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Vasuki the Serpent King: The Secret Behind Shiva’s Snake (Full Mythology Story) | True Realms

By True Realms

Summary

Topics Covered

  • सच्ची भक्ति देती है, मांगती नहीं
  • जब राजा खुद रस्सी बन गया
  • एक मां का झूठ, पूरे वंश का दर्द
  • सर्पों में मैं वासुकी हूं

Full Transcript

कल्पना कीजिए एक ऐसा प्राणी जिसकी सांस में जहर है जिसका स्पर्श मृत्यु है जिसकी आंखों में समूचा ब्रह्मांड समाया है और

फिर कल्पना कीजिए कि उस प्राणी को खुद महादेव ने अपने गले में धारण किया क्यों क्योंकि वो कोई साधारण सर्प नहीं था वो था

वासुकी नागों का राजा वो सर्प जिसने एक बार अपना पूरा शरीर रस्सी की तरह दे दिया ताकि देवता और असुर मिलकर सृष्टि को बचा

सके। वो राजा जिसने असहनीय दर्द में भी मुंह नहीं खोला। वो भक्त जिसके बारे में खुद भगवान कृष्ण ने गीता में कहा सर्पों

में मैं वासुकी हूं। लेकिन दोस्तों वासुकी की कहानी सिर्फ समुद्र मंथन तक नहीं रुकती। उनकी कहानी में है एक कठोर तपस्या [संगीत] जिसने शिव

को पिघला दिया। एक श्राप जिसने पूरी नाग जाति को तोड़ दिया और एक ऐसा त्याग जिसे तीनों लोकों ने याद रखा। क्या वासुकी

सिर्फ एक सर्प थे या एक दर्शन, एक जीवन सत्य। आज की इस यात्रा में आप जानेंगे वासुकी की वो कहानियां जो ग्रंथों में दबी

रह गई। [संगीत] वो सच्चाइयां जो आपकी अपनी जिंदगी से सीधी जुड़ती हैं। तो बने रहिए हमारे साथ क्योंकि यह सिर्फ एक कहानी नहीं

यह उस राजा की गाथा है जिसने खुद को मिटाकर दुनिया [संगीत] को बचाया। दोस्तों सबसे पहले बात करते हैं वासुकी थे

कौन? हमारे पुराणों में खासकर महाभारत,

कौन? हमारे पुराणों में खासकर महाभारत, विष्णु पुराण, शिव पुराण और भागवत पुराण में वासुकी का उल्लेख बड़े ही आदर और

श्रद्धा के साथ किया गया है। वासुकी महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रु माता के पुत्र थे। कद्रु को सर्पों की माता कहा जाता है। उनके गर्भ से हजारों नागों ने

जन्म लिया। शेषनाग, वासुकी, [संगीत] तक्षक, कर्कोटक, पद्म और भी अनेक। लेकिन इन सब में वासुकी अलग थे। आपने शेषनाग का

नाम जरूर सुना होगा। शेषनाग जो भगवान विष्णु की शैया हैं जिनके फन पर पूरी पृथ्वी टिकी है। शेषनाग जेष्ठ थे सबसे

बड़े। लेकिन वासुकी वासुकी नागराज थे। नागोक के राजा। वो जो काम करते थे वो ना शेषनाग ने किया ना किसी और ने। अगर शेषनाग

शक्ति और धैर्य के प्रतीक हैं तो वासुकी त्याग और भक्ति के। शेषनाग विष्णु की सेवा में है। वासुकी शिव के गले में है। दोनों

महान लेकिन दोनों के रास्ते अलग। दोनों की कहानियां अलग। वासुकी के बारे में ग्रंथों में कहा गया है कि उनके पास एक अद्भुत नागमणि थी जो उनके मस्तक पर चमकती थी।

[संगीत] इस मणि की रोशनी इतनी तेज थी कि अंधेरे में भी पूरा नागोक जगमगा उठता था। उन्हें नौ फनों वाला भी कहा जाता है। हर

फन एक दिशा का एक शक्ति का प्रतीक। उनकी आंखों में एक अजीब सम्मोहन था। कोई भी उनकी आंखों में देखता तो उसे अपनी गलतियां खुद याद आ जाती थी। वो न्याय के राजा थे।

ना कमजोर पर अत्याचार करते थे ना शक्तिशाली से डरते थे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान थी [संगीत] उनकी भक्ति। वासुकी

नागलोक के राजा थे। नागलोक यानी पाताल लोक का वो हिस्सा जहां सर्पों का साम्राज्य था। जहां रत्न माणिक्य से भरे महल थे। जहां नाग कन्याएं नृत्य करती थी। जहां

ज्ञान की नदियां बहती थी और जहां वासुकी न्याय और प्रेम के साथ राज करते थे। उनके दरबार में कोई भेद नहीं था। छोटा नाग हो

या बड़ा सबको समान न्याय मिलता था। यही उनकी महानता थी। यही उनका धर्म था। [संगीत] लेकिन दोस्तों वासुकी की असली कहानी की शुरुआत होती है उस तपस्या से जो

उन्होंने भगवान शिव के लिए की थी। बहुत पहले की बात है जब नागलोक अभी-अभी बसा था। जब वासुकी अभी युवा थे। वासुकी ने सुना था शिव के बारे में, उन महादेव के बारे में जो

[संगीत] तीनों लोकों के स्वामी हैं, जो भस्म लगाते हैं, जो श्मशान में रहते हैं, जो मृत्यु से भी नहीं डरते और वासुकी के मन में एक इच्छा जागी।

मैं इन्हीं की सेवा करूंगा। इन्हीं को अपना सब कुछ दूंगा। वासुकी ने तपस्या शुरू की। कठोर, बहुत

कठोर। वासुकी हिमालय की गुफा में बैठ गए ध्यान में उन्होंने भोजन त्याग दिया जल त्याग दिया ओम नमः शिवाय

दिन बीते महीने बीते साल बीते जंगल में तूफान आए बर्फ गिरी धरती कामी लेकिन वासुकी नहीं हिले उनके शरीर पर दीमके चढ़

गई लेकिन वो नहीं हिले उनके चारों ओर जंगल की आग लग गई लेकिन वो नहीं हिले बस एक ही नाम शिव शिव

शिव और फिर एक दिन वो पल आया जमीन हिली आकाश गरजा और वासुकी के सामने प्रकट हुए भगवान

शिव जटा में गंगा [संगीत] माथे पर चंद्रमा गले में रुद्राक्ष आंखों में एक अजीब शांति शिव ने वासुकी को देखा

मुस्कुराए और बोले वासुकी तुम्हारी भक्ति ने मुझे यहां खींच लिया मांगो क्या चाहते हो?

वासुकी ने आंखें खोली। शिव को देखा और बोले प्रभु [संगीत] मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस इतना कि मैं हमेशा आपके पास रहूं आपकी सेवा में।

शिव एक पल के लिए चुप रहे और फिर बोले तथास्तु। आज से तुम मेरे गले के आभूषण बनोगे। दोस्तों सोचिए इस पल को जो भगवान तीनों

लोकों के स्वामी हैं। जिनके पास देने को सब कुछ था। धन, शक्ति, अमरता और वासुकी ने मांगा क्या? बस [संगीत] सेवा का अधिकार।

मांगा क्या? बस [संगीत] सेवा का अधिकार। यही सच्ची भक्ति है जो मांगता नहीं जो देता है और शिव ने भी इसे समझा। [संगीत] इसीलिए उन्होंने वासुकी को ऐसा स्थान दिया

जो किसी देवता को नहीं मिला। खुद अपने गले में। आज भी जब आप शिव की तस्वीर देखते [संगीत] हैं। उनके गले में लिपटा नाग। वो

वासुकी हैं। आज भी हर पल। लेकिन दोस्तों वासुकी की कहानी यहां नहीं रुकती। अब आने वाला था वो दिन जो वासुकी की असली परीक्षा

था। वो दिन जब उनकी जान दांव पर थी। जब उन्हें एक ऐसे काम के लिए हां कहनी थी जिसका दर्द शायद मृत्यु से भी बड़ा था। त्रेता युग की बात है। देवताओं और असुरों

के बीच हमेशा से युद्ध चलता रहता था। देवता जीतते असुर हारते। फिर असुर जीतते देवता हारते। एक बार देवताओं को ऋषि

दुर्वासा का श्राप मिला। उनकी दिव्य शक्ति क्षीण हो गई। देवताओं के राजा इंद्र अपना राज खो बैठे। स्वर्ग पर असुरों का कब्जा

हो गया। देवता भागते-भागते भगवान विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु जी ने कहा, घबराओ नहीं।

क्षीर सागर का मंथन करो। उससे अमृत निकलेगा। वो अमृत पीकर तुम अमर हो जाओगे। फिर कोई असुर तुम्हें नहीं हरा सकेगा।

लेकिन समुद्र मंथन करना आसान नहीं था। मंथन के लिए मंद्राचल पर्वत को मथानी बनाना था और मथानी के लिए एक रस्सी चाहिए

थी। कोई साधारण रस्सी नहीं ऐसी रस्सी जो पूरे मंद्राचल पर्वत को थाम सके जिसमें इतनी शक्ति हो कि देवता और असुर दोनों मिलकर खींचे तो भी टूटे नहीं। ब्रह्मा जी

बोले [संगीत] इस काम के लिए सिर्फ एक ही रस्सी काम आएगी। देवता उत्साहित हुए। [संगीत] कौन सी?

ब्रह्मा जी ने कहा वासुकी [संगीत] और यह सुनकर पूरे ब्रह्मांड में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। देवता और असुर दोनों

मिलकर नागलोक गए। वासुकी अपने राज सिंहासन पर बैठे थे। देवताओं ने हाथ जोड़े। असुरों ने सिर झुकाया। [संगीत] बोले हे नागराज हमें आपकी जरूरत है। समुद्र

मंथन [संगीत] के लिए सृष्टि की रक्षा के लिए। वासुकी समझ गए क्या मांगा जा रहा है। वो जानते थे इस काम में क्या होगा। पर्वत

का भार उनकी पीठ पर होगा। दोनों तरफ से खिंचाई होगी। उनका शरीर टूटेगा। उनके घाव होंगे। उनका जहर बाहर निकलेगा। एक पल

वासुकी चुप रहे और फिर बोले मैं तैयार हूं। मंथन शुरू होता है। मंद्राचल पर्वत समुद्र के बीच रखा गया। वासुकी ने उसके

चारों ओर अपना शरीर लपेट लिया। देवता एक तरफ खड़े हुए। असुर दूसरी तरफ और खिंचाई

शुरू हुई। एक दो तीन पर्वत घूमा। समुद्र हिला लेकिन साथ ही वासुकी का दर्द शुरू हुआ। पर्वत का वजन उनकी रीड पर था। दोनों

तरफ से खिंचाव था। [संगीत] उनका शरीर जगह-जगह से छिल रहा था। लेकिन वह कुछ नहीं बोले। चुपचाप सहते रहे। भगवान विष्णु ने

एक चतुर योजना बनाई थी। उन्होंने देवताओं से कहा, वासुकी की पूंछ की तरफ खड़े रहो। असुरों ने सोचा,

हम तो सिर की तरफ रहेंगे। सिर में शक्ति होती है। हम ज्यादा ताकत से खींचेंगे। उन्हें नहीं पता था। विष्णु ने उन्हें

फंसा दिया था। जैसे-जैसे मंथन तेज हुआ, वासुकी के मुंह से धुआं निकलने लगा। आग के गोले निकलने लगे और वह सीधे असुरों के

मुंह पर जा रहे थे। असुर जलने लगे, भागने लगे, चिल्लाने लगे। लेकिन वासुकी वासुकी को पता भी नहीं था कि उनका दर्द देवताओं

की रक्षा कर रहा है। उनकी तकलीफ किसी के काम आ रही है। मंथन होता रहा। एक के बाद एक अद्भुत अकल्पनीय चीजें निकलने लगी।

कामधेनु वो गाय जो हर इच्छा पूरी करती है। उच्चश्रवा सात मुखों वाला दिव्य घोड़ा एरावत चार सूंड वाला श्वेत हाथी जो इंद्र

का वाहन बना कल्पवृक्ष वो पेड़ जिसके नीचे बैठने से हर कामना पूरी होती है। रंभा जैसी अप्सराएं जिन्होंने स्वर्ग [संगीत]

को सजाया। मां लक्ष्मी जो विष्णु जी की संगिनी बनी। धनवंतरी देवताओं के वैद्य हाथ में अमृत का कलश लिए। एक से बढ़कर एक रत्न

निकल रहे थे। देवता प्रसन्न थे। लेकिन तभी कुछ और निकला। कुछ ऐसा जिसे देखकर देवता और असुर दोनों कांप गए। हलाहल महावश।

समुद्र की सतह काली पड़ने लगी। एक अजीब गंध आई। ऐसी जो नाक और फेफड़े जला दे। पानी उबलने लगा। पेड़ सूखने लगे। पक्षी

आकाश से गिरने लगे [संगीत] और फिर निकला हलाहल। कालकूट विष महावश। ऐसा जहर जो पूरी सृष्टि को एक पल में नष्ट कर सकता था।

देवता भागे, असुर भागे, ब्रह्मा जी स्तब्ध हो गए। और वासुकी वासुकी अभी भी वहीं थे। उसी पर्वत से लिपटे हुए। वो भाग नहीं सकते

थे। उन्होंने वचन दिया था। उन्होंने उस हलाहल की गंध महसूस की। उनका पूरा शरीर जल रहा था। लेकिन वो नहीं हिले। सब चिल्लाए।

इसे कौन रोकेगा?

और तब एक ही नाम गूंजा शिव। भगवान शिव आगे आए। मां पार्वती घबराई हुई। आंखों में चिंता। शिव ने वो हलाहल अपनी हथेली में

लिया। देवताओं की सांसे रुक गई और शिव ने वो हलाहल पी लिया। मां पार्वती ने तुरंत उनका कंठ थाम लिया। जहर नीचे नहीं उतरा।

वो जहर शिव के कंठ में ही रुक गया और उनका कंठ नीला पड़ [संगीत] गया। इसीलिए महादेव को नीलकंठ कहते हैं उस दिन से आज तक। और

दोस्तों उस पल जब शिव ने हलाहल पिया वासुकी भी उनके [संगीत] गले में लिपटे थे। उन्होंने भी वो जहर महसूस किया। समुद्र

मंथन का दर्द अलग था लेकिन अपने भगवान को जहर पीते देखने का दर्द वो और भी गहरा था। वासुकी की आंखें भर आई। उन्होंने शिव को

और कसकर थाम लिया। जैसे कह रहे हो प्रभु [संगीत] मैं हूं। मैं हमेशा यहां हूं। और शिव ने

अपनी बंद आंखों से वासुकी की उस भावना को महसूस किया और मुस्कुराए। दोस्तों, समुद्र मंथन के बाद भी वासुकी की कहानी खत्म नहीं हुई। एक बार ब्रह्मा जी ने तीन असुरों,

[संगीत] तारकाक्ष, विद्युन माली और कमलाक्ष को वरदान दिया था। इन तीनों ने तीन नगर बनाए। सोने का, चांदी का और लोहे का। यह तीनों

नगर मिलकर त्रिपुर कहलाए। [संगीत] वरदान था कि यह तीनों नगर जब एक सीध में आए तभी नष्ट हो सकते हैं और यह काम सिर्फ एक ही बाण से होगा। असुर अत्याचार करने लगे।

देवता फिर परेशान हुए। भगवान शिव ने त्रिपुर नष्ट करने का निश्चय किया। उन्होंने अपना विशाल धनुष उठाया। लेकिन

धनुष की डोरी नहीं थी। शिव ने इधर-उधर देखा। तभी वासुकी आगे आए। बोले प्रभु मुझे अपनी धनुष की डोरी बनाइए। शिव ने

वासुकी को देखा। मुस्कुराए और बोले तथास्तु वासुकी उस विशाल धनुष में डोरी बन गए। [संगीत] शिव ने पाशुपतास्त्र चढ़ाया।

तीनों नगर एक सीध में आए और उस एक बाण से त्रिपुर भस्म हो गया। देवता जय जयकार करने लगे और वासुकी एक बार फिर खुशी उनकी नहीं

थी। श्रेय उनका [संगीत] नहीं था लेकिन सेवा उनकी थी और वह काफी था। यही वासुकी थे हमेशा पीछे हमेशा निस्वार्थ हमेशा

तैयार। दोस्तों महाभारत काल की बात है। पांडव वनवास पर थे 12 साल का वनवास। जंगल-जंगल भटकना। कभी भूख कभी खतरा कभी अकेलापन। [संगीत]

एक दिन भीम जो पांचों पांडवों में सबसे बलशाली थे। जिनके शरीर में हजार हाथियों का बल था। अकेले एक घने जंगल में घूम रहे

थे। तभी एक नदी के किनारे उन्हें एक विशाल अजगर मिला। इतना विशाल कि उसने पलक झपकते भीम को अपनी कुंडली में जकड़ लिया। भीम ने

पूरी ताकत लगाई लेकिन वो हिल भी नहीं पाए। जो भीम पहाड़ तोड़ सकते थे। आज एक सर्प की पकड़ में थे। यह कोई साधारण सर्प नहीं था।

यह थे नाग वंश के एक महान राजा जो किसी श्राप के कारण अजगर बन गए थे। श्राप था कि जब कोई ज्ञानी पुरुष उनके सवालों का सही

जवाब दे तभी उनका उद्धार होगा। भीम के पास बल था ज्ञान नहीं इसलिए वह असहाय थे। जब बहुत देर तक भीम नहीं लौटे तो युधिष्ठिर

उन्हें ढूंढते हुए वहां पहुंचे। उन्होंने देखा भीम उस विशाल सर्प की पकड़ में है। युधिष्ठिर घबराए नहीं। [संगीत] उन्होंने शांति से उस सर्प से बात की। उनके हर सवाल

का सही, गहरा और धर्म युक्त जवाब दिया और उस जवाब से उस नाग राजा का श्राप टूट गया। वो मुक्त हो गए। उन्होंने आशीर्वाद देकर

प्रस्थान किया। यह बात जब नागोक तक पहुंची जब वासुकी को पता चला कि पांडवों ने उनके एक बंधु नाग को श्राप से मुक्त किया तो वासुकी का हृदय भर आया। [संगीत] उन्होंने

भीम को बुलाया और अपना आशीर्वाद दिया। 10,000 हाथियों का बल। भीम जो पहले से ही अजय थे अब और भी शक्तिशाली हो गए। दोस्तों

अब तक आपने देखा कि वासुकी ने कितना त्याग किया, कितना दर्द सहा, कितनी बार सबकी मदद की। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब वासुकी खुद

टूट गए। और इस दर्द की जड़ थी उनकी अपनी मां कद्रू। हुआ यूं कि एक बार कदू और उनकी सौतेली बहन विंता के बीच एक [संगीत] शर्त

लगी। शर्त थी देवताओं के दिव्य घोड़े उच्च श्रवा की पूंछ किस रंग की है? कदू ने कहा काली है। विंता ने कहा सफेद है। जो हारे

वो जीतने वाले की दासी बनेगी। अब असलियत यह थी कि घोड़े की पूंछ सफेद थी। यानी कदू हारने वाली थी। लेकिन कदू को दासी नहीं बनना था। तो उन्होंने अपने नागपुत्रों को

बुलाया और कहा। जाओ उस घोड़े की पूंछ पर लिपट जाओ। बाल-बाल काले दिखने चाहिए।

कुछ नागों ने डर के मारे हां कर दी। लेकिन कई नागों [संगीत] ने साफ मना कर दिया। बोले मां यह झूठ है या पाप [संगीत] है हम नहीं करेंगे।

कदू को गुस्सा आया। उन्होंने उन सभी नागों को श्राप दे दिया। तुम सब एक दिन अग्नि में चलोगे। एक मां ने अपने ही बच्चों को श्राप दे

दिया। सिर्फ इसलिए कि उन्होंने झूठ बोलने से मना किया था और उस एक श्राप का बोझ पूरी नाग जाति को उठाना था। वासुकी को जब

यह पता चला उनका मन भारी हो गया। वो जानते थे मां का यह पाप एक दिन भारी पड़ेगा। [संगीत] दोस्तों यह श्राप सच हुआ। महाभारत

के बाद गुरु वंश में एक राजा हुए जन्मेजय। वो राजा परीक्षित के पुत्र थे और परीक्षित अर्जुन के पोते थे। एक दिन नाग तक्षक ने राजा परीक्षित को डस लिया। परीक्षित की

मृत्यु हो गई। [संगीत] जन्मेजय टूट गए। पिता की मृत्यु का दर्द असहनीय था और वो दर्द धीरे-धीरे क्रोध में बदल गया। जन्मेजय ने सोचा

सिर्फ तक्षक को नहीं पूरी नाग जाति को खत्म करूंगा। उन्होंने एक महायज्ञ शुरू किया। सर्प यज्ञ। यह यज्ञ कोई साधारण यज्ञ नहीं था।

इसमें मंत्र पढ़े जाते थे और हर मंत्र के साथ एक नाग का नाम लिया जाता था और वो नाग चाहे कहीं भी हो खींचता चला आता था। सीधे

उस धकती [संगीत] अग्नि में मंत्र शुरू हुए आग धकने लगी और नाग एक-एक करके उस अग्नि में गिरने लगे। छोटे नाग, बड़े नाग,

[संगीत] बूढ़े, बच्चे, माताएं सब। नागोक में हाहाकार मच गया। चारों तरफ चीखें थी, रोना था, दर्द था। वो श्राप सच हो रहा था

जो कदू ने कभी गुस्से में दिया था। और वासुकी वो नागोक में बैठे थे [संगीत] और हर उस आवाज को सुन रहे थे। हर मंत्र के

साथ एक नाम, हर नाम के साथ एक चेहरा, हर चेहरे के साथ एक याद। यह तो मेरे दरबार का सेवक था।

यह तो मेरे भाई का मित्र था। यह तो अभी बच्चा था। वासुकी की आंखें भर आई। जो राजा कभी नहीं रोए थे। समुद्र मंथन के दर्द में नहीं

रोए। त्रिपुर दहन [संगीत] में नहीं रोए। आज रो रहे थे। उनकी प्रजा जल रही थी। उनके भाई जल रहे थे और वह कुछ नहीं कर सकते थे।

क्योंकि यह श्राप था। उनकी अपनी मां का श्राप। वासुकी के मन में एक ही सवाल था। क्या एक मां की गलती की सजा हमेशा बच्चों

को मिलती है? क्या एक झूठ पूरे वंश को मिटा सकता है? वासुकी ने आंखें बंद की। शिव को याद [संगीत] किया मन ही मन बोले।

प्रभु मैंने हमेशा सबकी मदद की। आज मेरी मदद करो। रास्ता दिखाओ। दोस्तों वासुकी की प्रार्थना सुनी गई।

दरअसल बहुत पहले जब यह श्राप दिया गया था तब ब्रह्मा जी ने वासुकी [संगीत] को एक उपाय बताया था। उन्होंने कहा था वासुकी तुम्हारी बहन जरतकारू [संगीत]

का विवाह ऋषि जरतकारू से होगा। उनका एक पुत्र होगा आस्तिक और वही आस्तिक [संगीत] एक दिन इस सर्प यज्ञ को रोकेगा। वासुकी को वह बात याद आई। उन्होंने अपनी बहन मनसा देवी की [संगीत]

ओर देखा जो खुद दर्द में थी। खुद रो रही थी। वासुकी ने कहा बहन तेरा बेटा ही हमारी आखिरी [संगीत] उम्मीद है।

मनसा देवी ने अपने आंसू पोंछे बोली भाई आस्तिक [संगीत] जाएगा हमारा वंश बचेगा। आस्तिक युवा थे। तेजस्वी थे। वेद ज्ञान से

भरे हुए। वो उस यज्ञ स्थल पर पहुंचे जहां आग धक रही थी। मंत्र गूंज रहे थे। हर तरफ भय था। लेकिन आस्तिक निडर थे। उन्होंने

वहां वेदों का इतना सुंदर पाठ किया। इतने गहरे [संगीत] ज्ञान की बातें की कि राजा जन्मेजय स्तब्ध रह गए। जन्मेजय ने खुश होकर कहा, मांगो

जो चाहो [संगीत] मांगो। आस्तिक ने एक पल भी नहीं लिया। बोले राजन [संगीत] यह यज्ञ रोक दीजिए।

जन्मेजय के मन में द्वंद हुआ। लेकिन वचन दे [संगीत] चुके थे। वचन से पीछे नहीं हट सकते थे। यज्ञ रुक गया। नाग जाति बच गई। नागोक में उत्सव हुआ। आंसू और खुशी दोनों

एक साथ और [संगीत] वासुकी वो झुककर आस्तिक के पैरों में गिर गए। बोले तुमने आज मेरे [संगीत] पूरे वंश को जीवन दिया। मैं तुम्हारा रुणी हूं।

एक राजा का सबसे बड़ा धर्म यही था अपनी प्रजा को बचाना और वासुकी ने वो [संगीत] धर्म निभाया। दोस्तों वासुकी की महानता का सबसे बड़ा प्रमाण मिलता है [संगीत] भगवत

गीता में। कुरुक्षेत्र के युद्ध क्षेत्र में जब अर्जुन टूट गए थे, जब उनके हाथ से गांडीव [संगीत] छूट रहा था, तब भगवान कृष्ण ने अपना विराट स्वरूप दिखाया और

कहा, मैं सब में हूं। देवताओं में [संगीत] इंद्र हूं। नदियों में गंगा हूं। मांसों में मार्गशीर्ष हूं।

और सर्पों में मैं वासुकी हूं। गीता का [संगीत] दसवां अध्याय विभूति योग। जब भगवान ने खुद कहा, सर्पों में मैं वासुकी

हूं। [संगीत] इससे बड़ा सम्मान, इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है? आज भी हर [संगीत] साल श्रावण मास में नाग पंचमी मनाई जाती है। उस दिन नागों की पूजा होती

है। दूध चढ़ाया जाता है। यह पूजा किस लिए?

वासुकी की याद में। [संगीत] उनके त्याग की याद में। उस राजा की याद में जिसने कभी मांगा नहीं। बस दिया। [संगीत] और हर

शिवलिंग पर जो नाग लिपटा है वह वासुकी है। आज भी हर मंदिर में हर शिवलिंग पर वो आज भी अपने भगवान की सेवा में है। तो दोस्तों

ये थी वासुकी की वो अद्भुत गाथा। वो नाग जिसने तपस्या से शिव को पाया। वो राजा जिसने खुद को रस्सी बनने दिया ताकि अमृत निकले। वो भक्त जिसने हलाहल के दर्द में

भी अपने भगवान को थामे रखा। वो रक्षक जिसने अपनी पूरी प्रजा को बचाने के लिए रास्ता निकाला और वो महान आत्मा जिसके बारे में खुद भगवान कृष्ण ने कहा सर्पों

में मैं वासुकी हूं। वासुकी हमें सिखाते हैं [संगीत] सच्ची भक्ति वो नहीं जो मांगती है। सच्ची भक्ति वो है जो देती है। सच्चा राजा वो नहीं जो सिंहासन पर बैठे।

[संगीत] सच्चा राजा वो है जो प्रजा के लिए खड़ा हो। और सच्चा प्रेम वो नहीं जो दिखावे में हो। सच्चा प्रेम वो है जो दर्द में भी साथ ना छोड़े। अगले वीडियो में हम

लाएंगे शेषनाग का रहस्य, तक्षक [संगीत] की कहानी और नागोक का अनजाना इतिहास। अगर इस कहानी ने आपके मन को छुआ हो तो लाइक जरूर

करें। [संगीत] कमेंट में लिखें जय नागराज वासुकी और बताएं कि आपको वासुकी की कौन सी बात सबसे ज्यादा पसंद आई। चैनल को सब्सक्राइब करें और बेल आइकन दबाएं ताकि

कोई कहानी छूटे नहीं। अगले वीडियो में मिलते हैं एक और रहस्यमय यात्रा के साथ। तब तक के लिए जय महादेव, जय नागराज।

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