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The Power of Mental Discipline Train Your Brain For Absolute Discipline Completely

By Books review hub

Summary

Topics Covered

  • ब्रेन सर्वाइवल के लिए है, सक्सेस के लिए नहीं
  • डोपामिन ट्रैप: इंस्टेंट प्लेज़र vs लॉन्ग-टर्म गोल्स
  • आइडेंटिटी विल पावर से ज़्यादा पावरफुल है
  • एनवायरमेंट डिज़ाइन: डिसिप्लिन को एफर्टलेस बनायें
  • डेली हैबिट्स कंपाउंड होकर ज़िंदगी बदल देते हैं

Full Transcript

सोचिए अगर मैं आपसे कहूं कि आपकी सबसे बड़ी दुश्मन कोई इंसान नहीं, कोई सरकमस्टेंस नहीं बल्कि आपका अपना ब्रेन

है। वही ब्रेन जो हर सुबह आपको स्नूज़ बटन दबाने पर मजबूर करता है। वही ब्रेन जो आपको डेडलाइन के आखिरी दिन तक काम टालने देता है। वही ब्रेन जो आपको कन्विंस करता

है कि कल से स्टार्ट करूंगा और कल कभी आता नहीं। तो क्या आप मानेंगे? सच यह है कि डिसिप्लिन कोई टैलेंट नहीं है। कोई गिफ्ट नहीं है जो कुछ लोगों को पैदा होते ही मिल

जाता है। यह एक ट्रेनेबल स्किल है और इस वीडियो के एंड तक आप एग्जैक्टली समझ जाएंगे कि अपने ब्रेन को कैसे रिप्रोग्राम करना है ताकि डिसिप्लिन आपकी आइडेंटिटी बन

जाए ना कि एक डेली स्ट्रगल। इस वीडियो में आप जानेंगे कि आपका ब्रेन डिफॉल्ट क्यों कंफर्ट चूज करता है। डोपामाइन का वो हिडन ट्रैप जो आपकी प्रोडक्टिविटी चुपके से

खत्म कर रहा है। विल पावर और आइडेंटिटी का असली डिफरेंस। स्मॉल विंस की इनविज़िबल पावर। एनवायरनमेंट डिजाइन का सीक्रेट हैक जो सक्सेसफुल लोगों को एफर्टलेसली

डिसिप्लिन बनाता है। अपने इमोशंस को मास्टर करने का तरीका और वो कंपाउंडिंग इफेक्ट जो छोटे डेली एकशंस को एक साल में एक पूरी नई लाइफ में बदल देता है। लेकिन यह सब तभी काम करेगा जब आप इस वीडियो को

एंड तक देखेंगे। क्योंकि हर चैप्टर पिछले से ज्यादा पावरफुल है। अगर आप सच में अपनी लाइफ चेंज करना चाहते हैं तो अभी इस वीडियो को लाइक करिए। कमेंट में लिखिए आई विल ट्रेन माय ब्रेन। और अगर आपको ऐसे ही

लाइफ चेंजिंग कंटेंट चाहिए तो चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए। अब तैयार हो जाइए क्योंकि जो आप आगे जानेंगे वो आपकी सोच को हमेशा के लिए बदल देगा। चैप्टर वन द ब्रेन

डिफॉल्ट प्रोग्रामिंग। एक सवाल अगर आपको पता चले कि आपका ब्रेन एक मशीन है जो हमेशा सबसे इजी रास्ता चूज़ करता है। चाहे वह रास्ता आपके लिए सही हो या नहीं। तो

क्या आप इस मशीन को कंट्रोल करना सीखेंगे या इसी के हवाले अपनी जिंदगी छोड़ देंगे?

असल में आपका ब्रेन सर्वाइवल के लिए डिजाइन हुआ है। सक्सेस के लिए नहीं। इसका सिर्फ एक ही काम है एनर्जी बचाना और खतरे से बचना। और इसीलिए जब भी कोई मुश्किल काम

आता है, आपका ब्रेन उसे थ्रेट की तरह देखता है और आपको कंफर्ट की तरफ पुश करता है। सोचिए आपने कितनी बार प्लान बनाया है और कितनी बार वह प्लान सिर्फ प्लान रह गया

है। आपका इंटेंशन स्ट्रांग था लेकिन एक्शन वीक था। यह आपकी कमजोरी नहीं है। यह बायोलॉजी है। आपका ब्रेन ऑटो पायलट पर चलता है। जब आप सुबह उठते हैं और फोन

उठाते हैं, जब आप किसी मुश्किल टास्क को देखकर थोड़ी देर बात करूंगा, सोचते हैं, यह सब ऑटोमेटिक पैटर्न्स हैं जो आपके ब्रेन ने इयर्स में बिल्ड किए हैं। लेकिन

यहां एक पावरफुल ट्रुथ है। जिस तरह यह पैटर्न्स बिल्ड हुए हैं, उसी तरह यह रिवायर भी हो सकते हैं। हर बार जब आप डिसकंफर्ट चूज़ करते हैं, इंस्टेड ऑफ कंफर्ट, आप अपने ब्रेन को एक नया सिग्नल

दे रहे होते हैं। आप उसे सिखा रहे होते हैं कि मैं कंट्रोल में हूं तू नहीं। और धीरे-धीरे यह नया पैटर्न आपकी डिफॉल्ट सेटिंग बन जाता है। अब इमेजिन करिए अगर आप

अपने इस ऑटो पायलट को खुद रिप्रोग्राम कर सकें। अगर हर चॉइस आपके कंट्रोल में हो तो एक साल बाद आपकी लाइफ कैसी होगी। लेकिन इस रिप्रोग्रामिंग के पीछे एक हिडन एनिमी है

जो आपको पता भी नहीं चलता और वो है डोपामिन। आगे आप जानेंगे कि यह डोपामिन कैसे आपके ब्रेन को एक ऐसे ट्रैप में डालता है जहां से निकलना मुश्किल हो जाता

है। चैप्टर टू द डोपामिन ट्रैप। कभी सोचा है कि आप फोन उठाते हैं सिर्फ 5 मिनट के लिए और एक घंटा निकल जाता है या आप काम शुरू करने से पहले एक बार Instagram चेक

कर लूं सोचते हैं और फिर उस एक बार में ही आपका पूरा फोकस टूट जाता है। यह कोई एक्सीडेंट नहीं है। यह आपके ब्रेन का डोपामिन सिस्टम है जो चुपके से आपको कंट्रोल कर रहा है। डोपामिन वो केमिकल है

जो आपको रिवॉर्ड का फीलिंग देता है। जब आप कुछ इजी और इंस्टेंट करते हैं जैसे स्क्रोलिंग, जंक फूड या किसी नोटिफिकेशन का रिप्लाई आपका ब्रेन डोपामिन रिलीज करता

है और आपको एक क्विक गुड फीलिंग मिलता है। लेकिन प्रॉब्लम यह है कि जब आपको किसी मुश्किल और इंपॉर्टेंट काम की तरफ जाना होता है। जहां रिवॉर्ड इमीडिएट नहीं होता, आपका ब्रेन वहां से भागने की कोशिश करता

है। इमेजिन करिए आपका ब्रेन एक बच्चा है जिसे कैंडी बहुत पसंद है। आप उस बच्चे को हेल्दी खाना दोगे तो वह मजा नहीं करेगा क्योंकि उसका रिवॉर्ड इंस्टेंट नहीं है।

लेकिन कैंडी दो तो वह खुश हो जाता है तुरंत। यही आपके साथ हो रहा है हर दिन। आपका ब्रेन कैंडी यानी इंस्टेंट प्लेजर की तरफ भागता है और हेल्दी फूड यानी लॉन्ग

टर्म गोल्स को अवॉइड करता है। लेकिन यहां एक ट्विस्ट है। आप इस डोपामिन सिस्टम को अपने अगेंस्ट यूज करने की जगह अपने फेवर में यूज कर सकते हैं। जब आप कोई छोटा डिसिप्लिंड एक्शन कंप्लीट करते हैं जैसे

10 मिनट फोकस करना या एक इंपॉर्टेंट टास्क स्टार्ट करना आपका ब्रेन भी डोपामिन रिलीज करता है। लेकिन यह डोपमिन रियल होता है क्योंकि यह ग्रोथ से आता है डिस्ट्रैक्शन

से नहीं। तो अब सवाल यह है क्या आप अपने डोपामिन के स्लेव हैं या मास्टर? क्या आप

हर नोटिफिकेशन, हर डिस्ट्रैक्शन के पीछे भागते हैं या आप डिसाइड करते हैं कि किस चीज को रिवॉर्ड देना है। लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है क्योंकि डोपामिन से भी डीपर एक

लेयर है और वो है आपकी आइडेंटिटी जो डिसाइड करती है कि आप कौन बन रहे हैं। चैप्टर थ्री आइडेंटिटी ओवर विल पावर।

यहां एक ब्रूटल ट्रुथ है। आपका विल पावर कभी भी इनफ नहीं होगा क्योंकि विल पावर एक लिमिटेड बैटरी है जो दिन भर के डिसीजन से खत्म होती रहती है। लेकिन आइडेंटिटी

आइडेंटिटी परमानेंट है और यही वो फैक्टर है जो डिसाइड करता है कि आप डिसिप्लिन मेंटेन कर पाएंगे या नहीं। सोचिए जब आप खुद से कहते हैं मैं डिसिप्लिन फॉलो करना

चाहता हूं। यह एक एक्सटर्नल प्रेशर बन जाता है। लेकिन जब आप कहते हैं मैं एक डिसिप्लिंड इंसान हूं। यह आपकी आइडेंटिटी बन जाती है और आइडेंटिटी के अगेंस्ट जाना

बहुत मुश्किल होता है। आपने कभी नोटिस किया है कि कुछ लोग एफर्टलेसली डिसिप्लिन दिखते हैं? वो स्ट्रगल नहीं करते जिम जाने

दिखते हैं? वो स्ट्रगल नहीं करते जिम जाने के लिए। वो स्ट्रगल नहीं करते फोकस करने के लिए क्योंकि उनके लिए यह काम करना ऑप्शन नहीं है। यह उनकी आइडेंटिटी का

पार्ट है। अब यहां एक डीप ट्रुथ है जो बहुत कम लोग समझते हैं। आपके एक्शंस आपकी आइडेंटिटी फॉलो करते हैं ना कि आइडेंटिटी आपके एक्शंस फॉलो करती है। अगर आप खुद को

लेजी मानते हैं तो चाहे आप कितनी भी प्लानिंग कर लें आप वापस उसी पैटर्न में लौट आएंगे। लेकिन अगर आप खुद को डिसिप्लिंड मानना स्टार्ट करते हैं। इवन

छोटे लेवल पर आपके एक्शंस ऑटोमेटिकली शिफ्ट होने लगते हैं। लेकिन आइडेंटिटी ओवरनाइट नहीं बदलती। यह एविडेंस से बदलती है। हर बार जब आप कोई छोटा डिसिप्लिन

एक्शन लेते हैं, आप अपने ब्रेन को एविडेंस देते हैं। मैं वह इंसान हूं जो अपनी बात रखता है और यह एविडेंस जितना ज्यादा कलेक्ट होता है, आपकी नई आइडेंटिटी उतनी

ही स्ट्रांग होती जाती है। तो, आप खुद से पूछिए, आप खुद को किस तरह का इंसान मानते हैं और क्या यह बिलीफ आपको आगे ले जा रहा है या पीछे खींच रहा है। क्योंकि अगला

चैप्टर आपको एग्जैक्टली बताएगा कि कैसे यह छोटे-छोटे एक्शंस जो आपको बेकार लगते हैं। असल में आपकी पूरी आइडेंटिटी को रिवायर कर देते हैं। चैप्टर फोर रिवायरिंग थ्रू

स्मॉल विंड्स। एक बहुत कॉमन मिस्टेक है जो लोग करते हैं। वो सोचते हैं कल से मैं पूरी तरह चेंज हो जाऊंगा और यही मिस्टेक उनको फेल कर देती है। क्योंकि ब्रेन एक ही

दिन में बड़े चेंजेस एक्सेप्ट नहीं करता। यह रेजिस्ट करता है। लेकिन छोटे चेंजेस इतने छोटे कि ब्रेन उनको थ्रेट ना समझे। वह एक्सेप्ट हो जाते हैं और धीरे-धीरे

परमानेंट बन जाते हैं। यहां साइंस कहती है कि हर बार जब आप एक छोटा डिसिप्लिन एक्शन लेते हैं, आपके ब्रेन में नए न्यूरल पाथवेज बन रहे होते हैं। जितना ज्यादा आप उस एक्शन को रिपीट करते हैं, उतना ही

स्ट्रांग वो पाथवे बन जाता है। जब तक कि वो ऑटोमेटिक ना हो जाए। यह प्रोसेस स्लो है लेकिन यह परमानेंट है। इमेजिन करिए हर छोटी विन एक प्रिक है। अकेली एक ब्रिक से

कुछ नहीं बनता। लेकिन जब आप रोज एक प्रिक ऐड करते हैं कुछ महीनों बाद एक पूरी बिल्डिंग खड़ी हो जाती है और आपको पता भी नहीं चलता कब यह बन गई। यही 5 मिनट रूल का कांसेप्ट है। जब किसी काम को स्टार्ट करना

मुश्किल लगता है। खुद से कहिए सिर्फ 5 मिनट करूंगा। ब्रेन इसे थ्रेट नहीं समझता और यूजुअली वो 5 मिनट 20-30 मिनट में बदल जाते हैं क्योंकि सबसे मुश्किल पार्ट होता

है सिर्फ स्टार्ट करना। लेकिन यहां पेशेंस जरूरी है क्योंकि शुरुआत में कुछ नहीं बदलेगा। आपको कोई फर्क फील नहीं होगा और यही वह मोमेंट है जहां लोग क्विट कर देते

हैं क्योंकि उनका ब्रेन इंस्टेंट रिजल्ट्स चाहता है। लेकिन जो लोग इस इनविज़िबल फेस को पार कर जाते हैं उनके लिए रिजल्ट्स कंपाउंड होकर एक दिन सडनली विज़िबल हो जाते

हैं। तो आज आप जो छोटा एक्शन ले रहे हैं वो आज कुछ नहीं लगेगा। लेकिन सोचिए एक साल बाद वो छोटा एक्शन आपको कहां ले जा सकता है?

लेकिन इन स्मॉल विंस को सस्टेन करने के लिए सिर्फ विल पावर काफी नहीं है। आपको अपने एनवायरमेंट को भी अपने फेवर में डिजाइन करना होगा। और यही अगला चैप्टर है।

चैप्टर फाइव एनवायरमेंट डिजाइन द ब्रेन हैक। यह एक ऐसी ट्रुथ है जो सक्सेसफुल लोगों को ऑर्डिनरी लोगों से अलग करती है। वो अपने विल पावर पर डिपेंड नहीं करते। वो

अपने एनवायरमेंट को डिजाइन करते हैं ताकि उन्हें विल पावर यूज करना ही ना पड़े। सोचिए अगर आपके सामने हमेशा जंक फूड रखा हो तो हेल्दी ईटिंग कितना मुश्किल हो जाता

है और अगर आपका फोन हमेशा आपके पास हो तो फोकस करना कितना टफ हो जाता है। आपका एनवायरमेंट आपके डिसीजन से ज्यादा पावरफुल है। क्योंकि विल पावर लिमिटेड है लेकिन

एनवायरमेंट का इन्फ्लुएंस कांस्टेंट है। अगर आप हर बार टेंप्टेशन से लड़ते रहेंगे एक दिन आप हार जाएंगे। लेकिन अगर टेंप्टेशन ही आपके सामने नहीं है तो आपको

लड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। यहां कुछ प्रैक्टिकल शिफ्ट्स हैं जो बड़े रिजल्ट्स दे सकते हैं। अपना फोन जब फोकस करना हो दूसरे रूम में रख दीजिए। अपना वर्क स्पेस

क्लीन रखिए जहां सिर्फ वो चीजें हो जो आपके काम से रिलेटेड हैं। अपने गोल्स को विज़िबल बना दीजिए। जैसे एक स्टिकी नोट जिसमें आपका आज का एक इंपॉर्टेंट टास्क

लिखा हो। यह सब छोटी-छोटी चेंजेस लगती हैं। लेकिन यह आपके ब्रेन के लिए पाथ ऑफ लीस्ट रेजिस्टेंस को डिसिप्लिन की तरफ शिफ्ट कर देती हैं। यहां एक डीप इनसाइट

है। डिसिप्लिन एक पर्सनल बैटल नहीं होनी चाहिए जो आप हर दिन लड़े। डिसिप्लिन एक सिस्टम होनी चाहिए जो आपके लिए काम करे। इवन जब आपका मूड ना हो। जब आपका एनवायरमेंट आपके गोल्स के अगेंस्ट है, आप

अपने ही ब्रेन के अगेंस्ट फाइट कर रहे हैं। लेकिन जब एनवायरमेंट आपके गोल्स के फेवर में है, डिसिप्लिन ऑटोमेटिकली आसान हो जाती है। तो अब खुद से पूछिए क्या आप

अपने एनवायरमेंट को कंट्रोल कर रहे हैं या आपका एनवायरमेंट आपको कंट्रोल कर रहा है। लेकिन एनवायरमेंट सिर्फ बाहर की दुनिया तक लिमिटेड नहीं है। आपके अंदर भी एक

एनवायरनमेंट है जिसमें आपके थॉट्स और इमोशंस रहते हैं। और अगला चैप्टर आपको सिखाएगा कि उस इनर एनवायरनमेंट को कैसे मास्टर किया जाए। चैप्टर सिक्स, इमोशनल

मास्टरी एंड द ऑब्जर्वर माइंडसेट। कभी रात को ऐसे लगा है कि आपके अंदर थॉट्स का शोर इतना है कि साइलेंस भी नॉइज़ लगने लगता है। कभी एंगर में ऐसा डिसीजन लिया है जिसका

पछतावा बाद में हुआ। कभी फियर की वजह से कुछ अवॉइड किया है जो आपको करना चाहिए था। यह सब मोमेंट्स हैं जहां आप अपने इमोशंस के कंट्रोल में होते हैं ना कि इमोशंस

आपके कंट्रोल में। यहां एक हिडन ट्रुथ है जो सब कुछ बदल देती है। आप अपने थॉट्स नहीं है। आप वो हैं जो उन थॉट्स को ऑब्जर्व करता है। जब तक आप हर थॉट को सच

मानते रहेंगे आप उसके कंट्रोल में रहेंगे। लेकिन जिस दिन आप अपने थॉट्स को डिस्टेंस से देखना शुरू करते हैं, कंट्रोल आपके हाथ में आने लगता है। इमेजिन करिए आपका माइंड एक रेडियो स्टेशन है जिसमें अलग-अलग

फ्रीक्वेंसीज चल रही हैं। कभी फियर, कभी एंगर, कभी लेज़नेस और आप अननोइंगली हर चैनल सुन लेते हैं। लेकिन अगर आप खुद डिसाइड करें कि कौन सा चैनल सुनना है, यही इमोशनल

कंट्रोल है। रिएक्शन नहीं, रिस्पांस चूज़ करना। इसके लिए सबसे पावरफुल टूल है अवेयरनेस। जब भी कोई स्ट्रांग इमोशन आए

इमीडिएटली रिएक्ट मत करिए। बस एक सेकंड के लिए रुक जाइए। खुद से पूछिए मैं अभी क्या फील कर रहा हूं और क्यों? यह छोटा सा पॉज

आपको ऑटोमेटिक रिएक्शन से बाहर निकालता है और आपको कॉन्शियस कंट्रोल देता है। यह प्रैक्टिस शुरू में मुश्किल लगेगी क्योंकि आपका ब्रेन फमिलियर पैटर्न्स रिपीट करना

चाहता है। लेकिन जितनी बार आप पॉज करके कॉन्शियस चॉइस लेंगे उतना ही यह नया पैटर्न स्ट्रांग होता जाएगा। जब तक कि आपका माइंड आपका एनिमी नहीं आपका टूल बन

जाए। तो जब अगली बार कोई स्ट्रांग इमोशन आए क्या पुरानी हैबिट फॉलो करेंगे या आप पॉज करके प्रूव करेंगे कि कंट्रोल आपके हाथ में है? लेकिन इमोशनलस्टरी सिर्फ एक

दिन का काम नहीं है। यह एक डेली प्रैक्टिस है और यही आखिरी और सबसे पावरफुल चैप्टर का टॉपिक है। एक साल बाद का कैसा दिखेगा?

वही पुरानी हैबिट्स, वही अधूरे गोल्स, वही कल से शुरू करूंगा वाला वर्जन। या एक ऐसा इंसान जो सुबह उठते ही क्लेरिटी के साथ काम पर लग जाता है जो डिस्ट्रैक्शंस के

बीच भी फोकस्ड रहता है और जो हर दिन अपने गोल्स के करीब पहुंचता जा रहा है। फर्क सिर्फ एक चीज का है आपकी डेली हैबिट्स।

सक्सेस कभी एक बड़े डिसीजन से नहीं आती। यह उन छोटे-छोटे एकशंस से बनती है जो आप हर दिन रिपीट करते हैं। लेकिन प्रॉब्लम यह है कि लोग डेली हैबिट्स को अंडरएस्टिमेट

करते हैं। उन्हें लगता है इतना छोटा काम क्या फर्क डालेगा और यहीं वो हार जाते हैं। क्योंकि छोटे एक्शंस कंपाउंड होकर बड़े रिजल्ट्स बनाते हैं। लेकिन यह स्लोली

होता है। इतना स्लोली कि शुरुआत में कुछ चेंज फील ही नहीं होता। यहीं पर पेशेंस की परीक्षा होती है। आपका माइंड इंस्टेंट रिजल्ट्स चाहता है। अगर उसे तुरंत रिवॉर्ड नहीं मिलता, वह

इंटरेस्ट खो देता है और आपको कन्विंस करता है। इससे कुछ नहीं होगा। लेकिन डिसिप्लिन एक सीड की तरह है जिसे रोज पानी देना पड़ता है। भले ही शुरुआत में कोई फल दिखाई

ना दे। इमेजिन करिए अगर आप अपनी डेली लाइफ में कुछ सिंपल लेकिन पावरफुल हैबिट्स डाल दें। सुबह उठते ही 10 मिनट प्लानिंग करना, दिन का एक क्लियर गोल सेट करना,

डिस्ट्रैक्शंस को लिमिट करना और हर दिन अपने सबसे इंपॉर्टेंट टास्क पे फोकस्ड एक्शन लेना। धीरे-धीरे यह एकशंस आपकी आइडेंटिटी बन जाएंगे। फिर आपको खुद को पुश

करने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि आप वही इंसान बन जाएंगे जो नेचुरली डिसिप्लिंड है। लेकिन याद रखिए हैबिट्स तभी टिकती हैं जब वो सिंपल और रियलिस्टिक हैं। अगर आप एक

साथ परफेक्ट बनने की कोशिश करेंगे आप जल्दी बर्न आउट हो जाएंगे। तो कंसिस्टेंसी को परफेक्शन से ऊपर रखिए। हर दिन थोड़ा करिए लेकिन करिए जरूर। क्योंकि एक दिन मिस

करना आपको नहीं तोड़ता लेकिन बार-बार छोड़ना आपको वापस वहीं ले जाता है जहां से आप शुरू हुए थे। अब तक आपने समझ लिया है कि आपका ब्रेन डिफॉल्ट क्यों कंफर्ट चूज

करता है। डोपामिन का ट्रैप आपको कैसे कंट्रोल करता है। आइडेंटिटी विल पावर से क्यों ज्यादा पावरफुल है? स्मॉल विंस कैसे आपके ब्रेन को रिवायर करते हैं?

एनवायरमेंट डिजाइन कैसे एफर्टलेस डिसिप्लिन क्रिएट करता है? इमोशंस को

मास्टर करने का तरीका क्या है? और डेली

हैबिट्स कैसे कंपाउंड होकर आपकी पूरी लाइफ बदल देते हैं। लेकिन यह सब नॉलेज तब तक बेकार है जब तक आप इसे एक्शन में नहीं बदलते। सोचिए अगर आज से एक साल बाद आप वही

इंसान हैं जो आज हैं। वही हैबिट्स, वही एक्सक्यूसेस, वही रिग्रेट्स तो कैसा लगेगा? काश मैंने उस दिन खुद को बदल लिया

लगेगा? काश मैंने उस दिन खुद को बदल लिया होता। यह काश वही शब्द है जो जिंदगी भर इंसान को अंदर से तोड़ता रहता है। क्योंकि ओपोरर्चुनिटीज बार-बार नहीं आती लेकिन

डिसीजंस हर दिन आते हैं और हर छोटा डिसीजन आपकी पूरी जिंदगी की डायरेक्शन तय करता है। आप स्पेशल नहीं है लेकिन आप कैपेबल हैं। आपके अंदर भी वही ब्रेन है। वही

पोटेंशियल है। फर्क सिर्फ इतना है कि कुछ लोग अपने माइंड को कंट्रोल करना सीख जाते हैं और कुछ लोग पूरी जिंदगी उससे कंट्रोल होते रहते हैं। और आज आपके सामने भी वही

चॉइस खड़ी है। तो आखिरी सवाल यह है अगर आज रात आप सो जाएं और सुबह उठे एक बिल्कुल नए फुल्ली डिसिप्लिन वर्जन के रूप में। सबसे पहला काम जो आप करेंगे वो क्या होगा?

कमेंट में जरूर लिखिए। क्योंकि मैं पढ़ना चाहता हूं कि आपका जवाब क्या है? और अगर

यह वीडियो आपको हेल्पफुल लगा तो इसे लाइक करिए, चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए और अगले वीडियो में मिलते हैं जहां हम इस जर्नी को आगे ले जाएंगे।

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