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Osho - गरुड पुराण का असली सच... वह 1 पल जब स्त्री खुद को रोक नहीं पाती #osho

By Femina Mind

Summary

Topics Covered

  • कमजोरी में छिपा है प्रेम का सबसे गहरा द्वार
  • समाधान खोजने की जल्दी प्रेम के द्वार बंद कर देती है
  • शब्दों से अधिक गहरी बैठती है मौन उपस्थिति
  • हज़ार ज्ञानियों से एक फकीर का मौन अधिक गहरा
  • खालीपन ही स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति है

Full Transcript

उस एक पल में स्त्री का पूरा दिल खुला होता है और जो पुरुष उस पल को पहचान लेता है, उसे फिर कभी किसी स्त्री को मनाने की

जरूरत नहीं पड़ती। यह कोई साधारण बात नहीं है। यह जीवन का एक बहुत गहरा सूत्र है। इसे समझने के लिए तुम्हें बहुत सी धारणाओं

को छोड़ना होगा जो तुमने अब तक समाज से सीखी हैं। जीवन सिद्धांतों से नहीं चलता। जीवन चलता है उन छोटी-छोटी घटनाओं से जो

हमारे आसपास हर दिन घट रही हैं। लेकिन हमारी आंखें इतनी सोई हुई है कि हम उन्हें देख नहीं पाते। मैं तुम्हें एक कथा से यात्रा पर ले

चलता हूं। किसी दूर देश की बात नहीं, किसी बहुत पुरानी किताब की बात नहीं। यह तुम्हारे ही घर की तुम्हारे ही आस पड़ोस

की कहानी है। एक स्त्री है। वह सुबह उठती है और जीवन के युद्ध में उतर जाती है। उसे दुनिया का सामना करना है। उसे समाज की

नजरों से खुद को बचाना है। उसे अपने काम में खुद को साबित करना है। यह दुनिया बहुत कठोर है और यहां कमजोरों के लिए कोई जगह

नहीं है। इसलिए वह स्त्री अपने चारों तरफ एक अदृश्य कवच पहन लेती है। एक ऐसा कवच जो

उसे चोट से बचा सके। वह दिन भर एक योद्धा की तरह व्यवहार करती है। वह तर्क करती है। वह हिसाब लगाती है। वह सही और गलत के बीच

निरंतर चुनाव करती है। उसकी आंखों में एक दृढ़ता होती है। उसके चेहरे पर एक तनाव होता है। वह दुनिया को यह दिखाना चाहती है

कि वह कमजोर नहीं है। वह किसी से कम नहीं है। लेकिन यह कवच बहुत भारी होता है। इसे दिन भर पहने रहना आत्मा को थका देता है।

जब दिन ढलता है, जब सूरज की किरणें मध्यम पड़ने लगती हैं और रात का सन्नाटा गहराने लगता है, तब उसके भीतर का वह योद्धा भी

थकने लगता है। वह घर लौटती है, दरवाजे बंद होते हैं और बाहरी दुनिया का शोर खत्म हो जाता है। ऐसे में किसी एक प्रहर में, किसी

एक विशेष क्षण में वह अचानक बहुत थक जाती है। यह केवल शरीर की थकान नहीं है। यह मन

की आत्मा की थकान है। यह उस निरंतर लड़ाई की थकान है जो वह दिन भर खुद से और दुनिया से लड़ती रही है। और फिर वो पल आता है। वो

तुम्हारे पास आकर बैठती है। अचानक उसकी आंखों में दिन भर वाली वो कठोरता नहीं होती। वहां एक अजीब सी नमी छा जाती है। एक

उदासी जिसका कोई स्पष्ट कारण तुम्हें नजर नहीं आता। वह अचानक से बहुत शांत हो जाती

है। या शायद बिना किसी बहुत बड़े कारण के उसकी आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं। वह तुम्हारे कंधे पर सिर रख देती है या शून्य

में देखने लगती है। यही वह पल है। इसे बहुत ध्यान से समझना। यह वह एक अकेला पल है जब वह सबसे ज्यादा खुली होती है। लोग

इसे उसकी कमजोरी कहते हैं। तुम भी शायद इसे उसकी कमजोरी मानतेगे। तुम्हें लगता होगा कि वह टूट रही है। लेकिन नहीं वह

कमजोर नहीं हो रही है। वह दरअसल अपना वह भारी कवच उतार कर जमीन पर रख रही है। उसने अब योद्धा होने से इंकार कर दिया है। वह

बस एक साधारण कोमल स्त्री होना चाहती है। उसका पूरा दिल इस एक पल में बिल्कुल नग्न और खुला होता है। वह उस समय ग्रहण करने के

लिए सबसे अधिक तैयार होती है। लेकिन यहीं पर ठीक इसी बिंदु पर सबसे बड़ी त्रासदी

घटती है। पुरुष जो खुद दिन भर एक कठोर दुनिया में जिया है। जो हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसने का आदि है। वह एक बहुत बड़ी

भूल कर बैठता है। पुरुष क्या करता है?

जैसे ही वह स्त्री को इस अवस्था में देखता है, उसका तर्कशील दिमाग सक्रिय हो जाता है। वह तुरंत एक चिकित्सक, एक सलाहकार, एक

गुरु बन जाता है। वह उससे पूछता है, क्या हुआ? तुम इतनी परेशान क्यों हो? कोई बात

हुआ? तुम इतनी परेशान क्यों हो? कोई बात

है क्या? स्त्री कहती है कुछ नहीं। बस ऐसे ही। वह सच कह रही है। कोई विशिष्ट बात नहीं है। बस वह थक गई है और उसने अपना कवच

उतार दिया है। लेकिन पुरुष का मन इस बस ऐसे ही को स्वीकार नहीं कर पाता। उसे लगता है कि कार्य है तो कारण भी होना चाहिए। वह

समाधान खोजने लगता है। वह कहता है अगर दफ्तर में कोई परेशानी है तो नौकरी छोड़ दो। अगर किसी ने कुछ कहा है तो मुझे बताओ।

मैं उसे ठीक कर दूंगा। पुरुष उसे तर्क से बुद्धि से ठीक करना चाहता है। वह सोचता है कि स्त्री के मन में कोई मशीनरी है जो

खराब हो गई है और उसे मरम्मत की जरूरत है। वह सलाह देने लगता है। वह भविष्य की योजनाएं बनाने लगता है। वह उसे समझाता है

कि उसे मजबूत होना चाहिए। उसे इस तरह से हार नहीं माननी चाहिए और इसी एक झटके में वह सब कुछ नष्ट कर देता है। स्त्री जो

अपने सबसे खुले पल में थी, वह तुरंत वापस सिकुड़ जाती है। वह देखती है कि जिसके सामने उसने अपना कवच उतारा था, वह तो खुद

हथौड़ा लेकर खड़ा है। वह फिर से अपना कवच पहन लेती है। उसके आंसू सूख जाते हैं। वह

गहरी सांस लेती है। उठती है और कहती है तुम सही कह रहे हो मुझे कमजोर नहीं पड़ना चाहिए और इसके साथ ही वह द्वार जो कुछ

पलों के लिए खुला था हमेशा के लिए बंद हो जाता है पुरुष सोचता है कि उसने बहुत अच्छा काम किया उसने अपनी स्त्री को मजबूत

बना दिया उसने समस्या का समाधान कर दिया लेकिन असल में उसने प्रेम के खिलने की सबसे बड़ी संभावना को अपने ही हाथों कुचल

पुरुष चूक क्यों जाता है? क्योंकि वह

स्त्री के मन की दिशा को नहीं समझता। जब वह कमजोर दिख रही होती है, जब वह भावनात्मक रूप से उफान पर होती है, तब उसका मन किसी समाधान की तरफ नहीं जा रहा

होता। वह कोई रास्ता नहीं ढूंढ रही होती। तर्कों से वह थक चुकी है। हिसाब किताब से उसका मन भर चुका है। वह उस पल किसी

मार्गदर्शक को नहीं ढूंढ रही है जो उसे बताए कि क्या करना सही है और क्या गलत। वह तो बस एक उपस्थिति को ढूंढ रही है।

तुम्हें उस मनोदशा को बहुत गहराई से महसूस करना होगा। जब एक स्त्री उस गहरे भावनात्मक पल में होती है तो उसे तुम्हारे

शब्दों की नहीं तुम्हारे मौन की जरूरत होती है। उसे तुम्हारे समाधानों की नहीं तुम्हारे स्पर्श की जरूरत होती है। उसे एक

ऐसी सुरक्षित जगह चाहिए जहां उसे यह साबित ना करना पड़े कि वह मजबूत है जहां उसे सही या गलत होने के दबाव से मुक्ति मिल सके।

स्त्री दर्शन से जुड़ी प्राचीन पुस्तकों में उन गहरे ग्रंथों में जहां मानव मन के रहस्य खोले गए हैं। एक बहुत ही अनूठी बात

कही गई है। उन पुस्तकों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि स्त्री का सबसे गहरा स्वभाव उसकी ग्रहणशीलता है। पुरुष का

स्वभाव आक्रामक है। वह बाहर की तरफ भागता है। वह जीतना चाहता है। वह प्रकृति को बदलना चाहता है। लेकिन स्त्री का मूल

स्वभाव एक खालीपन है, एक गहराई है। एक असीम ग्रहणशीलता है। जैसे धरती बीज को ग्रहण करती है, वैसे ही स्त्री ऊर्जा को

ग्रहण करती है। उन प्राचीन किताबों का सार यह है कि जिसे दुनिया स्त्री की कमजोरी समझती है, वही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। एक

कठोर चट्टान पर तुम कुछ नहीं उगा सकते क्योंकि वह बहुत मजबूत है। लेकिन एक मुलायम मिट्टी जो तुम्हारे हाथों से दब

जाती है जो पानी पड़ने पर गीली हो जाती है उसी में जीवन अंकुरित होता है। स्त्री जब उस कमजोर पल में होती है तब वह दरअसल उस

मुलायम मिट्टी की तरह होती है। वह प्रेम के बीज को ग्रहण करने के लिए पूरी तरह से तैयार होती है। उसका अहंकार उस समय शून्य

पर होता है। उसकी सुरक्षा दीवारें गिरी हुई होती हैं। जो पुरुष इस रहस्य को समझ लेता है, वह उस पल में कोई शब्द नहीं

बोलता। वह कोई सलाह नहीं देता। वह बस उसके पास बैठता है। वह उसे अपने सीने से लगा लेता है। वह उसके बालों को सहलाता है। वह

बस वहां उपस्थित रहता है। पूरी तरह से। वह उसे यह महसूस कराता है कि तुम जैसी भी हो, इस थकी हुई टूटी हुई अवस्था में भी तुम

मेरे लिए पूरी तरह से स्वीकार्य हो। तुम्हें मेरे सामने योद्धा बनने की जरूरत नहीं है। और जब कोई पुरुष यह करता है तब

एक चमत्कार घटता है। जब वह बिना कुछ कहे बिना कोई तर्क दिए बस एक मौन उपस्थिति बन जाता है तब वह स्त्री के दिल की सबसे गहरी

परतों तक पहुंच जाता है। वह उस स्त्री की चेतना में हमेशा के लिए जड़े जमा लेता है। स्त्री का अवचेतन मन उस पुरुष को अपनी अंतिम सुरक्षा के रूप में दर्ज कर लेता

है। इसके बाद चाहे जीवन में कितने ही तूफान आए, चाहे कितनी ही असहमतियां हो, वह स्त्री कभी उस पुरुष से दूर नहीं जा सकती।

क्योंकि उसने देखा है कि जब वह सबसे ज्यादा नग्न और असुरक्षित थी, तब इस पुरुष ने उस पर कोई प्रहार नहीं किया बल्कि उसे

अपने प्रेम की चादर से ढक दिया। लेकिन बहुतांश लोग इस रहस्य से चूक जाते हैं और उनके चूकने का कारण उनका अपना अज्ञान है।

उनका अपना अहंकार है। पुरुष सोचता है कि अगर उसने स्त्री की समस्या का समाधान नहीं किया तो वह पुरुष कैसा? उसका पुरुषार्थ

हमेशा कुछ करने में लगा रहता है। वह भूल जाता है कि कभी कभी सबसे बड़ा काम कुछ ना करना होता है। स्त्री के उस पल को समझना कोई बौद्धिक प्रक्रिया नहीं है। तुम किसी

किताब को पढ़कर इसे नहीं सीख सकते। तुम्हें इसे अपनी संवेदनशीलता से महसूस करना होगा। जब तुम्हारी स्त्री तुम्हारे सामने मौन हो तो उसके मौन को तोड़ने की

जल्दबाजी मत करो। उस मौन को सुनो। जब वह अकारण रो रही हो तो उसके आंसुओं को रोकने की कोशिश मत करो। उन आंसुओं को बहने दो।

वे सदियों की थकान को धो रहे हैं। वे उसे हल्का कर रहे हैं। यदि तुम गौर करो तो पाओगे कि स्त्री का जीवन पुरुष से बहुत

अलग है। उसकी जैविक संरचना, उसकी मानसिक बनावट सब कुछ चांद की तरह जो घटता है, जो

बढ़ता है, जिसमें उतारव आते हैं। पुरुष सूरज की तरह एक सा एक जैसी तीव्रता वाला हमेशा तर्क की रोशनी से भरा हुआ। जब चांद

पूरी तरह से अंधेरे में होता है, जब अमावस्या की रात होती है, तब सूरज उसे रोशनी देने के लिए उसके पास नहीं जाता। सूरज बस दूर से अपनी उपस्थिति बनाए रखता

है। स्त्री की उस कमजोर अवस्था, उस शून्यता की अवस्था में उसका पूरा मन सिर्फ एक ही दिशा में भागता है। सुरक्षा और

ठहराव की दिशा में। वह उस व्यक्ति को ढूंढती है जो पहाड़ की तरह स्थिर हो जो उसकी भावनाओं के तूफान में खुद ना बह जाए

बल्कि एक किनारे की तरह मौजूद रहे जिससे टकराकर उसकी लहरें शांत हो सके। अगर तुम उसके रोते समय खुद घबरा गए। अगर तुम उसकी

उदासी देखकर खुद परेशान हो गए और पूछने लगे कि अब मैं क्या करूं? तो वह समझ जाएगी कि तुम वह पहाड़ नहीं हो। तुम तो खुद एक

छोटी सी लहर हो जो उसके तूफान से डगमगा गई और फिर वह कभी तुम्हारे सामने अपना कवच नहीं उतारेगी। वह तुम्हारे साथ हंसेगी। तुम्हारे साथ बाजार जाएगी। तुम्हारे साथ

जीवन बिता लेगी। लेकिन वह तुम्हें कभी अपना वह गहरा नाजुक हिस्सा नहीं सौंपेगी। तुम बस उसके साथ ही रहोगे। तुम उसके प्रेमी नहीं बन पाओगे। स्त्री का वह एक

पल। प्रकृति का दिया हुआ एक बहुत बड़ा अवसर है। प्रकृति स्वयं तुम्हें आमंत्रण दे रही है कि आओ और इस स्त्री के भीतर

प्रवेश करो। लेकिन हम इतने मूढ़ हैं, इतने अंधे हैं कि हम द्वार खुलने पर वहां पीठ करके खड़े हो जाते हैं और व्यर्थ की बातों में उलझ जाते हैं। तुम्हें यह याद रखना

होगा कि स्त्री जब अपने सबसे बड़े भावनात्मक उफान पर होती है तब वह तर्कों को उसी तरह खारिज कर देती है जैसे पानी आग

को बुझा देता है। तुम उसे कितना भी समझाओ कि तुम्हारा रोना तर्कसंगत नहीं है। तुम्हारी परेशानी का कोई वास्तविक आधार नहीं है। वह तुम्हारी बात नहीं सुनेगी

बल्कि तुम्हारे यह तर्क उसे और भी ज्यादा अकेला महसूस कराएंगे। उसे लगेगा कि दुनिया में कोई भी उसे नहीं समझता। तुम भी नहीं।

प्राचीन ग्रंथों में इस अवस्था को बहुत सुंदर नाम दिए गए हैं। इसे समर्पण की अवस्था कहा गया है। यह वह अवस्था है जहां

मैं पूरी तरह से मिटने को तैयार होता है। अहंकार थक चुका होता है। और प्रेम केवल वहीं घट सकता है जहां अहंकार ना हो। इसलिए

जब वह कमजोर महसूस कर रही हो जब वह निढाल हो तब समझ लेना कि उसका अहंकार सो गया। यह प्रेम के बीज बोने का सबसे सही समय है।

लेकिन यह सब कैसे होगा? यह तब होगा जब तुम भीतर से शांत होगे। जब तुम्हारे भीतर यह जल्दी नहीं होगी कि सब कुछ तुरंत ठीक कर दिया जाए। तुम्हें समय को ठहरने देना

होगा। तुम्हें उस उदासी को, उस बोझ को, उस मौन को अपने कमरे में जगह देनी होगी। तुम्हें उस स्त्री के साथ उस अंधेरे में

बैठने की हिम्मत जुटानी होगी। पुरुष अक्सर अंधेरे से डरता है। भावनाओं के गहरे पानी में उतरने से डरता है। उसे उथले पानी में

किनारों पर खेलना पसंद है। जहां सब कुछ साफ-साफ दिखाई देता है। जहां तर्क काम करते हैं। लेकिन स्त्री गहरे समंदर की तरह

उसकी असली सुंदरता उसके असली रहस्य किनारों पर नहीं मिलते। उसके रहस्यों को जानने के लिए तुम्हें गहरे पानी में उतरना

ही होगा। वहां जहां तुम्हारी बुद्धि का कोई उपयोग नहीं होगा। जहां केवल तुम्हारा मौन और तुम्हारी उपस्थिति ही तुम्हारी नाव

बनेगी। तुमने अक्सर देखा होगा जो पुरुष बहुत ज्यादा बोलते हैं, जो बहुत ज्यादा तर्क करते हैं, उनकी स्त्रियां कभी पूरी

तरह से तृप्त नहीं होती। वे हमेशा एक अतृप्ति में जीती हैं। उनके पास भौतिक सुख सुविधाएं हो सकती हैं। लेकिन उनकी आंखों

में एक सूखापन रहता है। क्योंकि उनके पुरुष ने कभी उस एक पल को नहीं पकड़ा। वह पुरुष बस बाहर बाहर ही घूमता रहा। उस एक

पल को पहचानना कोई जादू नहीं। यह केवल ध्यान की बात है। जब तुम अपनी स्त्री के साथ हो तो सच में उसके साथ रहो। अपने दफ्तर की उलझनों में नहीं। अपने विचारों

के जाले में नहीं। जब तुम ध्यान पूर्ण होगे तभी तुम देख पाओगे कि कब उसके चेहरे से वह कठोर नकाब सरक गया है। कब उसकी

आंखों की भाषा बदल गई है। और जब वह पल आए तो कुछ मत करना। बस उसके करीब जाना। एक गहरा आलिंगन जो बिना कुछ कहे यह संदेश दे

दे कि मैं यहां हूं। तुम्हें कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी धड़कन जब उसकी धड़कन के पास होगी तो बिना शब्दों के

एक बहुत बड़ा संवाद हो जाएगा। वह महसूस करेगी कि तुम उसे ठीक करने की कोशिश नहीं कर रहे हो। तुम बस उसे स्वीकार कर रहे हो

और यही वह स्वीकृति है जो स्त्री के मन को हमेशा के लिए तुम्हारा गुलाम बना देती है। गुलाम इस अर्थ में नहीं कि तुम उस पर

हुक्म चलाओगे बल्कि इस अर्थ में कि वह अपनी मर्जी से अपने पूरे होशोहवास में अपना सब कुछ तुम्हारे चरणों में रख देगी। क्योंकि [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसे

वह जगह मिल गई है जिसकी उसे हमेशा से तलाश थी। उसे अपना घर मिल गया है। तुम्हें कभी उसे मनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि

रूठना और मनाना तो अहंकार का खेल है। जहां अहंकार ही गल गया हो, जहां उसने तुम्हारे सामने खुद को पूरी तरह उगाड़ दिया हो,

वहां कैसा रूठना और कैसा मनाना। वहां तो बस एक अद्वैत रह जाता है। एक गहरा जुड़ाव रह जाता है। जिसे कोई बाहरी शक्ति नहीं

तोड़ सकती। इसे एक बहुत ही गहरे मनोविज्ञान के रूप में समझना। दुनिया की कोई भी किताब, कोई भी विश्वविद्यालय

तुम्हें यह नहीं सिखा सकता। यह जीवन की पाठशाला का सबसे गुप्त पाठ है। स्त्री जब तक लड़ रही है तब तक वह पुरुष के बराबर है

या शायद उससे भी आगे है। लेकिन जब वह लड़ना छोड़ देती है। जब वह थक कर बैठ जाती है तब वह पूरी तरह से एक स्त्री होती है।

उस समय वह तुम्हारे पुरुषत्व को चुनौती नहीं दे रही होती। वह तुम्हारे पुरुषत्व को पुकार रही होती है। वह पुकार रही होती है कि आओ और मुझे अपने घेरे में ले लो

ताकि मैं सुरक्षित महसूस कर सकूं और जो मूढ़ इस पुकार को नहीं सुन पाता जो उस समय भी उसे यह ज्ञान देने लगता है कि तुम्हें

मजबूत होना चाहिए। तुम्हें इस तरह रोना नहीं चाहिए। वह दरअसल अपने ही हाथों अपने घर में आग लगा रहा है। वह अपनी स्त्री को

यह सिखा रहा है कि तुम्हें मेरे सामने भी वही कवच पहनकर रहना होगा जो तुम दुनिया के सामने पहनती हो। और जिस स्त्री ने अपने प्रेमी के सामने भी कवच पहन लिया। फिर वो

प्रेमिका कहां रही? वो तो एक साथी सैनिक बन गई। जिसके साथ तुम जीवन का युद्ध तो लड़ सकते हो लेकिन जिसके साथ तुम जीवन का संगीत नहीं सुन सकते। स्त्री दर्शन की

महान पुस्तकों का यही सबसे बड़ा रहस्य है। उन्होंने स्त्री को एक पहेली कहा है। लेकिन यह पहेली उनके लिए है जो इसे गणित

की तरह हल करना चाहते हैं। जो इसे कविता की तरह पढ़ना जानते हैं। उनके लिए यह कोई पहेली नहीं है। यह एक खुला आकाश है। यह एक

ऐसा गीत है जो तुम्हें अपने साथ बहा ले जाने को तैयार है। बशर्ते तुम नाव की पतवार छोड़ने की हिम्मत जुटा सको। तुम्हें

बस इतनी सी बात याद रखनी है कि कमजोरी कोई बुरी बात नहीं है। हम सभी कभी ना कभी कमजोर होते हैं। लेकिन स्त्री की कमजोरी

एक बहुत ही पवित्र घटना है। वह उसकी कोमलता का विस्फोट है। उस पल में वह परमात्मा के सबसे करीब होती है क्योंकि वह

शून्य होती है। और अगर तुम उस शून्य में प्रवेश करना सीख गए। अगर तुम बिना उसे भरे, बिना उसे अपने तर्कों से प्रदूषित

किए उस शून्य का हिस्सा बनना सीख गए तो तुम उस स्त्री के भीतर ही परमात्मा का दर्शन कर लोगे। तुम्हें किसी मंदिर या मस्जिद जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

तुम्हारा अपना घर, तुम्हारा अपना शयन कक्ष एक तीर्थ बन जाएगा। लेकिन इसके लिए तुम्हें अपने भीतर के उस समस्या सुलझाने

वाले को मारना होगा। तुम्हें उस सलाहकार को विदा करना होगा जो हर बात पर अपनी राय देना चाहता है। जब वह रोए तो उसे रोने दो।

जब वह चुप रहे तो उसकी चुप्पी को पियो। जब वह उदास हो तो उस उदासी के रंग में खुद को रंग जाने दो। कोई जल्दबाजी मत करो। कोई

हड़बड़ी मत दिखाओ। बस ठहरो। समय को रुक जाने दो। और तुम देखोगे कि उसी मौन से उसी ठहरे हुए समय से एक ऐसा प्रेम जन्म लेगा

जिसकी तुमने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। एक बहुत पुरानी और गहरी कथा है। इसे सिर्फ एक कहानी की तरह मत सुनना क्योंकि यह तुम्हारे ही जीवन का एक अक्स है। किसी

पुराने समय की बात है। एक गांव के बाहर एक नदी बहती थी। शाम का समय था और सूरज ढल रहा था। नदी के किनारे एक स्त्री बैठी रो

रही थी। वह बहुत फूट-फूट कर [गला साफ़ करने की आवाज़] रो रही थी। जैसे उसके भीतर का कोई बहुत बड़ा बांध टूट गया हो। उसकी आवाज में एक अजीब सी तड़प थी।

गांव के कुछ समझदार लोग वहां से गुजरे। उन्होंने उस स्त्री को रोते हुए देखा तो उनके भीतर का वह समाधान खोजने वाला पुरुष

जाग उठा। एक व्यक्ति उसके पास गया और पूछने लगा क्या हुआ? तुम क्यों रो रही हो?

क्या किसी ने तुम्हें कुछ कहा है? मुझे

बताओ। मैं अभी जाकर उसे सबक सिखाता हूं। उस स्त्री ने कोई जवाब नहीं दिया। वह और जोर से रोने लगी। फिर दूसरा व्यक्ति आया

जो खुद को बहुत ज्ञानी मानता था। उसने कहा देखो इस तरह रोना कमजोरी की निशानी है। जीवन में दुख आते हैं। हमें मजबूत होना

चाहिए। रोने से कोई समस्या हल नहीं होती। उठो और अपनी परेशानी का सामना करो। उस स्त्री ने अपना चेहरा घुटनों में छिपा

लिया और उसका शरीर सिसकियों से कांपने लगा। तभी वहां से एक फकीर गुजरा। वह एक ऐसा व्यक्ति था [गला साफ़ करने की आवाज़]

जिसने जीवन के रहस्यों को किताबों से नहीं बल्कि ध्यान से जाना था। उसने उस भीड़ को देखा। उस रोती हुई स्त्री को देखा। और उन

ज्ञान देने वाले लोगों को देखा। वह फकीर चुपचाप उस स्त्री के पास गया। उसने कोई सवाल नहीं पूछा। उसने यह नहीं कहा कि रोना

बंद करो। उसने कोई सलाह नहीं दी। वह बस उस स्त्री के ठीक बगल में जमीन पर बैठ गया। उसने अपनी आंखें बंद की और वह पूरी तरह से

शांत हो गया। उसका मौन इतना गहरा था कि वह मौन उस स्त्री तक पहुंचने लगा। वह फकीर बस

वहां था। एक पहाड़ की तरह स्थिर। थोड़ी देर बाद उस स्त्री का रोना कम होने लगा। उसने सिर उठाकर उस फकीर को देखा। फकीर की

आंखों में कोई सवाल नहीं था। कोई फैसला नहीं था। सिर्फ एक गहरी स्वीकारिता थी। स्त्री ने अपना सिर उस फकीर के कंधे पर रख

दिया और गहरी सांस ली। उसका सारा तनाव, उसकी सारी लड़ाई, उसकी सारी तड़प उस एक पल में शांत हो गई। वह फकीर कुछ नहीं बोला।

वह स्त्री कुछ नहीं बोली। लेकिन उस एक पल में उस फकीर ने उस स्त्री के दिल में हमेशा के लिए अपना घर बना लिया। यह कथा

हमें क्या सिखाती है? यह बताती है कि जब स्त्री अपने सबसे गहरे उफान पर होती है, तब उसे तुम्हारे शब्दों की, तुम्हारे तर्कों की, तुम्हारे ज्ञान की कोई

आवश्यकता नहीं होती। प्राचीन दर्शन में उन गहरे रहस्यों में जो अब लगभग खो चुके हैं। स्त्री के इस मनोविज्ञान को बहुत विस्तार

से समझाया गया है। वहां बताया गया है कि प्रकृति ने दो तरह की ऊर्जाएं बनाई है। एक सक्रिय ऊर्जा जो हमेशा बाहर की तरफ भागती

है जो हमेशा कुछ करना चाहती है। जो जीतना चाहती है। यह पुरुष की ऊर्जा है। और दूसरी है निष्क्रिय ऊर्जा जो ठहरना जानती है। जो

अपने भीतर एक खालीपन रखती है, जो ग्रहण करना जानती है, यह स्त्री की ऊर्जा है। इसे ऐसे समझो। एक प्याला है। प्याले की

असली कीमत क्या है? उसकी मिट्टी, उसका आकार नहीं। प्याले की असली कीमत उसका खालीपन है। उसी खालीपन में तुम जल भर सकते

हो। अगर प्याला पहले से ही भरा हो तो वह किसी काम का नहीं। स्त्री का मन जब अपनी उस सबसे कमजोर लगने वाली अवस्था में होता

है तब वह असल में उस खाली प्याले की तरह होता है। वह एक शून्य अवस्था है। दिन भर वह स्त्री भी पुरुष की तरह सक्रिय ऊर्जा

में जीती है। वह दफ्तर में काम करती है। वह घर संभालती है। वह दुनिया से लड़ती है। लेकिन जब वह अचानक मौन हो जाए या अचानक

रोने लगे या अचानक उदास हो जाए, तो समझ लेना कि वह अपनी मूल ऊर्जा में लौट आई है। वह खाली हो गई है। वह ग्रहण करने के लिए

तैयार है। यही वह समय है जब वह सबसे ज्यादा खुली होती है। सबसे ज्यादा भावुक होती है। वह उस समय यह ढूंढ रही होती है

कि कोई आए और उसके इस खालीपन को अपने प्रेम से अपनी स्थिर उपस्थिति से भर दे। लेकिन पुरुष क्या करता है? वह उस खालीपन

को अपने तर्कों से, अपनी व्यर्थ की सलाहों से भरने की कोशिश करता है। और तर्क कभी प्याले को नहीं भरते। वे तो उस प्याले को

ही तोड़ देते हैं। चलो इसे तुम्हारे आज के जीवन से जोड़कर देखते हैं। तुम एक महानगर में रहते हो। तुम्हारी एक भाग दौड़ भरी

जिंदगी है। तुम दफ्तर से थके हारे लौटते हो और तुम्हारी पत्नी या तुम्हारी प्रेमिका भी अपने काम से लौटती है। एक दिन

अचानक वह घर आती है और किसी बहुत छोटी सी बात पर भड़क जाती है। शायद तौलिया सही जगह पर नहीं रखा है। यह पानी का गिलास गिर गया

है। वह चिल्लाने लगती है। वो शिकायत करने लगती है। अब सामान्य पुरुष क्या करेगा? वह

तुरंत अपना कवच पहन लेगा। वह पलट कर लड़ने लगेगा। वह कहेगा तुम बात का बतंगड़ क्यों बना रही हो? तौलिया ही तो है। मैं रख देता

हूं। तुम हर समय क्यों झगड़ती रहती हो? और

जैसे ही पुरुष यह कहता है वह स्त्री और ज्यादा आक्रामक हो जाती है। बात तौललिए से शुरू होकर पिछले 10 सालों की शिकायतों तक पहुंच जाती है। लेकिन अगर तुमने उस गहरे

रहस्य को समझ लिया है तो तुम देखोगे कि वह तौललिए के लिए नहीं लड़ रही है। वो पानी के गिलास के लिए नहीं चिल्ला रही है। वो

थक गई है। उसके भीतर एक अजीब सा खालीपन है। एक असुरक्षा है जो इस क्रोध के रूप में बाहर आ रही है। वह असल में यह कह रही

है कि मैं बहुत थक गई हूं। मुझे संभाल लो। जिस पुरुष ने इस रहस्य को जान लिया वह उस समय मुस्कुराएगा।

वह तर्कों में नहीं उलझेगा। वह उसके करीब जाएगा। उसके हाथ से वह तौलिया ले लेगा।

उसे एक तरफ फेंक देगा और उस स्त्री को अपनी बाहों में भर लेगा। वह बस इतना कहेगा

छोड़ो इन सब बातों को। तुम बस मेरे पास आओ और तुम देखोगे कि उसका सारा क्रोध सारी शिकायतें उस एक आलिंगन में पिघल जाएंगी।

वह तुम्हारे सीने पर सिर रखकर शायद रोने लगे। यह उसका वह कमजोर पल था जिसे तुमने अपनी समझ से प्रेम के सबसे गहरे पल में

बदल दिया। अब मैं तुम्हें उन तीन विशेष परिस्थितियों के बारे में बताता हूं जो तुम्हारे रोजमर्रा के जीवन में बार-बार घटती हैं और जहां तुम्हें इस रहस्य को

लागू करना है। ध्यान से समझना क्योंकि यह केवल दर्शन नहीं है। यह जीवन की कीमिया है। पहली परिस्थिति

अकारण क्रोध या चिड़चिड़ापन। जब वह अचानक बिना किसी बड़े कारण के क्रोधित हो जाए। छोटीछोटी बातों पर चिड़चिड़ करने लगे तो

उसे शांत होने के लिए मत कहना। उसे यह मत समझाना कि उसका क्रोध अनुचित है। जब तुम कहते हो शांत हो जाओ तो तुम असल में उसकी

भावनाओं को दबाने की कोशिश कर रहे होते हो। ऐसे समय में तुम्हें अपने भीतर एक

गहरा मौन साधना है। उसकी आंखों में देखो लेकिन विरोध से नहीं करुणा से। उसे महसूस होने दो कि उसका क्रोध तुम्हें हिला नहीं

पा रहा है। तुम्हारी वह अचंचल उपस्थिति उसके भीतर के तूफान को खुद ब खुद शांत कर देगी। उसे सिर्फ तुम्हारी स्थिर ऊर्जा की

जरूरत है। तुम्हारे तर्कों की नहीं। दूसरी परिस्थिति अचानक मौन और दूरी कभी कभी वह

बिल्कुल चुप हो जाएगी। वह तुमसे दूर-दूर रहने लगेगी। तुम पूछोगे तो कहेगी कुछ नहीं। यह मौन क्रोध से भी ज्यादा खतरनाक

लगता है। पुरुष इस मौन से बहुत घबराता है। वह इसे अपना अपमान समझता है या सोचता है कि उसने कुछ गलत कर दिया है। वह उसे कुरेदने लगता है। बताओ क्या हुआ है? तुम

ऐसे चुप क्यों हो? मत कुरेदो।

यह वह पल है जब वह अपने भीतर किसी गहरी उदासी से गुजर रही है। वह उस उदासी में खुद को समेट रही है। तुम्हें बस इतना करना

है कि तुम उसके आसपास बने रहो। अपना काम करते रहो। लेकिन अपनी चेतना को उसके पास रखो। कभी अचानक जाकर उसके माथे को चूम लो

और बिना कुछ कहे वापस आ जाओ। कभी उसके पास बैठकर उसका हाथ अपने हाथ में ले लो। यह बिना शब्दों का संवाद उसे यह भरोसा

दिलाएगा कि उसके मौन में उसकी इस उखड़ी हुई मनोस्थिति में भी तुम उसे छोड़कर नहीं गए हो। तीसरी परिस्थिति

पूर्ण मानसिक या शारीरिक बिखराव एक ऐसा पल भी आता है जब वह पूरी तरह से टूट जाती है। वह निढाल हो जाती है। शायद वह बीमार हो।

शायद किसी बात ने उसे बहुत गहरी चोट पहुंचाई हो। वह बस लेटी रहती है। उसकी आंखों में कोई जीवन नहीं दिखता। यह वह समय

है जब वह अपने सबसे गहरे शून्य में होती है। इस समय वह दुनिया की सबसे कमजोर चीज लग सकती है। यही वह पल है जहां तुम्हें

अपना पूरा पुरुषत्व, अपनी पूरी आध्यात्मिक ऊर्जा उसके सामने उड़ेल देनी है। तुम्हें

उसके लिए एक ऐसा घेरा बनाना है जहां वह खुद को सुरक्षित महसूस करें। इस समय उसे

तुम्हारी छुवन की तुम्हारे गर्मजशी भरे आलिंगन की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। उसे एक बच्चे की तरह संभालो। उसे महसूस कराओ

कि जब वह खुद को नहीं संभाल सकती तब तुम मौजूद हो। अब जहां भी तुम इस समय बैठे हो, मेरे साथ एक छोटा सा प्रयोग करो। यह

प्रयोग तुम्हारे भीतर की सोई हुई समझ को जगह देगा। अपनी आंखें बंद करो। हां इसी वक्त अपनी आंखें बंद कर लो। एक गहरी सांस

लो। अब अपने मन में उस स्त्री को याद करो जिसे तुम प्रेम करते हो। उसके चेहरे को देखो। अब उस पल को याद करो जब वह सबसे

ज्यादा उदास, परेशान या क्रोधित थी। याद करो कि उस समय तुम्हारे भीतर क्या चल रहा था। तुम्हारे भीतर उसे ठीक करने की, उसे

समझाने की, उसे तर्क देने की जो जल्दबाजी उठ रही थी, उसे महसूस करो। अब मेरी आवाज के साथ-साथ अपने भीतर की उस जल्दबाजी को

धीरे-धीरे छोड़ दो। उस तड़प को छोड़ दो कि तुम्हें कुछ सही करना है। बस खुद को पूरी तरह से शांत और स्थिर महसूस करो। देखो कि

जब तुम अपने तर्कों को गिरा देते हो, जब तुम उसे ठीक करने का अहंकार छोड़ देते हो, तो तुम्हारे भीतर कितनी गहरी शांति आ जाती

है। इस शांति में, इस मौन में उस स्त्री को अपनी बाहों में महसूस करो। देखो कैसे वह तुम्हारी इस शांति में पिघल रही है। अब

आंखें खोल लो। तुमने जो अभी महसूस किया, यह कोई नई बात नहीं थी। यह सिर्फ एक स्मरण था। यह तुम्हारी अपनी ही चेतना का,

तुम्हारे अपने ही स्वभाव का स्मरण था। जिसे तुम दुनिया की भागदौड़ और तर्कों की लड़ाई में भूल गए थे। स्त्री का वह एक पल

जब वह सबसे कमजोर होती है। दरअसल प्रकृति का तुम्हारे लिए भेजा गया एक निमंत्रण पत्र है। यह [नाक से की जाने वाली आवाज़]

आमंत्रण है कि तुम किनारे को छोड़कर गहरे सागर में उतरो। पुरुष हमेशा किनारे पर घर बनाना चाहता है। वह हिसाब किताब रखता है

कि उसने क्या दिया और उसे क्या मिला। लेकिन प्रेम कोई व्यापार नहीं है। प्रेम तो एक जुआ है जिसमें तुम्हें अपना सब कुछ

दांव पर लगाना होता है। जब वह स्त्री उस पल में तुम्हें पुकारती है शब्दों से नहीं

अपने मौन से, अपने आंसुओं से, अपने चिड़चिड़ेपन से। तब वह यह देख रही होती है कि क्या तुम किनारे को छोड़ने का साहस

रखते हो? क्या तुम उसके उस अंधेरे में,

रखते हो? क्या तुम उसके उस अंधेरे में, उसके उस तूफान में बिना डरे प्रवेश कर सकते हो? और जो पुरुष यह साहस कर लेता है,

सकते हो? और जो पुरुष यह साहस कर लेता है, जो बिना किसी शर्त, बिना किसी समाधान के बस उसके साथ खड़ा हो जाता है, वह पुरुष

हमेशा के लिए उस स्त्री का देवता बन जाता है। फिर उनके बीच जो संबंध बनता है, वह साधारण पति, पत्नी या प्रेमी प्रेमिका का

संबंध नहीं रह जाता। वह दो आत्माओं का एक गहरा नृत्य बन जाता है। फिर तुम्हें उसे खुश रखने के लिए महंगे उपहारों की जरूरत नहीं पड़ती। तुम्हें उसे मनाने के लिए

शब्दों के जाल नहीं बुनने पड़ते क्योंकि तुम्हारी वह मौन उपस्थिति, तुम्हारी वह गहरी समझ ही उसके लिए सबसे बड़ा उपहार बन

जाती है। इसलिए अगली बार जब तुम अपनी स्त्री को उस अवस्था में देखो तो घबराना मत, उलझना मत। उसे एक समस्या की तरह मत

देखना जिसे तुम्हें हल करना है। उसे एक द्वार की तरह देखना जो तुम्हारे लिए खुला है। उस द्वार में मौन के साथ प्रवेश करना।

अपने अहंकार के जूते बाहर उतार देना। अपने तर्कों का बोझ वहीं छोड़ देना। बस एक कोरे कागज की तरह उसके पास जाना। और तुम देखोगे

कि कैसे वह कमजोर सा लगने वाला पल तुम्हारे जीवन के सबसे सुंदर, सबसे गहरे और सबसे मजबूत प्रेम की नींव बन जाएगा। का है।

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