भक्ति की शक्ति के फल स्वरूप कुछ ही क्षण भर के भीतर मात्र उनके
स्पर्श मात्र से ही समस्त मृत हो चुके पुरोहित गण पुनः जीवित हो उठे यह सब देख समस्त पुरोहित गण भक्त प्रहलाद से अत्यंत
प्रसन्न हुए और उनको महान बताते हुए उनका आभार प्रकट करने लगे जिसके बाद समस्त पुरोहित हिरण्यकशिपु के समक्ष जाकर उसे सारा
समाचार ज्यों का त्यों सुनाने लगे यह सुन हिरण्यकशिपु आश्चर्य और क्रोध से जल उठा जिसके बाद हिरण्यकशिपु ने भक्त
प्रहलाद को अपने समक्ष बुलाकर उनसे हर बार मृत्यु के मुख से बच निकलने का रहस्य पूछने लगा जिसके प्रत्युत्तर में भक्त प्रहलाद ने इसे श्री विष्णु भगवान की ही
कृपा बताई यह सुन हिरण्यकशिपु ने इस बार क्रोध पूर्वक अपने सुरी सैनिकों को भक्त प्रहलाद को पकड़ महल से 100 योजन की ऊंचाई
से सीधे नीचे गिरा देने का आदेश दे दिया जिसके बाद हिरण्य कशि पू के निर्दय आसुरी सैनिकों ने भक्त प्रहलाद को उठाकर महल से
सीधे 100 योजन नीचे फेंक दिया और नीचे गिरते समय भक्त प्रहलाद श्री विष्णु का स्मरण करने लगे श्री विष्णु के कृपा से
भक्त प्रहलाद के धरती में गिरने से पूर्व ही जगत धात्री पृथ्वी ने भक्त प्रहलाद को अपने गोद में थाम लिया और धरती पर रख
अंतर्धान हो गई भक्त प्रहलाद को सकुशल देख आसुरी सैनिकों ने हिरण्यकशिपु को यह समाचार सुना
दी यह समाचार सुन हिरण्यकशिपु क्रोध से लाल होते हुए तनिक भी विलंब ना करते हुए अपने आसुरी सैनिकों को भक्त प्रहलाद को
नागपाश से बांध कर महासागर में डुबो देने का आदेश दे दिया जिसके बाद उन आसुरी सैनिकों ने भक्त प्रहलाद को बंदी बनाकर
नागपाश से बांधकर महासागर में डुबो दिया परंतु भक्त प्रहलाद को नागपाश सहित महासागर में डुबो देने के पश्चात महासागर
में जोरदार हलचल होने लगी सभी ओर ऊंची ऊंची लहरें उठने लगी महासागर के इस भयंकर हलचल को देख हिरण्यकशिपु ने भक्त प्रहलाद
को एक मायावी बालक बतलाते हुए आसुरी सेना को उसे ऊपर से बड़ी-बड़ी चट्टान शिला हों से ढक देने का आदेश दे दिया दिया जिसके बाद आसुरी सेना ने महासागर में डूबे भक्त
प्रहलाद को चट्टानों से ढककर उसके ऊपर हजारों योजन का ढेर कर दिया पर अभी भी भक्त प्रहलाद महासागर के अंदर चट्टानों के बीच अचेत होकर भी अंदर ही अंदर भगवान
विष्णु का स्मरण किए जा रहे थे अचेत अवस्था में भगवान विष्णु को स्मरण करते समय वेन स्वयं को भूल ही गए वेन श्री विष्णु को स्वयं के भीतर अनुभूत करने लगे
जिससे कि तत्काल ही नागपाश नष्ट हो गई समुंद्र में जोड़र कंपन होने लगी जिससे कि असुरों द्वारा लादे गए समस्त चट्टान शिला
झटके से दूर फेंकते हुए भक्त प्रहलाद महासागर से बाहर निकले और धरती पर पांव रखते ही उन्हें पुनः अनुभूत हुआ कि वे
प्रहलाद हैं जिसके बाद व धरती में बैठकर विलाप करते हुए श्री विष्णु की स्तुति करने लगे उनके इस प्रकार तन्मयता पूर्वक
स्तुति करने के कुछ क्षण पश्चात ही उनके सम्मुख स्व सृष्टि के पालनहार श्री विष्णु प्रकट हुए साक्षात श्री विष्णु को अपने
सम्मुख देख भक्त प्रहलाद गदगद हो उठे और उन्हें अभिवादन कर उनके चरणों में गिर पड़े हे प्रहलाद मैं तुम्हारी अनन्य भक्ति
से अति प्रसन्न हूं तुम्हें जिस वर की इच्छा हो मुझसे मांग लो य सुन भक्त प्रहलाद अपने हर योनि में मात्र विष्णु
भक्त ही बने रहने का वर मांगते हैं जिसे भगवान विष्णु स्वीकृति दे देते हुए अन्य वर भी मांगने को कहने लगते हैं जिसके बाद
भक्त प्रहलाद समस्त प्रकार के पाप कर चुके अपने पिता हिरण्य कशि को पाप मुक्त करने का वर मांग लेते हैं जिसके बाद तथास्तु
कहकर श्री विष्णु अंतर्धान हो जाते हैं जिसके बाद भक्त प्रहलाद वापस से महल में प्रवेश कर सीधे अपनी माता कयाधु के कक्ष
की ओर चल देते हैं जहां उन्हें माता कयाधु अपने सीने से लगा लेती हैं और उसी क्षण वहां हिरण्यकशिपु भी आ धमकता है भक्त
प्रहलाद को सकुशल अपनी माता के संघ देख हिरण्यकशिपु गुस्से से हाथ मलता रह जाता है और गहरे चिंतन में पड़ जाता है फिर उसे अपनी छोटी बहन होलिका का ध्यान आता है
जिसके बाद वह होलिका के पास बुलावा भेजता है फिर अगले ही दिन महल में होलिका का आगमन होता है जिसके साथ हिरण्यकशिपु एक
संपूर्ण भयंकर योजना बनाता है जिसे पूरे नगर में एक आयोजन का नाम दे दिया जाता है और इस आयोजन के अंतर्गत भक्त प्रहलाद को
जलती हुई चिता में होलिका के संघ बिना किसी क्षति के बैठने की घोषणा कर दी जाती है असल में होलिका को ब्रह्मदेव से आग में
न जलने का वर प्राप्त था और इसी का लाभ उठाकर हिरण्य कशि पू भक्त प्रहलाद को मृत्यु के घाट उतार देना चाहता था फिर
संध्या होते ही इस मिथ्य आयोजन की शुरुआत होही जाती है जिसमें कि कयाधु के ना चाहते हुए भी बलपूर्वक भक्त प्रहलाद को होलिका
के गोद में चिता के ऊपर बैठाकर आग लगा दिया जाता है आग लगते ही भक्त प्रहलाद श्री विष्णु को स्मरण करने लगते हैं और वहीं होलिका जोरों से ठहाके लगाने लगती है
जिसे देख हिरण्यकशिपु भी जोरों से ठहाके लगाने लगता है फिर कुछ क्षण बीतने के पश्चात भक्त प्रहलाद को तो कुछ ना हुआ परंतु वहीं होलिका को गर्मी की अनुभूति
अवश्य होने लगती है क्षण बीतने के साथ-साथ यह गर्मी जलन में परिवर्तित हो जाती है और होलिका उसी चिता में छटपटाते हुए भस्म हो
जाती है जिसे देख हिरण्यकशिपु मात्र गर्जना और विलाप के कुछ ना कर पाया और वहीं भक्त प्रहलाद फिर से सकुशल मृत्यु को मात देते हुए चिता से बाहर आ गए जिसे देख
सभी आश्चर्य चकित पर हिरण्यकशिपु क्रोध से लाल हुए जा रहा था नगर समेत महल में शोक का वातावरण था धीरे-धीरे सूर्यास्त भी हुआ
और फिर आसुरी सैनिकों ने भक्त प्रहलाद को बलपूर्वक राजसभा में हिरण्यकशिपु के सम्मुख प्रस्तुत किया भक्त प्रहलाद को
अपने सम्मुख देख हिरण्य कशि अपने अति क्रोध और घमंड से भरे स्वर में भक्त प्रहलाद को असुर जाति के नाम पर एक कलंक
मात्र बताने लगा और स्वयं को असल भगवान साथ ही श्री विष्णु समेत समस्त देवी देवताओं को शक्तिहीन बताते हुए स्वयं
मात्र को बताया शक्तिमान मैं स्वयं स् सूर्य मैं स्वयं चंद्र मैं स्वयं वायु में ही स्वयं काल पूरे सृष्टि में मुझसा ना
कोई भगवान इतना कहते हुए हिरण्य कशपत मात्र को ही भगवान मनवाने के लिए भक्त प्रहलाद पर जोर देने लगा जिसे कि भक्त
प्रहलाद ने गलत बताते हुए मात्र भगवान विष्णु को ही सत्य बताया य सुन हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आते हुए भक्त प्रहलाद के सीने में जोरों से लात मारी
जिससे कि भक्त प्रहलाद जोरों से छिटक हुए द जा गिरे और अध मरी अवस्था में पहुंच गए कहां गया तेरा भगवान बुला अपने भगवान
विष्णु को बचा सकता है तो आकर बचा ले तेरा प्राण जिसके बाद भक्त प्रहलाद ने भगवान विष्णु को हर जगह विराजमान होने की बात
कही यहां तक कि महल के हर खंभे में भी यह सुन हिरण्य क शिपु महल के खंभों को अपनी गदा प्रहार से पागलों की भाति चखना चूर
करने लगा यूं ही खंबो को चखना चूर करते हुए वह एक और खंभे में अपनी गदा प्रहार कर देता है परंतु वह खंबा चखना चूर ना होकर ज्यों का त्यों रह जाता है जिसे देख
हिरण्यकशिपु आश्चर्य में पड़ जाता है जिसके बाद वह क्रोध में आकर उस खंबे में अनेकों प्रहार करता है परंतु वह खंबा ज्यों का त्यों ही रह जाता है फिर कुछ
क्षण के बाद वह खंबा अपने आप धीरे-धीरे फटने लगता है फिर वह खंबा अचानक अति तीव्र गति से फट पड़ता है जिसके धमाके से हिरण्य
क शिपु अति दूर जा गिरता है फिर धुंदले हो चुके राज सभा में एक भयावह गर्जना गूंज उठती है और धुंद को ड़ते हुए गर्जना करते
हुए अद्भुत श्री विष्णु अवतार नरसिंह हिरण्यकशिपु के समक्ष आ खड़े होते हैं जिन्हें देख हिरण्यकशिपु आश्चर्य में पड़
जाता है तो वहीं भक्त प्रहलाद हाथ जोड़े भक्तिमय हो जाता है यह देख हिरण्यकशिपु समझ जाता है कि हो ना हो यह स्वयं विष्णु
है जिसके बाद अपने समक्ष महा उग्र नरसिंह को देख हिरण्यकशिपु स्वयं भी महा क्रोधित होते हुए अपनी गदा लिए भगवान नरसिंह पर
टूट पड़ता है और नरसिंह पर अपनी गदा लिए अंधा धुंध प्रहार करने लगता है पर उसके गदा का नरसिंह पर कोई भी असर ना होता है जिसके बाद नरसिंह अपने पंजे के एक ही वार
से हिरण्यकशिपु के गदा को चकनाचूर कर देते हैं यह देख एक हिरण्यकशिपु तिल मिलाते हुए एक धारदार शक्तिशाली तलवार प्रकट कर नरसिंह पर फिर से प्रहार करने लगता है पर
तलवार का भी नरसिंह पर कोई असर ना होता है जिसे कि नरसिंह पुनः अपने प्रहार से नष्ट कर देते हैं यूं ही अपने अनेकों अस्त्र शस्त्र को नष्ट होता देख हिरण्य कशी पू अब
मल्ल युद्ध करने को उतारू हो जाता है जिसके बाद वह अपने मुक्के को ताने सीधे नरसिंह पर टूट पड़ता है परंतु नरसिंह उसके
मुक्के को पकड़ धरती पर पटक देते हैं और उसे मल युद्ध के दौरान वही धूल चटाने लगते हैं यह शक्तिशाली दृश्य देख समस्त असुर
आश्चर्य चकित होते हुए डर से थ्रने लगते हैं यह पहली बार था जब हिरण्यकशिपु के समक्ष कोई उससे भी अधिक शक्तिशाली उससे युद्ध करता हुआ उसे लगातार धूल चटाए जा
रहा था स्वयं को यूं लगातार मार खाता हुआ देख वह समझ चुका था कि अब भागने में ही उसकी भलाई है जिसके बाद वह नरसिंह से दुरी
बनाता हुआ इधर-उधर भागने लगा परंतु नरसिंह भगवान ने उसका पीछा करते हुए उसे अपने पंजों में दबोच लिया और उसे पूरे राज महल में घसीटते हुए मुख्य द्वार के चौखट तक ले
गए और उसे हवा में उछलते हुए अपने गोद में लेटा दिया विष्णु मुझे कोई भी नहीं मार सकता चाहे कितना भी प्रयत्न कर लो तुम तू ना
अभी घर के अंदर है ना ही बाहर तू ना धरती पर है ना ही आकाश में ना अभी दिन है और ना ही रात्री
मैं ना तुझे अस्त्र से मारूंगा और ना ही शस्त्र से और मैं ना तो देवता हूं ना यक्ष
ना राक्षस ना मनुष्य और ना ही पशु मैं हूं नरसिंह इतना कह नरसिंह सीधे अपने धारदार पंजों से हिरण्य कशि के उदर को बीच से
चीरने लगे जिससे कि हिरण्य कशि पू के प्राण पखेरू वहीं उखड़ गए और वोह वहीं भगवान नरसिंह के हाथों मृत्यु को प्राप्त हो गया यह देख भक्त प्रहलाद को अपने पिता
के मृत्यु का अत्यंत ही शोक हुआ परंतु इसे उन्होंने श्री विष्णु की इच्छा मात्र समझते हुए भगवान नरसिंह के समक्ष हाथ जोड़े बैठे रहे अपने असुर राज्य को यूं
छटपटा करर मृत्यु के घाट उतरता देख समस्त आसुरी सेना हिरण्य करण वन राज्य को छोड़ पाताल लोक की ओर भागने लगी और हिरण्यकशिपु
के कुछ प्रमुख आसुरी सैनिकों ने यह भयंकर दृश्य देख अपना नियंत्रण खोते हुए नरसिंह पर हमला बोल दिया जिसके बाद नरसिंह ने
अपने प्रलयनकारी प्रहार से समस्त उग्र आसुरी सैनिकों को मिट्टी में मिलाते गए समस्त सृष्टि को हिरण्यकशिपु के चंगुल से
मुक्त होता देख इंद्र देव समेत समस्त देवता अत्यंत ही प्रसन्न हुए पर उनकी यह प्रसन्नता चिंता में तब परिवर्तित हो गई
जब नरसिंह समस्त उग्र हो चुके संपूर्ण आसुरी सेना को मृत्यु के घाट उतार देने के पश्चात भी शांत ना हुए असल में
हिरण्यकशिपु जैसे महा प्रलयनकारी असुर समेत उसके समस्त प्रमुख असुरों को मारते मारते नरसिंह का क्रोध इतना उग्र हो चुका
था कि वह अब शांत होने की जगह बढ़ता ही जा रहा था और अब वे पूरी तरह से अपने नियंत्रण से बाहर हो चुके थे जो कि संपूर्ण सृष्टि के विनाश का कारण बनने
वाला था और यह विना नाश लीला देख समस्त देवताओं को सिर्फ एक ही मार्ग सुझा और वो था कैलाश
का मार्ग जिसके बाद समस्त देवता पृथ्वी में स्थित कैलाश चले आए सृष्टि की रक्षा करें महादेव अन्यथा
नरसिंह पृथ्वी समेत समस्त सृष्टि को उजाड़ करर समाप्त कर देंगे इस पूरी सृष्टि में एक मात्र आप ही हैं जो नरसिंह देव को
नियंत्रण में ला सकते हैं जागिए महादेव जागिए ब
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